होम Mansarovar

Mansarovar

0 / 0
यह पुस्तक आपको कितनी अच्छी लगी?
फ़ाइल की गुणवत्ता क्या है?
पुस्तक की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के लिए यह पुस्तक डाउनलोड करें
डाउनलोड की गई फ़ाइलों की गुणवत्ता क्या है?
Mansarovar Vol 3 - Munshi Premchand
Book is Open Source.
श्रेणियाँ:
खंड:
3
प्रकाशन:
Open Source
भाषा:
hindi
पृष्ठ:
174
फ़ाइल:
PDF, 995 KB
डाउनलोड करें (pdf, 995 KB)

आप के लिए दिलचस्प हो सकता है Powered by Rec2Me

 
0 comments
 

To post a review, please sign in or sign up
आप पुस्तक समीक्षा लिख सकते हैं और अपना अनुभव साझा कर सकते हैं. पढ़ूी हुई पुस्तकों के बारे में आपकी राय जानने में अन्य पाठकों को दिलचस्पी होगी. भले ही आपको किताब पसंद हो या न हो, अगर आप इसके बारे में ईमानदारी से और विस्तार से बताएँगे, तो लोग अपने लिए नई रुचिकर पुस्तकें खोज पाएँगे.
1

Детонация в газах

साल:
1989
भाषा:
russian
फ़ाइल:
PDF, 7.94 MB
0 / 0
2

Početnica češkoga jezika

साल:
1915
भाषा:
cree
फ़ाइल:
PDF, 5.10 MB
0 / 0
प्रेमचिंद
मानसरोवर

भाग 3

ह द
िं ीकोश
www.hindikosh.in

Manasarovar – Part 3
By Premchand

य

पुस्तक प्रकाशनाधिकार मुक्त

समाप्त

ो चुकी

ै क्योंकक इसकी प्रकाशनाधिकार अवधि

ैं।

This work is in the public domain in India because its term of copyright
has expired.

यूनीकोड सिंस्करण: सिंजय खत्री. 2012

Unicode Edition: Sanjay Khatri, 2012

आवरण धचत्र: ववककपीडडया (प्रेमचिंद, मानसरोवर झील)

Cover image: Wikipedia.org (Premchand, Manasarovar Lake).

ह द
िं ीकोश

Hindikosh.in
http://www.hindikosh.in

Contents
ववश्वास ........................................................................................................ 4
नरक का मागग ............................................................................................ 25
स्त्री और पुरुष ............................................................................................ 34
उद्धार ......................................................................................................... 42
ननवागसन ..................................................................................................... 52
नैराश्य लीला .............................................................................................. 61
कौशल ....................................................................................................... 77
स्वगग की दे वी ............................................................................................. 83
आिार ....................................................................................................... 94
एक आिंच की कसर ................................................................................... 102
माता का ह्रदय.......................................................................................... 109
परीक्षा ...................................................................................................... 120
तें तर ........................................................................................................ 124
नैराश्य .....................................................................; ................................ 134
दिं ड .......................................................................................................... 148
धिक्कार (2) ............................................................................................. 165

विश्िास
उन हदनो ममस जोसी बम्बई सभ्य-समाज की राधिका
छोटी

सी

बडी-बडी

थी।

कन्या पाठशाला की अध्यावपका पर उसका
िन-राननयों

को

भी लज्जजत करता

र ती थी, जो ककसी जमाने में

सतारा

तो

व

एक

ठाट-बाट, मान-सम्मान

था। व

के म ाराज

थी

एक बडे म ल में

का ननवास-स्थान था। व ॉँ

सारे हदन नगर के रईसों, राजों, राज-कमचाररयों का तािंता

लगा

र ता था। व

सारे प्रािंत के िन और कीनतग के उपासकों की दे वी थी। अगर ककसी को खखताब
का

खब्त था तो व

ममस जोशी की खुशामद करता था। ककसी को अपने या

सिंबिी के मलए कोई अच्छा

ओ दा हदलाने की िुन थी तो व

ममस जोशी की

अरािना करता था। सरकारी इमारतों के ठीके; नमक, शराब, अफीम आहद
सरकारी चीजों के ठीके; लो े -लकडी, कल-परु जे आहद के ठीके
ी के
ाथो

ाथो में थे। जो कुछ करती थी व ी करती थी, जो कुछ
ोता

था। ज्जस वक्त व

दक
ु ानदार खडे

ी आप रास्ते से

ो- ो कर सलाम करने लगते थे।

नगर में उससे बढ़कर रूपवती रमखणयािं
थी, गाने

ममस

जोशी

ोता था उसी के

अपनी अरबी घोडो की कफटन पर सैर करने

ननकलती तो रईसों की सवाररयािं आप

व

भी थी। व

ट जाती थी, बडे

रूपवती

थी, लेककन

सुमशक्षक्षता थीिं, वक्चतुर

में ननपण
ु , िं सती तो अनोखी छवव से, बोलती तो ननराली घटा से,

ताकती तो बािंकी

धचतवन

से; लेककन इन गण
ु ो में उसका एकाधिपत्य न था।

उसकी प्रनतष्ठा, शज्क्त और कीनतग का

कुछ

और

ी र स्य था। सारा नगर

न ी ; सारे प्रान्त का बच्चा जानता था कक बम्बई के गवनगर
ममस जोशी के बबना दामों के गुलाम
उनके

सब

मलए नाहदरशा ी ु क्म

ै। व

ै ।ममस

जोशी

की

ी

ममस्टर जौ री
आिंखो

का

इशारा

धथएटरो में दावतों में , जलसों में ममस

ॉँ
जोशी के साथ साये की भ नत
र ते ै । और कभी-कभी उनकी मोटर रात के
सन्नाटे में ममस जोशी के मकान से ननकलती
इस प्रेम में वासना की मात्रा अधिक

ुई

लोगो

ै या भज्क्त की, य

को हदखाई दे ती
कोई न ी

जानता

लेककन ममस्टर जौ री वववाह त

ै और ममस जौशी वविवा, इसमलए जो लोग

उनके प्रेम को

ै , वे उन पर कोई अत्याचार न ीिं करते।

कलुवषत क ते

ै।
।

बम्बई की व्यवस्थावपका-सभा ने अनाज पर कर लगा हदया था और जनता की
ओर

से

नगरों

उसका ववरोि करने के मलए एक ववराट सभा

से

प्रजा

के

प्रनतननधि

उसमें सज्म्ममलत

सिंख्या में आये थे। ममस जोशी के ववशाला भवन

ो र ी थी। सभी

ोने के मलए

जारो की

के सामने , चौडे मैदान में

री-भरी घास पर बम्बई की जनता उपनी फररयाद सन
ु ाने के मलए
अभी

जमा

थी।

तक सभापनत न आये थे, इसमलए लोग बैठे गप-शप कर र े थे। कोई

कमगचारी पर आक्षेप करता था, कोई दे श की ज्स्थनत पर, कोई अपनी दीनता
पर—अगर
य

म लोगो में अगडने का जरा भी

सामर्थयग

कर लगा हदया जाता, अधिकाररयों का घर से बा र

जाता।

मारा जरुरत से जयादा सीिापन

बनाए ु ए

ै।

मसर न ीिं उठा

वे जानते
सकते।

ोता तो मजाल थी कक
ननकलना

में अधिकाररयों के

सरकार

ने

के

सभी

डेरा डाले पडे थे।

िं टर मलए, जनता के बीच में

से घोंडे दौडाते कफरते थे , मानों साफ मैदान
नगर

ाथों का खखलौना

भी उपद्रव की आिंशका से सशस्त्र पुमलस

उनके अफसर, घोडों पर सवार, ाथ में
में

ो

ैं कक इन् ें ज्जतना दबाते जाओ, उतना दबते जायेगें,

बुला ली।ैै उस मैदान के चारों कोनो पर मसपाह यों के दल
भाव

मुज्श्कल

ननश्शिंक

ै । ममस जोशी के ऊिंचे बरामदे

बडे-बडे रईस और राजयाधिकारी तमाशा दे खने के मलए

बैठे ु ए थे। ममस जोशी मे मानों का आदर-सत्कार
जौ री, आराम-कुसी परलेटे, इस जन-समू

कर र ी थीिं और ममस्टर

को घण
ृ ा और भय की दृज्ष्ट

से

दे ख

र े थे।
स सा सभापनत म ाशय आपटे एक ककराये के तािंगे पर आते हदखाई हदये। चारों
तरफ
कर

लचल
मिंच

पर

मच गई, लोग उठ-उठकर उनका स्वागत करने दौडे और उन् ें ला
बेठा

हदया।

आपटे

की अवस्था ३०-३५ वषग से अधिक न थी

; दब
ु ले-पतले आदमी थे, मुख पर धचन्ता का गाढ़ा रिं ग-चढ़ा
पक चले थे, पर मुख पर सरल
सफेद

ास्य की रे खा झलक र ी

ु आ था। बाल भी
थी।

व

एक

मोटा कुरता प ने थे, न पािंव में जत
ू े थे, न मसर पर टोपी। इस अद्धनगग्न,

दब
ग , ननस्तेज प्राणी
ु ल

में

न जाने कौल-सा जाद ू था कक समस्त जनता उसकी

पज
ू ा करती थी, उसके पैरों में न जाने कौन सा

जाद ू था कक समस्त जरत

उसकी पज
ू ा करती थी, उसके पैरों पर मसर रगडती थी। इस एक प्राणी क

ाथों

में इतनी शज्क्त थी कक व

था,

श र

का

न आती

क्षण मात्र में सारी ममलों को बिंद करा सकता

सारा कारोबार ममटा सकता था। अधिकाररयों को उसके भय से नीिंद
थी, रात

को

सोते-सोते चौंक पडते थे। उससे जयादा भिंयकर जन्तु

अधिकाररयों की दृज्ष्टमें दस
ू रा नथा। ये प्रचिंड
आदमी से थरथर कािंपती थी, क्योंकक उस

शासन-शज्क्त उस एक

ड्डी में एक

ड्डी के

पववत्र, ननष्कलिंक, बलवान

और हदव्य आत्मा का ननवास था।
2

आपटे नें मिंच पर खडें

ोकर

व्रत पालन

आदे श हदया। कफर दे श में राजनननतक ज्स्थनत का वणगन

करने

का

प ले जनता को शािंत धचत्त र ने और अह स
िं ा-

करने लगे। स सा उनकी दृज्ष्ट सामने
उनका प्रजा-दख
ु पीडडत हृदय

ममस

नतलममला

जोशी के बरामदे की ओर गई तो

उठा।

य ािं

अगखणत

प्राणी अपनी

ववपज्त्त की फररयाद सुनने के मलए जमा थे और व ािं में जो पर चाय और
बबस्कुट, मेवे और
दे ख-दे ख

फल, बफग और शराब की रे ल-पेल थी। वे लोग इन अभागों को

िं सते और तामलयािं बजाते थे।

काबू से बा र

जीवन में प ली बार आपटे की जबान

ो गयी। मेघ की भािंनत गरज कर बोले—

‘इिर तो

मारे भाई दाने-दाने को मु ताज

जा

ै , केवल इसमलए कक राजकमगचाररयों के

र ा

जो दे श जो दे श के राजा
मरते
के

ैं; और वे लोग, ज्जन् ें

मलए रखा

ो र े

ै , उिर अनाज पर कर लगाया
लवे-परू ी में कमी न

ो।

ैं, जो छाती फाड कर िरती से िन ननकालते
मने अपने

सुख

ै , मारे स्वामी बने ु ए

शराबों

म

ैं , भूखों

और शानत की व्यवस्था करने
की

बोतले

उडाते

ैं। ककतनी

अनोखी बात

ै कक स्वामी भख
ू ों मरें और

सेवक शराबें उडायें, मेवे खायें और

इटली

स्पेन की ममठाइयािं चलें ! य

ककसका अपराि

और

न ीिं, कदावप

न ीिं,

मारा

ी अपराि

ै कक

ै ? क्या सेवकों

मने अपने सेवकों को इतना

का?

अधिकार दे रखा

ै । आज

म उच्च स्वर से क

क्रूर और कुहटल व्यव ार न ीिं स
और

चा ते

ैं कक

मारें मलए असह्य

म य

ै कक

म

मारे बाल-बच्चे दानों को तरसें और कमगचारी लोग, ववलास में डूबें

मारे करूण-क्रन्दन की
कक

सकते।य

दे ना

मारें घरों में चूल् ें

जरा
न

भी परवा न करत ु ए वव ार करें । य
जलें

और

कमगचारी

की

सिंसार में और कसा कौन कसा दे श

मरती

ोगा, ज ािं प्रजा तो भख
ू ी

कमगचारी अपनी प्रेम-कक्रडा में मग्न

खाती कफरती

ों और

प्रमोद के नशें में चूर

असह्य

लोग धथएटरों में कश करें ,

नाच-रिं ग की म कफलें सजायें, दावतें उडायें, वेश्चाओिं पर किंचन
प्रिान

ुए

वषाग करें ।
ो

और

ो, ज ािं ज्स्त्रयािं गमलयों में ठोकरें

अध्यावपकाओिं का वेष िारण करने वाली वेश्याएिं आमोदों...

