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कर्मभूमि Karmbhumi

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कर्मभूमि प्रेमचन्द का राजनीतिक उपन्यास है जो पहली बार १९३२ में प्रकाशित हुआ। आज कई प्रकाशकों द्वारा इसके कई संस्करण निकल चुके हैं। इस उपन्यास में विभिन्न राजनीतिक समस्याओं को कुछ परिवारों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। ये परिवार यद्यपि अपनी पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे हैं तथापि तत्कालीन राजनीतिक आन्दोलन में भाग ले रहे हैं।

उपन्यास का कथानक काशी और उसके आस-पास के गाँवों से संबंधित है। आन्दोलन दोनों ही जगह होता है और दोनों का उद्देश्य क्रान्ति है। किन्तु यह क्रान्ति गाँधी जी के सत्याग्रह से प्रभावित है। गाँधीजी का कहना था कि जेलों को इतना भर देना चाहिए कि उनमें जगह न रहे और इस प्रकार शांति और अहिंसा से अंग्रेज सरकार पराजित हो जाए। इस उपन्यास की मूल समस्या यही है। उपन्यास के सभी पात्र जेलों में ठूस दिए जाते हैं। इस तरह प्रेमचन्द क्रान्ति के व्यापक पक्ष का चित्रण करते हुए तत्कालीन सभी राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याओं को कथानक से जोड़ देते हैं। निर्धनों के मकान की समस्या, अछूतोद्धार की समस्या, अछूतों के मन्दिर में प्रवेश की समस्या, भारतीय नारियों की मर्यादा और सतीत्व की रक्षा की समस्या, ब्रिटिश साम्राज्य के दमन चक्र से उत्पन्न समस्याएँ, भारतीय समाज में व्याप्त धार्मिक पाखण्ड की समस्या पुनर्जागरण और नवीन चेतना के समाज में संचरण की समस्या, राष्ट्र के लिए आन्दोलन करने वालों की पारिवारिक समस्याएँ आदि इस उपन्यास में बड़े यथार्थवादी तरीके से व्यक्त हुई हैं।

'कर्मभूमि' का नायक अमरकांत एक अस्थिर गांधीवादी के रूप में चित्रित किया गया है। अमरकांत तत्कालीन मध्यमवर्ग का प्रतिनिधि है, जिसकी मूल-प्रवृत्ति स्थिति के प्रति समझौतावादी है, उसकी राजनीतिक दृष्टि एवं चारित्रिक दृढ़ता अविश्वसनीय है। गांधीवाद से प्रभावित जन समुदाय की भावना, सामूहिक सत्याग्रह, गांवों के रचनात्मक कार्यक्रम का चित्रण पूरी आस्था से किया गया है। इनके सभी चरित्रों द्वारा लेखक ने राष्ट्रीय चेतना, आदर्श पारिवारिक व्यवस्था आदि में गांधी दर्शन स्पष्ट किया है।
साल:
1999
संस्करण:
Paperback
भाषा:
hindi
पृष्ठ:
280 / 279
ISBN 10:
8171822525
फ़ाइल:
PDF, 947 KB
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Año:
2002
Idioma:
polish
Archivo:
PDF, 15,07 MB
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गोदान Godan

Año:
2014
Idioma:
hindi
Archivo:
PDF, 3,75 MB
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कर्मभर्मभूमिमभ
प्रेमभचंद

1

www.hindustanbooks.com

हमारे स्कूलों और कॉलेजों में िजस तत्परता से फीस वसूल की जाती ह, शायद मालगुजारी भी उतनी
सख्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक िदन िनयत कर िदया जाता ह। उस िदन फीस का दािखिला होना
अनिनवायर्य ह। या तो फीस दीिजए, या नाम कटवाइए, या जब तक फीस न दािखिल हो, रोज कुछ जुमाना दीिजए।
कहीं-कहीं ऐसा भी िनयम ह िक उसी िदन फीस दुगुनी कर दी जाती ह, और िकसी दूसरी तारीखि को दुगुनी फीस
न दी तो नाम कट जाता ह। काशी के क्वीन्स कॉलेज में यही िनयम था। सातवीं तारीखि को फीस न दो , तो
इक्कीसवीं तारीखि को दुगुनी फीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर िनयमों का उद्देश्य इसके
िसवा और क्या हो सकता था, िक गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जाएं - वही हृदयहीन दफ्तरी शासन, जो
अनन्य िवभागों में ह, हमारे िशक्षालयों में भी ह। वह िकसी के साथ िरयायत नहीं करता। चाहे जहां से लाओ, कजर्य
लो, गहने िगरवी रखिो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फीस जरूर दो, नहीं दूनी फीस देनी पड़ेगी, या नाम
कट जाएगा। जमीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ िरयायत की जाती ह। हमारे िशक्षालयों में नमी
को घुसने ही नहीं िदया जाता। वहां स्थायी रूप से माशर्यल -लॉ का व्यवहार होता ह। कचहरी में पैसे का राज ह,
हमारे स्कूलों में भी पैसे का राज ह, उससे कहीं कठोर, कहीं िनदर्यय। देर में आइए तो जुमाना न आइए तो जुमाना
सबक न याद हो तो जुमाना िकताबें न खिरीद सिकए तो जुमाना कोई अनपराध हो जाए तो जुमाना िशक्षालय क्या
ह, जुमानालय ह। यही हमारी पिश्चिमी िशक्षा का आदशर्य ह, िजसकी तारीफों के पुल बांधे जाते हैं। यिद ऐसे
िशक्षालयों से पैसे पर जान देने वाले, पैसे के िलए गरीबों का गला काटने वाले, पैसे के िलए अनपनी आत्मा बेच
देने वाले छात्र िनकलते हैं, तो आश्चियर्य क्या हआज वही वसूली की तारीखि ह। अनधयापकों की मेजों पर रुपयों के ढेर लगे हैं। चारों तरफ खिनाखिन की
आवाजें आ रही हैं। सराफे में भी रुपये की ऐसी झंकार कम सुनाई देती ह। हरेक मास्टर तहसील का चपरासी
बना बैठा हुआ ह। िजस लड़के का नाम पुकारा जाता ह, वह अनधयापक के सामने आता ह, फीस देता ह और
अनपनी जगह पर आ बैठता ह। माचर्य का महीना ह। इसी महीने में अनप्रैल , मई और जून की फीस भी वसूल की जा
रही ह। इम्तहान की फीस भी ली जा रही ह। दसवें दजर्जे में तो एक-एक लड़के को चालीस रुपये देने पड़ रहे हैं।
अनधया; पक ने बीसवें लड़के का नाम पुकारा-अनमरकान्त
अनमरकान्त गैरहािजर था।
अनधयापक ने पूछा-क्या अनमरकान्त नहीं आया?
एक लड़के ने कहा-आए तो थ, शायद बाहर चले गए हों।
'क्या फीस नहीं लाया ह?'
िकसी लड़के ने जवाब नहीं िदया।
अनधयापक की मुद्रा पर खेद की रेखिा झलक पड़ी। अनमरकान्त अनच्छे लड़कों में था। बोले-शायद फीस लाने
गया होगा। इस घंटे में न आया, तो दूनी फीस देनी पड़ेगी। मेरा क्या अनिख्तयार ह- दूसरा लड़का चलेगोवधर्यनदास
सहसा एक लड़के ने पूछा-अनगर आपकी इजाजत हो, तो मैं बाहर जाकर देखिूं?
अनधयापक ने मुस्कराकर कहा-घर की याद आई होगी। खिैर , जाओ मगर दस िमनट के अनंदर आ जाना।
2

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लडकों को बुला-बुलाकर फीस लेना मेरा काम नहीं ह।
लड़के ने नम्रता से कहा-अनभी आता हूं। कसम ले लीिजए, जो हाते के बाहर जाऊं।
यह इस कक्षा के संपन्न लड़कों में था, बड़ा िखिलाड़ी, बड़ा बैठकबाज। हािजरी देकर गायब हो जाता, तो
शाम की खिबर लाता। हर महीने फीस की दूनी रकम जुमाना िदया करता था। गोरे रंग का , लंबा, छरहरा शौकीन
युवक था। िजसके प्राण खेल में बसते थ। नाम था मोहम्मद सलीम।
सलीम और अनमरकान्त दोनों पास-पास बैठते थ। सलीम को िहसाब लगाने या तजुर्यमा करने में अनमरकान्त
से िवशेष सहायता िमलती थी। उसकी कापी से नकल कर िलया करता था। इससे दोनों में दोस्ती हो गई थी।
सलीम किव था। अनमरकान्त उसकी गजलें बड़े चाव से सुनता था। मैत्री का यह एक और कारण था।
सलीम ने बाहर जाकर इधर-उधर िनगाह दौड़ाई, अनमरकान्त का कहीं पता न था। जरा और आगे बढे। , तो
देखिा, वह एक वृक्ष की आड़ में खिड़ा ह। पुकारा-अनमरकान्त ओ बुध्दू लाल चलो, फीस जमा कर। पंिडतजी िबगड़
रहे हैं।
अनमरकान्त ने अनचकन के दामन से आंखें पोंछ लीं और सलीम की तरफ आता हुआ बोला-क्या मेरा नंबर आ
गया?
सलीम ने उसके मुंह की तरफ देखिा, तो उसकी आंखें लाल थीं। वह अनपने जीवन में शायद ही कभी रोया हो
चौंककर बोला-अनरे तुम रो रहे हो क्या बात हअनमरकान्त सांवले रंग का, छोटा-सा दुबला-पतला कुमार था। अनवस्था बीस की हो गई थी पर अनभी मस
भी न भीगी थीं। चौदह-पंद्रह साल का िकशोर-सा लगता था। उसके मुखि पर एक वेदनामय दृढ़ता, जो िनराशा से
बहुत कुछ िमलती-जुलती थी, अनंिकत हो रही थी, मानो संसार में उसका कोई नहीं ह। इसके साथ ही उसकी मुद्रा
पर कुछ ऐसी प्रितभा, कुछ ऐसी मनिस्वता थी िक एक बार उसे देखिकर िफर भूल जाना किठन था।
उसने मुस्कराकर कहा-कुछ नहीं जी, रोता कौन ह'आप रोते हैं, और कौन रोता ह। सच बताओ क्या हुआ?'
अनमरकान्त की आंखें िफर भर आइं। लाखि यत्न करने पर भी आंसू न रूक सके। सलीम समझ गया। उसका
हाथ पकड़कर बोला-क्या फीस के िलए रो रहे हो- भले आदमी, मुझसे क्यों न कह िदया- तुम मुझे भी गैर
समझते हो। कसम खिुदा की, बड़े नालायक आदमी हो तुम। ऐसे आदमी को गोली मार देनी चािहए दोस्तों से भी
यह गैिरयत चलो क्लास में, मैं फीस िदए देता हूं। जरा-सी बात के िलए घंटे-भर से रो रहे हो। वह तो कहो मैं आ
गया, नहीं तो आज जनाब का नाम ही कट गया होता।
अनमरकान्त को तसल्ली तो हुई पर अननुग्रह के बोझ से उसकी गदर्यन दब गई। बोला -पंिडतजी आज मान न
जाएंगे?
सलीम ने खिड़े होकर कहा-पंिडतजी के बस की बात थोड़े ही ह। यही सरकारी कायदा ह। मगर हो तुम बड़े
शैतान, वह तो खिैिरयत हो गई, मैं रुपये लेता आया था, नहीं खिूब इम्तहान देते। देखिो, आज एक ताजा गजल कही
ह। पीठ सहला देना :
आपको मेरी वफा याद आई,
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खिैर ह आज यह क्या याद आई।
अनमरकान्त का व्यिथत िचत्ता इस समय गजल सुनने को तैयार न था पर सुने बगैर काम भी तो नहीं चल
सकता। बोला-नाजुक चीज ह। खिूब कहा ह। मैं तुम्हारी जबान की सफाई पर जान देता हूं।
सलीम-यही तो खिास बात ह, भाई साहब लफ्जों की झंकार का नाम गजल नहीं ह। दूसरा शेर सुनो :
िफर मेरे सीने में एक हूक उठी,
िफर मुझे तेरी अनदा याद आई।
अनमरकान्त ने िफर तारीफ की-लाजवाब चीज ह। कैसे तुम्हें ऐसे शेर सूझ जाते हैंसलीम हंसा-उसी तरह, जैसे तुम्हें िहसाब और मजमून सूझ जाते हैं। जैसे एसोिसएशन में स्पीचें दे लेते हो।
आओ, पान खिाते चलें।
दोनों दोस्तों ने पान खिाए और स्कूल की तरफ चले। अनमरकान्त ने कहा-पंिडतजी बड़ी डांट बताएंगे।
'फीस ही तो लेंगे'
'और जो पूछें, अनब तक कहां थ?'
'कह देना, फीस लाना भूल गया था।'
'मुझसे न कहते बनेगा। मैं साफ-साफ कह दूंगा।'
तो तुम िपटोगे भी मेरे हाथ से'
संध्या समय जब छुट्टी हुई और दोनों िमत्र घर चले, अनमरकान्त ने कहा-तुमने आज मुझ पर जो एहसान
िकया ह...
सलीम ने उसके मुंह पर हाथ रखिकर कहा-बस खिबरदार, जो मुंह से एक आवाज भी िनकाली। कभी
भूलकर भी इसका िजक्र न करना।
'आज जलसे में आओगे?'
'मजमून क्या ह, मुझे तो याद नहीं?'
'अनजी वही पिश्चिमी सभ्यता ह।'
'तो मुझे दो-चार प्वाइंट बता दो, नहीं तो मैं वहां कहूंगा क्या?'
'बताना क्या ह- पिश्चिमी सभ्यता की बुराइयां हम सब जानते ही हैं। वही बयान कर देना।'
'तुम जानते होगे, मुझे तो एक भी नहीं मालूम।'
'एक तो यह तालीम ही ह। जहां देखिो वहीं दूकानदारी। अनदालत की दूकान, इल्म की दूकान, सेहत की
दूकान। इस एक प्वाइंट पर बहुत कुछ कहा जा सकता ह।'
'अनच्छी बात ह, आऊंगा।

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दो
अनमरकान्त के िपता लाला समरकान्त बड़े उद्योगी पुरुष थ। उनके िपता केवल एक झोंपडी छोड़कर मरे थ
मगर समरकान्त ने अनपने बाहुबल से लाखिों की संपित्त जमा कर ली थी। पहले उनकी एक छोटी-सी हल्दी की
आढ़त थी। हल्दी से गुड़ और चावल की बारी आई। तीन बरस तक लगातार उनके व्यापार का क्षेत्र बढ़ता ही
गया। अनब आढ़तें बंद कर दी थीं। केवल लेन-देन करते थ। िजसे कोई महाजन रुपये न दे, उसे वह बेखिटके दे देते
और वसूल भी कर लेते उन्हें आश्चियर्य होता था िक िकसी के रुपये मारे कैसे जाते हैं- ऐसा मेहनती आदमी भी कम
होगा। घड़ी रात रहे गंगा-स्नान करने चले जाते और सूयोदय के पहले िवश्वनाथजी के दशर्यन करके दूकान पर पहुंच
जाते। वहां मुनीम को जरूरी काम समझाकर तगादे पर िनकल जाते और तीसरे पहर लौटते। भोजन करके िफर
दूकान आ जाते और आधी रात तक डटे रहते। थ भी भीमकाय। भोजन तो एक ही बार करते थ , पर खिूब डटकर।
दो-ढाई सौ मुग्दर के हाथ अनभी तक फेरते थ। अनमरकान्त की माता का उसके बचपन ही में देहांत हो गया था।
समरकान्त ने िमत्रों के कहने-सुनने से दूसरा िववाह कर िलया था। उस सात साल के बालक ने नई मां का बड़े
प्रेम से स्वागत िकया लेिकन उसे जल्द मालूम हो गया िक उसकी नई माता उसकी िजद और शरारतों को उस
क्षमा-दृिष्टि से नहीं देखितीं, जैसे उसकी मां देखिती थीं। वह अनपनी मां का अनकेला लाड़ला लड़का था, बड़ा िजद़दी,
बड़ा नटखिट। जो बात मुंह से िनकल जाती, उसे पूरा करके ही छोड़ता। नई माताजी बात-बात पर डांटती थीं।
यहां तक िक उसे माता से द्वेष हो गया। िजस बात को वह मना करतीं, उसे वह अनदबदाकर करता। िपता से भी
ढीठ हो गया। िपता और पुत्र में स्नेह का बंधन न रहा। लालाजी जो काम करते, बेटे को उससे अनरुिच होती। वह
मलाई के प्रेमी थ बेटे को मलाई से अनरुिच थी। वह पूजा-पाठ बहुत करते थ, लड़का इसे ढोंग समझता था। वह
पहले िसरे के लोभी थ लड़का पैसे को ठीकरा समझता था।
मगर कभी-कभी बुराई से भलाई पैदा हो जाती ह। पुत्र सामान्य रीित से िपता का अननुगामी होता ह।
महाजन का बेटा महाजन, पंिडत का पंिडत, वकील का वकील, िकसान का िकसान होता ह मगर यहां इस द्वेष ने
महाजन के पुत्र को महाजन का शत्रु बना िदया। िजस बात का िपता ने िवरोध िकया, वह पुत्र के िलए मान्य हो
गई, और िजसको सराहा, वह त्याज्य। महाजनी के हथकंडे और षडयंत्र उसके सामने रोज ही रचे जाते थ। उसे
इस व्यापार से घृणा होती थी। इसे चाहे पूवर्य संस्कार कह लो पर हम तो यही कहेंगे िक अनमरकान्त के चिरत्र का
िनमाण िपता-द्वेष के हाथों हुआ।
खिैिरयत यह हुई िक उसके कोई सौतेला भाई न हुआ। नहीं शायद वह घर से िनकल गया होता। समरकान्त
अनपनी संपित्त को पुत्र से ज्यादा मूल्यवान समझते थ। पुत्र के िलए तो संपित्त की कोई जरूरत न थी पर संपित्त के
िलए पुत्र की जरूरत थी। िवमाता की तो इच्छा यही थी िक उसे वनवास देकर अनपनी चहेती नैना के िलए रास्ता
साफ कर दे पर समरकान्त इस िवषय में िनश्चिल रहे। मजा यह था िक नैना स्वयं भाई से प्रेम करती थी, और
अनमरकान्त के हृदय में अनगर घर वालों के िलए कहीं कोमल स्थान था, तो वह नैना के िलए था। नैना की सूरत
भाई से इतनी िमलती-जुलती थी, जैसे सगी बहन हो। इस अननुरूपता ने उसे अनमरकान्त के और भी समीप कर
िदया था। माता-िपता के इस दुवर्यव्यहवार को वह इस स्नेह के नशे में भुला िदया करता था। घर में कोई बालक न
था और नैना के िलए िकसी साथी का होना अनिनवायर्य था। माता चाहती थीं, नैना भाई से दूर-दूर रहे। वह
अनमरकान्त को इस योग्य न समझती थीं िक वह उनकी बेटी के साथ खेले। नैना की बाल-प्रकृतित इस कूटनीित के
झुकाए न झुकी। भाई-बहन में यह स्नेह यहां तक बढ़ा िक अनंत में िवमात़त्व ने मात़त्व को भी परास्त कर िदया।

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िवमाता ने नैना को भी आंखिों से िगरा िदया और पुत्र की कामना िलए संसार से िवदा हो गइं।
अनब नैना घर में अनकेली रह गई। समरकान्त बाल-िववाह की बुराइयां समझते थ। अनपना िववाह भी न कर
सके। वृध्द-िववाह की बुराइयां भी समझते थ। अनमरकान्त का िववाह करना जरूरी हो गया। अनब इस प्रस्ताव का
िवरोध कौन करताअनमरकान्त की अनवस्था उन्नीस साल से कम न थी पर देह और बुिध्द को देखिते हुए, अनभी िकशोरावस्था ही
में था। देह का दुबर्यल, बुिध्द का मंद। पौधे को कभी मुक्त प्रकाश न िमला, कैसे बढ़ता, कैसे फैलता- बढ़ने और
फैलने के िदन कुसंगित और अनसंयम में िनकल गए। दस साल पढ़ते हो गए थ और अनभी ज्यों-त्यों आठवें में पहुंचा
था। िकतु िववाह के िलए यह बातें नहीं देखिी जातीं। देखिा जाता ह धान, िवशेषकर उस िबरादरी में, िजसका उ?
म ही व्यवसाय हो। लखिनऊ के एक धानी पिरवार से बातचीत चल पड़ी। समरकान्त की तो लार टपक पड़ी।
कन्या के घर में िवधावा माता के िसवा िनकट का कोई संबधी न था, और धान की कहीं थाह नहीं। ऐसी कन्या
बड़े भागों से िमलती ह। उसकी माता ने बेटे की साधा बेटी से पूरी की थी। त्याग की जगह भोग, शील की जगह
तेज, कोमल की जगह तीव्र का संस्कार िकया था। िसकुड़ने और िसमटने का उसे अनभ्यास न था। और वह युवकप्रकृतित की युवती ब्याही गई युवती-प्रकृतित के युवक से, िजसमें पुरुषाथर्य का कोई गुण नहीं। अनगर दोनों के कपड़े
बदल िदए जाते, तो एक-दूसरे के स्थानापन्न हो जाते। दबा हुआ पुरुषाथर्य ही स्त्रीत्व ह।
िववाह हुए दो साल हो चुके थ पर दोनों में कोई सामंजस्य न था। दोनों अनपने-अनपने मागर्य पर चले जाते थ।
दोनों के िवचार अनलग, व्यवहार अनलग, संसार अनलग। जैसे दो िभन्न जलवायु के जंतु एक िपजरे में बंद कर िदए
गए हों। हां, तभी अनमरकान्त के जीवन में संयम और प्रयास की लगन पैदा हो गई थी। उसकी प्रकृतित में जो
ढीलापन, िनजीवता और संकोच था वह कोमलता के रूप में बदलता जाता था। िवद्याभ्यास में उसे अनब रुिच हो
गई थी। हालांिक लालाजी अनब उसे घर के धंधो में लगाना चाहते थ-वह तार-वार पढ़ लेता था और इससे अनिधक
योग्यता की उनकी समझ में जरूरत न थी-पर अनमरकान्त उस पिथक की भांित, िजसने िदन िवश्राम में काट िदया
हो, अनब अनपने स्थान पर पहुंचने के िलए दूने वेग से कदम बढ़ाए चला जाता था।

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तीन
स्कूल से लौटकर अनमरकान्त िनयमानुसार अनपनी छोटी कोठरी में जाकर चरखे पर बैठ गया। उस िवशाल
भवन में, जहां बारात ठहर सकती थी, उसने अनपने िलए यही छोटी-सी कोठरी पसंद की थी। इधर कई महीने से
उसने दो घंटे रोज सूत कातने की प्रितज्ञा कर ली थी और िपता के िवरोध करने पर भी उसे िनभाए जाता था।
मकान था तो बहुत बड़ा मगर िनवािसयों की रक्षा के िलए उतना उपयुक्त न था, िजतना धान की रक्षा के
िलए। नीचे के तल्ले में कई बड़े-बड़े कमरे थ, जो गोदाम के िलए बहुत अननुकूल थ। हवा और प्रकाश का कहीं
रास्ता नहीं। िजस रास्ते से हवा और प्रकाश आ सकता ह, उसी रास्ते से चोर भी तो आ सकता ह। चोर की शंका
उसकी एक-एक इंट से टपकती थी। ऊपर के दोनों तल्ले हवादार और खिुले हुए थ। भोजन नीचे बनता था। सोनाबैठना ऊपर होता था। सामने सड़क पर दो कमरे थ। एक में लालाजी बैठते थ, दूसरे में मुनीम। कमरों के आगे
एक सायबान था, िजसमें गाय बंधाती थी। लालाजी पक्के गोभक्त थ।
अनमरकान्त सूत कातने में मग्न था िक उसकी छोटी बहन नैना आकर बोली-क्या हुआ भैया, फीस जमा हुई
या नहीं- मेरे पास बीस रुपये हैं, यह ले लो। मैं कल और िकसी से मांग लाऊंगी।
अनमर ने चरखिा चलाते हुए कहा-आज ही तो फीस जमा करने की तारीखि थी। नाम कट गया। अनब रुपये
लेकर क्या करूंगानैना रूप-रंग में अनपने भाई से इतनी िमलती थी िक अनमरकान्त उसकी साड़ी पहन लेता, तो यह बतलाना
मुिश्कल हो जाता िक कौन यह ह कौन वह हां, इतना अनंतर अनवश्य था िक भाई की दुबर्यलता यहां सुकुमारता
बनकर आकषर्यक हो गई थी।
अनमर ने िदल्लगी की थी पर नैना के चेहरे रंग उड़ गया। बोली-तुमने कहा नहीं, नाम न काटो, मैं दो-एक
िदन में दे दूंगाअनमर ने उसकी घबराहट का आनंद उठाते हुए कहा-कहने को तो मैंने सब कुछ कहा लेिकन सुनता कौन
थानैना ने रोष के भाव से कहा-मैं तो तुम्हें अनपने कड़े दे रही थी, क्यों नहीं िलएअनमर ने हंसकर पूछा-और जो दादा पूछते, तो क्या होता'दादा से बतलाती ही क्यों?'
अनमर ने मुंह लंबा करके कहा-मैं चोरी से कोई काम नहीं करना चाहता, नैना अनब खिुश हो जाओ, मैंने फीस
जमा कर दी।
नैना को िवश्वास न आया, बोली-फीस नहीं, वह जमा कर दी। तुम्हारे पास रुपये कहां थ?'
'नहीं नैना, सच कहता हूं, जमा कर दी।'
'रुपये कहां थ?'
'एक दोस्त से ले िलए।'

7

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'तुमने मांगे कैसे?'
'उसने आप-ही-आप दे िदए, मुझे मांगने न पड़े।'
'कोई बड़ा सज्जन होगा।'
'हां, ह तो सज्जन, नैना जब फीस जमा होने लगी तो मैं मारे शमर्य के बाहर चला गया। न जाने क्यों उस
वक्त मुझे रोना आ गया। सोचता था, मैं ऐसा गया-बीता हूं िक मेरे पास चालीस रुपये नहीं। वह िमत्र जरा देर में
मुझे बुलाने आया। मेरी आंखें लाल थीं। समझ गया। तुरंत जाकर फीस जमा कर दी। तुमने कहां पाए ये बीस
रुपये?'
'यह न बताऊंगी।'
नैना ने भाग जाना चाहा। बारह बरस की यह लज्जाशील बािलका एक साथ ही सरल भी थी और चतुर
भी। उसे ठफना सहज न था। उससे अनपनी िचताआं को िछपाना किठन था।
अनमर ने लपककर उसका हाथ पकड़ िलया और बोला-जब तक बताओगी नहीं, मैं जाने न दूंगा। िकसी से
कहूंगा नहीं, सच कहता हूं।
नैना झंपती हुई बोली-दादा से िलए।
अनमरकान्त ने बेिदली के साथ कहा-तुमने उनसे नाहक मांगे, नैना जब उन्होंने मुझे इतनी िनदर्ययता से
दुत्कार िदया, तो मैं नहीं चाहता िक उनसे एक पैसा भी मांगूं। मैंने तो समझा था, तुम्हारे पास कहीं पड़े होंगे
अनगर मैं जानता िक तुम भी दादा से ही मांगोगी तो साफ कह देता, मुझे रुपये की जरूरत नहीं। दादा क्या बोलेनैना सजल नेत्र होकर बोली-बोले तो नहीं। यही कहते रहे िक करना-धारना तो कुछ नहीं, रोज रुपये
चािहए, कभी फीस कभी िकताब कभी चंदा। िफर मुनीमजी से कहा, बीस रुपये दे दो। बीस रुपये िफर देना।
अनमर ने उत्तोिजत होकर कहा-तुम रुपये लौटा देना, मुझे नहीं चािहए।
नैना िससक-िससककर रोने लगी। अनमरकान्त ने रुपये जमीन पर फेंक िदए थ और वह सारी कोठरी में
िबखिरे पड़े थ। दोनों में से एक भी चुनने का नाम न लेता था। सहसा लाला समरकान्त आकर द्वार पर खिड़े हो
गए। नैना की िससिकयां बंद हो गइं और अनमरकान्त मानो तलवार की चोट खिाने के िलए अनपने मन को तैयार
करने लगा। लाला जो दोहरे बदन के दीघर्यकाय मनुष्य थ। िसर से पांव तक सेठ-वही खिल्वाट मस्तक, वही फूले
हुए कपोल, वही िनकली हुई तोंद। मुखि पर संयम का तेज था, िजसमें स्वाथर्य की गहरी झलक िमली हुई थी।
कठोर स्वर में बोले-चरखिा चला रहा ह। इतनी देर में िकतना सूत काता- होगा दो-चार रुपये काअनमरकान्त ने गवर्य से कहा-चरखिा रुपये के िलए नहीं चलाया जाता।
'और िकसिलए चलाया जाता ह।'
'यह आत्म-शुिध्द का एक साधन ह।'
समरकान्त के घाव पर जैसे नमक पड़ गया। बोले-यह आज नई बात मालूम हुई। तब तो तुम्हारे ऋषिष होने
में कोई संदेह नहीं रहा, मगर साधन के साथ कुछ घर-गृहस्थी का काम भी देखिना होता ह। िदन-भर स्कूल में
रहो, वहां से लौटो तो चरखे पर बैठो, रात को तुम्हारी स्त्री-पाठशाला खिुले, संध्या समय जलसे हों, तो घर का
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धंधा कौन करे- मैं बैल नहीं हूं। तुम्हीं लोगों के िलए इस जंजाल में फंसा हुआ हूं। अनपने ऊपर लाद न ले जाऊंगा।
तुम्हें कुछ तो मेरी मदद करनी चािहए। बड़े नीितवान बनते हो, क्या यह नीित ह िक बूढ़ा बाप मरा करे और
जवान बेटा उसकी बात भी न पूछे अनमरकान्त ने उद़डंता से कहा-मैं तो आपसे बार-बार कह चुका, आप मेरे िलए कुछ न करें। मुझे धान की
जरूरत नहीं। आपकी भी वृध्दावस्था ह। शांतिचत्त होकर भगवत् -भजन कीिजए।
समरकान्त तीखे शब्दों में बोले-धान न रहेगा लाला, तो भीखि मांगोगे। यों चैन से बैठकर चरखिा न
चलाओगे। यह तो न होगा, मेरी कुछ मदद करो, पुरुषाथर्यहीन मनुष्यों की तरह कहने लगे, मुझे धान की जरूरत
नहीं। कौन ह, िजसे धान की जरूरत नहीं- साधु-संन्यासी तक तो पैसों पर प्राण देते हैं। धान बड़े पुरुषाथर्य से
िमलता ह। िजसमें पुरुषाथर्य नहीं, वह क्या धान कमाएगा- बड़े-बड़े तो धान की उपेक्षा कर ही नहीं सकते, तुम
िकस खेत की मूली हो
अनमर ने उसी िवतंडा भाव से कहा-संसार धान के िलए प्राण दे, मुझे धन की इच्छा नहीं। एक मजूर भी
धमर्य और आत्मा की रक्षा करते हुए जीवन का िनवाह कर सकता ह। कम-से-कम मैं अनपने जीवन में इसकी परीक्षा
करना चाहता हूं।
लालाजी को वाद-िववाद का अनवकाश न था। हारकर बोले-अनच्छा बाबा, कर लो खिूब जी भरकर परीक्षा
लेिकन रोज-रोज रुपये के िलए मेरा िसर न खिाया करो। मैं अनपनी गाढ़ी कमाई तुम्हारे व्यसन के िलए नहीं
लुटाना चाहता।
लालाजी चले गए। नैना कहीं एकांत में जाकर खिूब रोना चाहती थी पर िहल न सकती थी और अनमरकान्त
ऐसा िवरक्त हो रहा था, मानो जीवन उसे भार हो रहा ह।
उसी वक्त महरी ने ऊपर से आकर कहा-भैया, तुम्हें बहूजी बुला रही हैं।
अनमरकान्त ने िबगड़कर कहा-जा कह दे, फुसर्यत नहीं ह। चली वहां से-बहूजी बुला रही हैं।
लेिकन जब महरी लौटने लगी, तो उसने अनपने तीखेपन पर लिज्जत होकर कहा-मैंने तुम्हें कुछ नहीं कहा ह
िसल्लो कह दो, अनभी आता हूं। तुम्हारी रानीजी क्या कर रही हैंिसल्लो का पूरा नाम था कौशल्या। सीतला में पित, पुत्र और एक आंखि जाती रही थी, तब से िविक्षप्त-सी
हो गई थी। रोने की बात पर हंसती, हंसने की बात पर रोती। घर के और सभी प्राणी, यहां तक की नौकर-चाकर
तक उसे डांटते रहते थ। केवल अनमरकान्त उसे मनुष्य समझता था। कुछ स्वस्थ होकर बोली-बैठी कुछ िलखि रही
हैं। लालाजी चीखिते थ इसी से तुम्हें बुला भेजा।
अनमर जैसे िगर पड़ने के बाद गदर्य झाड़ता हुआ, प्रसन्न मुखि ऊपर चला। सुखिदा अनपने कमरे के द्वार पर खिड़ी
थी। बोली-तुम्हारे तो दशर्यन ही दुलर्यभ हो जाते हैं। स्कूल से आकर चरखिा ले बैठते हो। क्यों नहीं मुझे घर भेज देतेजब मेरी जरूरत समझना, बुला भेजना। अनबकी आए मुझे छ: महीने हुए। मीयाद पूरी हो गई। अनब तो िरहाई हो
जानी चािहए।
यह कहते हुए उसने एक तश्तरी में कुछ नमकीन और कुछ िमठाई लाकर मेज पर रखि दी और अनमर का
हाथ पकड़ कमरे में ले जाकर कुरसी पर बैठा िदया।