3

एकाएक सशस्त्र मसपाह यों के दल में
र ा था—सभा भिंग कर
ववद्रो ात्मक व्याख्यान

लचल पड गई। उनका अफसर ु क्म दे

दो, नेताओिं को पकड लो, कोई न जाने पाए। य
ै।

ममस्टर जौ री ने पुमलस के अफसर को इशारे पर बुलाकर क ा—और ककसी को
धगरफ्तार

करने की जरुरत न ीिं। आपटे

ी को पकडो। व ी

मारा शत्रु

ै।

पमु लस ने डिंडे चलने शुरु ककये। और कई मसपाह यों के साथ जाकर अफसर ने
अपटे

का

धगरफ्तार कर मलया।

जनता ने त्यौररयािं बदलीिं। अपने प्यारे नेता को यों धगरफ्तार
उनका िैयग

ोते दे ख कर

ाथ से जाता र ा।

लेककन उसी वक्त आपटे की ललकार सुनाई दी—तुमने अह स
िं ा-व्रत मलया
अगर

ककसी

ने उस व्रत को तोडा तो उसका दोष मेरे मसर

ै ओर

ोगा। मैं तम
ु से

ै

सववनय अनरु ोि करता ूिं कक
ककया जो

अपने-अपने घर जाओिं। अधिकाररयों ने व ी

म समझते थे। इस सभा से

मारा

जो

उद्देश्य था

व

परू ा

गया।

म य ािं बलवा करने न ीिं , केवल सिंसार की नैनतक स ानुभूनत प्राप्त

करने

के

मलए जमा ु ए थे, और

एक क्षण में सभा भिंग

मारा उद्देश्य पूरा

ो गयी और आपटे पमु लस की

ो

ो गया।
वालात में भेज हदए गये

4
ममस्टर जौ री ने क ा—बच्चा ब ु त हदनों के बाद पिंजे में आए
कामुकदमा चलाकर

कम

ैं, राज-द्रो

से कम १० साल के मलए अिंडमान भें जूगािं।

ममस जोशी—इससे क्या फायदा?
‘क्यों? उसको अपने ककए की सजा ममल जाएगी।’
‘लेककन सोधचए, में उसका ककतना मूल्य दे ना पडेगा। अभी ज्जस बात को
धगनाये

लोग जानते

ैं , व

लायक

न ीिं

आप

र ें गें।

सारे सिंसार में फैलेगी और
अखबारों

म क ीिं मुिं

धगने-

हदखाने

में सिंवाददाताओिं की जबान तो न ीिं बिंद

कर सकते।’
‘कुछ भी
नीिंद
को

ो मैं इसे जोल में सडाना चा ता ूिं । कुछ हदनों के मलए तो

नसीब
अपने

ोगी। बदनामी से डरना
सदाचार

ै।

कर

सकते

ैं, आपटे

की

म प्रािंत के सारे समाचार-पत्रों

का राग अलापने के मलए मोल ले सकते

लािंछन को झूठ साबबत
अपराि लगा सकते

ी व्यथग

चैन

ैं।

म प्रत्येक

पर ममर्थया दोषारोपरण का

ैं।’

‘मैं इससे स ज उपाय बतला सकती ूिं । आप आपटे को मेरे

ाथ में छोड

दीज्जए। मैं उससे

ममलूिंगी और उन यिंत्रों से, ज्जनका प्रयोग करने में

जानत मसद्ध स्त

ै , उसके आिंतररक

भावों

और ववचारों की था

मारी
लेकर आपके

सामने रख दिं ग
ू ी। मैं कसे प्रमाण खोज ननकालना चा ती
उसे मिंु
साथ

खोलने का सा स न
ो।

चारों

ओर से य ी आवाज आये कक य

षिंड्यिंत्रकाररयों को मुखखया

ै

जो

ै और मैं इसे

मारे

कपटी ओर िूतग था और
ोना चाह ए। मुझे ववश्वास
मसद्ध

मैं उसे जनता की दृज्ष्ट में दे वता न ीिं बनाना चा तीिं
रुप

उत्तर में

ो, और सिंसार की स ानभ
ु नू त उसके बदले

सरकर ने उसके साथ व ी व्यव ार ककया
कक व

ूिं ज्जनके

कर

दे ना चा ती ूिं ।

ूिं , उसको

राक्षस

के

में हदखाना चा ती ूिं ।

‘कसा कोई पुरुष न ीिं

ै , ज्जस पर युवती अपनी मोह नी न डाल सके।’

‘अगर तुम् ें ववश्वास

ै कक तुम य

आपज्त्त

न ीिं

काम पूरा कर हदखाओिंगी, तो मुझे कोई

ै । मैं तो केवल उसे दिं ड दे ना चा ता ूिं ।’

‘तो ु क्म दे दीज्जए कक व
‘जनता क ीिं य

इसी वक्त छोड हदया जाय।’

तो न समझेगी कक सरकार डर गयी?’

‘न ीिं, मेरे ख्याल में तो जनता पर इस व्यव ार का ब ु त अच्छा असर पडेगा।
लोग समझेगें

कक सरकार ने जनमत का

सम्मान ककया

ै।’

‘लेककन तुम् ें उसेक घर जाते लोग दे खेंगे तो मन में क्या क ें गे?’
‘नकाब डालकर जाऊिंगी, ककसी को कानोंकान खबर न
‘मुझे तो अब भी भय
पिंजे
य

में

न

ै कक व

तुम् े सिंदे

आयेगा, लेककन तुम् ारी इच्छा

ोगी।’

की दृज्ष्ट से दे खेगा और तुम् ारे
ै तो आजमा दे खों।’

क कर ममस्टर जौ री ने ममस जोशी को प्रेम मय नेत्रों से दे खा, ाथ

ममलाया

और

चले गए।

ै

आकाश पर तारे ननकले
चौडे

ु द वायु चल र ी थी, सामने के
ु ए थे, चैत की शीतल, सख

मैदान में सन्नाटा छाया ु आ था, लेककन ममस जोशी को कसा मालम
ू
ुआ

मानों आपटे

मिंच

पर

खडा

बोल र ा

ै । उसक शािंत, सौम्य, ववषादमय स्वरुप

उसकी आिंखों में समाया ु आ था।

5
प्रात:काल ममस जोशी अपने भवन से ननकली, लेककन उसके वस्त्र ब ु त सािारण
थे

और

आभूषण

के

नाम शरीर पर एक िागा भी नथा। अलिंकार-वव ीन

कर उसकी छवव स्वच्छ, जल की

भािंनत

ो

और भी ननखर गयी। उसने सडक पर

आकर एक तािंगा मलया और चली।
आपटे का मकान गरीबों के एक दरू के मु ल्ले में था। तािंगेवाला मकान का
पता

जानता

था। कोई हदक्कत न ु ई। ममस जोशी जब मकान के द्वार पर

प ुिं ची तो न जाने क्यों

उसका

हदल

िडक र ा था। उसने कािंपते ु ए

किंु डी खटखटायी। एक अिेड औरत ननकलकर द्वार खोल हदय।
घर की सादगी दे ख दिं ग र

ाथों से

ममस जोशी उस

गयी। एक ककनारें चारपाई पडी ु ई थी, एक

टूटी

आलमारी में कुछ ककताबें चुनी ु ई थीिं, फशग पर खखलने का डेस्क था ओर एक
रस्सी की अलगनी पर

कपडे

लटक र े थे। कमरे के दस
ू रे ह स्से में एक लो े

का चूल् ा था और खाने के बरतन पडे

ुए

उसी अिेड औरत का पनत था, बैठा एक टूटे

थे।

एक

लम्बा-तगडा आदमी, जो

ु ए ताले की मरम्मत कर र ा था

और एक पािंच-छ वषग का तेजस्वी बालक आपटे की पीठ पर चढ़ने के मलए उनके
गले

में

ाथ

डाल

र ा था।आपटे इसी लो ार के साथ उसी घर में र ते थे।

समाचार-पत्रों के लेख मलखकर

जो

कुछ

ममलता उसे दे दे ते और

ग ृ -प्रबिंि की धचिंताओिं से छुट्टी पाकर जीवन व्यतीत करते थें।

इस भािंनत

ममस जोशी को दे खकर आपटे जरा चौंके, कफर खडे
ओर

सोचने

ोकर उनका स्वागत ककया

लगे कक क ािं बैठाऊिं। अपनी दररद्रता पर आज उन् ें ज्जतनी लाज

आयी उतनी और कभी न आयी थी।

ममस जोशी उनका असमिंजस दे खकर

चारपाई पर बैठ गयी और जरा रुखाई से बोली—मैं बबना

बल
ु ाये

आपके य ािं

आने के मलए क्षमा मािंगती ूिं ककिं तु काम कसा जरुरी था कक मेरे आये बबना पूरा
न

ो

सकता। क्या मैं एक ममनट के मलए आपसे एकािंत में ममल सकती ूिं ।

आपटे ने जगन्नाथ की ओर दे ख कर कमरे से बा र चले जाने का इशारा ककया।
उसकी स्त्री

भी बा र चली गयी। केवल बालक र

ओर बार-बार
दादा की कौन

उत्सुक

आिंखों

से

गया। व

ममस जोशी की

दे खता था। मानों पूछ र ा

ो कक तुम आपटे

ो?

ममस जोशी ने चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठते ु ए क ा—आप कुछ
अनुमान

कर

सकते

ैं कक इस वक्त क्यों आयी ूिं ।

आपटे ने झेंपते ु ए क ा—आपकी कृपा के मसवा और क्या कारण
ममस जोशी—न ीिं, सिंसार इतना उदार न ीिं ु आ कक
व

आपको िन्यवाद दे । आपको याद

मुझ पर क्या-क्या

आक्षेप

ककए

आप

ज्जसे

ो सकता
गािंमलयािं

ै?
दें ,

ै कक कल आपने अपने व्याख्यान में

थे? मैं आपसे जोर दे कर क ती ूिं ककवे

आक्षेप करके आपने मुझपर घोर अत्याचार ककया

ै।

आप

जैसे

सहृदय,

शीलवान, ववद्वान आदमी से मुझे कसी आशा न थी। मैं अबला ूिं , मेरी रक्षा करने
वाला

कोई

न ीिं

ै ? क्या आपको उधचत था कक एक अबला पर ममर्थयारोपण

करें ? अगर मैं पुरुष

ोती

तो आपसे

ड्यूल खेलने काक आग्र

ूिं , इसमलए आपकी सजजनता को स्पशग करना
पर जो लािंछन लगाये

ैं, वे सवगथा ननमल
ूग

ी मेरे

ाथ

में

करती । अबला
ै । आपने मुझ

ैं।

आपटे ने दृढ़ता से क ा—अनुमान तो बा री प्रमाणों से

ी ककया जाता

ै।

ममस जोशी—बा री प्रमाणों से आप ककसी के अिंतस्तल की बात न ीिं जान सकते
।
आपटे —ज्जसका भीतर-बा र एक न
स्वाभाववक

ै।

ममस जोशी— ािं, तो व
ममटा

दे

ो, उसे दे ख कर भ्रम में पड जाना

आपका भ्रम

ै और मैं चा ती ूिं कक आप उस कलिंक को

जो आपने मुझ पर लगाया

ै । आप इसके मलए प्रायज्श्चत करें गे?

आपटे —अगर न करूिं तो मुझसे बडा दरु ात्मा सिंसार में न
ममस जोशी—आप मझ
ु पर ववश्वास करते

ोगा।

ैं।

आपटे —मैंने आज तक ककसी रमणी पर ववश्वास न ीिं ककया।
ममस जोशी—क्या आपको य

सिंदे

ो र ा

ै कक मैं आपके साथ कौशल कर

र ी ूिं ?
आपटे ने ममस जोशी की ओर अपने सदय, सजल, सरल नेत्रों से दे ख कर क ा—
बाई जी, मैं
में जो आदर

गिंवार और अमशष्ट प्राणी ूिं । लेककन नारी-जानत के मलए मेरे हृदय
ै, व

श्रद्धा से कम

माता का मुख न ीिं दे खा, य

भी

न ीिं
न ीिं

ै , जो मुझे दे वताओिं पर
जानता

कक

मेरा वपता कौन था; ककिं तु

ज्जस दे वी के दया-वक्ष
ृ की छाया में मेरा पालन-पोषण ु आ उनकी
आज तक मेरी आिंखों के सामने
ुए

ै।

मै

उन

शब्दों को मुिं

लज्जजत ूिं जो आवेश में

ननकल

ैं। मैंने अपनी
प्रेम-मनू तग

ै और नारी के प्रनत मेरी भज्क्त को सजीव रखे
से ननकालने के मलए अत्यिंत द:ु खी और
गये, और

मै

आज

ी समाचार-पत्रों में

खेद प्रकट करके आपसे क्षमा की प्राथगना करुिं गा।
ममस जोशी का अब तक अधिकािंश स्वाथी आदममयों
ज्जनके

ी से साबबका पडा था,

धचकने-चुपडे शब्दों में मतलब छुपा ु आ था। आपटे के सरल ववश्वास

पर उसका धचत्त आनिंद से गद्गद
अपने अन्य ममत्रों से य

ो

गया। शायद व

क ती तो उसके फैशनेबल
ु ममलने वालों

ककसी को उस पर ववश्वास न आता। सब मुिं
बा र

ननकलते

सम्मुख य

ज्जसके

एक-एक

आपटे उसे चुप दे खकर ककसी और

शब्द

में सच्चाई झलक र ी थी,

ोते थे।

ी धचिंता में पडे ु ए थें।उन् ें भय

असर

कभी

ो

र ा

न ममटे गा।

इस भाव ने अज्ञात रुप से उन् ें अपने ववषय की गुप्त बातें क ने
जो

से

मैं चा े ककतना क्षमा मािंग,ू ममस जोशी के सामने ककतनी सफाइयािं

पेश करूिं, मेरे आक्षेपों का

की

में

ी उसका मजाक उडाना शुरु करते। उन कपटी ममत्रों के

आदमी था

अब

ोकर

के सामने तो ‘ ािं- ािं’ करते, पर

ज्जसके शब्द अिंतस्तल से ननकलते ु ए मालूम

था

गिंगा में खडी

उन् ें उसकी दृज्ष्ट में लघु बना दें , ज्जससे व

लगे, उसको सिंतोष

ो जाए कक य

नसीब

प्रेरणा

भी उन् ें नीच समझने

भी कलुवषत आत्मा
दे खना

की

ै । बोले—मैं जन्म से

अभागा ूिं । माता-वपता का तो मिंु

ी

न

ु आ, ज्जस दयाशील

मह ला ने मझ
ु े आश्रय हदया था, व

भी मझ
ु े १३ वषग की अवस्था

में

अनाथ

छोडकर परलोक मसिार गयी। उस समय मेरे मसर पर जो कुछ बीती उसे याद
करके इतनी लजजा आती

े

कक ककसी को मुिं

काम ककया; मोची का काम ककया; घोडे की साईसी
मािंजता र ा; य ािं

तक कक ककतनी

ी

बार

न हदखाऊिं। मैंने िोबी का
की; एक

क्षुिासे

व्याकुल

मािंगी। मजदरू ी करने को बरु ा न ीिं समझता, आज भी मजदरू ी
मािंगनी भी

ककसी-ककसी दशा में क्षम्य

कमग ककए, ज्जन् ें

क ते लजजा

आती

ोटल में बरतन
ोकर

भीख

ी करता ूिं । भीख

ै , लेककन मैंने उस अवस्था में कसे-कसे
ै —चोरी की, ववश्वासघात ककया, य ािं

तक कक चोरी के अपराि में कैद की सजा भी पायी।
ममस जोशी ने सजल नयन
ैं? मैं

इनका

ोकर क ा—आज य

सब बातें मुझसे क्यों कर र े

उल्लेख करके आपको ककतना बदनाम कर सकतीिं ूिं , इसका

आपको भय न ीिं

ै?

आपटे ने

िं सकर क ा—न ीिं, आपसे मझ
ु े भय न ीिं

ै।

ममस जोशी—अगर मैं आपसे बदला लेना चा ूिं , तो?
आपटे —जब मैं अपने अपराि पर लज्जजत

ोकर आपसे क्षमा मािंग र ा

ूिं , तो

मेरा

अपराि र ा

ी क ााँ, ज्जसका आप मुझसे बदला लें गी। इससे तो मुझे भय

ोता

ै कक आपने

मुझे

क्षमा

न ीिं ककया। लेककन यहद मैंने आपसे क्षमा न

मािंगी तो मुझसे तो बदला न ले सकतीिं। बदला

लेने

वाले

न ीिं

ो जाया करतीिं। मैं आपको कपट करने के अयोग्य

यहद

कपट करना चा तीिं तो य ािं कभी न आतीिं।

ममस जोशी—मै आपका भेद लेने

की आिंखें यो सजल
समझता

ूिं ।

आप

ी के मलए आयी ूिं ।

आपटे —तो शौक से लीज्जए। मैं बतला चुका ूिं कक मैंने चोरी के अपराि में कैद
की सजा

पायी थी। नामसक के जेल में रखा गया था। मेरा शरीर दब
ग था, जेल
ु ल

की कडी मे नत न

ो

सकती

थी और अधिकारी लोग मझ
ु े कामचोर समझ

कर बेंतो से मारते थे। आखखर एक हदन मैं रात को जेल से

भाग खडा ु आ।

ममस जोशी—आप तो नछपे रुस्तम ननकले!
आपटे — कसा भागा कक ककसी को खबर न ु ई। आज तक मेरे नाम वारिं ट जारी
ै

और

५०० रु.का इनाम भी

ै।

ममस जोशी—तब तो मैं आपको जरुर पकडा दिं ग
ू ी।
आपटे —तो कफर मैं आपको अपना असल नाम भी बता दे ता ूिं । मेरा नाम
दामोदर

मोदी

ै। य

नाम तो पमु लस से बचने के मलए रख छोडा

ै।

बालक अब तक तो चप
ु चाप बैठा ु आ था। ममस जोशी के मिंु
बात

सन
ु कर

व

सजग

से पकडाने

की

ो गया। उन् ें डािंटकर बोला— माले दादा को कौन

पकडेगा?
ममस जोशी—मसपा ी और कौन?
बालक— म मसपा ी को मालें गे।
य

क कर व

पास

एक कोने से अपने खेलने वाला डिंडा उठा लाया और

वीरोधचता भाव से खडा

आपटे

के

ो गया, मानो मसपाह यों से उनकी रक्षा कर र ा

ै।
ममस जोशी—आपका रक्षक तो बडा ब ादरु मालूम
आपटे —इसकी भी एक कथा

ै । साल-भर

ोता

ोता

ै, य

ै।

लडका खो गया था।

मझ
ु े

रास्ते में ममला। मैं पछ
ू ता-पछ
ू ता इसे य ािं लाया। उसी हदन से इन लोगों से
मेरा इतना प्रेम

ो गया कक मैं

इनके साथ र ने लगा।
ममस जोशी—आप अनम
ु ान कर सकते

ैं कक आपका वत
ु कर मैं आपको
ृ ान्त सन

क्या समझ र ी ूिं ।
आपटे —व ी, जो मैं वास्तव में

ू .ग ...
ूिं ....नीच, कमीना ित

ममस जोशी—न ीिं, आप मुझ पर कफर अन्याय कर र े
क्षमा कर

सकती ूिं, य

में

पडकर

व

आदमी न ीिं दे वता

सत्य
आपकी

भी

ै । प ला अन्याय तो

अन्याय क्षमा न ीिं कर सकती। इतनी प्रनतकूल दशाओिं

ज्जसका
ै।

हृदय

इतना पववत्र, इतना ननष्कपट, इतना सदय

भगवन ्, आपने

मझ
ु

पर

ो,

जो आक्षेप ककये व

ैं। मैं आपके अनुमान से क ीिं भ्रष्ट ूिं । मैं इस योग्य भी न ीिं ूिं कक
ओर ताक सकिंू । आपने अपने हृदय की ववशालता हदखाकर मेरा असली

स्वरुप मेरे सामने

प्रकट

कर

हदया। मझ
ु े क्षमा कीज्जए, मझ
ु पर दया

कीज्जए।
य

क ते-क ते व

बोले—ईश्वर

उनके पैंरो पर धगर पडी। आपटे ने उसे उठा मलया

के मलए मझ
ु े लज्जजत न करो।

ममस जोशी ने गद्गद किंठ से क ा---आप इन दष्ु टों के
कीज्जए।
साक्षी

मुझे

कभी-कभी

अपनी

बार चेष्टा करती ूिं कक अपनी

दशा पर ककतना दख
ु

दशा

सि
ु ारुिं ; इस

दिं ,ू जो मेरी आत्मा को चारों तरफ से जकडे ु ए
पररणाम

ोना

स्वाभाववक-सा मालूम
कर

ोता
दी।

का ववचार अस्वाभाववक जान पउ़ता था।

ववलामसता

से

र ना चा ती

ै । मैं बार-

के जाल को तोड

ै , पर दब
ग आत्मा अपने
ु ल
ु आ, उसका य

ै । मेरी उच्च मशक्षा ने गहृ णीमुझे ककसी परु
ु ष के अिीन र ने

मैं गहृ णी

धचिंताओिं को अपनी मानमसक स्वािीनता के मलए

की

ज्जम्मेदाररयों

ववष-तल्
ु य

समझती

और

थी।

मैं

अपने स्त्रीत्व को ममटा दे ना चा ती थी, मैं पुरुषों की भािंनत स्वतिंत्र
थी।

क्यों

ककसी की पािंबद

ककसी व्यज्क्त के सािंचे में ढाल?ू क्यों
य

ोता

पर ज्स्थत न ीिं र ती। मेरा पालन-पोषण ज्जस ढिं ग से

जीवन से मेरे मन में घण
ृ ा पैदा

तकगबुवद्ध

ाथ से मेरा उद्धार

इस योग्य बनाइए कक आपकी ववश्वासपात्री बन सकिंू । ईश्वर

ै कक मझ
ु े

ननश्चय

और

क्यों ककया, व

ोकर र ूिं ? क्यों अपनी इच्छाओिं को

ककसी

को

य

क्यों ककया? दाम्पत्य मेरी ननगा

अधिकार दिं ू कक तुमने
में

तुच्छ

वस्तु

थी।

अपने माता-वपता की आलोचना करना मेरे मलए अधचत न ीिं , ईश्वर उन् ें
सद्गनत

दे , उनकी

राय ककसी बात पर न ममलती थी। वपता ववद्वान ् थे, माता

के मलए ‘काला अक्षर भैंस

बराबर’ था। उनमें रात-हदन वाद-वववाद

था। वपताजी कसी स्त्री से

वववा

दभ
ु ागग्य समझते थे। व

य

ो

जाना

अपने जीवन का सबसे बडा

क ते कभी न थकते थे कक तुम मेरे पािंव की बेडी

बन गयीिं, न ीिं तो मैं न जाने क ािं उडकर प ुिं चा
दोष माता की

ोता र ता

अमशक्षा के मसर था। व

सिंसगग से दरू रखना चा ते थे। माता

ोता। उनके ववचार मे सारा

अपनी एकमात्र पत्र
ु ी को मख
ू ाग माता से

कभी मुझसे कुछ क तीिं तो वपताजी उन

पर टूट पडते—तम
ु से ककतनी बार क
अपना भला-बरु ा सोच सकती
ककतना िक्का लगेगा, य
ोकर मुझे मेरे

चक
ु ा कक लडकी को डािंटो

ै , तम्
ु ारे डािंटने

से

उसके

मत, व

स्वयिं

आत्म-सम्मान

का

तुम न ीिं जान सकतीिं। आखखर माताजी ने ननराश

ाल पर छोड हदया

और कदाधचत ् इसी

अपने घर की अशािंनत दे खकर मुझे वववा

शोक में चल बसीिं।

से और भी घण
ृ ा

ो

गयी। सबसे बडा

असर मुझ पर मेरे कालेज की लेडी वप्रिंमसपल का ु आ जो स्वयिं अवववाह त
मेरा

तो अब य

पर रखना

ववचार

चाह ए।

ै कक यव
ु को की मशक्षा का भार केवल आदशग चररत्रों

ववलास में रत, कालेजों के शौककन प्रोफेसर ववद्याधथगयों पर

कोई अच्छा असर न ीिं डाल

सकते ।

र ी ूिं । पर अभी घर जाकर य
उसकी जलवायु

ी दवू षत

मेरे ववलासासक्त
मझ
ु

पर

मैं इस वक्त कसी बात आपसे क

सब भूल जाऊिंगी। मैं

ज्जस

सिंसार

में

ू ाँ,

ै । व ािं सभी मुझे कीचड में लतपत दे खना चा ते

र ने में

ववश्वास

थीिं।

ी उनका स्वाथग ै । आप व

ककया

ै, ज्जसने

प ले आदमी

ै।,

ैं ज्जसने

मझ
ु से ननष्कपट व्यव ार ककया

ै।

ईश्वर के मलए अब मुझे भूल न जाइयेगा।
आपटे ने ममस जोशी की ओर वेदना पूणग दृज्ष्ट से दे खकर क ा—अगर मैं
आपकी कुछ सेवा
जोशी!

कर

सकाँू तो य

म सब ममट्टी के पुतले

मेरे मलए सौभाग्य की बात

ैं, कोई

पररज्स्थनतयों से, या पूवग सिंस्कारों से
बच सकता
ै।

।

भािंनत ढिं क मलया

ै । अब वववेक

कु रा

जाएगा।

भी

ननदोषग न ीिं। मनुष्य बबगडता
पररज्स्थनतयों

ै , सिंस्कारों से धगरने वाले मनुष्य का मागग

आपकी आत्मा सुन्दर और पववत्र
फट

करने को तैयार

सबसे

ो जाइए।

ममस जोशी—य ी आपको करना

ोगा।

का

ै तो

त्याग करने से

इससे

क ीिं

ी

कहठन

ै , केवल पररज्स्थनतयों ने उसे कु रे की

का सूयग उदय

लेककन

ोगी। ममस

ो गया

प ले

ै , ईश्वर

ने

चा ातो

उन पररज्स्थनतयों का त्याग

आपटे ने चभ
ु ती ु ई ननगा ों से दे ख कर क ा—वैद्य रोगी को जबरदस्ती दवा
वपलाता

ै।

ममस जोशी –मैं सब कुछ करुगीिं। मैं कडवी से कडवी दवा वपयूिंगी यहद आप
वपलायेंगे।

कल

आप मेरे घर आने की कृपा करें गे, शाम को?

आपटे —अवश्य आऊिंगा।
ममस जोशी ने ववदा दे ते ु ए क ा—भूमलएगा न ीिं, मैं आपकी रा
अपने
य

दे खती र ूिं गी।

रक्षक को भी लाइएगा।

क कर उसने बालक को गोद मे उठाया ओर उसे गले से लगा कर बा र

ननकल आयी।
गवग के मारे उसके पािंव जमीन पर न पडते थे। मालम
ू
जा

र ी

ोता था, वामें

उडी

ै , प्यास से तडपते ु ए मनष्ु य को नदी का तट नजर आने लगा था।

6
दस
ू रे हदन प्रात:काल ममस जोशी ने मे मानों के नाम
उत्सव

मनाने

ने उन् ें

तरकीब ननकाली। इस काम में ननपण
ु मालम
ू
मसवा और
चार

क्या

और

काडग दे खा तो मुस्कराये। अब म ाशय इस जाल

क ािं जायेगे। ममस जोशी ने

चालाक आदमी

काडग भेजे

की तैयाररयािं करने लगी। ममस्टर आपटे के सम्मान में पाटी दी

जा र ी थी। ममस्टर जौ री ने
से बचकर

दावती

ोती

फसाने

के मलए य

अच्छी

ै । मैने सकझा था, आपटे

ोगा, मगर इन आन्दोलनकारी ववद्राह यों को बकवास करने के
सूझ सकती

ै।

ी बजे मे मान लोग आने लगे। नगर के बडे-बडे अधिकारी, बडे-बडे

व्यापारी, बडे-बडे ववद्वान, समाचार-पत्रों के सम्पादक, अपनी-अपनी मह लाओिं के
साथ आने लगे। ममस

जोशी ने

आज अपने अच्छे -से-अच्छे वस्त्र और

आभष
ू ण ननकाले

ू
ु ए थे, ज्जिर ननकल जाती थी मालम

की छटा चली आर ी
मिुर

सिंगीत

ोता

था, अरुण प्रकाश

ै । भवन में चारों ओर सग
ु िंि की लपटे आ र ी थीिं और

की ध्वनन

वा में गूिंज र ीिं थी।

पािंच बजते-बजते ममस्टर जौ री आ प ुिं चे और ममस जोशी से
ुए

मस्
ु करा

ो गया कक य
ममसेज

कर बोले—जी चा ता
म ाशय

तुम् ारे

ै तम्
ु ारे
पिंजे

ाथ

ममलाते

ाथ चम
ू लिं।ू अब मझ
ु े ववश्वास

से न ीिं ननकल सकते।

पेहटट बोलीिं—ममस जोशी हदलों का मशकार करने के मलए

ी बनाई गई

ै।
ममस्टर सोराब जी—मैंने सुना

ै , आपटे बबलकुल गिंवार-सा आदमी

ममस्टर भरुचा—ककसी यूननवमसगटी में मशक्षा

ै।

ी न ीिं पायी, सभ्यता क ािं से आती?

ममस्टर भरुचा—आज उसे खब
ू बनाना चाह ए।
म िं त वीरभद्र डाढ़ी के भीतर से बोले—मैंने सुना
का

ै नाज्स्तक

ै । वणागश्रम िमग

पालन न ीिं करता।

ममस जोशी—नाज्स्तक तो मै भी ूिं । ईश्वर पर मेरा भी ववश्वास न ीिं
म िं त—आप नाज्स्तक

ों, पर आप ककतने

ै।

ी नाज्स्तकों को आज्स्तक बना दे ती

ैं।
ममस्टर जौ री—आपने लाख की बात की क ीिं मिं त जी!
ममसेज भरुचा—क्यों म िं त जी, आपको ममस जोशी
क्या?