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यह कमरा और सब कमरों से बड़ा, हवादार और सुसिज्जत था। दरी का गशर्य था, उस पर करीने से कई
गद्ददार और सादी कुरिसयां लगी हुई थीं। बीच में एक छोटी-सी नक्काशीदार गोल मेज थी। शीशे की आल्मािरयों
में सिजल्द पुस्तकें सजी हुई थीं। आलों पर तरह-तरह के िखिलौने रखे हुए थ। एक कोने में मेज पर हारमोिनयम
रखिा हुआ था। दीवारों पर धुरंधर, रिव वमा और कई िचत्रकारों की तस्वीरें शोभा दे रही थीं। दो-तीन पुराने
िचत्र भी थ। कमरे की सजावट से सुरुिच और संपन्नता का आभास होता था।
अनमरकान्त का सुखिदा से िववाह हुए दो साल हो चुके थ। सुखिदा दो बार तो एक-एक महीना रहकर चली
गई थी। अनबकी उसे आए छ: महीने हो गए थ मगर उनका स्नेह अनभी तक ऊपर-ही-ऊपर था। गहराइयों में दोनों
एक-दूसरे से अनलग-अनलग थ। सुखिदा ने कभी अनभाव न जाना था, जीवन की किठनाइयां न सही थीं। वह जानेमाने मागर्य को छोड़कर अननजान रास्ते पर पांव रखिते डरती थी। भोग और िवलास को वह जीवन की सबसे
मूल्यवान वस्तु समझती थी और उसे हृदय से लगाए रहना चाहती थी। अनमरकान्त को वह घर के कामकाज की
ओर खिींचने का प्रयास करती रहती थी। कभी समझाती थी, कभी रूठती थी, कभी िबगड़ती थी। सास के न रहने
से वह एक प्रकार से घर की स्वािमनी हो गई थी। बाहर के स्वामी लाला समरकान्त थ पर भीतर का संचालन
सुखिदा ही के हाथों में था। िकतु अनमरकान्त उसकी बातों को हंसी में टाल देता। उस पर अनपना प्रभाव डालने की
कभी चेष्टिा न करता। उसकी िवलासिप्रयता मानो खेतों में हौवे की भांित उसे डराती रहती थी। खेत में हिरयाली
थी, दाने थ, लेिकन वह हौवा िनश्चिल भाव से दोनों हाथ फैलाए खिड़ा उसकी ओर घूरता रहता था। अनपनी आशा
और दुराशा, हार और जीत को वह सुखिदा से बुराई की भांित िछपाता था। कभी-कभी उसे घर लौटने में देर हो
जाती, तो सुखिदा व्यंग्य करने से बाज न आती थी-हां, यहां कौन अनपना बैठा हुआ ह बाहर के मजे घर मेंकहां और
यह ितरस्कार, िकसान की कड़े-कड़े की भांित हौवे के भय को और भी उत्तोिजत कर देती थी। वह उसकी
खिुशामद करता, अनपने िसध्दांतों को लंबी-से-लंबी रस्सी देता पर सुखिदा इसे उसकी दुबर्यलता समझकर ठुकरा देती
थी। वह पित को दया-भाव से देखिती थी, उसकी त्यागमयी प्रवृित्त का अननादर न करती थी पर इसका तथ्य न
समझ सकती थी। वह अनगर सहानुभूित की िभक्षा मांगता, उसके सहयोग के िलए हाथ फैलाता, तो शायद वह
उसकी उपेक्षा न करती। अनपनी मुठ़ठी बंद करके, अनपनी िमठाई आप खिाकर, वह उसे रूला देता। वह भी अनपनी
मुठ़ठी बंद कर लेती थी और अनपनी िमठाई आप खिाती थी। दोनों आपस में हंसते-बोलते थ, सािहत्य और
इितहास की चचा करते थ लेिकन जीवन के गूढ़ व्यापारों में पृथक् थ। दूध और पानी का मेल नहीं, रेत और पानी
का मेल था जो एक क्षण के िलए िमलकर पृथक् हो जाता था।
अनमर ने इस िशकायत की कोमलता या तो समझी नहीं, या समझकर उसका रस न ले सका। लालाजी ने
जो आघात िकया था, अनभी उसकी आत्मा उस वेदना से तड़प रही थी। बोला-मैं भी यही उिचत समझता हूं। अनब
मुझे पढ़ना छोड़कर जीिवका की िफक्र करनी पड़ेगी।
सुखिदा ने खिीझकर कहा-हां, ज्यादा पढ़ लेने से सुनती हूं, आदमी पागल हो जाता ह।
अनमर ने लड़ने के िलए यहां भी आस्तीनें चढ़ा लीं-तुम यह आक्षेप व्यथर्य कर रही हो। पढ़ने से मैं जी नहीं
चुराता लेिकन इस दशा में पढ़ना नहीं हो सकता। आज स्कूल में मुझे िजतना लिज्जत होना पड़ा, वह मैं ही
जानता हूं। अनपनी आत्मा की हत्या करके पढ़ने से भूखिा रहना कहीं अनच्छा ह।
सुखिदा ने भी अनपने शस्त्र संभाले। बोली-मैं तो समझती हूं िक घड़ी-दो घड़ी दूकान पर बैठकर भी आदमी
बहुत कुछ पढ़ सकता ह। चरखे और जलसों में जो समय देते हो, वह दूकान पर दो, तो कोई बुराई न होगी। िफर
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जब तुम िकसी से कुछ कहोगे नहीं तो कोई तुम्हारे िदल की बातें कैसे समझ लेगा- मेरे पास इस वक्त भी एक
हजार रुपये से कम नहीं। वह मेरे रुपये हैं, मैं उन्हें उड़ा सकती हूं। तुमने मुझसे चचा तक न की। मैं बुरी सही,
तुम्हारी दुश्मन नहीं। आज लालाजी की बातें सुनकर मेरा रक्त खिौल रहा था। चालीस रुपये के िलए इतना
हंगामा तुम्हें िजतनी जरूरत हो, मुझसे लो, मुझसे लेते तुम्हारे आत्म-सम्मान को चोट लगती हो, अनम्मां से लो।
वह अनपने को धान्य समझंगी। उन्हें इसका अनरमान ही रह गया िक तुम उनसे कुछ मांगते। मैं तो कहती हूं , मुझे
लेकर लखिनऊ चले चलो और िनिश्चत होकर पढ़ो। अनम्मां तुम्हें इंग्लैंड भेज देंगी। वहां से अनच्छी िडग्री ला सकते
हो।
सुखिदा ने िनष्कपट भाव से यह प्रस्ताव िकया था। शायद पहली बार उसने पित से अनपने िदल की बात कही
अनमरकान्त को बुरा लगा। बोला-मुझे िडग्री इतनी प्यारी नहीं ह िक उसके िलए ससुराल की रोिटयां तोडूं अनगर मैं
अनपने पिरश्रम से धानोपाजर्यन करके पढ़ सकूंगा, तो पढूंगा नहीं कोई धंधा देखिूंगा। मैं अनब तक व्यथर्य ही िशक्षा के
मोह में पड़ा हुआ था। कॉलेज के बाहर भी अनधययनशील आदमी बहुत-कुछ सीखि सकता ह। मैं अनिभमान नहीं
करता लेिकन सािहत्य और इितहास की िजतनी पुस्तकें इन दो-तीन सालों में मैंने पढ़ी हैं, शायद ही मेरे कॉलेज
में िकसी ने पढ़ी हों
सुखिदा ने इस अनिप्रय िवषय का अनंत करने के िलए कहा-अनच्छा, नाश्ता तो कर लो। आज तो तुम्हारी मीिटग
ह। नौ बजे के पहले क्यों लौटने लगे- मैं तो टाकीज में जाऊंगी। अनगर तुम ले चलो, तो मैं तुम्हारे साथ चलने को
तैयार हूं।
अनमर ने रूखेपन से कहा-मुझे टाकीज जाने की फुरसत नहीं ह। तुम जा सकती हो।
'िफल्मों से भी बहुत-कुछ लाभ उठाया जा सकता ह।'
'तो मैं तुम्हें मना तो नहीं करता।'
'तुम क्यों नहीं चलते?'
'जो आदमी कुछ उपाजर्यन न करता हो, उसे िसनेमा देखिने का अनिधकार नहीं। मैं उसी संपित्त को अनपना
समझता हूं, िजसे मैंने पिरश्रम से कमाया ह।'
कई िमनट तक दोनों गुम बैठे रहे। जब अनमर जलपान करके उठा, तो सुखिदा ने सप्रेम आग्रह से कहा-कल से
संध्या समय दूकान पर बैठा करो। किठनाइयों पर िवजय पाना पुरुषाथी मनुष्यों का काम ह अनवश्य मगर
किठनाइयों की सृिष्टि करना, अननायास पांव में कांटे चुभाना कोई बुिध्दमानी नहीं ह।
अनमरकान्त इस आदेश का आशय समझ गया पर कुछ बोला नहीं। िवलािसनी संकटों से िकतना डरती ह यह
चाहती ह, मैं भी गरीबों का खिून चूसूं उनका गला काटूं यह मुझसे न होगा।
सुखिदा उसके दृिष्टिकोण का समथर्यन करके कदािचत् उसे जीत सकती थी। उधर से हटाने की चेष्टिा करके वह
उसके संकल्प को और भी दृढ़ कर रही थी। अनमरकान्त उससे सहानुभूित करके अनपने अननुकूल बना सकता था पर
शुष्क त्याग का रूप िदखिाकर उसे भयभीत कर रहा था।

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चार
अनमरकान्त मैिट'कुलेशन की परीक्षा में प्रांत में सवर्यप्रथम आया पर अनवस्था अनिधक होने के कारण छात्रवृित्त
न पा सका। इससे उसे िनराशा की जगह एक तरह का संतोष हुआ क्योंिक वह अनपने मनोिवकारों को कोई
िटकौना न देना चाहता था। उसने कई बड़ी-बड़ी कोिठयों में पत्र-व्यवहार करने का काम उठा िलया। धानी िपता
का पुत्र था, यह काम उसे आसानी से िमल गया। लाला समरकान्त की व्यवसाय-नीित से प्राय: उनकी िबरादरी
वाले जलते थ और िपता-पुत्र के इस वैमनस्य का तमाशा देखिना चाहते थ। लालाजी पहले तो बहुत िबगड़े।
उनका पुत्र उन्हीं के सहविगयों की सेवा करे, यह उन्हें अनपमानजनक जान पड़ा पर अनमर ने उन्हें सुझाया िक वह
यह काम केवल व्यावसाियक ज्ञानोपाजर्यन के भाव से कर रहा ह। लालाजी ने भी समझा, कुछ-न-कुछ सीखि ही
जाएगा। िवरोध करना छोड़ िदया। सुखिदा इतनी आसानी से मानने वाली न थी। एक िदन दोनों में इसी बात पर
झड़प हो गई।
सुखिदा ने कहा-तुम दस-दस, पांच-पांच रुपये के िलए दूसरों की खिुशामद करते िफरते हो तुम्हें शमर्य भी नहीं
आती
अनमर ने शांितपूवर्यक कहा-काम करके कुछ उपाजर्यन करना शमर्य की बात नहीं : दूसरों का मुंह ताकना शमर्य
की बात ह।
'तो ये धािनयों के िजतने लड़के हैं, सभी बेशमर्य हैं?'
'हैं ही, इसमें आश्चियर्य की कोई बात नहीं। अनब तो लालाजी मुझे खिुशी से भी रुपये दें तो न लूं। जब तक
अनपनी सामथ्यर्य का ज्ञान न था, तब तक उन्हें कष्टि देता था। जब मालूम हो गया िक मैं अनपने खिचर्य भर को कमा
सकता हूं, तो िकसी के सामने हाथ क्यों फैलाऊं ?'
सुखिदा ने िनदर्ययता के साथ कहा-तो जब तुम अनपने िपता से कुछ लेना अनपमान की बात समझते हो, तो मैं
क्यों उनकी आिश्रत बनकर रहूं - इसका आशय तो यही हो सकता ह िक मैं भी िकसी पाठशाला में नौकरी करूं या
सीने-िपरोने का धंधा उठाऊंअनमरकान्त ने संकट में पड़कर कहा-तुम्हारे िलए इसकी जरूरत नहीं।
'क्यों मैं खिाती-पहनती हूं, गहने बनवाती हूं, पुस्तकें लेती हूं, पित्रकाएं मंगवाती हूं, दूसरों ही की कमाई पर
तो- इसका तो यह आशय भी हो सकता ह िक मुझे तुम्हारी कमाई पर भी कोई अनिधकार नहीं। मुझे खिुद पिरश्रम
करके कमाना चािहए।'
अनमरकान्त को संकट से िनकलने की एक युिक्त सूझ गई-अनगर दादा, या तुम्हारी अनम्मांजी तुमसे िचढ़ं और
मैं भी ताने दूं, तब िनस्संदेह तुम्हें खिुद धान कमाने की जरूरत पड़ेगी।
'कोई मुंह से न कहे पर मन में तो समझ सकता ह। अनब तक तो मैं समझती थी, तुम पर मेरा अनिधकार ह।
तुमसे िजतना चाहूंगी, लड़कर ले लूंगी लेिकन अनब मालूम हुआ, मेरा कोई अनिधकार नहीं। तुम जब चाहो, मुझे
जवाब दे सकते हो। यही बात ह या कुछ और?'
अनमरकान्त ने हारकर कहा-तो तुम मुझे क्या करने को कहती हो- दादा से हर महीने रुपये के िलए लड़ता
रहूं12

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सुखिदा बोली-हां, मैं यही चाहती हूं। यह दूसरों की चाकरी छोड़ दो और घर का धंधा देखिो। िजतना समय
उधर देते हो उतना ही समय घर के कामों में दो।
'मुझे इस लेन-देन, सूद-ब्याज से घृणा ह।'
सुखिदा मुस्कराकर बोली-यह तो तुम्हारा अनच्छा तकर्क ह। मरीज को छोड़ दो, वह आप-ही-आप अनच्छा हो
जाएगा। इस तरह मरीज मर जाएगा, अनच्छा न होगा। तुम दूकान पर िजतनी देर बैठोगे, कम-से-कम उतनी देर
तो यह घृिणत व्यापार न होने दोगे। यह भी तो संभव ह िक तुम्हारा अननुराग देखिकर लालाजी सारा काम तुम्हीं
को सौंप दें। तब तुम अनपनी इच्छानुसार इसे चलाना। अनगर अनभी इतना भार नहीं लेना चाहते, तो न लो लेिकन
लालाजी की मनोवृित्त पर तो कुछ -न-कुछ प्रभाव डाल ही सकते हो। वह वही कर रहे हैं जो अनपने-अनपने ढंग से
सारा संसार कर रहा ह। तुम िवरक्त होकर उनके िवचार और नीित को नहीं बदल सकते। और अनगर तुम अनपना
ही राग अनलापोगे, तो मैं कहे देती हूं, अनपने घर चली जाऊंगी। तुम िजस तरह जीवन व्यतीत करना चाहते हो,
वह मेरे मन की बात नहीं। तुम बचपन से ठुकराए गए हो और कष्टि सहने में अनभ्यस्त हो। मेरे िलए यह नया
अननुभव ह।
अनमरकान्त परास्त हो गया। इसके कई िदन बाद उसे कई जवाब सूझे पर इस वक्त वह कुछ जवाब न दे
सका। नहीं, उसे सुखिदा की बातें न्याय-संगत मालूम हुइं। अनभी तक उसकी स्वतंत्र कल्पना का आधार िपता की
कृतपणता थी। उसका अनंकुर िवमाता की िनमर्यमता ने जमाया था। तकर्क या िसध्दांत पर उसका आधार न था और
वह िदन तो अनभी दूर, बहुत दूर था, जब उसके िचत्ता की वृित्त ही बदल जाए। उसने िनश्चिय िकया-पत्र-व्यवहार
का काम छोड़ दूंगा। दूकान पर बैठने में भी उसकी आपित्त उतनी तीव्र न रही। हां, अनपनी िशक्षा का खिचर्य वह
िपता से लेने पर िकसी तरह अनपने मन को न दबा सका। इसके िलए उसे कोई दूसरा ही गुप्त मागर्य खिोजना
पड़ेगा। सुखिदा से कुछ िदनों के िलए उसकी संिध-सी हो गई।
इसी बीच में एक और घटना हो गई, िजसने उसकी स्वतन्त्र कल्पना को भी िशिथल कर िदया।
सुखिदा इधर साल भर से मैके न गई थी। िवधावा माता बार-बार बुलाती थीं, लाला समरकान्त भी चाहते
थ िक दो-एक महीने के िलए हो आए पर सुखिदा जाने का नाम न लेती थी। अनमरकान्त की ओर से िनिश्चत न हो
सकती थी। वह ऐसे घोड़े पर सवार थी, िजसे िनत्य फेरना लािजमी था, दस-पांच िदन बंधा रहा, तो िफर पुट्ठे
पर हाथ ही न रखिने देगा। इसीिलए वह अनमरकान्त को छोड़कर न जाती थी।
अनंत में माता ने स्वयं काशी आने का िनश्चिय िकया। उनकी इच्छा अनब काशीवास करने की भी हो गई। एक
महीने तक अनमरकान्त उनके स्वागत की तैयािरयों में लगा रहा। गंगातट पर बड़ी मुिश्कल से पसंद का घर िमला ,
जो न बहुत बड़ा था न बहुत छोटा। उसकी सफाई और सफेदी में कई िदन लगे। गृहस्थी की सैकड़ों ही चीजें जमा
करनी थीं। उसके नाम सास ने एक हजार का बीमा भेज िदया था। उसने कतरब्योंत से उसके आधो ही में सारा
प्रबंध कर िदया। पाई-पाई का िहसाब िलखिा तैयार था। जब सास जी प्रयाग का स्नान करती हुइं , माघ में काशी
पहुंचीं, तो वहां का सुप्रबंध देखिकर बहुत प्रसन्न हुइं।
अनमरकान्त ने बचत के पांच सौ रुपये उनके सामने रखि िदए।
रेणुकादेवी ने चिकत होकर कहा-क्या पांच सौ ही में सब कुछ हो गया- मुझे तो िवश्वास नहीं आता।
'जी नहीं, पांच सौ ही खिचर्य हुए।'
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'यह तो तुमने इनाम देने का काम िकया ह। यह बचत के रुपये तुम्हारे हैं।'
अनमर ने झंपते हुए कहा-जब मुझे जरूरत होगी, आपसे मांग लूंगा। अनभी तो कोई ऐसी जरूरत नहीं ह।
रेणुकादेवी रूप और अनवस्था से नहीं, िवचार और व्यवहार से वृध्दा थीं। ज्ञान और व्रत में उनकी आस्था न
थी लेिकन लोकमत की अनवहेलना न कर सकती थीं। िवधावा का जीवन तप का जीवन ह। लोकमत इसके
िवपरीत कुछ नहीं देखि सकता। रेणुका को िववश होकर धमर्य का स्वांग भरना पड़ता था िकतु जीवन िबना िकसी
आधार के तो नहीं रह सकता। भोग-िवलास, सैर-तमाशे से आत्मा उसी भांित संतुष्टि नहीं होती, जैसे कोई चटनी
और अनचार खिाकर अनपनी क्षुधा को शांत नहीं कर सकता। जीवन िकसी तथ्य पर ही िटक सकता ह। रेणुका के
जीवन में यह आधार पशु-प्रेम था। वह अनपने साथ पशु-पिक्षयों का एक िचिड़याघर लाई थीं। तोते, मैने, बंदर,
िबल्ली, गाएं, िहरन, मोर, कुत्तो आिद पाल रखे थ और उन्हीं के सुखि -दुखि में सिम्मिलत होकर जीवन में साथर्यकता
का अननुभव करती थीं। हरएक का अनलग-अनलग नाम था, रहने का अनलग-अनलग स्थान था, खिाने-पीने के अनलगअनलग बतर्यन थ। अनन्य रईसों की भांित उनका पशु -प्रेम नुमायशी, व्शनेबल या मनोरंजक न था। अनपने पशु-पिक्षयों
में उनकी जान बसती थी। वह उनके बच्चों को उसी मात़त्व -भरे स्नेह से खेलाती थीं मानो अनपने नाती-पोते हों।
ये पशु भी उनकी बातें, उनके इशारे, कुछ इस तरह समझ जाते थ िक आश्चियर्य होता था।
दूसरे िदन मां-बेटी में बातें होने लगीं।
रेणुका ने कहा-तुझे ससुराल इतनी प्यारी हो गईसुखिदा लिज्जत होकर बोली-क्या करूं अनम्मां, ऐसी उलझन में पड़ी हूं िक कुछ सूझता ही नहीं। बाप-बेटे में
िबलकुल नहीं बनती। दादाजी चाहते हैं, वह घर का धंधा देखें। वह कहते हैं, मुझे इस व्यवसाय से घृणा ह। मैं
चली जाती, तो न जाने क्या दशा होती। मुझे बराबर खिटका लगा रहता ह िक वह देश -िवदेश की राह न लें।
तुमने मुझे कुएं में ढकेल िदया और क्या कहूं ?
रेणुका िचितत होकर बोलीं-मैंने तो अनपनी समझ में घर-वर दोनों ही देखिभाल कर िववाह िकया था मगर
तेरी तकदीर को क्या करती- लड़के से तेरी अनब पटती ह, या वही हाल हसुखिदा िफर लिज्जत हो गई। उसके दोनों कपोल लाल हो गए। िसर झुकाकर बोली-उन्हें अनपनी िकताबों
और सभाआं से छुट्टी नहीं िमलती।
'तेरी जैसी रूपवती एक सीधे-सादे छोकरे को भी न संभाल सकी- चाल-चलन का कैसा ह?'
सुखिदा जानती थी, अनमरकान्त में इस तरह की कोई दुवासना नहीं ह पर इस समय वह इस बात को
िनश्चियात्मक रूप से न कह सकी। उसके नारीत्व पर धब्बा आता था। बोली-मैं िकसी के िदल का हाल क्या जानूं ,
अनम्मां इतने िदन हो गए, एक िदन भी ऐसा न हुआ होगा िक कोई चीज लाकर देते। जैसे चाहूं रहूं , उनसे कोई
मतलब ही नहीं।
रेणुका ने पूछा-तू कभी कुछ पूछती ह, कुछ बनाकर िखिलाती ह, कभी उसके िसर में तेल डालती हसुखिदा ने गवर्य से कहा-जब वह मेरी बात नहीं पूछते तो मुझे क्या गरज पड़ी ह वह बोलते हैं, तो मैं बोलती
हूं। मुझसे िकसी की गुलामी नहीं होगी।
रेणुका ने ताड़ना दी-बेटी, बुरा न मानना, मुझे बहुत-कुछ तेरा ही दोष दीखिता ह। तुझे अनपने रूप का गवर्य
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ह। तू समझती ह, वह तेरे रूप पर मुग्धा होकर तेरे पैरों पर िसर रगड़ेगा। ऐसे मदर्य होते हैं, यह मैं जानती हूं पर
वह प्रेम िटकाऊ नहीं होता। न जाने तू क्यों उससे तनी रहती ह- मुझे तो वह बड़ा गरीब और बहुत ही
िवचारशील मालूम होता ह। सच कहती हूं , मुझे उस पर दया आती ह। बचपन में तो बेचारे की मां मर गई।
िवमाता िमली, वह डाइन। बाप हो गया शत्रु। घर को अनपना घर न समझ सका। जो हृदय िचता-भार से इतना
दबा हुआ हो, उसे पहले स्नेह और सेवा से पोला करने के बाद तभी प्रेम का बीज बोया जा सकता ह।
सुखिदा िचढ़कर बोली-वह चाहते हैं, मैं उनके साथ तपिस्वनी बनकर रहूं। रूखिा-सूखिा खिाऊं, मोटा-झोटा
पहनूं और वह घर से अनलग होकर मेहनत और मजूरी करें। मुझसे यह न होगा, चाहे सदैव के िलए उनसे नाता ही
टूट जाए। वह अनपने मन की करेंगे, मेरे आराम-तकलीफ की िबलकुल परवाह न करेंगे, तो मैं भी उनका मुंह न
जोहूंगी।
रेणुका ने ितरस्कार भरी िचतवनों से देखिा और बोली-और अनगर आज लाला समरकान्त का दीवाला िपट
जाएसुखिदा ने इस संभावना की कभी कल्पना ही न की थी।
िवमूढ़ होकर बोली-दीवाला क्यों िपटने लगा'ऐसा संभव तो ह।'
सुखिदा ने मां की संपित्त का आश्रय न िलया। वह न कह सकी,'तुम्हारे पास जो कुछ ह, वह भी तो मेरा ही
ह।' आत्म-सम्मान ने उसे ऐसा न कहने िदया। मां के इस िनदर्यय प्रश्न पर झुंझलाकर बोली-जब मौत आती ह, तो
आदमी मर जाता ह। जान-बूझकर आग में नहीं कूदा जाता।
बातों-बातों में माता को ज्ञात हो गया िक उनकी संपित्त का वािरस आने वाला ह। कन्या के भिवष्य के
िवषय में उन्हें बड़ी िचता हो गई थी। इस संवाद ने उस िचता का शमन कर िदया।
उन्होंने आनंद िवह्नल होकर सुखिदा को गले लगा िलया।