ी न आज्स्तक बनाया

ै

स सा आपटे लो ार के बालक की उिं गली पकडे ु ए भवन में दाखखल ु ए। व
परू े
था।

फैशनेबल
ु
आज

रईस बने ु ए थे। बालक भी ककसी रईस का लडका मालम
ू

आपटे

सजीला आदमी
क ीिं

दे खकर

लोगो

को ववहदत ु आ कक व

ै । मुख से शौयग ननकल र ा

झलकती थी, मालूम
व

को

ोता था व

था, पोर-पोर

इसी समाज में पला

ोता

ककतना सुदिंर,

से मशष्टता

ै । लोग दे ख र े थे कक

चूके और तामलयािं बजायें, क ी कदम कफसले और क क े लगायें पर

आपटे मिंचे ु ए खखलाडी
ाथ हदखलाता था व

की

भािंनत, जो कदम उठाता था व

सिा ु आ, जो

जमा ु आ। लोग उसे प ले तच्
ु छ समझते

थे, अब उससे

ईष्याग करने लगे, उस पर फबनतयािं उडानी शुरु कीिं। लेककन आपटे इस कला में
भी

एक

ी ननकला। बात मुिं

जवाब में मामलन्य या कटुता

से ननकली ओर उसने जवाब हदया, पर उसके
का

लेश भी न

सरल, स्वच्छ , धचत्त को प्रसन्न करने वाले

ोता था। उसका एक-एक शब्द

भावों

में

डूबा

ोता था। ममस

जोशी उसकी वाक्यचातरु ी पर फुल उठती थी?
सोराब जी—आपने ककस यूननवमसगटी से मशक्षा पायी थी?
आपटे —यूननवमसगटी में मशक्षा पायी
अध्यक्ष

ोती तो

आज

मैं भी

मशक्षा-ववभाग

का

ोता।

ममसेज भरुचा—मैं तो आपको भयिंककर जिंतु समझती थी?
आपटे ने मुस्करा कर क ा—आपने मुझे मह लाओिं के सामने न दे खा

ोगा।

स सा ममस जोशी अपने सोने के कमरे में गयी ओर अपने सारे वस्त्राभूषण
उतार फेंके।
जयोनत

उसके

प्रस्फुहटत

मुख से शुभ्र सिंकल्प का तेज ननकल र ा था। नेंत्रो से दबी
ो

र ी

थी, मानों ककसी दे वता ने उसे वरदान हदया

उसने सजे ु ए कमरे को घण
ू णों
ृ ा से दे खा, अपने आभष
और एक मोटी साफ साडी प नकर बा र ननकली।
य

साडी मिंगा ली थी।

आज

को

ो।

पैरों से ठुकरा हदया

प्रात:काल

ी

उसने

उसे इस नेय वेश में दे ख कर सब लोग चककत
ककसी

की

आिंखों को ववश्वास न आया; ककिं तु ममस्टर जौ री बगलें बजाने लगे।

ममस जोशी ने इसे फिंसाने
‘ममत्रों! आपको याद
य

म ाशय खडे

कल इनके मकान
आयी। य

ो गये। कायापलट कैसी? स सा

के मलए

य

कोई नया स्वािंग रचा

ै।

ै , परसों म ाशय आपटे ने मुझे ककतनी गािंमलयािं दी

थी।

ैं । आज मैं इन् ें उस दव्ु यगव ार का दण्ड दे ना चा ती ूिं । मैं
पर

जाकर

इनके जीवन के सारे गुप्त र स्यों को जान

जो जनता की भीड गरजते कफरते

ै , मेरे

एक

ी ननशाने पर धगर

पडे। मैं उन र स्यों के खोलने में अब ववलिंब न करुिं गी, आप लोग अिीर
ोगें । मैंने जो कुछ दे खा, व
आप
य

लोगों

को

मूछाग

इतना भिंयकर

ै कक उसका वत
ृ ािंत

आ जायेगी। अब मुझे लेशमात्र भी सिंदे

म ाशय पक्के दे शद्रो ी

ो र े

सुनकर
न ीिं

शायद
ै कक

ै ....’

ममस्टर जौ री ने ताली बजायी ओर तामलयों के

ल गूिंज उठा।

ममस जोशी—लेककन राज के द्रो ी न ीिं, अन्याय के द्रो ी, दमन के द्रो ी, अमभमान
के द्रो ी...
चारों ओर सन्नाटा छा गया। लोग ववज्स्मत

ोकर एक दस
ू रे की ओर ताकने

लगे।
ममस जोशी—गुप्त रुप से शस्त्र जमा ककए

ै और गुप्त रुप से

त्याऍ िं की

ैं...

ममस्टर जौ री ने तामलयािं बजायी और तामलयािं का दौगडा कफर बरस गया।
ममस जोशी—लेककन ककस की

त्या? द:ु ख की, दररद्रता की, प्रजा के कष्टों

ठिमी की ओर अपने स्वाथग की।

की,

चारों ओर कफर सन्नाटा छा गया और लोग चककत
ओर

ताकने

ो- ो कर एक दस
ू रे की

लगे, मानो उन् ें अपने कानों पर ववश्वास न ीिं

ममस जोशी—म ाराज आपटे ने डकैनतयािं

की और कर र े

ै।
ैं...

अब की ककसी ने ताली न बजायी, लोग सुनना चा ते थे कक दे खे आगे क्या
क ती

ै।

‘उन् ोंने मुझ पर भी
य ािं

तक

आश्रय न ीिं

ाथ साफ ककया

ै , मेरा सब कुछ अप रण कर मलया

ै,

कक अब मैं ननरािार ूिं और उनके चरणों के मसवा मेरे मलए कोई
ै।

प्राण्िार!

इस

अबला को अपने चरणों में स्थान दो, उसे डूबने

से बचाओ। मैं जानती ूिं तुम मुझे ननराश न करोंगें ।’
य

क ते-क ते व

र

गयी।

जाकर आपटे के चरणों में धगर पडी। सारी मण्डली स्तिंमभत

7
एक सप्ता गज
ु र चक
ु ा था। आपटे पमु लस की ह रासत में थे। उन पर चार
अमभयोग चलाने की

तैयाररयािं चल र ीिं थी। सारे प्रािं त में

नगर में रोज सभाएिं

ोती थीिं, पुमलस

रोज

समाचार-पत्रों में जोरों के साथ वाद-वववाद

लचल मची ु ई थी।

दस-पािंच आदममयािं को पकडती थी।
ो र ा था।

रात के नौ बज गये थे। ममस्टर जौ री राज-भवन में में ज पर बैठे ु ए सोच
थे

कक

ममस जोशी को क्यों कर वापस लाएिं? उसी हदन से उनकी छाती पर

सािंप लोट र ा था। उसकी सरू त
व

र े

एक क्षण के मलए आिंखों से न उतरती थी।

सोच र े थे, इसने मेरे साथ कसी दगा की! मैंने इसके

मलएक्या कुछ

न ीिं

ककया? इसकी कौन-सी इच्छा थी, जो मैने पूरी न ीिं की इसी ने मुझसे बेवफाई

की। न ीिं, कभी

न ीिं, मैं

इसके बगैर ज्जिंदा न ीिं र

बदनाम करे , त्यारा क े , चा े

मझ
ु े

न ीिं छोडूगािं। इस रोडे को रास्ते से

पद

से

सकता। दनु नया चा े मझ
ु े

ाथ िोना पडे, लेककन आपटे को

टा दिं ग
ू ा, इस कािंटे

को

प लू

से ननकाल

बा र करुिं गा।
स सा कमरे का दरवाजा खल
ु ा और ममस जाशी ने प्रवेश ककया। ममस्टर
कबका

कर कुसी पर से उठ खडे ु ए, य

ने ननराश

ोकर मेरे पास आयी

जौ री

सोच र े थे कक शायद ममस जोशी

ैं , कुछ रुखे, लेककन नम्र भाव से बोले—आओ

बाला, तुम् ारी याद में बैठा था। तुम ककतनी

ी

बेवफाई करो, पर तुम् ारी याद

मेरे हदल से न ीिं ननकल सकती।
ममस जोशी—आप केवल जबान से क ते ै ।
ममस्टर जौ री—क्या हदल चीरकर हदखा दिं ?ू
ममस जोशी—प्रेम प्रनतकार न ीिं करता, प्रेम में दरु ाग्र
के

प्यासे

ो र े

मेरे स्वामी
चा ते

को

ैं, उस पर भी आप क ते
ह रासत

में डाल रखा

ैं? अगर आप समझ र े

ों कक

शरण आ जाऊिंगी तो आपका भ्रम

न ीिं

ोता। आप मरे खून

ैं , मैं तम्
ु ारी याद करता ूिं । आपने

ै, य
इन

प्रेम

ै ! आखखर आप मझ
ु से क्या

सज्ख्तयों से डर कर मै आपकी

ै । आपको अज्ख्तयार

ै कक आपटे को काले

पानी भेज दें , फािंसी चढ़ा दें , लेककन इसका मुझ परकोई असर न
स्वमी

ैं, मैं

उनको

अपना स्वामी

बीत र ी

फिंदो में फिंसाते थे, मेरी आत्मा को

खयाल आया कक इसकी आत्मा पर

क्या

ोगी? आप मुझे आत्मशुन्य समझते थे। इस दे वपुरुष ने अपनी ननमगल

स्वच्छ आत्मा
उसकी

मेरे

समझती ूिं । उन् ोने अपनी ववशाल उदारता

से मेरा उद्धार ककया । आप मझ
ु े ववषय के
कलुवषत करते थे। कभी आपको य

ोगा।व

के

आकषगण से मुझे प ली

ी मुलाकात में खीिंच मलया। मैं

ो गयी और मरते दम तक उसी की र ूिं गी।

उस मागग से अब आप

न ीिं सकते। मुझे एक सच्ची आत्मा की जरुरत थी , व

मुझे

ममल

गयी।

टा

उसे पाकर अब तीनों लोक की सम्पदा मेरी आिंखो में तच्
ु छ
में चा े प्राण

दे

दिं ,ू पर आपके काम न ीिं आ सकती।

ममस्टर जौ री—ममस जोशी । प्रेम उदार न ीिं

ोता, क्षमाशील न ीिं

मलए तम
ु सवगस्व

ो, जब तक मैं समझता ूिं कक तम
ु मेरी

न ीिं

तो

में

ो

ै । मैं उनके ववयोग

सकती

मझ
ु े इसकी क्या धचिंता

ो सकती

ोता ।

मेरे

ो। अगर तम
ु मेरी
ै कक तम
ु ककस हदशा

ो?

ममस जोशी—य

आपका अिंनतम ननणगय

ममस्टर जौ री—अगर मैं क

दिं ू कक

ै?

ािं, तो?

ममस जोशी ने सीने से वपस्तौल ननकाल कर क ा—तो प ले आप की लाश
जमीन पर

फडकती

ननणगय ननश्चय

ोगी और आपके बाद मेरी ,बोमलए। य

आपका अिंनतम

ै?

य

क कर ममस जोशी ने जौ री की तरफ वपस्तौल सीिा ककया। जौ री कुसी

से

उठ

खडे ु ए और मुस्कर बोले—क्या तुम मेरे मलए कभी इतना सा स कर

सकती थीिं? जाओिं, तुम् ारा

आपटे

मलया जाएगा। पववत्र प्रेम

ी मे य

कक तम्
ु ारा प्रेम पववत्र
तो मैं क ता ूिं , व

सकता

ै और अज्ञान को ममटा कर प्रकाश की

***

अब

मझ
ु े ववश्वास

ो गया
ै

ोगी।

के क्षेत्र में न ीिं, राजनीनत के क्षेत्र में भी परास्त कर हदया।

आदमी

ो गया।

ै।

ै , जब तम
ु इस भवन की स्वाममनी

सच्चा

आज मसद्ध

एक

सा स

ो। उस पर से अमभयोग उठा

ै । अगर कोई परु ाना पापी भववष्यवाणी कर सकता

हदन दरू न ीिं

आपटे ने मुझे प्रेम

तुम् ें मुबारक

मुलाकात

में

ी जीवन बदल सकता
जयोनत

ै , आत्मा को जगा

फैला सकता

ै, य

नरक का मार्ग
रात “भक्तमाल” पढ़ते-पढ़ते न जाने कब नीिंद आ गयी। कैसे-कैसे म ात्मा थे
ज्जनके मलए

भगवत ्-प्रेम

ी सब कुछ था, इसी में मग्न र ते थे। कसी भज्क्त

बडी तपस्या से ममलती

ै । क्या मैं व

और कौन-सा सख
ु रखा

ै ? आभष
ू णों से ज्जसे प्रेम

दे खकर आिंखे फूटती
नाम

सुनकर

मेरा श्रिंग
ृ ार

तपस्या

न ीिं कर सकती? इस जीवन में
ो जाने , य ािं तो

ै ;िन-दौलत पर जो प्राण दे ता

जवर-सा चढ़ आता

ककया

था, ककतने

ो व

जाने, य ािं तो इसका

ैं। कल पगली सुशीला ने ककतनी उमिंगों से

प्रेम

से बालों में फूल गूिंथे। ककतना मना करती

र ी, न मानी। आखखर व ी ु आ ज्जसका मुझे भय था।

ज्जतनी दे र उसके साथ

िं सी थी, उससे क ीिं जयादा रोयी। सिंसार में कसी भी कोई स्त्री

ै , ज्जसका

उसका श्रिंग
ृ ार दे खकर मसर से पािंव तक जल उठे ? कौन कसी स्त्री
पनत के मिंु

से ये

रिं ग-ढिं ग क े दे ते
सिंसार में कसे

इनको

पनत

ै जो अपने

शब्द सन
े तम
ु —
ु मेरा परलोग बबगाडोगी, और कुछ न ीिं, तम्
ु ारे
ैं ---और मनुष्य उसका

भी

मनुष्य

ैं।

हदल ववष खा लेने को चा े । भगवान ्!

आखखर

मैं नीचे चली

‘भक्तमाल’ पढ़ने लगी। अब वद
िं ृ ावन बब ारी
अपना

श्रिंग
ृ ार हदखाऊिंगी, व

जानते

ैं।

ी

की

तो दे खकर न जलेगे। व

गयी

और

सेवा करुिं गी
तो

उन् ीिं

को

मारे मन का

ाल

2
भगवान! मैं अपने मन को कैसे समझाऊिं!
का

ाल

जानते

ो। मैं चा ती

तुम अिंतयागमी

ो, तुम मेरे रोम-रोम

ुिं कक उन् ें अपना इष्ट समझूिं, उनके चरणों की

सेवा करुिं , उनके इशारे पर चलिंू, उन् ें मेरी ककसी बात से, ककसी व्यव ार से
नाममात्र, भी द:ु ख न
उनका दोष

ो। व

ननदोष

ैं, जो

कुछ

मेरे भाग्य में था व

ै , न माता-वपता का, सारा दोष मेरे नसीबों

सब जानते ु ए भी जब उन् ें आते दे खती ूिं , तो मेरा
पर

मुरदनी सी-छा जाती

ै , मसर भारी

ो जाता

ी

का

ै । लेककन य

हदल बैठ जाता

ै , जी चा ता

ु आ, न
ै , मु

ै इनकी सूरत न

दे खिंू, बात

तक

करने

को जी न ी चा ता; कदाधचत ् शत्रु को भी दे खकर ककसी

का मन इतना क्लािंत न ीिं
सी

ोने लगती

उठ जाता
लेककन

ै।

आने का समाचार पाते
ै, य

कक पव
ग न्म में
ू ज
व

उनके आने के समय हदल में िडकन
ैं तो हदल पर

से बोझ

िं सती भी ूिं , बोलती भी ूिं , जीवन में कुछ आनिंद आने लगता

क्यों

मझ
े े वववा
ु स

ोगा।

ै । दो-एक हदन के मलए क ीिं चले जाते

उनके

कसी दशा

ोता

मैं

न ीिं

ी कफर चारों ओर अिंिकार! धचत्त की

क

सकती। मुझे तो कसा जान

म दोनों में बैर था, उसी बैर का

ककया

ै

ै , व ी परु ाने सिंस्कार

बदला

पडता

ै

लेने के मलए उन् ोंने

मारे मन में बने ु ए

ैं।

न ीिं

तो

मुझे दे ख-दे ख कर क्यों जलते और मैं उनकी सूरत से क्यों घण
ृ ा करती?

वववा

करने का

तो

य

मतलब न ीिं ु आ करता! मैं अपने घर क ीिं इससे

सुखी थी। कदाधचत ् मैं जीवन-पयगन्त अपने घर
लेककन इस लोक-प्रथा का बुरा
परु
ु ष

को

रो र ी

कोमल हृदय उसके पैरो तल रौंदे जा
मिुर कल्पनाओिं का स्रोत्र

से

ो, जो अभाधगन कनयाओिं को

के गलें में बािंि दे ना अननवायग समझती

ककतनी युवनतयािं उसके नाम

आनिंद

ोता

र े

ै। व

र

सकती थी।
ककसी-न-ककसी

क्या जानता

ै कक

ै , ककतने अमभलाषाओिं से ल राते ु ए,
ै ? युवनत

ै , पुरुष में जो उत्तम

के मलए पनत कैसी-कैसी
ै , श्रेष्ठ

ै , दशगनीय

ै,

उसकी सजीव मूनतग इस शब्द के ध्यान में आते

ी उसकी नजरों के सामने

आकर

शब्द क्या

खडी

ो

जाती

ै ।लेककन मेरे मलए य

वाला शूल, कलेजे में खटकनेवाला

कािंटा, आिंखो

अिंत:करण को बेिने वाला व्यिंग बाण! सुशीला को

में गडने वाली ककरककरी,
मेशा

कभी अपनी दररद्रता का धगला न ीिं करती; ग ने न ीिं
नन् ें से

मकान

में र ती

ै , अपने

ाथों

कफर भी उसे रोते न ीिं दे खती अगर

न्योछावर कर दिं ।ू

ैं , कपडे न ीिं

अपने बस की बात

आते दे खकर उसका सारा द:ु ख दाररद्रय छूमिंतर
ै । उसके प्रेमामलिंगन में व

सुख

िं सते दे खती

ूिं ।

व

ैं, भाडे के

घर का सारा काम-काज करती

िन को उसकी दररद्रता से बदल लेती। अपने पनतदे व
जाती

ै । हृदय में उठने

ै ,

ोती तो आज अपने

को मुस्कराते ु ए घर में

ो जाता

ै , छाती गज-भर की

ै , ज्जस पर तीनों लोक का िन

ो

3
आज मझ
ु से जब्त न
था? य

ो सका। मैंने पछ
ू ा—तम
ु ने मझ
ु से ककसमलए वववा

प्रश्न म ीनों से

ककया

मेरे मन में उठता था, पर मन को रोकती चली आती

थी। आज प्याला छलक पडा। य

प्रश्न सुनकर

कुछ बौखला-से गये, बगलें

झाकने लगे, खीसें ननकालकर बोले—घर सिंभालने के मलए, ग ृ स्थी का

भार

उठाने के मलए, और न ीिं क्या भोग-ववलास के मलए? घरनी के बबना य
भूत

का

डेरा-सा

मालम
ू

ोता था। नौकर-चाकर घर की सम्पनत उडाये दे ते थे।

जो चीज ज ािं पडी र ती थी, कोई
ु आ कक मैं

उसको दे खने वाला न था। तो अब मालम
ू

इस घर की चौकसी के मलए लाई गई ूिं । मझ
ु े

करनी चाह ए और अपने को िन्य समझना चाह ए कक य
ै।

मुख्य वस्तु सम्पज्त्त

आग लग जाये!
ज्जतना व

अब

चा ते

आपको

इस
सारी

घर की रक्षा
सम्पनत

ै , मै तो केवल चौकी दाररन ूिं । कसे घर में आज

तक तो

ैं उतना न

स ी, पर

अपनी

बुवद्ध

जानती ूिं । कोई परु
ु ष घर की चौकसी के मलए वववा

म ाशय ने धचढ़ कर य

बात

के अनुसार अवश्य

दे खकर वपिंजरा सूना लगता

ोगा, उसी

ै। य

तर

य

न ीिं करता और इन

मुझसे क ी। लेककन सुशीला ठीक क ती

स्त्री के बबना घर सुना लगता

ी

मैं अनजान में घर की चौकसी करती थी,

करती थी। आज से ककसी चीज को भल
ू कर भी छूने की कसम खाती ूिं ।
मैं

मेरी

ै , इन् ें

जैसे वपिंजरे में धचडडया को न

म ज्स्त्रयों का भाग्य!

4
मालूम न ीिं, इन् ें मुझ पर इतना सिंदे
लाया

ैं, इन् ें

क्यो

ोता

बराबर सिंदे -मूलक कटाक्ष करते दे खती ूिं । क्या कारण

बाल गुथवाकर बैठी और य

ोठ चबाने

अपनी आबरु प्यारी न ीिं? य
सिंदे

ै तो समझता

अपमान

असह्य

मझ
ु े इतनी नछछोरी क्यों समझते

करते लजजा भी न ीिं आती? काना आदमी ककसी को
ै लोग मुझी

पर

ै ? जरा

लगे। क ीिं जाती न ीिं, क ीिं आती न ीिं,

ककसी से बोलती न ीिं, कफर भी इतना सिंदे ! य
मुझपर

ै । जब से नसीब इस घर में

ाँस र े

ै । क्या मुझे
ैं, इन् ें
िं सते दे खता

ै । शायद इन् ें भी य ी ब म

ो

गया

ै कक मैं इन् ें धचढ़ाती ूिं । अपने

अधिकार के

कर बैठने से कदाधचत ् मारे धचत्त की य ी वज्ृ त्त

बा र
ो

जाती

से बा र कोई काम
ै।

मभक्षुक

राजा की गद्दी पर बैठकर चैन की नीिंद न ीिं सो सकता। उसे अपने चारों
शुत्र

हदखायी

दें गें।

मै समझती

तरफ

ूिं , सभी शादी करने वाले बुड्ढ़ो का य ी

ाल

ै।
आज सुशीला के क ने से मैं ठाकुर जी की झािंकी दे खने जा र ी थी। अब य
सािारण बुवद्ध

का आदमी भी समझ सकता

ननकलना अपनी

िं सी उडाना

ै , लेककन

ै कक फू ड ब ू बनकर बा र

आप

उसी वक्त न जाने ककिर से

टपक पडे और मेरी ओर नतरस्कापूणग नेत्रों से दे खकर बोले—क ााँ की तैयारी
मैंने क

ै?

हदया, जरा ठाकुर जी की झािंकी दे खने जाती ूिं ।

इतना सन
ु ते

ी

त्योररयािं

चढ़ाकर बोले—तम्
ु ारे जाने की कुछ जरुरत न ीिं।

जो अपने पनत की सेवा न ीिं कर
बदले पाप

ोता।

सकती, उसे

मुझसे उडने चली

दे वताओिं

के दशगन से पुण्य के

ो । मैं औरतों की नस-नस प चानता ूिं ।

कसा क्रोि आया कक बस अब क्या क ूिं । उसी दम कपडे बदल डाले और प्रण कर
मलया

कक

अब कभ दशगन करने जाऊिंगी। इस अववश्वास का भी कुछ हठकाना

ै ! न जाने

क्या

सोचकर

उसी क्षण घरसे चल खडी ु ई

रुक

गयी। उनकी बात का जवाब तो य ी था कक

ोती, कफर दे खती

इन् ें मेरा उदास और ववमन र ने पर आश्चयग
समझते

ै।

ोता

क्या कर लेत।े
ै । मुझे मन-में

कृतघ्न

अपनी

समणमें इन् ोने मरे से वववा
बडी जायदाद और

करके शायद मुझ पर ए सान ककया

ै । इतनी

ववशाल

सम्पज्त्त की स्वाममनी
यशगान

मेरा

करते र ना

ोकर मझ
ु े फूले न समाना चाह ए था, आठो प रइनका

चाह ये था। मैं य
कभी बेचारे पर
ै। य

सब कुछ न करके उलटे और मिंु
दया

लटकाए र ती ूिं । कभी-

आती

न ीिं समझते कक नारी-जीवन में कोई कसी वस्तु भी ै ज्जसे दे खकर

उसकी आिंखों में
नरकतुल्य

स्वगग भी

ो जाता

ै।

5
तीन हदन से बीमार
गया

ै।

पर

ैं। डाक्टर क ते

ैं , बचने की कोई आशा न ीिं, ननमोननया

मझ
ु े न जाने क्यों इनका गम न ीिं

न थी।न जाने

व

मेरी

कोमलता

दे खकर मेरा हृदय करुणा से चिंचल

ो

ै । मैं इनती वज्र-हृदय कभी

क ािं चली गयी। ककसी बीमार की सरू त
ो जाता

था, मैं

ककसी

का रोना न ीिं सुन

सकती थी। व ी मैं ूिं कक आज तीन हदन से उन् ें बगल के कमरे में पडे
करा ते
ज्जक्र

सुनती ूिं और एक बार भी उन् ें दे खने न गयी, आिंखो में आिंसू का
ी क्या। मुझे कसा मालम
ू

ोता

ै , इनसे मेरा कोई नाता

चा े कोई वपशाचनी क े , चा े कुलटा, पर मझ
ु े तो य
सिंकोच न ीिं

क ने

ै । इन् ोने मुझे य ािं कारावास दे रखा था—मैं इसे वववा

नाम

न ीिं दे ना

चा ती---य

मुझे कैद मे डाल रखा

का

पुलककत

पा

ी

सकता

ो र ा था। ईश्वर इन् ें इस पाप का दण्ड
न ीिं ु आ

ी उसकी वववाह ता न ीिं

दे र े

ै । स्त्री ककसी

ै।
के

ो जाती। व ी सिंयोग वववा

ै । ज्जिंसमे कम-से-कम एक बार तो हृदय प्रेम से

ो जाय! सुनती ूिं , म ाशय अपने कमरे

न ीिं। ज्जसका

पववत्र

करुिं , जो मुझे लात से मारे उसक पैरो

में

ैं, अपनी बीमारी का सारा बुखार मुझ पर ननकालते
परवा

का

आ

ै । मैं इतनी उदार न ीिं ूिं कक ज्जसने

ोकर क ती ूिं कक मेरा इनसे वववा

बािंि हदये जाने से
पद

कारावास

ो उसकी पूजा

का चूिंमू। मुझे तो मालूम
गले

में लेशमात्र भी

ै कक इनकी बीमारी से मझ
ु े एक प्रकार का ईष्यागमय आनिंद

र ा

मै ननस्सकोंच

ी न ीिं मुझे

पडे-पडे मुझे कोसा करते
ैं, लेककन

य ािं

इसकी

जी चा े जायदाद ले , िन ले, मुझे इसकी जरुरत न ीिं!