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पांच
अनमरकान्त ने अनपने जीवन में माता के स्नेह का सुखि न जाना था। जब उसकी माता का अनवसान हुआ, तब
वह बहुत छोटा था। उस दूर अनतीत की कुछ धाुंधाली-सी और इसीिलए अनत्यंत मनोहर और सुखिद स्मृितयां शेष
थीं। उसका वेदनामय बाल-रूदन सुनकर जैसे उसकी माता ने रेणुकादेवी के रूप में स्वगर्य से आकर उसे गोद में
उठा िलया। बालक अनपना रोना-धोना भूल गया और उस ममता-भरी गोद में मुंह िछपाकर दैवी-सुखि लूटने लगा।
अनमरकान्त नहीं-नहीं करता रहता और माता उसे पकड़कर उसके आगे मेवे और िमठाइयां रखि देतीं। उसे इंकार न
करते बनता। वह देखिता, माता उसके िलए कभी कुछ पका रही हैं, कभी कुछ, और उसे िखिलाकर िकतनी प्रसन्न
होती हैं, तो उसके हृदय में श्रध्दा की एक लहर-सी उठने लगती ह। वह कॉलेज से लौटकर सीधे रेणुका के पास
जाता। वहां उसके िलए जलपान रखे हुए रेणुका उसकी बाट जोहती रहती। प्रात: का नाश्ता भी वह वहीं करता।
इस मात्-स्नेह से उसे त़िप्त ही न होती थी। छुट़िटयों के िदन वह प्राय: िदन-भर रेणुका ही के यहां रहता। उसके
साथ कभी-कभी नैना भी चली जाती। वह खिासकर पशु -पिक्षयों की क्रीड़ा देखिने जाती थी।
अनमरकान्त के कोष में स्नेह आया, तो उसकी वह कृतपणता जाती रही। सुखिदा उसके समीप आने लगी।
उसकी िवलािसता से अनब उसे उतना भय न रहा। रेणुका के साथ उसे लेकर वह सैर -तमाशे के िलए भी जाने
लगा। रेणुका दसवें-पांचवें उसे दस-बीस रुपये जरूर दे देतीं। उसके सप्रेम आग्रह के सामने अनमरकान्त की एक न
चलती। उसके िलए नए-नए सूट बने, नए-नए जूते आए, मोटर साइिकल आई, सजावट के सामान आए। पांच ही
छ: महीने में वह िवलािसता का द्रोही, वह सरल जीवन का उपासक, अनच्छा-खिास रईसजादा बन बैठा,
रईसजादों के भावों और िवचारों से भरा हुआ उतना ही िनद्वऊद्व और स्वाथी। उसकी जेब में दस-बीस रुपये
हमेशा पड़े रहते। खिुद खिाता, िमत्रों को िखिलाता और एक की जगह दो खिचर्य करता। वह अनधययनशीलता जाती
रही। ताश और चौसर में ज्यादा आनंद आता। हां, जलसों में उसे अनब और अनिधक उत्साह हो गया। वहां उसे
कीित-लाभ का अनवसर िमलता था। बोलने की शिक्त उसमें पहले भी बुरी न थी। अनभ्यास से और भी पिरमािजत
हो गई। दैिनक समाचार और सामियक सािहत्य से भी उसे रुिच थी, िवशेषकर इसिलए िक रेणुका रोज-रोज की
खिबरें उससे पढ़वाकर सुनती थीं।
दैिनक समाचार-पत्रों के पढ़ने से अनमरकान्त के राजनैितक ज्ञान का िवकास होने लगा। देशवािसयों के साथ
शासक मंडल की कोई अननीित देखिकर उसका खिून खिौल उठता था। जो संस्थाएं राष्ट्रीय उत्थान के िलए उद्योग
कर रही थीं, उनसे उसे सहानुभूित हो गई। वह अनपने नगर की कंाग्रेस -कमेटी का मेम्बर बन गया और उसके
कायर्यक्रम में भाग लेने लगा।
एक िदन कॉलेज के कुछ छात्र देहातों की आिथक-दशा की जांच-पड़ताल करने िनकले। सलीम और अनमर
भी चले। अनधयापक डॉ. शािन्तकुमार उनके नेता बनाए गए। कई गांवों की पड़ताल करने के बाद मंडली संध्या
समय लौटने लगी, तो अनमर ने कहा-मैंने कभी अननुमान न िकया था िक हमारे कृतषकों की दशा इतनी
िनराशाजनक ह।
सलीम बोला-तालाब के िकनारे वह जो चार-पांच घर मल्लाहों के थ, उनमें तो लोहे के दो-एक बतर्यन के
िसवा कुछ था ही नहीं। मैं समझता था, देहाितयों के पास अननाज की बखिारें भरी होंगी लेिकन यहां तो िकसी घर
में अननाज के मटके तक न थ।

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शािन्तकुमार बोले-सभी िकसान इतने गरीब नहीं होते। बड़े िकसानों के घर में बखिारें भी होती हैं लेिकन
ऐसे िकसान गांव में दो-चार से ज्यादा नहीं होते।
अनमरकान्त ने िवरोध िकया-मुझे तो इन गांवों में एक भी ऐसा िकसान न िमला। और महाजन और अनमले
इन्हीं गरीबों को चूसते हैं मैं चाहता हूं उन लोगों को इन बेचारों पर दया भी नहीं आती शािन्तकुमार ने
मुस्कराकर कहा-दया और धमर्य की बहुत िदनों परीक्षा हुई और यह दोनों हल्के पड़े। अनब तो न्याय -परीक्षा का युग
ह।
शािन्तकुमार की अनवस्था कोई पैंतीस की थी। गोरे-िचट्टे, रूपवान आदमी थ। वेश-भूषा अनंग्रेजी थी, और
पहली नजर में अनंग्रेज ही मालूम होते थ क्योंिक उनकी आंखें नीली थीं, और बाल भी भूरे थ। आक्सफोडर्य से
डॉक्टर की उपािध प्राप्त कर लाए थ। िववाह के कट्टर िवरोधी, स्वतंत्रता-प्रेम के कट्टर भक्त, बहुत ही प्रसन्न
मुखि, सहृदय, सेवाशील व्यिक्त थ। मजाक का कोई अनवसर पाकर न चूकते थ। छात्रों से िमत्र भाव रखिते थ।
राजनैितक आंदोलनों में खिूब भाग लेते पर गुप्त रूप से। खिुले मैदान में न आते। हां, सामािजक क्षेत्र में खिूब गरजते
थ।
अनमरकान्त ने करूण स्वर में कहा-मुझे तो उस आदमी की सूरत नहीं भूलती, जो छ: महीने से बीमार पड़ा
था और एक पैसे की भी दवा न ली थी। इस दशा में जमींदार ने लगान की िडगरी करा ली और जो कुछ घर में
था, नीलाम करा िलया। बैल तक िबकवा िलए। ऐसे अनन्यायी संसार की िनयंता कोई चेतन शिक्त ह, मुझे तो
इसमें संदेह हो रहा ह। तुमने देखिा नहीं सलीम, गरीब के बदन पर िचथड़े तक न थ। उसकी वृध्दा माता िकतना
ठ्ठट-ठ्ठटकर रोती थीं।
सलीम की आंखिों में आंसू थ। बोला-तुमने रुपये िदए, तो बुिढ़या कैसे तुम्हारे पैरों पर िगर पड़ी। मैं तो
अनलग मुंह फेरकर रो रहा था।
मंडली यों ही बातचीत करती चली जाती थी। अनब पक्की सड़क िमल गई थी। दोनों तरफ ऊंचे वृक्षों ने
मागर्य को अनंधोरा कर िदया था। सड़क के दािहने-बाएं-नीचे ऊखि, अनरहर आिद के खेत खिड़े थ। थोड़ी-थोड़ी दूर पर
दो-एक मजूर या राहगीर िमल जाते थ।
सहसा एक वृक्ष के नीचे दस-बारह स्त्री-पुरुष सशंिकत भाव से दुबके हुए िदखिाई िदए। सब-के-सब सामने
वाले अनरहर के खेत की ओर ताकते और आपस में कनफुसिकयां कर रहे थ। अनरहर के खेत की मेड़ पर दो गोरे
सैिनक हाथ में बेंत िलए अनकड़े खिड़े थ। छात्र-मंडली को कौतूहल हुआ। सलीम ने एक आदमी से पूछा-क्या माजरा
ह, तुम लोग क्यों जमा होअनचानक अनरहर के खेत की ओर से िकसी औरत का चीत्कार सुनाई पड़ा। छात्र वगर्य अनपने डंडे संभालकर
खेत की तरफ लपका। पिरिस्थित उनकी समझ में आ गई थी।
एक गोरे सैिनक ने आंखें िनकालकर छड़ी िदखिाते हुए कहा-भाग जाओ नहीं हम ठोकर मारेगा ।
इतना उसके मुंह से िनकलना था िक डॉ. शािन्तकुमार ने लपककर उसके मुंह पर घूंसा मारा। सैिनक के मुंह
पर घूंसा पड़ा, ितलिमला उठा पर था घूंसेबाजी में मंजा हुआ। घूंसे का जवाब जो िदया, तो डॉक्टर साहब िगर
पड़े। उसी वक्त सलीम ने अनपनी हाकी-िस्टक उस गोरे के िसर पर जमाई। वह चौंिधया गया, जमीन पर िगर
पड़ा और जैसे मूिछत हो गया। दूसरे सैिनक को अनमर और एक दूसरे छात्र ने पीटना शुरू कर िदया था पर वह
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इन दोनों युवकों पर भारी था। सलीम इधर से फुसर्यत पाकर उस पर लपका। एक के मुकाबले में तीन हो गए।
सलीम की िस्टक ने इस सैिनक को भी जमीन पर सुला िदया। इतने में अनरहर के पौधों को चीरता हुआ तीसरा
गोरा आ पहुंचा। डॉक्टर शािन्तकुमार संभलकर उस पर लपके ही थ िक उसने िरवाल्वर िनकलकर दाग िदया।
डॉक्टर साहब जमीन पर िगर पड़े। अनब मामला नाजुक था। तीनों छात्र डॉक्टर साहब को संभालने लगे। यह भय
भी लगा हुआ था िक वह दूसरी गोली न चला दे। सबके प्राण नहों में समाए हुए थ।
मजूर लोग अनभी तक तो तमाशा देखि रहे थ। मगर डॉक्टर साहब को िगरते देखि उनके खिून में भी जोश
आया। भय की भांित साहस भी संक्रामक होता ह। सब-के-सब अनपनी लकिड़यां संभालकर गोरे पर दौड़े। गोरे ने
िरवाल्वर दागी पर िनशाना खिाली गया। इसके पहले िक वह तीसरी गोली चलाए, उस पर डंडों की वषा होने
लगी और एक क्षण में वह भी आहत होकर िगर पड़ा।
खिैिरयत यह हुई िक जख्म डॉक्टर साहब की जांघ में था। सभी छात्र 'तत्कालधमर्य' जानते थ। घाव का खिून
बंद िकया और पट्टी बंधा दी।
उसी वक्त एक युवती खेत से िनकली और मुंह िछपाए, लंगड़ाती, कपड़े संभालती, एक तरफ चल पड़ी।
अनबला लज्जावश, िकसी से कुछ कहे िबना, सबकी नजरों से दूर िनकल जाना चाहती थी। उसकी िजस अनमूल्य
वस्तु का अनपहरण िकया गया था, उसे कौन िदला सकता था- दुष्टिों को मार डालो, इससे तुम्हारी न्याय-बुिध्द को
संतोष होगा, उसकी तो जो चीज गई, वह गई। वह अनपना दुखि क्यों रोए- क्यों फिरयाद करे- सारे संसार की
सहानुभूित, उसके िकस काम की ह ।
सलीम एक क्षण तक युवती की ओर ताकता रहा। िफर िस्टक संभालकर उन तीनों को पीटने लगा ऐसा
जान पड़ता था िक उन्मत्ता हो गया ह।
डॉक्टर साहब ने पुकारा-क्या करते हो सलीम इससे क्या फायदा- यह इंसािनयत के िखिलाफ ह िक िगरे
हुआं पर हाथ उठाया जाए।
सलीम ने दम लेकर कहा-मैं एक शैतान को भी िजदा न छोडूंगा। मुझे फांसी हो जाए, कोई गम नहीं। ऐसा
सबक देना चािहए िक िफर िकसी बदमाश को इसकी जुरर्यत न हो।
िफर मजूरों की तरफ देखिकर बोला-तुम इतने आदमी खिड़े ताकते रहे और तुमसे कुछ न हो सका। तुममें
इतनी गैरत भी नहीं- अनपनी बहू-बेिटयों की आबरू की िहफाजत भी नहीं कर सकते- समझते होंगे कौन हमारी
बहू-बेटी हैं। इस देश में िजतनी बेिटयां हैं, िजतनी बहुएं हैं, सब तुम्हारी बहुएं हैं, िजतनी मांएं हैं, सब तुम्हारी
मांएं हैं। तुम्हारी आंखिों के सामने यह अननथर्य हुआ और तुम कायरों की तरह खिड़े ताकते रहे क्यों सब -के-सब जाकर
मर नहीं गए।
सहसा उसे खियाल आ गया िक मैं आवेश में आकर इन गरीबों को फटकार बताने की अननािधकार चेष्टिा कर
रहा हूं। वह चुप हो गया और कुछ लिज्जत भी हुआ।
समीप के एक गांव से बैलगाड़ी मंगाई गई। शािन्तकुमार को लोगों ने उठाकर उस पर लेटा िदया और गाड़ी
चलने को हुई िक डॉक्टर साहब ने चौंककर पूछा-और उन तीनों आदिमयों को क्या यहीं छोड़ जाओगेसलीम ने मस्तक िसकोड़कर कहा-हम उनको लादकर ले जाने के िजम्मेदार नहीं हैं। मेरा तो जी चाहता ह,
उन्हें खिोदकर दफन कर दूं।
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आिखिर डॉक्टर के बहुत समझाने के बाद सलीम राजी हुआ। तीनों गोरे भी गाड़ी पर लादे गए और गाड़ी
चली। सब-के-सब मजूर अनपरािधयों की भांित िसर झुकाए कुछ दूर तक गाड़ी के पीछे-पीछे चले। डॉक्टर ने
उनको बहुत धान्यवाद देकर िवदा िकया। नौ बजते-बजते समीप का रेलवे स्टेशन िमला। इन लोगों ने गोरों को
तो वहीं पुिलस के चाजर्य में छोड़ िदया और आप डॉक्टर साहब के साथ गाड़ी पर बैठकर घर चले।
सलीम और अनमर तो जरा देर में हंसने-बोलने लगे। इस संग्राम की चचा करते उनकी जबान न थकती थी।
स्टेशन-मास्टर से कहा, गाड़ी में मुसािफरों से कहा, रास्ते में जो िमला उससे कहा। सलीम तो अनपने साहस और
शौयर्य की खिूब डींगें मारता था, मानो कोई िकला जीत आया ह और जनता को चािहए िक उसे मुकुट पहनाए,
उसकी गाड़ी खिींचे, उसका जुलूस िनकाले िकतु अनमरकान्त चुपचाप डॉक्टर साहब के पास बैठा हुआ था। आज के
अननुभव ने उसके हृदय पर ऐसी चोट लगाई थी, जो कभी न भरेगी। वह मन-ही-मन इस घटना की व्याख्या कर
रहा था। इन टके के सैिनकों की इतनी िहम्मत क्यों हुई- यह गोरे िसपाही
इंगलैंड के िनम्नतम श्रेणी के मनुष्य होते हैं। इनका इतना साहस कैसे हुआ- इसीिलए िक भारत पराधीन ह।
यह लोग जानते हैं िक यहां के लोगों पर उनका आतंक छाया हुआ ह। वह जो अननथर्य चाहें, करें। कोई चूं नहीं कर
सकता। यह आतंक दूर करना होगा। इस पराधीनता की जंजीर को तोड़ना होगा।
इस जंजीर को तोड़ने के िलए वह तरह-तरह के मंसूबे बंधाने लगा, िजनमें यौवन का उन्माद था, लड़कपन
की उग्रता थी और थी कच्ची बुिध्द की बहक।