6
आज तीन हदन ु ए, मैं वविवा

ो गयी, कम-से-कम लोग य ी क ते

जो जी चा े क े , पर मैं अपने को जो कुछ समझती ूिं व

ैं। ज्जसका

समझती ूिं । मैंने

चूडडया न ीिं तोडी, क्यों तोडू? क्यों तोडू? मािंग में सेंदरु प ले भी न डालती थी,
अब भी न ीिं डालती। बूढ़े बाबा का कक्रया-कमग उनके

सुपुत्र

न फटकी। घर में मुझ पर मनमानी आलोचनाएिं

ैं , कोई मेरे गुिंथे ु ए

बालों
य ािं

को दे खकर नाक मसिंकोडता
इसकी

धचिंता

न ीिं।

ोती

ने ककया, मैं पास

ैं , कोई मेरे आभूषणों पर आिंख मटकाता

उन् ें धचढ़ाने को मैं भी रिं ग=-बबरिं गी साडडया प नती

ु े
ूिं , और भी बनती-सिंवरती ूिं , मझ

जरा

गयी। इिर कई हदन सुशीला के घर

भी

गयी।

द:ु ख न ीिं
छोटा-सा

ैं। मैं तो कैद से छूट
मकान

ै , कोई सजावट

न सामान, चारपाइयािं तक न ीिं, पर सुशीला ककतने आनिंद से र ती
उल्लास

दे खकर मेरे मन में भी भािंनत-भािंनत

उन् ें कुज्त्सत क्यों

क ुिं , जब

जीवन में ककतना उत्सा
खेलता र ता
से, चा े

व

मेरा

न ीिं सकता, उसी

स्मनृ त

ैं ---

मन उन् ें कुज्त्सत न ीिं समझता ।इनके

ै ।आिंखे मस्
ु कराती र ती
ी क्षखणक

ै । उसका

की कल्पनाएिं उठने लगती
ैं , ओठों पर

ै , बातों में प्रेम का स्रोत ब ता ु आजान पडता
ककतना

ै,

ै।

मिरु

ास्य

इस

आनिंद

ो, जीवन सफल

ो जाता

ै , कफर उसे कोई भूल

अिंत क के मलए काफी

ो जाती

ै , इस ममजराब की

चोट हृदय के तारों को अिंतकाल तक मिुर स्वरों

में किंवपत रख कती

एक हदन मैने सुशीला से क ा---अगर तेरे पनतदे व क ीिं परदे श

चले

ै।
जाए

तो

रोत-रोते मर जाएगी!
सुशीला गिंभीर भाव से बोली—न ीिं ब न, मरुगीिं न ीिं , उनकी
प्रफुज्ल्लत

याद

करती र े गी, चा े उन् ें परदे श में बरसों लग जाएिं।

मैं य ी प्रेम चा ती ूिं , इसी चोट के मलए मेरा मन तडपता र ता
ी

सदै व

ै , मै भी कसी

स्मनृ त चा ती ूिं ज्जससे हदल के तार सदै व बजते र ें , ज्जसका नशा ननत्य

छाया र े ।

7
रात रोते-रोते ह चककयािं बिंि गयी। न-जाने क्यो हदल भर आता था। अपना
जीवन

सामने

बगूलों के मसवा

एक

बी ड मैदान की भािंनत फैला ु आ

ररयाली का नाम

न ीिं।

मालूम

ोता था, ज ािं

घर फाडे खाता था, धचत्त कसा चिंचल

ो र ा था कक क ीिं उड जाऊिं। आजकल भज्क्त के

ग्रिंथो

की

ओर ताकने को

जी न ीिं चा ता, क ी सैर करने जाने की भी इच्छा न ीिं

ोती, क्या

व

मेरा

रोम

मैं स्वयिं भी न ीिं जानती। लेककन मै जो जानती व
जानता

ै , मैं

एक-एक

रोम-

अपनी भावनाओिं को सिंजीव मूनतग ैं, मेरा एक-एक अिंग

मेरी आिंतररक वेदना का आतगनाद
दशा को प िं च गयी

चा ती ूिं

ो र ा

ै । मेरे धचत्त की चिंचलता उस अिंनतम

ै , जब मनुष्य को ननिंदा

की

न

लजजा र ती

ै और न

भय। ज्जन लोभी, स्वाथी माता-वपता ने मझ
ु े कुएिं

में

ढकेला, ज्जस

पाषाण-

हृदय प्राणी ने मेरी मािंग में सेंदरु डालने का स्वािंग ककया, उनके प्रनत मेरे मन में
बार-बार

दष्ु कामनाएिं उठती

में कामलख लगा कर

ैं। मैं उन् े लज्जजत करना चा ती ूिं । मैं अपने मुिं

उनके

मुख

में

कामलख लगाना चा ती ूिं मैअपने

प्राणदे कर उन् े प्राणदण्ड हदलाना चा ती ूिं ।मेरा नारीत्व लुप्त
हृदय में प्रचिंड जवाला उठी ु ई
घर के सारे आदमी सो र े
घर

से

जग

की

मैं डरी क ीिं य

मसर से पािंव तक दे खा

ै ,। मेरे

ै थे। मैं चुपके से नीचे उतरी , द्वार खोला और
ओर

सडक पर सन्नाटा था, दक
ु ानें बिंद
हदखायी दी।

गया

ै।

ननकली, जैसे कोई प्राणी गमी से व्याकुल

ककसी खुली ु ई

ो

दौडे। उस मकान में मेरा दम घुट र ा था।
ो चुकी थी। स सा एक बुहढयािं आती ु ई

चुडल
ै न

और बोली

मैंने धचढ़ कर क ा---मौत की!

ोकर घर से ननकले और

ो। बुहढया ने मेरे समीप आकर मुझे
--- ककसकी रा

दे ख र ी

ो

बहु ढ़या---तम्
ु ारे नसीबों में तो अभी ज्जन्दगी के बडे-बडे सख
ु भोगने मलखे
अिंिेरी
मैने

रात गज
ु र गयी, आसमान पर सब
ु

की रोशनी नजर आ र ी

िं सकर क ा---अिंिेरे में भी तुम् ारी आिंखे इतनी तेज

मलखावट पढ़ लेती

ैं?

ैं। तुम् ारे हदन गये और अच्छे हदन आ र े

करते इतनी

उम्र

गज
ु र

चूडे

मािंगती, भगवान ् का हदया सब कुछ घर में
ै

में कूदने जा
रात

गये

ो सके तो करुिं । ककसी से
ै, केवल य ी इच्छा

उन् ें सिंतान, बस औरक्या क ूिं , व

बता दे ती ूिं कक ज्जसकी जो इच्छा जो व

सुफेद

िं सो मत बेटी, य ी काम

ैं। इसीमलए इतनी

ाथों ककसी अभाधगन का उद्धार

उन् े िन, ज्जन् े सिंतान की इच्छा

न ी

ै , जो ज र का प्याल पीने को

तैयार थीिं, वे आज दि
ू की कुज्ल्लयािं कर र ी
ननकलती ू कक अपने

ै।

में

गयी। इसी बहु ढ़या की बदौलत जो नदी

र ी थीिं, वे आज फूलों की सेज पर सो र ी

कुछ न ीिं

ैं।

ैंकक नसीबों की

बुहढ़या---आिंखो से न ीिं पढती बेटी, अक्ल से पढ़ती ूिं , िूप
ककये

ैं।

परू ी

ै
मिंत्र

ो जाये।

मैंने क ा---मुझे न िन चाह ए न सिंतान। मेरी मनोकामना तुम् ारे बस की बात
न ीिं

ै।

बुहढ़या
जो

िं सी—बेटी, जो तुम चा ती

सिंसार में

आनिंदप्रद

ोते ु ए स्वगग की

ै , जो आकाश कुसुम

लेककन मेरे मिंत्र में व
की प्यासी

ो व

मै जानती ूिं ; तुम व

चीज चा ती

ै , जो दे वताओिं के वरदान से भी जयादा
ै , गुलर का फूल

ै और अमावसा का चािंद

शिंज्क्त ै जो भाग्य को भी सिंवार

सकती

मैने उत्किंहठत

ु ई तुम् े पार उतार दे ।

ोकर पछ
ू ा—माता, तम्
ु ारा घर क ािं

ै।

ै।

ै । तम
ु प्रेम

ो, मैं तुम् े उस नाव पर बैठा सकती ूिं जो प्रेम के सागर

की तिंरगों पर क्रीडा करती

ो

में , प्रेम

बहु ढया---ब ु त नजदीक

ै बेटी, तम
ु चलों तो मैं अपनी आिंखो पर बैठा कर ले

चलिं।ू
मुझे कसा मालम
ू
ु आ कक य

कोई आकाश की दे वी

ै । उसेक पीछ-पीछे चल

पडी।
8
आ ! व
मेरा

बुहढया, ज्जसे मैं आकाश की दे वी समझती थी, नरक की डाइन ननकली।

सवगनाश

ो गया। मैं अमत
ृ खोजती थी, ववष ममला, ननमगल स्वच्छ प्रेम की

प्यासी थी, गिंदे ववषाक्त
मैं सश
ु ीला का –सा

नाले

सख
ु

में धगर पडी व

चा ती

थी, कुलटाओिं

लेककन जीवन-पथ में एक बार उलटी रा
आना कहठन

वस्तु न ममलनी थी, न ममली।

चलकर

की ववषय-वासना न ीिं।
कफर

सीिे

मागग पर

ै?

लेककन मेरे अि:पतन का अपराि मेरे मसर न ीिं, मेरे माता-वपता और उस बढ़
ू े पर
ै

जो

मेरा स्वामी बनना चा ता था। मैं य

ववचार से मलख र ी ूिं

कक

पिंज्क्तयािं न मलखतीिं , लेककन इस

मेरी आत्म-कथा पढ़कर लोगों की आिंखे खुलें; मैं

कफर क ती ूिं कक अब भी अपनी बामलकाओ के मलए मत दे खों िन, मत दे खों
जायदाद, मत दे खों कुलीनता, केवल वर दे खों। अगर उसके मलए जोडा का वर
न ीिं

पा सकते तो लडकी को क्वारी रख छोडो, ज र दे कर मार डालो, गला घोंट

डालो, पर

ककसी

बढ़
ू े खूसट से मत ब्या ो। स्त्री सब-कुछ स

से दारुण द:ु ख, बडे से

बडा

सिंकट, अगर न ीिं स

सकती

ै । दारुण

सकती तो अपने यौवन-

काल की उिं मगो का कुचला जाना।
र ी मैं, मेरे मलए अब इस जीवन में कोई आशा न ीिं । इस
उस दशा
***

से

न बदलूिंगी, ज्जससे ननकल कर आयी ूिं ।

अिम दशा को भी

स्त्री और परु
ु ष
वववपन बाबू के मलए स्त्री
उनकी

कववता

के

ी सिंसार की सुन्दर वस्तु थी। व

मलए ज्स्त्रयों के रुप और यौवन की प्रशसा

धचिंताकषगक ववषय था। उनकी दृज्ष्ट में

स्त्री

उनकी आिंखे जगमगा उठती थीिं, कान खडें
आवाज

सुन ली

ो। जब से

कल्पना करनी शुरु की
प्रफुल्लता

का

जो उसके

हृदय की रानी

आते

की

चमक, बसिंत

की छवव, कोयल

ोगी। व

उस कज्ल्पत

हदन भी समीप आ गया

रे - रे पत्तों से ल रायेंगी, उनकी मरु ादें परू ी

कालेज की अिंनतम परीक्षा समाप्त

ी

ोगी; उसमें ऊषा की

मनू तग के उपासक थे, कववताओिं में उसका गण
ु गाते, व
आशाएिं

नाम

ो जाते थे, मानो ककसी रमसक ने गाने

कवव वखणगत सभी उपमाओिं से ववभूवषत

था, जब उनकी

ी सबसे

ोश सिंभाला, तभी से उन् ोंने उस सुिंदरी की

ोगी, पुष्प की कोमलता, किंु दन

की ध्वनन—व

और

जगत में व्याप्त कोमलता, मािुयग

और अलिंकारों की सजीव प्रनतमा थी। जबान पर स्त्री
की

कवव थे

ो

गयी

थी और वववा

ो

ोगी।

के सिंदेशे आने लगे

थे।
2
वववा

तय

ो गया। बबवपन बाबू ने कन्या को दे खने का ब ु त आग्र

लेककन जब उनके

मािंमू

अपनी आिंखों से दे खा
और वववा

ै , तब

व

राजी

ै , मैंने

मिंडप

में

आयी तो

ाथ-पािंव नजर आये। ककतनी सुिंदर उिं गमलया थीिं, मानों दीप-

ो, अिंगो की शोभा ककतनी मनो ाररणी थी। वववपन फूले न समाये। दस
ू रे

हदन विू ववदा ु ई

तो

व

उसके दशगनों के मलए इतने अिीर ु ए कक जयों

रास्ते में क ारों ने पालकी रखकर मुिं - ाथ
विू

ी रुपवती

ो गये। िूमिाम से बारात ननकली

का मु ू तग आया। विू आभूषणों से सजी ु ई

वववपन को उसके
मशखाएिं

ने ववश्वास हदलाया कक लडकी ब ु त

ककया,

के पास जा प ुिं च।े व

घूिंघट

झािंक र ी थी। वववपन की ननगा

िोना

टाये , पालकी से

शुरु ककया, आप चुपके से
मसर

उस पर पड गयी। य

व

ननकाले

बा र

परम सुिंदर रमणी

ी

न थी

ज्जसकी

थे---य

उन् ोने कल्पना की थी, ज्जसकी व

एक चौडे माँु , धचपटी नाक, और

बरसों से कल्पना कर र े

फुले ु ए गालों वाली कुरुपा स्त्री थी।

रिं ग गोरा था, पर उसमें लाली के बदले सफदी थी; और कफर रिं ग कैसा
ो, रूप की कमी न ीिं पूरी कर सकता। वववपन का सारा उत्सा
ािं! इसे मेरे

ठिं डा पड

गया---

ी गले पडना था। क्या इसके मलए समस्त सिंसार में और कोई न

ममलता था? उन् ें

अपने मािंमू पर क्रोि आया ज्जसने विू की तारीफों के पुल

बािंि हदये थे। अगर इस वक्त व
लेता कक व

ी सुिंदर

ममल

जाते तो वववपन उनकी कसी खबर

भी याद करते।

जब क ारों ने कफर पालककयााँ उठायीिं तो वववपन मन में सोचने लगा, इस स्त्री के
साथ

कैसे मैं बोलग
ू ा, कैसे इसके साथ जीवन काटूाँगा। इसकी ओर तो

ी से घण
ृ ा

ोती

ै।

पता न था। क्या माँु

कसी

कुरुपा ज्स्त्रयााँ

ईश्वर ने बनाया

ओर से आिंखे बिंद कर लेता, लेककन व
मुझी पर य

भी सिंसार में

ै , क्या

आाँखें

चौडा-सा

माँु !

ताकने

ैं, इसका मझ
ु े अब तक

ै ! मैं और सारे कबों की
भगवान ्! क्या तुम् ें

वज्रपात करना था।

3
वववपन
ससुर

ो अपना जीवन नरक-सा जान पडता था। व
को

लिंबा

खराग मलखकर फटकारा, मािं-बाप से

शािंनत न ु ई तो क ीिं

भाग

अवश्य आती थी। व

अपने का समझाता कक

दोष

ै , उसने जबरदस्ती

य

ववचार

तो मझ
ु से वववा

ो जाती

कक

बात सोचने लगा। आशा पर उसे दया
इसमें

उस

बेचारी

ककया न ीिं। लेककन य

थी।

का क्या
दया और
ी उसके

आशा अपने अच्छे -से-अच्छे कपडे प नती;

से बाल सिंवारती, घिंटो आइने के सामने खडी

करती, लेकन वववपन को य
थी

की

लडा।

ु जजत की और जब इससे

उस घण
ृ ा को न जीत सकता था जो आशा को दे खते

रोम-रोम में व्याप्त
तर -तर

जाने

अपने मािंमू से

शुतुरगमज-से मालूम

ोकर अपना श्रिंग
ृ ार

ोते। व

हदल

से

चा ती

उन् ें प्रसन्न करूाँ, उनकी सेवा करने के मलए अवसर खोजा करती थी;

लेककन

वववपन

उससे

भागा-भागा कफरता था। अगर कभी भें ट

कुछ कसी जली-कटी बातें करने लगता कक आशा
सबसे बुरी बात य
चेष्टा

करने

थी कक उसका चररत्र भ्रष्ट

लगा कक मेरा वववा

उसके दशगन भी न

ोते।

व

ो गया

उसके

सुनती, झरोखे से दे खती कक व

रोती

ो जाती तो

ु ई व ािं से चली जाती।

ोने लगा। व

य

भूल जाने की

ै । कई-कई हदनों क आशा को

क -क े की आवाजे बा र से आती ु ई

दोस्तों के गले में

ाथ डालें सैर करने जा र े

ै

और तडप कर र े जाती।
एक हदन खाना खाते समय उसने क ा—अब तो आपके दशगन
कारण घर

ी न ीिं

ोतें । मेरे

छोड दीज्जएगा क्या ?

वववपन ने मिंु

फेर कर क ा—घर

की

ै इसमलए दौड-िप
ू जयादा करनी पडती

तलाश

ी पर तो र ता ूिं । आजकल

जरा

नौकरी

ै।

आशा—ककसी डाक्टर से मेरी सूरत क्यों न ीिं बनवा दे ते? सुनती ूिं , आजकल सूरत
बनाने

वाले डाक्टर पैदा ु ए

ै।

वववपन— क्यों ना क धचढ़ती

ो, य ािं तुम् े ककसने बुलाया था?

आशा— आखखर इस मजग की दवा कौन करें गा ?
वववपन— इस मजग की दवा न ीिं
आदमी

क्या

बना सकता

ै । जो काम ईश्चर से ने करते बना उसे

ै?

आशा – य

तो तुम् ी सोचो कक ईश्वर की भुल के मलए मझ
ु े दिं ड दे र े

सिंसार

कौन कसा आदमी

में

ककसी मदग को केवल रूप ीन

ो।

ै ज्जसे अच्छी सरू त बरु ी लगती

ो,ककन तम
ु ने

ोने के कारण क्वािंरा र ते दे खा

ै , रूप ीन

लडककयािं भी मािं-बाप के घर न ीिं

बैठी

र तीिं।

ककसी-न-ककसी तर

उनका

ननवाग

ो

ी जाता

ै ; उसका पनत उप पर प्राण ने दे ता

ो, लेककन दि
ू

की

मक्खी न ीिं समझता।
वववपन ने झुिंझला कर क ा—क्यों ना क मसर खाती
कर

र ा

ू ाँ। हदल पर जब्र न ीिं ककया जा सकता और न दलीलों का उस पर

कोई असर पड सकता
ु जजत करती
आशा य

ो, मै तुमसे ब स तो न ीिं

ै । मैं तम्
ु े

कुछ क ता तो न ीिं ूिं , कफर तम
ु क्यों मझ
ु से

ो?

खझडकी सन
ु कर चली गयी। उसे मालम
ू

से सदा के मलए ह्रदय कठोर कर मलया

ो गया कक इन् ोने मेरी ओर

ै।

4
वववपन तो रोज सैर-सपाटे करते, कभी-कभी रात को गायब र ते। इिर आशा
धचिंता

और

नैराश्य

से घल
ु ते-घल
ु ते बीमार पड गयी। लेककन वववपन भल
ू कर

भी उसे दे खने न आता, सेवा करना तो दरू
मानता था कक व
पसिंद का वववा
अब व

र ा। इतना

मर जाती तो गला छुटता, अबकी खुब

ी न ीिं, व
दे खभाल

हदल में
कर अपनी

करता।

और भी खल
ु खेला। प ले आशा से कुछ दबता था, कम-से-कम उसे य

िडका लगा
अब व

र ता था कक कोई मेरी चाल-ढ़ाल पर ननगा

िडका छुट गया।

कमरे में

ी जमघटे

कुवासनाओिं

ोने लगे। लेककन

में कसा मलप्त
ववषय-भोग

ोता, इससे क ीिं अधिक बुवद्ध और बल का सवगनाश
पीला लगा, दे

भी क्षीण

इदग -धगदग गढ़े पड

ोने लगी, पसमलयों की

गये। अब व

में
ोता

रखने वाला भी

ै।

ो गया कक मरदाने
िन

ी

ै । वववपन

का सवगनाश
का

चे रा

ड्डडयािं ननकल आयीिं आिंखों के

प ले से क ीिं जयादा शोक करता, ननत्य तेल

लगता, बाल बनवाता, कपडे बदलता, ककन्तु मुख पर कािंनत न थी, रिं ग-रोगन से
क्या

ो सकता?

एक हदन आशा बरामदे में चारपाई पर लेटी ु ई थी। इिर
को न

दे खा था। उन् े दे खने की इच्छा ु ई। उसे भय था कक व

कफर भी व

मन को

न

रोक

सन आयेंगे,

सकी। वववपन को बुला भेजा। वववपन को भी

उस पर कुछ दया आ गयी आ गयी। आकार सामने खडे
उनके मुिं

की ओर दे खा तो चौक पडी। व

मुमशकल

था। बोली—तुम भी बीमार

गये

फ्तों से उसने वववपन

इतने दब
ग
ु ल

ो

गये। आशा ने

ो गये थे कक प चनाना

ो क्या? तुम तो मुझसे भी जयादा घुल

ो।

वववपन—उिं , ज्जिंदगी में रखा

ी क्या

ै ज्जसके मलए जीने की कफक्र करुिं !

आशा—जीने की कफक्र न करने से कोई इतना दब
ु ला न ीिं

ो जाता। तुम अपनी

कोई दवा क्यों न ीिं करते?
य

क

मलया।

कर उसने वववपन का दाह न
वववपन ने भी

ाथ पकड कर अपनी चारपाई पर बैठा

ाथ छुडाने की चेष्टा न की। उनके स्वाभाव में इस समय

एक ववधचत्र नम्रता थी, जो

आशा ने कभी ने दे खी थी। बातों से भी ननराशा

टपकती थी। अक्खडपन या क्रोि की
ु आ कक उनकी आिंखो में आिंसू भरे

गिंि भी न थी। आशा का कसा मालुम
ुए

ै।

वववपन चारपाई पर बैठते ु ए बोले—मेरी दवा अब मौत करे गी। मै तुम् ें जलाने
के

मलए

न ीिं क ता। ईश्वर जानता

अब जयादा हदनों तक न
र े

ै , मैं तुम् े चोट न ीिं प ुिं चाना चा ता। मै

ज्जऊिंगा। मुझे ककसी भयिंकर रोग के लक्षण हदखाई दे

ै । डाक्टर नें भी व ी क ा

ै । मझ
ु े इसका खेद

ै

कक मेरे

प ुिं चा पर क्षमा करना। कभी-कभी बैठे-बैठे मेरा हदल डूब हदल डूब
मूछाग-सी आ जाती
य

ो

कर

जाता

ै।

क तें -क ते एकाएक व

मूनछग त

ाथों तम्
ु े कष्ट

कााँप उठे । सारी दे

चारपाई पर धगर पडे और

में सनसनी सी दौड गयी।

ाथ-पैर पटकने लगे।

ै,

माँु

से कफचकुर ननकलने लगा। सारी दे

आशा का सारा रोग

वा

ो गया। व

पसीने से तर

ो गयी।

म ीनों से बबस्तर न छोड सकी थी। पर

इस समय उसके मशधथल अिंगो में ववधचत्र स्फूनतग दौड गयी। उसने तेजी से उठ
कर वववपन को अच्छी तर

लेटा हदया और उनके मख
ु पर पानी के छीिंटे दे ने

लगी। म री भी दौडी आयी और पिंखा झलने लगी। पर
खोलीिं। सिंध्या

ोते- ोते उनका मुिं

गया। ह लाना तो दरू र ा, मूिं

टे ढ़ा

भी वववपन ने आिंखें न

ो गया और बायािं अिंग

से बात ननकालना भी मुज्श्कल

शून्य

पड

ो गया। य

मूछाग

न थी, फामलज था।
5
फामलज के भयिंकर रोग में रोगी की सेवा करना आसान काम न ीिं
आशा

म ीनों

से

बीमार थी। लेककन उस रोग के सामने व

गई। 15 हदनों तक वववपन की
और रात-की-रात उनके पास

ालत

ब ुत

ै । उस पर

पना रोग भूल

नाजुक र ी। आशा हदन-के-हदन

बैठी र ती। उनके मलए पर्थय

सम्भाल कर दवा वपलाना, उनके जरा-जरा से इशारों

बनाना, उन् ें गोद में

को समझाना

उसी

िैयश
ग ाली स्त्री का काम था। अपना मसर ददग से फटा करता, जवर से दे
करती, पर इसकी

उसे

जरा भी परवा

१५ हदनों बाद वववपन की

जैसी

तपा

न थी।

ालत कुछ सिंभली। उनका दाह ना पैर तो लिंज
ु पड

गया था, पर तोतली भाषा में कुछ बोलने लगे थे। सबसे बरु ी गत उनके सन्
ु दर
मुख की ु ई थी। व

इतना

टे ढ़ा

ो गया था जैसे कोई रबर के खखलौने को

खीिंच कर बढ़ा दें । बैटरी की मदद से जरा दे र के मलए बैठे या खडे तो

ो जाते

थे; लेककन चलने−कफरने की ताकत न थी।
एक हदनों लेटे−लेटे उन् े क्या ख्याल आया। आईना उठा कर अपना मुिं
लगे।

कसा

ईश्वर ने

दे खने

कुरुप आदमी उन् ोने कभी न दे खा था। आह स्ता से बोले−−आशा,

मुझे

गरुर

की सजा

दे

दी। वास्तव में मुझे य

उसी बुराई का

बदला ममला
से माँु
ककए

ै , जो मैने तम्
ु ारे साथ की। अब तम
ु अगर मेरा

माँु

दे खकर घण
ृ ा

फेर लो तो मझ
ु से उस दव्ु यगव ार का बदला लो, जो मैने, तम्
ु ारे साथ
ै।

आशा ने पनत की ओर कोमल भाव से दे खकर क ा−−मै तो आपको अब भी
उसी ननगा

से

दे खती ू ाँ। मझ
ु े तो आप में कोई अन्तर न ीिं हदखाई दे ता।

6
वववपन−−वा , बन्दर का−सा मुिं
न ीिं।

मैं

तो

ो गया

टे ढ़ा

इतनी

शज्क्त

ो कक कोई अन्तर

सीिा न ु आ। मख्
ु य का बायािं भाग

ो गया था कक चे रा दे खकर डर मालूम
आ

गई

कक अब

व

ोता था।
का

मु ल्ले की ज्स्त्रयािं बनाव−मसिंगार ककये जमा थीिं। गाना−बजाना
एक स े ली ने पुछा−−क्यों आशा, अब तो तुम् ें उनका मुिं

उत्सव

था।

ो र ा था।

जरा भी अच्छा न

ोगा।

आशा ने गम्भीर
लगता

ािं, पैरों में

चलने−कफरने लगे। आशा ने पनत की

बीमारी में दे वी की मनौती की थी। आज उसी की पुजा

लगता

ी

अब कभी बा र न ननकलिंग
ू ा। ईश्वर ने मझ
ु े सचमच
ु दिं ड हदया।

ब ु त यत्न ककए गए पर वववपन का मिंु
इतना

ै , तुम क ती

ोकर क ा−−मुझे तो प ले से क ीिं मुिं

जरा भी अच्छा न

ोगा।

‘चलों, बातें बनाती

ो।’

‘न ी ब न, सच क ती ू ाँ ; रूप के बदले मुझे उनकी आत्मा ममल गई जो रूप से
क ीिं बढ़कर

ै ।’

वववपन कमरे में बैठे ु ए थे। कई ममत्र जमा थे। ताश

ो र ा था।

कमरे में एक खखडकी थी जो आिंगन में खल
ु ती थी। इस वक्त व

बन्द थी। एक

ममत्र ने उसे चप
ु के से खोल हदया। एक ममत्र ने उसे चप
ु के हदया और शीशे से
झािंक कर वववपन से

क ा−−

आज

तो तुम् ारे य ािं पररयों का अच्छा जमघट

ै।
वववपन−−बन्दा कर दो।
‘अजी जरा दे खो तो: कैसी−कैसी सूरतें
मालम
ू

ोती

ै ! तुम् े इन सबों में कौन सबसे अच्छी

ै?

वववपन ने उडती ु ई नजरों से दे खकर क ा−−मुझे तो व ीिं सबसे अच्छी मालूम
ोती

ै जो थाल में फूल रख र ी

‘वा

री आपकी ननगा

तो

व

ै।

! क्या सूरत के साथ तुम् ारी ननगा

सबसे बदसूरत मालम
ू

ोती

‘इसमलए कक तुम उसकी सूरत दे खते
‘अच्छा, य ी ममसेज वववपन
‘जी
***

ािं, य

व ी दे वी

ै।

ैं ?’