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छ:
डॉ. शािन्तकुमार एक महीने तक अनस्पताल में रहकर अनच्छे हो गए। तीनों सैिनकों पर क्या बीती , नहीं कहा
जा सकता पर अनच्छे होते ही पहला काम जो डॉक्टर साहब ने िकया, वह तांगे पर बैठकर छावनी में जाना और
उन सैिनकों की कुशल पूछना था। मालूम हुआ िक वह तीनों भी कई-कई िदन अनस्पताल में रहे, िफर तबदील कर
िदए गए। रेिजमेंट के कप्तान ने डॉक्टर साहब से अनपने आदिमयों के अनपराध की क्षमा मांगी और िवश्वास
िदलाया िक भिवष्य में सैिनकों पर ज्यादा कड़ी िनगाह रखिी जाएगी। डॉक्टर साहब की इस बीमारी में
अनमरकान्त ने तन-मन से उनकी सेवा की, केवल भोजन करने और रेणुका से िमलने के िलए घर जाता, बाकी
सारा िदन और सारी रात उन्हीं की सेवा में व्यतीत करता। रेणुका भी दो-तीन बार डॉक्टर साहब को देखिने गइं।
इधर से फुरसत पाते ही अनमरकान्त कांग्रेस के कामों में ज्यादा उत्साह से शरीक होने लगा। चंदा देने में तो
बस संस्था में कोई उसकी बराबरी न कर सकता था।
एक बार एक आम जलसे में वह ऐसी उद़डंता से बोला िक पुिलस के सुपिरटेंडंट ने लाला समरकान्त को
बुलाकर लड़के को संभालने की चेतावनी दे डाली। लालाजी ने वहां से लौटकर खिुद तो अनमरकान्त से कुछ न कहा,
सुखिदा और रेणुका दोनों से जड़ िदया। अनमरकान्त पर अनब िकसका शासन ह, वह खिुद समझते थ। इधर बेटे से
वह स्नेह करने लगे थ। हर महीने पढ़ाई का खिचर्य देना पड़ता था, तब उसका स्कूल जाना उन्हें जहर लगता था,
काम में लगाना चाहते थ और उसके काम न करने पर िबगड़ते थ। अनब पढ़ाई का कुछ खिचर्य न देना पड़ता था।
इसिलए कुछ न बोलते थ बिल्क कभी-कभी संदूक की कुंजी न िमलने या उठकर संदूक खिोलने के कष्टि से बचने के
िलए, बेटे से रुपये उधर ले िलया करते। अनमरकान्त न मांगता, न वह देते।
सुखिदा का प्रसवकाल समीप आता जाता था। उसका मुखि पीला पड़ गया था। भोजन बहुत कम करती थी
और हंसती-बोलती भी बहुत कम थी। वह तरह-तरह के दु:स्वप्न देखिती रहती थी, इससे िचत्ता और भी सशंिकत
रहता था। रेणुका ने जनन-संबधी कई पुस्तकें उसको मंगा दी थीं। इन्हें पढ़कर वह और भी िचितत रहती थी।
िशशु की कल्पना से िचत्ता में एक गवर्यमय उल्लास होता था पर इसके साथ ही हृदय में कंपन भी होता था न जाने
क्या होगा?
उस िदन संध्या समय अनमरकान्त उसके पास आया, तो वह जली बैठी थी। तीक्ष्ण नेत्रों से देखिकर बोली-तुम
मुझे थोड़ी-सी संिखिया क्यों नहीं दे देते- तुम्हारा गला भी छूट जाए, मैं भी जंजाल से मुक्त हो जाऊं।
अनमर इन िदनों आदशर्य पित बना हुआ था। रूप-ज्योित से चमकती हुई सुखिदा आंखिों को उन्मत्ता करती थी
पर मात़त्व के भार से लदी हुई यह पीले मुखि वाली रोिगणी उसके हृदय को ज्योित से भर देती थी। वह उसके
पास बैठा हुआ उसके रूखे केशों और सूखे हाथों से खेला करता। उसे इस दशा में लाने का अनपराधी वह ह इसिलए
इस भार को सह्य बनाने के िलए वह सुखिदा का मुंह जोहता रहता था। सुखिदा उससे कुछ फरमाइश करे, यही इन
िदनों उसकी सबसे बड़ी कामना थी। वह एक बार स्वगर्य के तारे तोड़ लाने पर भी उताई हो जाता। बराबर उसे
अनच्छी-अनच्छी िकताबें सुनाकर उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न करता रहता था। िशशु की कल्पना से उसे िजतना
आनंद होता था उससे कहीं अनिधक सुखिदा के िवषय में िचता थी-न जाने क्या होगा- घबराकर भारी स्वर में
बोला-ऐसा क्यों कहती हो सुखिदा, मुझसे गलती हुई हो तो, बता दो?
सुखिदा लेटी हुई थी। तिकए के सहारे टेक लगाकर बोली-तुम आम जलसों में कड़ी-कड़ी स्पीचें देते िफरते
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हो, इसका इसके िसवा और क्या मतलब ह िक तुम पकड़े जाओ और अनपने साथ घर को भी ले डूबो। दादा से
पुिलस के िकसी बड़े अनफसर ने कहा ह। तुम उनकी कुछ मदद तो करते नहीं, उल्टे और उनके िकए-कराए को धूल
में िमलाने को तुले बैठे हो। मैं तो आप ही अनपनी जान से मर रही हूं , उस पर तुम्हारी यह चाल और भी मारे
डालती ह। महीने भर डॉक्टर साहब के पीछे हलकान हुए। उधर से छुट्टी िमली तो यह पचड़ा ले बैठे। क्या तुमसे
शांितपूवर्यक नहीं बैठा जाता- तुम अनपने मािलक नहीं हो, िक िजस राह चाहो, जाओ। तुम्हारे पांव में बेिड़यां हैं।
क्या अनब भी तुम्हारी आंखें नहीं खिुलतींअनमरकान्त ने अनपनी सफाई दी-मैंने तो कोई ऐसी स्पीच नहीं दी जो कड़ी कही जा सके।
'तो दादा झूठ कहते थ?'
'इसका तो यह अनथर्य ह िक मैं अनपना मुंह सी लूं ?'
'हां, तुम्हें अनपना मुंह सीना पड़ेगा।'
दोनों एक क्षण भूिम और आकाश की ओर ताकते रहे। तब अनमरकान्त ने परास्त होकर कहा -अनच्छी बात ह।
आज से अनपना मुंह सी लूंगा। िफर तुम्हारे सामने ऐसी िशकायत आए, तो मेरे कान पकड़ना।
सुखिदा नरम होकर बोली-तुम नाराज होकर यह प्रण नहीं कर रहे हो- मैं तुम्हारी अनप्रसन्नता से थर-थर
कांपती हूं। मैं भी जानती हूं िक हम लोग पराधीन हैं। पराधीनता मुझे भी उतनी ही अनखिरती ह िजतनी तुम्हें।
हमारे पांवों में तो दोहरी बेिड़यां हैं-समाज की अनलग, सरकार की अनलग लेिकन आगे-पीछे भी तो देखिना होता
ह। देश के साथ हमारा जो धमर्य ह, वह और प्रबल रूप में िपता के साथ ह, और उससे भी प्रबल रूप में अनपनी
संतान के साथ। िपता को दुखिी और संतान को िनस्सहाय छोड़कर देश धमर्य का पालन ऐसा ही ह जैसे कोई अनपने
घर में आग लगाकर खिुले आकाश में रहे। िजस िशशु को मैं अनपना हृदय-रक्त िपला-िपलाकर पाल रही हूं, उसे मैं
चाहती हूं, तुम भी अनपना सवर्यस्व समझो। तुम्हारे सारे स्नेह और िनष्ठा का मैं एकमात्र उसी को अनिधकारी देखिना
चाहती हूं।
अनमरकान्त िसर झुकाए यह उपदेश सुनता रहा। उसकी आत्मा लिज्जत थी और उसे िधक्कार रही थी।
उसने सुखिदा और िशशु दोनों ही के साथ अनन्याय िकया ह। िशशु का कल्पना-िचत्र उसी आंखिों में खिींच गया। वह
नवनीत-सा कोमल िशशु उसकी गोद में खेल रहा था। उसकी संपूणर्य चेतना इसी कल्पना में मग्न हो गई। दीवार
पर िशशु कृतष्ण का एक सुंदर िचत्र लटक रहा था। उस िचत्र में आज उसे िजतना मािमक आनंद हुआ, उतना और
कभी न हुआ था। उसकी आंखें सजल हो गइं।
सुखिदा ने उसे एक पान का बीड़ा देते हुए कहा-अनम्मां कहती हैं, बच्चे को लेकर मैं लखिनऊ चली जाऊंगी।
मैंने कहा-अनम्मां, तुम्हें बुरा लगे या भला, मैं अनपना बालक न दूंगी।
अनमरकान्त ने उत्सुक होकर पूछा-तो िबगड़ी होंगी'नहीं जी, िबगड़ने की क्या बात थी- हां, उन्हें कुछ बुरा जरूर लगा होगा लेिकन मैं िदल्लगी में भी अनपने
सवर्यस्व को नहीं छोड़ सकती।'
'दादा ने पुिलस कमर्यचारी की बात अनम्मां से भी कही होगी?'
'हां, मैं जानती हूं कही ह। जाओ, आज अनम्मां तुम्हारी कैसी खिबर लेती हैं।'
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'मैं आज जाऊंगा ही नहीं।'
'चलो, मैं तुम्हारी वकालत कर दूंगी।'
'मुआफ कीिजए। वहां मुझे और भी लिज्जत करोगी।'
'नहीं सच कहती हूं। अनच्छा बताओ, बालक िकसको पड़ेगा, मुझे या तुम्हें। मैं कहती हूं तुम्हें पड़ेगा।'
'मैं चाहता हूं तुम्हें पड़े।'
'यह क्यों- मैं तो चाहती हूं तुम्हें पड़े। '
'तुम्हें पड़ेगा, तो मैं उसे और ज्यादा चाहूंगा।'
'अनच्छा, उस स्त्री की कुछ खिबर िमली िजसे गोरों ने सताया था?'
'नहीं, िफर तो कोई खिबर न िमली।'
'एक िदन जाकर सब कोई उसका पता क्यों नहीं लगाते, या स्पीच देकर ही अनपनेर् कतर्यव्य से मुक्त हो
गए?'
अनमरकान्त ने झंपते हुए कहा-कल जाऊंगा।
'ऐसी होिशयारी से पता लगाओ िक िकसी को कानों-कान खिबर न हो अनगर घर वालों ने उसका बिहष्कार
कर िदया हो, तो उसे लाओ। अनम्मां को उसे अनपने साथ रखिने में कोई आपित्त न होगी, और यिद होगी तो मैं
अनपने पास रखि लूंगी।'
अनमरकान्त ने श्रध्दा-पूणर्य नेत्रों से सुखिदा को देखिा। इसके हृदय में िकतनी दया, िकतना सेवा-भाव, िकतनी
िनभीकता ह। इसका आज उसे पहली बार ज्ञान हुआ।
उसने पूछा-तुम्हें उससे जरा भी घृणा न होगी?
सुखिदा ने सकुचाते हुए कहा-अनगर मैं कहूं, न होगी, तो अनसत्य होगा। होगी अनवश्य पर संस्कारों को िमटाना
होगा। उसने कोई अनपराध नहीं िकया, िफर सजा क्यों दी जाएअनमरकान्त ने देखिा, सुखिदा िनमर्यल नारीत्व की ज्योित में नहा उठी ह। उसका देवीत्व जैसे प्रस्फुिटत होकर
उससे आिलगन कर रहा ह।

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सात
अनमरकान्त ने आम जलसों में बोलना तो दूर रहा, शरीक होना भी छोड़ िदया पर उसकी आत्मा इस बंधन
से छटपटाती रहती थी और वह कभी-कभी सामियक पत्र-पित्रकाआं में अनपने मनोिवकारों को प्रकट करके संतोष
लाभ करता था। अनब वह कभी-कभी दूकान पर भी आ बैठता। िवशेषकर छुट़िटयों के िदन तो वह अनिधकतर
दूकान पर रहता था। उसे अननुभव हो रहा था िक मानवी प्रकृतित का बहुत-कुछ ज्ञान दूकान पर बैठकर प्राप्त
िकया जा सकता ह। सुखिदा और रेणुका दोनों के स्नेह और प्रेम ने उसे जकड़ िलया था। हृदय की जलन जो पहले
घर वालों से, और उसके फलस्वरूप, समाज से िवद्रोह करने में अनपने को साथर्यक समझती थी, अनब शांत हो गई
थी। रोता हुआ बालक िमठाई पाकर रोना भूल गया।
एक िदन अनमरकान्त दूकान पर बैठा था िक एक अनसामी ने आकर पूछा-भैया कहां हैं बाबूजी, बड़ा जरूरी
काम थाअनमर ने देखिा-अनधोड़, बिलष्ठ, काला, कठोर आकृतित का मनुष्य ह। नाम ह काले खिां। रूखिाई से बोला-वह
कहीं गए हुए हैं। क्या काम ह'बड़ा जरूरी काम था। कुछ कह नहीं गए, कब तक आएंगे?'
अनमर को शराब की ऐसी दुफर्फंधा आई िक उसने नाक बंद कर ली और मुंह फेरकर बोला-क्या तुम शराब
पीते होकाले खिां ने हंसकर कहा-शराब िकसे मयस्सर होती ह लाला, रूखिी रोिटयां तो िमलती नहीं- आज एक
नातेदारी में गया था, उन लोगों ने िपला दी।
वह और समीप आ गया और अनमर के कान के पास मुंह लगाकर बोला-एक रकम िदखिाने लाया था। कोई
दस तोले की होगी। बाजार में ढाई सौ से कम नहीं ह लेिकन मैं तुम्हारा पुराना अनसामी हूं। जो कुछ दे दोगे , ले
लूंगा।
उसने कमर से एक जोड़ा सोने के कड़े िनकाले और अनमर के सामने रखि िदए। अनमर ने कड़ां को िबना उठाए
हुए पूछा-यह कड़े तुमने कहां पाएकाले खिां ने बेहयाई से मुस्कराकर कहा-यह न पूछो राजा, अनल्लाह देने वाला ह।
अनमरकान्त ने घृणा का भाव िदखिाकर कहा-कहीं से चुरा लाए होगेकाले खिां िफर हंसा-चोरी िकसे कहते हैं राजा, यह तो अनपनी खेती ह। अनल्लाह ने सबके पीछे हीला लगा
िदया ह। कोई नौकरी करके लाता ह, कोई मजूरी करता ह, कोई रोजगार करता ह, देता सबको वही खिुदा ह। तो
िफर िनकलो रुपये, मुझे देर हो रही ह। इन लाल पगड़ी वालों की बड़ी खिाितर करनी पड़ती ह भैया , नहीं एक
िदन काम न चले।
अनमरकान्त को यह व्यापार इतना जघन्य जान पड़ा िक जी में आया काले खिां को दुत्कार दे। लाला
समरकान्त ऐसे समाज के शत्रुआं से व्यवहार रखिते हैं, यह खियाल करके उसके रोएं खिड़े हो गए। उसे उस दूकान
से, उस मकान से, उस वातावरण से, यहां तक िक स्वयं अनपने आपसे घृणा होने लगी। बोला-मुझे इस चीज की
जरूरत नहीं ह। इसे ले जाओ, नहीं मैं पुिलस में इित्तला कर दूंगा। िफर इस दूकान पर ऐसी चीज लेकर न आना,
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कहे देता हूं।
काले खिां जरा भी िवचिलत न हुआ, बोला-यह तो तुम िबलकुल नई बात कहते हो भैया लाला इस नीित
पर चलते, तो आज महाजन न होते। हजारों रुपये की चीज तो मैं ही दे गया हूंगा। अनंगनू , महाजन, िभखिारी,
हींगन, सभी से लाला का व्यवहार ह। कोई चीज हाथ लगी और आंखि बंद करके यहां चले आए, दाम िलया और
घर की राह ली। इसी दूकान से बाल-बच्चों का पेट चलता ह। कांटा िनकलकर तौल लो। दस तोले से कुछ ऊपर
ही िनकलेगा मगर यहां पुरानी जजमानी ह, लाओ डेढ़ सौ ही दो, अनब कहां दौड़ते िफरेंअनमर ने दृढ़ता से कहा-मैंने कह िदया मुझे इसकी जरूरत नहीं।
'पछताओगे लाला, खिड़े-खिड़े ढ़ाई सौ में बेच लोगे।'
'क्यों िसर खिा रहे हो, मैं इसे नहीं लेना चाहता?'
'अनच्छा लाओ, सौ ही रुपये दे दो। अनल्लाह जानता ह, बहुत बल खिाना पड़ रहा ह पर एक बार घाटा ही
सही।'
'तुम व्यथर्य मुझे िदखि रहे हो। मैं चोरी का माल नहीं लूंगा, चाहे लाखि की चीज धोले में िमले। तुम्हें चोरी
करते शमर्य भी नहीं आती ईश्वर ने हाथ-पांव िदए हैं, खिासे मोटे-ताजे आदमी हो, मजदूरी क्यों नहीं करते- दूसरों
का माल उड़ाकर अनपनी दुिनया और आकबत दोनों खिराब कर रहे हो।'
काले खिां ने ऐसा मुंह बनाया, मानो ऐसी बकवास बहुत सुन चुका ह और बोला-तो तुम्हें नहीं लेना ह'नहीं।'
'पचास देते हो?'
'एक कौड़ी नहीं।'
काले खिां ने कड़े उठाकर कमर में रखि िलए और दूकान के नीचे उतर गया। पर एक क्षण में िफर लौटकर
बोला-अनच्छा तीस रुपये ही दे दो। अनल्लाह जानता ह, पगड़ी वाले आधा ले लेंगे।
अनमरकान्त ने उसे धाक्का देकर कहा-िनकल जा यहां से सूअनर, मुझे क्यों हरान कर रहा हकाले खिां चला गया, तो अनमर ने उस जगह को झाडू से साफ कराया और अनगरबत्ती जलाकर रखि दी। उसे
अनभी तक शराब की दुगंधा आ रही थी। आज उसे अनपने िपता से िजतनी अनभिक्त हुई, उतनी कभी न हुई थी। उस
घर की वायु तक उसे दूिषत लगने लगी। िपता के हथकंडों से वह कुछ -कुछ पिरिचत तो था पर उनका इतना
पतन हो गया ह, इसका प्रमाण आज ही िमला। उसने मन में िनश्चिय िकया आज िपता से इस िवषय में खिूब अनच्छी
तरह शास्त्राथर्य करेगा। उसने खिड़े होकर अनधीर नेत्रों से सड़क की ओर देखिा। लालाजी का पता न था। उसके मन में
आया, दूकान बंद करके चला जाए और जब िपताजी आ जाए तो साफ-साफ कह दे, मुझसे यह व्यापार न होगा।
वह दूकान बंद करने ही जा रहा था िक एक बुिढ़या लाठी टेकती हुई आकर सामने खिड़ी हो गई और बोली -लाला
नहीं हैं क्या, बेटा बुिढ़या के बाल सन हो गए थ। देह की हड़िडयां तक सूखि गई थीं। जीवन-यात्रा के उस स्थान पर पहुंच गई
थी, जहां से उसका आकार मात्र िदखिाई देता था, मानो दो-एक क्षण में वह अनदृश्य हो जाएगी।

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अनमरकान्त के जी में पहले तो आया िक कह दे, लाला नहीं हैं, वह आएं तब आना लेिकन बुिढ़या के िपचके
हुए मुखि पर ऐसी करूण याचना, ऐसी शून्य िनराशा छाई हुई थी िक उसे उस पर दया आ गई। बोला-लालाजी से
क्या काम ह- वह तो कहीं गए हुए हैं।
बुिढ़या ने िनराश होकर कहा-तो कोई हरज नहीं बेटा, मैं िफर आ जाऊंगी।
अनमरकान्त ने नम्रता से कहा-अनब आते ही होंगे, माता। ऊपर चली जाओ।
दूकान की कुरसी ऊंची थी। तीन सीिढ़यां चढ़नी पड़ती थीं। बुिढ़या ने पहली पट्टी पर पांव रखिा पर दूसरा
पांव ऊपर न उठा सकी। पैरों में इतनी शिक्त न थी। अनमर ने नीचे आकर उसका हाथ पकड़ िलया और उसे
सहारा देकर दूकान पर चढ़ा िदया। बुिढ़या ने आशीवाद देते हुए कहा-तुम्हारी बड़ी उम्र हो बेटा, मैं यही डरती हूं
िक लाला देर में आएं और अनंधोरा हो गया, तो मैं घर कैसे पहुंचूंगी- रात को कुछ नहीं सूझता बेटा।
'तुम्हारा घर कहां ह माता ?'
बुिढ़या ने ज्योितहीन आंखिों से उसके मुखि की ओर देखिकर कहा-गोवधर्यन की सराय पर रहती हूं , बेटा ।
'तुम्हारे और कोई नहीं ह?'
'सब हैं भैया, बेटे हैं, पोते हैं, बहुएं हैं, पोतों की बहुएं हैं पर जब अनपना कोई नहीं, तो िकस काम का- नहीं
लेते मेरी सुधा, न सही। हैं तो अनपने। मर जाऊंगी, तो िमट्टी तो िठकाने लगा देंगे।'
'तो वह लोग तुम्हें कुछ देते नहीं?'
बुिढ़या ने स्नेह िमले हुए गवर्य से कहा-मैं िकसी के आसरे-भरोसे नहीं हूं बेटा जीते रहें मेरा लाला समरकान्त,
वह मेरी परविरश करते हैं। तब तो तुम बहुत छोटे थ भैया, जब मेरा सरदार लाला का चपरासी था। इसी कमाई
में खिुदा ने कुछ ऐसी बरक्कत दी िक घर-द्वार बना, बाल-बच्चों का ब्याह-गौना हुआ, चार पैसे हाथ में हुए। थ
तो पांच रुपये के प्यादे, पर कभी िकसी से दबे नहीं, िकसी के सामने गदर्यन नहीं झुकाई। जहां लाला का पसीना
िगरे, वहां अनपना खिून बहाने को तैयार रहते थ। आधी रात, िपछली रात, जब बुलाया, हािजर हो गए। थ तो
अनदना-से नौकर, मुदा लाला ने कभी 'तुम' कहकर नहीं पुकारा। बराबर खिां साहब कहते थ। बड़े -बड़े सेिठए
कहते-खिां साहब, हम इससे दूनी तलब देंगे, हमारे पास आ जाओ पर सबको यही जवाब देते िक िजसके हो गए
उसके हो गए। जब तक वह दुत्कार न देगा, उसका दामन न छोडेगें। लाला ने भी ऐसा िनभाया िक क्या कोई
िनभाएगा- उन्हें मरे आज बीसवां साल ह, वही तलब मुझे देते जाते हैं। लड़के पराए हो गए, पोते बात नहीं पूछते
पर अनल्लाह मेरे लाला को सलामत रखे, मुझे िकसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत नहीं आई।
अनमरकान्त ने अनपने िपता को स्वाथी, लोभी, भावहीन समझ रखिा था। आज उसे मालूम हुआ, उनमें दया
और वात्सल्य भी ह। गवर्य से उसका हृदय पुलिकत हो उठा। बोला-तो तुम्हें पांच रुपये िमलते हैं'हां बेटा, पांच रुपये महीना देते जाते हैं।'
'तो मैं तुम्हें रुपये िदए देता हूं , लेती जाओ। लाला शायद देर में आएं।'
वृध्दा ने कानों पर हाथ रखिकर कहा-नहीं बेटा, उन्हें आ जाने दो। लिठया टेकती चली जाऊंगी। अनब तो
यही आंखि रह गई ह।

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'इसमें हजर्य क्या ह- मैं उनसे कह दूंगा, पठािनन रुपये ले गई। अनंधोरे में कहीं िगर-िगरा पड़ोगी।'
'नहीं बेटा, ऐसा काम नहीं करती, िजसमें पीछे से कोई बात पैदा हो। िफर आ जाऊंगी।'
नहीं, मैं िबना िलए न जाने दूंगा।'
बुिढ़या ने डरते-डरते कहा-तो लाओ दे दो बेटा, मेरा नाम टांक लेना पठािनन।
अनमरकान्त ने रुपये दे िदए। बुिढ़या ने कांपते हाथों से रुपये लेकर िगरह बांधो और दुआएं देती हुई, धीरेधीरे सीिढ़यों से नीचे उतरी मगर पचास कदम भी न गई होगी िक पीछे से अनमरकान्त एक इक्का िलए हुए आया
और बोला-बूढ़ी माता, आकर इक्के पर बैठ जाओ, मैं तुम्हें पहुंचा दूं।
बुिढ़या ने आश्चियर्यचिकत नेत्रों से देखिकर कहा-अनरे नहीं, बेटा तुम मुझे पहुंचाने कहां जाओगे मैं लिठया
टेकती हुई चली जाऊंगी। अनल्लाह तुम्हें सलामत रखे।
अनमरकान्त इक्का ला चुका था। उसने बुिढ़या को गोद में उठाया और इक्के पर बैठाकर पूछा-कहां चलूंबुिढ़या ने इक्के के डंडों को मजबूती से पकड़कर कहा-गोवधर्यन की सराय चलो बेटा, अनल्लाह तुम्हारी उम्र
दराज करे। मेरा बच्चा इस बुिढ़या के िलए इतना हरान हो रहा ह। इत्ती दूर से दौड़ा आया। पढ़ने जाते हो न
बेटा, अनल्लाह तुम्हें बड़ा दरजा दे।
पंद्रह-बीस िमनट में इक्का गोवधर्यन की सराय पहुंच गया। सड़क के दािहने हाथ एक गली थी। वहीं बुिढ़या
ने इक्का रूकवा िदया, और उतर पड़ी। इक्का आगे न जा सकता था। मालूम पड़ता था, अनंधोरे ने मुंह पर
तारकोल पोत िलया ह।
अनमरकान्त ने इक्के को लौटाने के िलए कहा, तो बुिढ़या बोली-नहीं मेरे लाल, इत्ती दूर आए हो, तो पलभर मेरे घर भी बैठ लो, तुमने मेरा कलेजा ठंडा कर िदया।
गली में बड़ी दुगंधा थी। गंदे पानी के नाले दोनों तरफ बह रहे थ। घर प्राय: सभी कच्चे थ। गरीबों का
मुहल्ला था। शहरों के बाजारों और गिलयों में िकतना अनंतर ह एक फूल ह-सुंदर, स्वच्छ, सुगंधामय दूसरी जड़ हकीचड़ और दुगर्यन्ध से भरी, टेढ़ी-मेढ़ी लेिकन क्या फूल को मालूम ह िक उसकी हस्ती जड़ से हबुिढ़या ने एक मकान के सामने खिड़े होकर धीरे से पुकारा-सकीना अनंदर से आवाज आई-आती हूं अनम्मां
इतनी देर कहां लगाईएक क्षण में सामने का द्वार खिुला और एक बािलका हाथ में िमट्टी के तेल की कुप्पी िलए द्वार पर खिड़ी हो
गई। अनमरकान्त बुिढ़या के पीछे खिड़ा था, उस पर बािलका की िनगाह न पड़ी लेिकन बुिढ़या आगे बढ़ी, तो
सकीना ने अनमर को देखिा। तुरंत ओढ़नी में मुंह िछपाती हुई पीछे हट गई और धीरे से पूछा-यह कौन हैं, अनम्मां?
बुिढ़या ने कोने में अनपनी लकड़ी रखि दी और बोली-लाला का लड़का ह, मुझे पहुंचाने आया ह। ऐसा नेकशरीफ लड़का तो मैंने देखिा ही नहीं।
उसने अनब तक का सारा वृत्तांत अनपने आशीवादों से भरी भाषा में कह सुनाया और बोली-आंगन में खिाट
डाल दे बेटी, जरा बुला लूं। थक गया होगा।
सकीना ने एक टूटी-सी खिाट आंगन में डाल दी और उस पर एक सड़ी-सी चादर िबछाती हुई बोली-इस
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खिटोले पर क्या िबठाओगी अनम्मां, मुझे तो शमर्य आती हबुिढ़या ने जरा कड़ी आंखिों से देखिकर कहा-शमर्य की क्या बात ह इसमें- हमारा हाल क्या इनसे िछपा हउसने बाहर जाकर अनमरकान्त को बुलाया। द्वार एक परदे की दीवार में था। उस पर एक टाट का गटा पुराना परदा पड़ा हुआ था। द्वार के अनंदर कदम रखिते ही एक आंगन था, िजसमें मुिश्कल से दो खिटोले पड़ सकते
थ। सामने खिपरैल का एक नीचा सायबान था और सायबान के पीछे एक कोठरी थी, जो इस वक्त अनंधोरी पड़ी
हुई थी। सायबान में एक िकनारे चूल्हा बना हुआ था और टीन और िमट्टी के दो-चार बतर्यन, एक घड़ा और एक
मटका रखे हुए थ। चूल्हे में आग जल रही थी और तवा रखिा हुआ था।
अनमर ने खिाट पर बैठते हुए कहा-यह घर तो बहुत छोटा ह। इसमें गुजर कैसे होती हबुिढ़या खिाट के पास जमीन पर बैठ गई और बोली-बेटा, अनब तो दो ही आदमी हैं, नहीं, इसी घर में एक
पूरा कुनबा रहता था। मेरे दो बेटे, दो बहुएं, उनके बच्चे, सब इसी घर में रहते थ। इसी में सबों के शादी-ब्याह
हुए और इसी में सब मर भी गए। उस वक्त यह ऐसा गुलजार लगता था िक तुमसे क्या कहूं - अनब मैं हूं और मेरी
यह पोती ह। और सबको अनल्लाह ने बुला िलया। पकाते हैं और पड़े रहते हैं। तुम्हारे पठान के मरते ही घर में जैसे
झाडू िफर गई। अनब तो अनल्लाह से यही दुआ ह िक मेरे जीते-जी यह िकसी भले आदमी के पाले पड़ जाए, तब
अनल्लाह से कहूंगी िक अनब मुझे उठा लो। तुम्हारे यार-दोस्त तो बहुत होंगे बेटा, अनगर शमर्य की बात न समझो, तो
िकसी से िजक्र करना। कौन जाने तुम्हारे ही हीले से कहीं बातचीत ठीक हो जाए।
सकीना कुरता-पाजामा पहने, ओढ़नी से माथा िछपाए सायबान में खिड़ी थी। बुिढ़या ने ज्योंही उसकी शादी
की चचा छेड़ी, वह चूल्हे के पास जा बैठी और आटे को अनंगुिलयों से गोदने लगी। वह िदल में झुंझला रही थी िक
अनम्मां क्यों इनसे मेरा दुखिड़ा ले बैठी- िकससे कौन बात कहनी चािहए, कौन बात नहीं, इसका इन्हें जरा भी
िलहाज नहीं- जो ऐरा-गैरा आ गया, उसी से शादी का पचड़ा गाने लगीं। और सब बातें गइं , बस एक शादी रह
गई।
उसे क्या मालूम िक अनपनी संतान को िववािहत देखिना बुढ़ापे की सबसे बड़ी अनिभलाषा ह।
अनमरकान्त ने मन में मुसलमान िमत्रों का िसहावलोकन करते हुए कहा-मेरे मुसलमान दोस्त ज्यादा तो नहीं
हैं लेिकन जो दो-एक हैं, उनसे मैं िजक्र करूंगा।
वृध्दा ने िचितत भाव से कहा-वह लोग धानी होंगे'हां, सभी खिुशहाल हैं।'
'तो भला धानी लोग गरीबों की बात क्यों पूछेंगे - हालांिक हमारे नबी का हुक्म ह िक शादी-ब्याह में
अनमीर-गरीब का िवचार न होना चािहए, पर उनके हुक्म को कौन मानता ह नाम के मुसलमान, नाम के िहन्दू
रह गए हैं। न कहीं सच्चा मुसलमान नजर आता ह, न सच्चा िहन्दू। मेरे घर का तो तुम पानी भी न िपयोगे बेटा,
तुम्हारी क्या खिाितर करूं (सकीना से) बेटी, तुमने जो रूमाल काढ़ा ह वह लाकर भैया को िदखिाओ। शायद इन्हें
पसंद आ जाए। और हमें अनल्लाह ने िकस लायक बनाया हसकीना रसोई से िनकली और एक ताक पर से िसगरेट का एक बड़ा-सा बक्स उठा लाई और उसमें से वह
रूमाल िनकालकर िसर झुकाए, िझझकती हुई, बुिढ़या के पास आ, रूमाल रखि, तेजी से चली गई।

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अनमरकान्त आंखें झुकाए हुए था पर सकीना को सामने देखिकर आंखें नीची न रह सकीं। एक रमणी सामने
खिड़ी हो, तो उसकी ओर से मुंह फेर लेना िकतनी भली बात ह। सकीना का रंग सांवला था और रूप-रेखिा देखिते
हुए वह सुंदरी न कही जा सकती थी अनंग -प्रत्यंग का गठन भी किव-विणत उपमाआं से मेल न खिाता था पर रंग रूप, चाल-ढाल, शील-संकोच, इन सबने िमल-जुलकर उसे आकषर्यक शोभा प्रदान कर दी थी। वह बड़ी-बड़ी
पलकों से आंखें िछपाए, देह चुराए, शोभा की सुगंधा और ज्योित फैलाती हुई इस तरह िनकल गई, जैसे स्वप्निचत्र एक झलक िदखिाकर िमट गया हो।
अनमरकान्त ने रूमाल उठा िलया और दीपक के प्रकाश में उसे देखिने लगा। िकतनी सफाई से बेल-बूटे बनाए
गए थ। बीच में एक मोर का िचत्र था। इस झोंपडे। में इतनी सुरुिचचिकत होकर बोला-यह तो खिूबसूरत रूमाल ह, माताजी सकीना काढ़ने के काम में बहुत होिशयार मालूम
होती ह।
बुिढ़या ने गवर्य से कहा-यह सभी काम जानती ह भैया, न जाने कैसे सीखि िलया- मुहल्ले की दो-चार
लड़िकयां मदरसे पढ़ने जाती हैं। उन्हीं को काढ़ते देखिकर इसने सब कुछ सीखि िलया। कोई मदर्य घर में होता, तो
हमें कुछ काम िमल जाएा करता। गरीबों के मुहल्ले में इन कामों की कौन कदर कर सकता ह- तुम यह रूमाल
लेते जाओ बेटा, एक बेकस की नजर ह।
अनमर ने रूमाल को जेब में रखिा तो उसकी आंखें भर आइं। उसका बस होता तो इसी वक्त सौ-दो सौ
रूमालों की फरमाइश कर देता। िफर भी यह बात उसके िदल में जम गई। उसने खिड़े होकर कहा-मैं इस रूमाल
को हमेशा तुम्हारी दुआ समझूंगा। वादा तो नहीं करता लेिकन मुझे यकीन ह िक मैं अनपने दोस्तों से आपको कुछ
काम िदला सकूंगा।
अनमरकान्त ने पहले पठािनन के िलए 'तुम' का प्रयोग िकया था। चलते समय तक वह तुम आप में बदल
गया था। सुरुिच, सुिवचार, सद्भाव उसे यहां सब कुछ िमला। हां, उस पर िवपन्नता का आवरण पड़ा हुआ था।
शायद सकीना ने यह 'आप' और 'तुम' का िववेक उत्पन्न कर िदया था।
अनमर उठ खिड़ा हुआ। बुिढ़या आंचल फैलाकर उसे दुआएं देती रही।

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आठ
अनमरकान्त नौ बजते-बजते लौटा तो लाला समरकान्त ने पूछा-तुम दूकान बंद करके कहां चले गए थ- इसी
तरह दूकान पर बैठा जाता हअनमर ने सफाई दी-बुिढ़या पठािनन रुपये लेने आई थी। बहुत अनंधोरा हो गया था। मैंने समझा कहीं िगरिगरा पड़े इसिलए उसे घर तक पहुंचाने चला गया था। वह तो रुपये लेती ही न थी पर जब बहुत देर हो गई तो
मैंने रोकना उिचत न समझा।
'िकतने रुपये िदए?'
'पांच।'
लालाजी को कुछ धैयर्य हुआ।
'और कोई अनसामी आया था- िकसी से कुछ रुपये वसूल हुए?'
'जी नहीं।'
'आश्चियर्य ह।'
'और तो कोई नहीं आया, हां, वही बदमाश काले खिां सोने की एक चीज बेचने लाया था। मैंने लौटा िदया।'
समरकान्त की त्योिरयां बदलीं-क्या चीज थी'सोने के कड़े थ। दस तोले बताता था।'
'तुमने तौला नहीं?'
'मैंने हाथ से छुआ तक नहीं।'
'हां, क्यों छूते, उसमें पाप िलपटा हुआ था न िकतना मांगता था?'
'दो सौ।'
'झूठ बोलते हो।'
'शुरू दो सौ से िकए थ, पर उतरते-उतरते तीस रुपये तक आया था।'
लालाजी की मुद्रा कठोर हो गई-िफर भी तुमने लौटा िदए'और क्या करता- मैं तो उसे सत में भी न लेता। ऐसा रोजगार करना मैं पाप समझता हूं। '
समरकान्त क्रोध से िवकृतत होकर बोले-चुप रहो, शरमाते तो नहीं, ऊपर से बातें बनाते हो। डेढ़ सौ रुपये
बैठे-बैठाए िमलते थ, वह तुमने धमर्य के घमंड में खिो िदए, उस पर से अनकड़ते हो। जानते भी हो, धमर्य ह क्या
चीज- साल में एक बार भी गंगा-स्नान करते हो- एक बार भी देवताआं को जल चढ़ाते हो- कभी राम का नाम
िलया ह िजदगी में- कभी एकादशी या कोई दूसरा व्रत रखिा ह- कभी कथा-पुराण पढ़ते या सुनते हो- तुम क्या
जानो धमर्य िकसे कहते हैं- धमर्य और चीज ह, रोजगार और चीज। िछ: साफ डेढ़ सौ फेंक िदए।
अनमरकान्त धमर्य की इस व्याख्या पर मन-ही-मन हंसकर बोला-आप गंगा-स्नान, पूजा-पाठ को मुख्य धमर्य
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समझते हैं मैं सच्चाई, सेवा और परोपकार को मुख्य धमर्य समझता हूं। स्नान-धयान, पूजा-व्रत धमर्य के साधन मात्र
हैं, धमर्य नहीं।
समरकान्त ने मुंह िचढ़ाकर कहा-ठीक कहते हो, बहुत ठीक अनब संसार तुम्हीं को धमर्य का आचायर्य मानेगा।
अनगर तुम्हारे धमर्य-मागर्य पर चलता, तो आज मैं भी लंगोटी लगाए घूमता होता, तुम भी यों महल में बैठकर मौज
न करते होते। चार अनक्षर अनंग्रेजी पढ़ ली न, यह उसी की िवभूित ह लेिकन मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूं , जो
अनंग्रेजी के िवद्वान् होकर अनपना धमर्य-कमर्य िनभाए जाते हैं। साफ डेढ़ सौ पानी में डाल िदए।
अनमरकान्त ने अनधीर होकर कहा-आप बार-बार, उसकी चचा क्यों करते हैं- मैं चोरी और डाके के माल का
रोजगार न करूंगा, चाहे आप खिुश हों या नाराज। मुझे ऐसे रोजगार से घृणा होती ह।
'तो मेरे काम में वैसी आत्मा की जरूरत नहीं। मैं ऐसी आत्मा चाहता हूं , जो अनवसर देखिकर, हािन-लाभ का
िवचार करके काम करे।'
'धमर्य को मैं हािन-लाभ की तराजू पर नहीं तौल सकता।'
इस वज-मूखिर्यता की दवा, चांटे के िसवा और कुछ न थी। लालाजी खिून का घूंट पीकर रह गए। अनमर हष्टपुष्टि न होता, तो आज उसे धमर्य की िनदा करने का मजा िमल जाता। बोले-बस, तुम्हीं तो संसार में एक धमर्य के
ठेकेदार रह गए हो, और सब तो अनधमी हैं। वही माल जो तुमने अनपने घमंड में लौटा िदया, तुम्हारे िकसी दूसरे
भाई ने दो-चार रुपये कम-बेश देकर ले िलया होगा। उसने तो रुपये कमाए, तुम नींबू-नोन चाटकर रह गए। डेढ़ सौ रुपये तब िमलते हैं, जब डेढ़ सौ थान कपड़ा या डेढ़ सौ बोरे चीनी िबक जाए। मुंह का कौर नहीं ह। अनभी
कमाना नहीं पड़ा ह, दूसरों की कमाई से चैन उड़ा रहे हो, तभी ऐसी बातें सूझती हैं। जब अनपने िसर पड़ेगी, तब
आंखें खिुलेंगी।
अनमर अनब भी कायल न हुआ। बोला-मैं कभी यह रोजगार न करूंगा।
लालाजी को लड़के की मूखिर्यता पर क्रोध की जगह क्रोध-िमिश्रत दया आ गई। बोले-तो िफर कौन रोजगार
करोगे- कौन रोजगार ह, िजसमें तुम्हारी आत्मा की हत्या न हो, लेन-देन, सूद-बक्रा, अननाज-कपड़ा, तेल-घी,
सभी रोजगारों में दांव-घात ह। जो दांव-घात समझता ह, वह नगा उठाता ह, जो नहीं समझता, उसका िदवाला
िपट जाता ह। मुझे कोई ऐसा रोजगार बता दो, िजसमें झूठ न बोलना पड़े, बेईमानी न करनी पड़े। इतने बड़े -बड़े
हािकम हैं, बताओ कौन घूस नहीं लेता- एक सीधी-सी नकल लेने जाओ, तो एक रुपया लग जाता ह। िबना
तहरीर िलए थानेदार रपट तक नहीं िलखिता। कौन वकील ह, जो झूठे गवाह नहीं बनाता- लीडरों ही में कौन ह,
जो चंदे के रुपये में नोच-खिसोट न करता हो- माया पर तो संसार की रचना हुई ह, इससे कोई कैसे बच सकता
हअनमर ने उदासीन भाव से िसर िहलाकर कहा-अनगर रोजगार का यह हाल ह, तो मैं रोजगार करूंगा ही
नहीं।
'तो घर-िगरस्ती कैसे चलेगी- कुएं में पानी की आमद न हो, तो कै िदन पानी िनकले?'
अनमरकान्त ने इस िववाद का अनंत करने के इरादे से कहा-मैं भूखिों मर जाऊंगा, पर आत्मा का गला न
घोंटूंगा।

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'तो क्या मजूरी करोगे?'
'मजूरी करने में कोई शमर्य नहीं ह।'
समरकान्त ने हथौड़े से काम चलते न देखिकर घन चलाया-शमर्य चाहे न हो पर तुम कर न सकोगे, कहो
िलखि दूं- मुंह से बक देना सरल ह, कर िदखिाना किठन होता ह। चोटी का पसीना एड़ी तक आता ह, तब चार गंडे
पैसे िमलते हैं। मजूरी करेंगे एक घड़ा पानी तो अनपने हाथों खिींचा नहीं जाता, चार पैसे की भाजी लेनी होती ह,
तो नौकर लेकर चलते हैं, यह मजूरी करेंगे। अनपने भाग्य को सराहो िक मैंने कमाकर रखि िदया ह। तुम्हारा िकया
कुछ न होगा। तुम्हारी इन बातों से ऐसा जी जलता ह िक सारी जायदाद कृतष्णापर्यण कर दूं िफर देखिूं तुम्हारी
आत्मा िकधर जाती हअनमरकान्त पर उनकी इस चोट का भी कोई अनसर न हुआ-आप खिुशी से अनपनी जायदाद कृतष्णापर्यण कर दें।
मेरे िलए रत्ती भर भी िचता न करें। िजस िदन आप यह पुनीत कायर्य करेंगे, उस िदन मेरा सौभाग्य-सूयर्य उदय
होगा। मैं इस मोह से मुक्त होकर स्वाधाीन हो जाऊंगा। जब तक मैं इस बंधन में पड़ा रहूंगा, मेरी आत्मा का
िवकास होगा।
समरकान्त के पास अनब कोई शस्त्र न था। एक क्षण के िलए क्रोध ने उनकी व्यवहार-बुिध्द को भ्रष्टि कर
िदया। बोले-तो क्यों इस बंधन में पड़े हो- क्यों अनपनी आत्मा का िवकास नहीं करते- महात्मा ही हो जाओ। कुछ
करके िदखिाओ तो िजस चीज की तुम कदर नहीं कर सकते, वह मैं तुम्हारे गले नहीं मढ़ना चाहता।
यह कहते हुए वह ठाकुरद्वारे में चले गए, जहां इस समय आरती का घंटा बज रहा था। अनमर इस चुनौती
का जवाब न दे सका। वे शब्द जो बाहर न िनकल सके, उसके हृदय में फोड़े क़ी तरह टीसने लगे-मुझ पर अनपनी
संपित्त की धौंस जमाने चले हैं- चोरी का माल बेचकर, जुआिरयों को चार आने रुपये ब्याज पर रुपये देकर, गरीब
मजूरों और िकसानों को ठगकर तो रुपये जोड़े हैं, उस पर आपको इतना अनिभमान ह ईश्वर न करे िक मैं उस धान
का गुलाम बनूं।
वह इन्हीं उत्तेजना से भरे हुए िवचारों में डूबा बैठा था िक नैना ने आकर कहा-दादा िबगड़ रहे थ,
भैयाजी।
अनमरकान्त के एकांत जीवन में नैना ही स्नेह और सांत्वना की वस्तु थी। अनपना सुखि -दुखि अनपनी िवजय और
पराजय, अनपने मंसूबे और इरादे वह उसी से कहा करता था। यद्यिप सुखिदा से अनब उसे उतना िवराग न था, अनब
उससे प्रेम भी हो गया था पर नैना अनब भी उसमें िनकटतर थी। सुखिदा और नैना दोनों उसके अनंतस्थल के दो कूल
थ। सुखिदा ऊंची, दुगर्यम और िवशाल थी। लहरें उसके चरणों ही तक पहुंचकर रह जाती थीं। नैना समतल, सुलभ
और समीप। वायु का थोड़ा वेग पाकर भी लहरें उसके ममर्यस्थल तक पहुँचती थीं।
अनमर अनपनी मनोव्यथा मंद मुस्कान की आड़ में िछपाता हुआ बोला-कोई नई बात नहीं थी नैना। वही
पुराना पचड़ा था। तुम्हारी भाभी तो नीचे नहीं थीं'अनभी तक तो यहीं थीं। जरा देर हुई ऊपर चली गइं। '
'तो आज उधर से भी शस्त्र-प्रहार होंगे। दादा ने तो आज मुझसे साफ कह िदया, तुम अनपने िलए कोई राह
िनकालो, और मैं भी सोचता हूं, मुझे अनब कुछ-न-कुछ करना चािहए। यह रोज-रोज की फटकार नहीं सही जाती।
मैं कोई बुराई करूं, तो वह मुझे दस जूते भी जमा दें, चूं न करूंगा लेिकन अनधमर्य पर मुझसे न चला जाएगा।'
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नैना ने इस वक्त मीठी पकौिड़यां, नमकीन पकौिड़यां और न जाने क्या-क्या पका रखे थ। उसका मन उन
पदाथों को िखिलाने और खिाने के आनंद में बसा हुआ था। यह धमर्य -अनधमर्य के झगड़े उसे व्यथर्य-से जान पड़े। बोलीपहले चलकर पकौिड़यां खिा लो, िफर इस िवषय पर सलाह होगी।
अनमर ने िवत़ष्णा के भाव से कहा-ब्यालू करने की मेरी इच्छा नहीं ह। लात की मारी रोिटयां कंठ के नीचे
न उतरेंगी। दादा ने आज फैसला कर िदया ।
'अनब तुम्हारी यही बात मुझे अनच्छी नहीं लगती। आज की-सी मजेदार पकौिड़यां तुमने कभी न खिाई होंगी।
तुम न खिाओगे, तो मैं न खिाऊंगी।'
नैना की इस दलील ने उसके इंकार को कई कदम पीछे धाकेल िदया-तू मुझे बहुत िदखि करती ह नैना, सच
कहता हूं, मुझे िबलकुल इच्छा नहीं ह।
'चलकर थाल पर बैठो तो, पकौिड़यां देखिते ही टूट न पड़ो, तो कहना।'
'तू जाकर खिा क्यों नहीं लेती- मैं एक िदन न खिाने से मर तो न जाऊंगा।'
'तो क्या मैं एक िदन न खिाने से मर जाऊंगी- मैं िनजर्यला िशवराित्र रखिती हूं , तुमने तो कभी व्रत नहीं
रखिा।'
नैना के आग्रह को टालने की शिक्त अनमरकान्त में न थी।
लाला समरकान्त रात को भोजन न करते थ। इसिलए भाई, भावज, बहन साथ ही खिा िलया करते थ।
अनमर आंगन में पहुंचा, तो नैना ने भाभी को बुलाया। सुखिदा ने ऊपर ही से कहा-मुझे भूखि नहीं ह।
मनावन का भार अनमरकान्त के िसर पड़ा। वह दबे पांव ऊपर गया। जी में डर रहा था िक आज मुआमला
तूल खिींचेगा पर इसके साथ ही दृढ़ भी था। इस प्रश्न पर दबेगा नहीं। यह ऐसा मािमक िवषय था, िजस पर
िकसी प्रकार का समझौता हो ही न सकता था।
अनमरकान्त की आहट पाते ही सुखिदा संभल बैठी। उसके पीले मुखि पर ऐसी करूण वेदना झलक रही थी िक
एक क्षण के िलए अनमरकान्त चंचल हो गया।
अनमरकान्त ने उसका हाथ पकड़कर कहा-चलो, भोजन कर लो। आज बहुत देर हो गई।
'भोजन पीछे करूंगी, पहले मुझे तुमसे एक बात का फैसला करना ह। तुम आज िफर दादाजी से लड़ पड़े ?'
'दादाजी से मैं लड़ पड़ा, या उन्हीं ने मुझे अनकारण डांटना शुरू िकया?'
सुखिदा ने दाशर्यिनक िनरपेक्षता के स्वर में कहा-तो उन्हें डांटने का अनवसर ही क्यों देते हो- मैं मानती हूं िक
उनकी नीित तुम्हें अनच्छी नहीं लगती। मैं भी उसका समथर्यन नहीं करती लेिकन अनब इस उम्र में तुम उन्हें नए
रास्ते पर नहीं चला सकते। वह भी तो उसी रास्ते पर चल रहे हैं, िजस पर सारी दुिनया चल रही ह। तुमसे जो
कुछ हो सके, उनकी मदद करो जब वह न रहेंगे उस वक्त अनपने आदशों का पालन करना। तब कोई तुम्हारा हाथ
न पकड़ेगा। इस वक्त तुम्हें अनपने िसध्दांतों के िवरूद्वद्व' भी कोई बात करनी पड़े, तो बुरा न मानना चािहए। उन्हें
कम-से-कम इतना संतोष तो िदला दो िक उनके पीछे तुम उनकी कमाई लुटा न दोगे। मैं आज तुम दोनों की बातें
सुन रही थी। मुझे तो तुम्हारी ही ज्यादती मालूम होती थी।

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अनमरकान्त उसके प्रसव-भार पर िचता-भार न लादना चाहता था पर प्रसंग ऐसा आ पड़ा था िक वह अनपने
को िनदोष ही करना आवश्यक समझता था। बोला-उन्होंने मुझसे साफ-साफ कह िदया, तम अनपनी िफक्र करो।
उन्हें अनपना धान मुझसे ज्यादा प्यारा ह।
यही कांटा था, जो अनमरकान्त के हृदय में चुभ रहा था।
सुखिदा के पास जवाब तैयार था-तुम्हें भी तो अनपना िसध्दांत अनपने बाप से ज्यादा प्यारा ह- उन्हें तो मैं
कुछ नहीं कहती। अनब साठ बरस की उम्र में उन्हें उपदेश नहीं िदया जा सकता। कम-से-कम तुमको यह अनिधकार
नहीं ह। तुम्हें धान काटता हो लेिकन मनस्वी, वीर पुरुषों ने सदैव लक्ष्मी की उपासना की ह। संसार को
पुरुषािथयों ने ही भोगा ह और हमेशा भोगेंगे। त्याग गृहस्थों के िलए नहीं ह, संन्यािसयों के िलए ह। अनगर तुम्हें
त्यागव्रत लेना था तो िववाह करने की जरूरत न थी, िसर मुड़ाकर िकसी साधु-संत के चेले बन जाते। िफर मैं
तुमसे झगड़ने न आती। अनब ओखिली में िसर डाल कर तुम मूसलों से नहीं बच सकते। गृहस्थी के चरखे में पड़कर
बड़े-बड़ों की नीित भी स्खििलत हो जाती ह। कृतष्ण और अनजुर्यन तक को एक नए तकर्क की शरण लेनी पड़ी।
अनमरकान्त ने इस ज्ञानोपदेश का जवाब देने की जरूरत न समझी। ऐसी दलीलों पर गंभीर िवचार िकया
ही नहीं जा सकता था। बोला-तो तुम्हारी सलाह ह िक संन्यासी हो जाऊं सुखिदा िचढ़ गई। अनपनी दलीलों का यह अननादर न सह सकी। बोली-कायरों को इसके िसवाय और सूझ ही
क्या सकता ह- धान कमाना आसान नहीं ह। व्यवसािययों को िजतनी किठनाइयों का सामना करना पड़ता ह , वह
अनगर संन्यािसयों को झेलनी पड़ं, तो सारा संन्यास भूल जाए। िकसी भले आदमी के द्वार पर जाकर पड़े रहने के
िलए बल, बुिध्द िवद्या, साहस िकसी की भी जरूरत नहीं। धानोपाजर्यन के िलए खिून जलाना पड़ता ह मांस
सुखिाना पड़ता ह। सहज काम नहीं ह। धान कहीं पड़ा नहीं ह िक जो चाहे बटोर लाए।
अनमरकान्त ने उसी िवनोदी भाव से कहा-मैं तो दादा को गद़दी पर बैठे रहने के िसवाय और कुछ करते
नहीं देखिता। और भी जो बड़े -बड़े सेठ-साहूकार हैं उन्हें भी फूलकर कुप्पा होते ही देखिा ह। रक्त और मांस तो
मजदूर ही जलाते हैं। िजसे देखिो कंकाल बना हुआ ह।
सुखिदा ने कुछ जवाब न िदया। ऐसी मोटी अनक्ल के आदमी से ज्यादा बकवास करना व्यथर्य था।
नैना ने पुकारा-तुम क्या करने लगे, भैया आते क्यों नहीं- पकौिड़यां ठंडी हुई जाती हैं।
सुखिदा ने कहा-तुम जाकर खिा क्यों नहीं लेते- बेचारी ने िदन-भर तैयािरयां की हैं।
'मैं तो तभी जाऊंगा, जब तुम भी चलोगी।'
'वादा करो िक िफर दादाजी से लड़ाई न करोगे।'
अनमरकान्त ने गंभीर होकर कहा-सुखिदा, मैं तुमसे सत्य कहता हूं, मैंने इस लड़ाई से बचने के िलए कोई बात
उठा नहीं रखिी। इन दो सालों में मुझमें िकतना पिरवतर्यन हो गया ह, कभी-कभी मुझे इस पर स्वयं आश्चियर्य होता
ह। मुझे िजन बातों से घृणा थी, वह सब मैंने अनंगीकार कर लीं लेिकन अनब उस सीमा पर आ गया हूं िक जौ भर
भी आगे बढ़ा, तो ऐसे गतर्य में जा िगरूंगा, िजसकी थाह नहीं ह। उस सवर्यनाश की ओर मुझे मत ढकेलो।
सुखिदा को इस कथन में अनपने ऊपर लांछन का आभास हुआ। इसे वह कैसे स्वीकार करती- बोली-इसका तो
यही आशय ह िक मैं तुम्हारा सवर्यनाश करना चाहती हूं। अनगर अनब तक मेरे व्यवहार का यही तत्व तुमने िनकाला
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ह, तो तुम्हें इससे बहुत पहले मुझे िवष दे देना चािहए था। अनगर तुम समझते हो िक मैं भोग-िवलास की दासी हूं
और केवल स्वाथर्यवश तुम्हें समझाती हूं तो तुम मेरे साथ घोरतम अनन्याय कर रहे हो। मैं तुमको बता देना चाहती
हूं, िक िवलािसनी सुखिदा अनवसर पड़ने पर िजतने कष्टि झेलने की सामथ्यर्य रखिती ह, उसकी तुम कल्पना भी नहीं
कर सकते। ईश्वर वह िदन न लाए िक मैं तुम्हारे पतन का साधन बनूं। हां, जलने के िलए स्वयं िचता बनाना मुझे
स्वीकार नहीं। मैं जानती हूं िक तुम थोड़ी बुिध्द से काम लेकर अनपने िसध्दांत और धमर्य की रक्षा भी कर सकते हो
और घर की तबाही को भी रोक सकते हो। दादाजी पढ़े -िलखे आदमी हैं, दुिनया देखि चुके हैं। अनगर तुम्हारे जीवन
में कुछ सत्य ह, तो उसका उन पर प्रभाव पड़े बगैर नहीं रह सकता। आए िदन की झौड़ से तुम उन्हें और भी
कठोर बनाए देते हो। बच्चे भी मार से िजद़दी हो जाते हैं। बूढ़ों की प्रकृतित कुछ बच्चों की-सी होती ह। बच्चों की
भांित उन्हें भी तुम सेवा और भिक्त से ही अनपना सकते हो।
अनमर ने पूछा-चोरी का माल खिरीदा करूं'कभी नहीं।'
'लड़ाई तो इसी बात पर हुई।'
'तुम उस आदमी से कह सकते थ-दादा आ जाएं तब लाना।'
'और अनगर वह न मानता- उसे तत्काल रुपये की जरूरत थी।'
'आप'मर्य भी तो कोई चीज ह?'
'वह पाखिंिडयों का पाखिंड ह।'
'तो मैं तुम्हारे िनजीव आदशर्यवाद को भी पाखिंिडयों का पाखिंड समझती हूं। '
एक िमनट तक दोनों थके हुए योद्वाआं की भांित दम लेते रहे। तब अनमरकान्त ने कहा -नैना पुकार रही ह।
'मैं तो तभी चलूंगी, जब तुम वह वादा करोगे।'
अनमरकान्त ने अनिवचल भाव से कहा-तुम्हारी खिाितर से कहो वादा कर लूं पर मैं उसे पूरा नहीं कर सकता।
यही हो सकता ह िक मैं घर की िकसी बात से सरोकार न रखिूं।
सुखिदा िनश्चियात्मक रूप से बोली-यह इससे कहीं अनच्छा ह िक रोज घर में लड़ाई होती रहे। जब तक इस
घर में हो, इस घर की हािन-लाभ का तुम्हें िवचार करना पड़ेगा।
अनमर ने अनकड़कर कहा-मैं आज इस घर को छोड़ सकता हूं।
सुखिदा ने बम-सा फेंका-और मैंअनमर िवस्मय से सुखिदा का मुंह देखिने लगा।
सुखिदा ने उसी स्वर में कहा-इस घर से मेरा नाता तुम्हारे आधार पर ह जब तुम इस घर में न रहोगे, तो
मेरे िलए यहां क्या रखिा ह- जहां तुम रहोगे, वहीं मैं भी रहूंगी।
अनमर ने संशयात्मक स्वर में कहा-तुम अनपनी माता के साथ रह सकती हो।
'माता के साथ क्यों रहूं- मैं िकसी की आिश्रत नहीं रह सकती। मेरा दु:खि-सुखि तुम्हारे साथ ह। िजस तरह
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रखिोगे, उसी तरह रहूंगी। मैं भी देखिूंगी, तुम अनपने िसध्दांतों के िकतने पक्के हो- मैं प्रण करती हूं िक तुमसे कुछ न
मांगूंगी। तुम्हें मेरे कारण जरा भी कष्टि न उठाना पड़ेगा। मैं खिुद भी कुछ पैदा कर सकती हूं , थोड़ा िमलेगा, थोड़े में
गुजर कर लेंगे, बहुत िमलेगा तो पूछना ही क्या। जब एक िदन हमें अनपनी झोंपड़ी बनानी ही ह तो क्यों न अनभी
से हाथ लगा दें। तुम कुएं से पानी लाना, मैं चौका-बतर्यन कर लूंगी। जो आदमी एक महल में रहता ह, वह एक
कोठरी में भी रह सकता ह। िफर कोई धौंस तो न जमा सकेगा।
अनमरकान्त पराभूत हो गया। उसे अनपने िवषय में तो कोई िचता नहीं लेिकन सुखिदा के साथ वह यह
अनत्याचार कैसे कर सकता थािखििसयाकर बोला-वह समय अनभी नहीं आया ह, सुखिदा ।
'क्यों झूठ बोलते हो तुम्हारे मन में यही भाव ह और इससे बड़ा अनन्याय तुम मेरे साथ नहीं कर सकते कष्टि
सहने में, या िसध्दांत की रक्षा के िलए िस्त्रयां कभी पुरुषों से पीछे नहीं रहीं। तुम मुझे मजबूर कर रहे हो िक और
कुछ नहीं तो लांछन से बचने के िलए मैं दादाजी से अनलग रहने की आज्ञा मांगू। बोलो?'
अनमर लिज्जत होकर बोला-मुझे क्षमा करो सुखिदा मैं वादा करता हूं िक दादाजी जैसा कहेंगे, वैसा ही
करूंगा।
'इसिलए िक तुम्हें मेरे िवषय में संदेह ह?'
'नहीं, केवल इसिलए िक मुझमें अनभी उतना बल नहीं ह।'
इसी समय नैना आकर दोनों को पकौिड़यां िखिलाने के िलए घसीट ले गई। सुखिदा प्रसन्न थी। उसने आज
बहुत बड़ी िवजय पाई थी। अनमरकान्त झंपा हुआ था। उसके आदशर्य और धमर्य की आज परीक्षा हो गई थी और उसे
अनपनी दुबर्यलता का ज्ञान हो गया था। ऊंट पहाड़ के नीचे आकर अनपनी ऊंचाई देखि चुका था।

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नौ
जीवन में कुछ सार ह, अनमरकान्त को इसका अननुभव हो रहा ह। वह एक शब्द भी मुंह से ऐसा नहीं
िनकालना चाहता, िजससे सुखिदा को दुखि हो क्योंिक वह गभर्यवती ह। उसकी इच्छा के िवरूद्वद्व' वह छोटी-सेछोटी बात भी नहीं कहना चाहता। वह गभर्यवती ह। उसे अनच्छी-अनच्छी िकताबें पढ़कर सुनाई जाती हैं रामायण,
महाभारत और गीता से अनब अनमर को िवशेष प्रेम ह क्योंिक सुखिदा गभर्यवती ह। बालक के संस्कारों का सदैव
धयान बना रहता ह। सुखिदा को प्रसन्न रखिने की िनरंतर चेष्टिा की जाती ह। उसे िथएटर, िसनेमा िदखिाने में अनब
अनमर को संकोच नहीं होता। कभी फूलों के गजरे आते हैं, कभी कोई मनोरंजन की वस्तु। सुबह-शाम वह दूकान
पर भी बैठता ह। सभाआं की ओर उसकी रुिच नहीं ह। वह पुत्र का िपता बनने जा रहा ह। इसकी कल्पना से
उसमें ऐसा उत्साह भर जाता ह िक कभी-कभी एकांत में नतमस्तक होकर कृतष्ण के िचत्र के सामने िसर झुका
लेता ह। सुखिदा तप कर रही ह। अनमर अनपने को नई िजम्मेदािरयों के िलए तैयार कर रहा ह। अनब तक वह समतल
भूिम पर था, बहुत संभलकर चलने की उतनी जरूरत न थी। अनब वह ऊंचाई पर जा पहुंचा ह। वहां बहुत
संभलकर पांव रखिना पड़ता ह।
लाला समरकान्त भी आजकल बहुत खिुश नजर आते हैं। बीसों ही बार अनंदर आकर सुखिदा से पूछते हैं,
िकसी चीज की जरूरत तो नहीं ह- अनमर पर उनकी िवशेष कृतपा-दृिष्टि हो गई ह। उसके आदशर्यवाद को वह उतना
बुरा नहीं समझते। एक िदन काले खिां को उन्होंने दूकान से खिड़े -खिड़े िनकाल िदया। अनसािमयों पर वह उतना नहीं
िबगड़ते, उतनी मािलशें नहीं करते। उनका भिवष्य उज्ज्वल हो गया ह। एक िदन उनकी रेणुका से बातें हो रही
थीं। अनमरकान्त की िनष्ठा की उन्होंने िदल खिोलकर प्रशंसा की।
रेणुका उतनी प्रसन्न न थीं। प्रसव के कष्टिों को याद करके वह भयभीत हो जाती थीं। बोलीं-लालाजी, मैं तो
भगवान् से यही मनाती हूं िक जब हंसाया ह, तो बीच में रूलाना मत। पहलौंठी में बड़ा संकट रहता ह। स्त्री का
दूसरा जन्म होता ह।
समरकान्त को ऐसी कोई शंका न थी। बोले-मैंने तो बालक का नाम सोच िलया ह। उसका नाम होगारेणुकान्त।
रेणुका आशंिकत होकर बोली-अनभी नाम-वाम न रिखिए, लालाजी इस संकट से उबर हो जाए, तो नाम
सोच िलया जाएगा। मैं सोचती हूं, दुगा-पाठ बैठा दीिजए। इस मुहल्ले में एक दाई रहती ह, उसे अनभी से रखि
िलया जाए, तो अनच्छा हो। िबिटया अनभी बहुत-सी बातें नहीं समझती। दाई उसे संभालती रहेगी।
लालाजी ने इस प्रस्ताव को हषर्य से स्वीकार कर िलया। यहां से जब वह घर लौटे तो देखिा-दूकान पर दो
गोरे और एक मेम बैठे हुए हैं और अनमरकान्त उनसे बातें कर रहा ह। कभी-कभी नीचे दजर्जे के गोरे यहां अनपनी
घिड़यां या और कोई चीज बेचने के िलए आ जाते थ। लालाजी उन्हें खिूब ठगते थ। वह जानते थ िक ये लोग
बदनामी के भय से िकसी दूसरी दुकान पर न जाएंगे। उन्होंने जाते-ही-जाते अनमरकान्त को हटा िदया और खिुद
सौदा पटाने लगे। अनमरकान्त स्पष्टिवादी था और यह स्पष्टिवािदता का अनवसर न था। मेम साहब को सलाम करके
पूछा-किहए मेम साहब, क्या हुक्म हतीनों शराब के नशे में चूर थ। मेम साहब ने सोने की एक जंजीर िनकालकर कहा -सेठजी, हम इसको
बेचना चाहता ह। बाबा बहुत बीमार ह। उसका दवाई में बहुत खिचर्य हो गया।
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समरकान्त ने जंजीर लेकर देखिा और हाथ में तौलते हुए बोले-इसका सोना तो अनच्छा नहीं ह, मेम साहब
आपने कहां बनवाया थामेम हंसकर बोली-ओ तुम बराबर यही बात कहता ह। सोना बहुत अनच्छा ह। अनंग्रेजी दूकान का बना हुआ
ह। आप इसको ले लें।
समरकान्त ने अनिनच्छा का भाव िदखिाते हुए कहा-बड़ी-बड़ी दूकानें ही तो ग्राहकों को उलटे छुरे से मूंड़ती
हैं। जो कपड़ा यहां बाजार में छह