भी बबगड गई? मुझे

ै ।’
ो और मै उसकी आत्मा दे खता ूिं ।’

उद्धार
ह द
िं ू समाज की वैवाह क प्रथा इतनी दवू षत, इतनी धचिंताजनक, इतनी भयिंकर
गयी

ै कक कुछ

माता-वपता
व

समझ में न ीिं आता, उसका सुिार क्योंकर

ोंगे ज्जनके सात पुत्रों के

बाद एक भी कन्या उत्पन्न

स षग उसका स्वागत करें । कन्या का

धचिंता मसर पर सवार

ो जाती

जन्म

ै जो कन्या

की

ोते

ो गई

ै

कक

दे ज

चौगुनी, पावस-काल के जल-गुजरे कक एक या दो
ै । अभी ब ु त हदन न ीिं गज
ु रे कक एक या दो
की

तो

य

ाल

दररद्रता हदन बढ़ती जाती
एक दजगन भी
उनके

ै

और

कमाओिं, कमाई

मशक्षक्षत

ो तो वववा

ोगा

कर लेना।

क ािं जायेगें? अगर वववा
कफर

बेटों

लेककन अभाग्यवश यहद व
के

ो

ोती।

ोते

की ननिगनता और

ोगा ईश्वर

ी

व

जाने।

अपने

बेटे

ऊपर

उसके मलए ‘कम्पलसरी’
दें गे--बेटा, खाओिं

कुचररत्रता कलिंक की बात

की नाक कट गयी; व

ी पडेगा, उससे भागकर

इस दघ
ग ना को
ु ट

पनतत

का

ककसी

इसे नछपा न सका, भिंडाफोड

दस्
ु स , कोई

ो गया, टाट बा र

सफलता के साथ गप्ु त रख सका

मलए, भाई-बिंिुओिं के मलए सिंसार में मुिं

कोई अपमान इससे

बडे

जार तक तय

समाज

की

केवल

गई

जार के नीचे तय न ीिं

तो करना

तब तो कोई बात न ीिं; उसकों कलिंककत करने
माता-वपता

द ेज

प ुिं च

में ववलम्ब ु आ और कन्या के पािंव क ीिं ऊाँचे नीचे

कुटुम्ब

कर हदया गया। अगर व

नौबत

तों कर दे गें; न ी क

न ीिं समझी जाती; लेककन कन्या का वववा
पड गये तो

जार रुपये

का अननवायग न ीिं समझता, य
ै।

ै।

की दर, हदन दन
ू ी रात

भी तीन-चार

ै । इसका अन्त क्या

ववषय न ीिं, ‘आप्शनल’ ववषय

की

ै , मानों मसर से

जारों तक

ों तो माता-वपता का धचिंता न ीिं

वववा -भार

उसके वववा

ोते

बात थी, छोटी-छोटी शाहदयों पााँच सौ से एक

जाती थीिं; अब मामूली-मामूली वववा
। खचग का

ो जाय तो

ै कक कसे माता-वपताओिं की

मत्ृ यु पर ह्रदय से प्रसन्न

बािा टली। इसका कारण केवल य ी

घरों

ी

ी कसे

ै और आदमी उसी में डुबककयााँ खाने लगता

अवस्था इतनी ननराशमय और भयानक
कमी न ीिं

ो। बबरलें

ो

का

सा स

ो गया तो

न ीिं ;

कफर

हदखाने को न ीिं र ता।

ववपज्त्त इससे भीषण न ीिं। ककसी भी व्याधि

की इससे भयिंकर कल्पना न ीिं की जा सकती। लत्ु फ
बेहटयों के वववा
वववा

की कहठनाइयों को भोग चक
ु े

भी

स ानुभूनत

य

में ककतनी ठोकरें खानी पडी

न ी प्रकट करतें , बज्ल्क कन्या के वववा

तावान उठाया था उसे चक्र-ववृ द्ध ब्याज के साथ बेटे

के वववा

पर कहटबद्ध

धचिंता

ो जाते

ैं। ककतने

ी माता-वपता इसी

कोई बढ़
ू े के गले कन्या का मढ़ कर अपना गला छुडाता
ववचार

करने का मौका क ािं, ठे लमठे ल

मुिंशी गुलजारीलाल कसे

ी

ै कक जो लोग

ोते ै व ीिं अपने बेटों के

के अवसर पर बबलकुल भूल जाते ै कक

थीिं, जरा

तो

में जो

में वसूल करने

में ग्र ण करलेता
ै , पात्र-कुपात्र

ै,

के

ै।

तभागे वपताओिं में थे। यों उनकी ज्स्थनत बुरी न थी।

दो-ढ़ाई सौ रुपये म ीने वकालत से पीट लेते थे, पर खानदानी आदमी थे, उदार
ह्रदय, ब ु त ककफायत

करने

पर भी माकूल बचत न

का आदर-सत्कार न करें तो न ीिं बनता, ममत्रों
बनता। कफर ईश्वर के हदये

ुए

दो

पुत्र

आवश्यक था कक वववा

अच्छे घराने में

घराने के मलए कम-से-कम पािंच
ोती जाती थी। व

की खानतरदारी न करें तो न ी

थे, उनका

भार था, क्या करते ! प ली कन्या का वववा

ो सकती थी। सिंबिंधियों
पालन-पोषण, मशक्षण का

टे ढ़ी खीर

ो र ा

ो, अन्यथा लोग

था।

य

िं सेगे और अच्छे

जार का तखमीना था। उिर पत्र
ु ी सयानी

अनाज जो लडके खाते थे, व

को दे खो तो जैसे सूखों का रोग लगा

भी

खाती थी; लेककन लडकों

ो और लडकी शुक्ल पक्ष का चािंद

ो

र ी थी। ब ु त दौड-िूप करने पर बचारे को एक लडका ममला। बाप आबकारी के
ववभाग में ४००
लडका तो ममला

रु०

का नौकर था, लडका सुमशक्षक्षत। स्त्री से आकार बोले,

और

कक लडका क ता

घरबार-एक

ै , मैं अपना

भी

काटने योग्य न ीिं; पर कहठनाई य ी

वववा

ककतना समझाया, औरों ने समझाया, पर व
ै , मै कभी वववा
करता

ै । कोई

न

करुिं गा।

टस से मस न ीिं

न करुिं गा। समझ में न ीिं आता, वववा
कारण

का एकलौता लडका

न ीिं बतलाता, बस य ी क ता

ै । उनकी

परम

इच्छा

करें क्या? यों उन् ोने फलदान तो रख मलया

बाप

ने समझाया, मैने
ोता।

क ता

से क्यों इतनी घण
ृ ा
ै , मेरी इच्छा। मािं बाप

ै कक इसका वववा
ै पर मुझसे क

हदया

ो जाय, पर
ै कक

ै

लडका स्वभाव का

ठीला

ै , अगर न मानेगा तो फलदान आपको लौटा हदया

जायेगा।
स्त्री ने क ा--तुमने लडके को एकािंत में बुलावकर पूछा न ीिं?
गुलजारीलाल--बुलाया था। बैठा रोता र ा, कफर उठकर चला गया। तुमसे क्या
क ूिं , उसके पैरों पर धगर पडा; लेककन बबना कुछ क े उठाकर चला गया।
स्त्री--दे खो, इस लडकी के पीछे क्या-क्या झेलना पडता

ै?

गल
ु जारीलाल--कुछ न ीिं, आजकल के लौंडे सैलानी

ैं। अिंगरे जी

पढ़ते

ै

कक ववलायत में ककतने

बस य ी सनक सवार
और शािंनत

ो

जाती

ै । ज्जतनी मुसीबतें

ोते

ी लोग अवववाह त र ना
ै कक ननद्गवद्व र ने में

ै व

सब वववा

ी में

पस्
ु तकों

में

ी पसिंद करते ै ।
ी जीवन की सुख

ै । मैं भी कालेज में

था तब सोचा करता था कक अकेला र ूिं गा और मजे से सैर-सपाटा करुिं गा।
स्त्री-- ै तो वास्तव में बात य ी। वववा

ी तो सारी मुसीबतों की जड

वववा

ोतीिं ? मैं भी क्वािंरी र ती तो चैन

न ककया

ोता तो क्यों ये धचिंताएिं

ै । तुमने

करती।
2
इसके एक म ीना बाद मुिंशी गल
ु जारीलाल के पास वर ने य

पत्र मलखा--

‘पज
ू यवर,
सादर प्रणाम।
मैं आज ब ु त असमिंजस में पडकर य
िष्ृ टता

को

क्षमा कीज्जएगा।

पत्र मलखने का सा स कर र ा ूिं । इस

आपके जाने के बाद से मेरे वपताजी और माताजी दोनों मझ
ु पर वववा
मलए नाना प्रकार
व

समझते

उन् े य

से दबाव डाल र े

ै कक मैं अपनी ज्जद

भी सन्दे

ो र ा

ै । माताजी रोती
के कारण वववा

ै कक मेरा चररत्र

करने के

ै , वपताजी नाराज

ोते

ैं।

से भागता ूिं । कदाधचता

भ्रष्ट

कारण बताते ु ए डारता ूिं कक इन लोगों को द:ु ख

ो गया
ोगा

ै । मैं वास्तववक

और

आश्चयग

न ीिं

कक शोक में उनके प्राणों पर

ी बन जाय। इसमलए अब तक मैने जो बात गुप्त

रखी

ोकर आपसे प्रकट करता ूिं और आपसे साग्र

थी, व

आज वववश

ननवेदन करता ूिं कक आप इसे गोपनीय

समखझएगा और ककसी दशा में भी उन

लोगों के कानों में इसकी भनक न पडने दीज्जएगा। जो
ै , प ले
र ा

ै

कक

ै।

य ािं सबसे अनुभवी जो दो डाक्टर

ै । अगर माता-वपता से य

ननश्चय

की कल्पना

क

करना भी पाप

सिंतान ु ई तो व

व

भी मेरे

और

सिंस्कार

ो

ैं, उन दोनों
जब

अकाल
बनना

मत्ृ यु

पडे।

न कीज्जए, अन्यथा

पायेगी

और कदाधचत ्

मेरे अवववाह त

ो जाने से मेरे साथ और कई

र ने
जीवों

ै कक मुझे इस बन्िन में

आपको पछताना पडेगा।

सेवक
‘ जारीलाल।’
पत्र पढ़कर गल
ु जारीलाल ने स्त्री की ओर दे खा और बोले--इस पत्र के ववषय में
तुम् ारा क्या ववचार

ैं।

ी

ोगी, क्योकक अगर कोई

जायगा। इसमलए आपसे मेरी प्राथगना

डालने के मलए आग्र

ो

ोते जाते ै ।

रो-रो कर मर जायेगें।

भी भयिंकर

जो बीतेगी, मुझ पर बीतेगी। वववाह त
नाश

अनुभव

ै कक मैं ववशेष प्रयत्न करके साल दो

से

स्त्री को भी इसी रोग-राक्षस का भक्ष्य
का

ोगा

ी हदनों का मे मान ूिं तो मेरे मलए वववा

ै । सिंभव

दशा

तो

ी ने स्पष्ट क ा कक तम्
ु े

दिं ू तो व

ै कक मैं सिंसार में थोडे

साल जीववत र ूिं , पर

से

व

मैं क्षय रोग से ग्रमसत ूिं । उसके सभी लक्षण प्रकट

से मैने अपनी आरोग्य-परीक्षा करायी और दोनो
य

ै

ी से क्यों उन् े शोक में डुबाऊिं। मुझे ५-६ म ीनों से य

डाक्टरों की भी य ी राय
मसल

ोना

स्त्री--मुझे तो कसा मालूम

ोता

ै कक उसने ब ाना रचा

गल
ु जारीलाल--बस-बस, ठीक य ी मेरा भी ववचार
बीमारी

का ब ाना कर दिं ग
ू ा तो आप

न ीिं। मैने तो दे खा

ी

ी

ै।

ै । उसने समझा

ै

कक

ट जायेंगे। असल में बीमारी कुछ

था, चे रा चमक र ा था। बीमार का मुिं

नछपा न ीिं

र ता।
स्त्री--राम नाम ले के वववा

करो, कोई ककसी का भाग्य थोडे

ी पढ़े बैठा

ै।

गल
ु जारीलाल--य ी तो मै सोच र ा ूिं ।
स्त्री--न
तो

ो ककसी डाक्टर से लडके को हदखाओिं । क ीिं सचमुच य

बीमारी

ो

बेचारी अम्बा क ीिं की न र े ।

गुलजारीलाल-तुम भी पागल
का

ाल

ो

जायगा

ो क्या? सब

मैं खुब जानता ूिं । सोचता
तो

य

गुलछरे

ीले- वाले

ैं। इन छोकरों

के हदल

ोगा अभी सैर-सपाटे कर र ा ूिं , वववा

कैसे उडेगे!

स्त्री--तो शुभ मु ू तग दे खकर लग्न मभजवाने की तैयारी करो।
3

जारीलाल बडे िमग-सिंदे
जा

र ी थी और व

धचट्ठा क

की बेडी डाली

कुछ न कर सकता था। उसने ससुर का अपना कच्चा

सन
ु ाया; मगर

से अपनी बीमारी का

में था। उसके पैरों में जबरदस्ती वववा
ककसी

ाल क ने

ने उसकी बालों पर ववश्वास न ककया। मााँ-बाप
का

उसे

सा स

न

ोता था। न जाने उनके

हदल पर क्या गुजरे , न जाने क्या कर बैठें? कभी सोचता ककसी डाक्टर

की

श दत लेकर ससूर के पास भेज दिं ,ू मगर कफर ध्यान आता, यहद उन लोगों को
उस पर भी ववश्वास

न आया, तो? आजकल डाक्टरी से सनद ले लेना कौन-सा

मज्ु श्कल काम

ै । सोचें गे, ककसी डाक्टर को

शादी के मलए तो इतना आग्र

ो र ा

कुछ दे हदलाकर मलखा मलया

था, उिर

डाक्टरों

ने स्पष्ट क

था कक अगर तुमने शादी की तो तुम् ारा जीवन-सुत्र और भी ननबगल
म ीनों की जग

हदनों में वारा-न्यारा

लग्न आ चक
ु ी थी। वववा

ो जाने की सम्भावाना

की तैयाररयािं

य

प्राण

बात मालूम

सूख

मुझे अपने

मन

न ीिं

तो परसों, तो क्यों न आज

साथ सारी

धचिंताओिं

और

की कल्पना

ी

ोगी ? जब उसे

में क्या क े गी? कौन इस पाप

का प्रायज्श्चत करे गा ? न ीिं, उस अबला पर घोर अत्याचार न
की आग में न जलाऊिंगा। मेरी ज्जन्दगी

जाएगा।

ो र ी थीिं, मे मान आते-जाते थे

जाते थे। आ ! उस अबला की क्या गनत

ोगी तो व

ो

हदया

ै।

जारीलाल घर से भागा-भागा कफरता था। क ािं चला जाऊिं? वववा
से उसके

ोगा।

करुिं गा, उसे वैिव्य

ी क्या, आज न मरा कल

ी मर जाऊिं। आज

मरुिं गा, कल

ी जीवन का और उसके

को, सारी ववपज्त्तयों का अन्त कर दिं ।ू वपता जी रोयेंगे,

अम्मािं प्राण त्याग दें गी; लेककन

एक

बामलका

का जीवन तो सफल

ो जाएगा,

मेरे बाद कोई अभागा अनाथ तो न रोयेगा।
क्यों न चलकर वपताजी से क

दिं ?ू व

एक रोज शोक से ननरा ार र
इतने
य

कष्ट

से

सोचकर व

एक

एक-दो हदन द:ु खी र ें गे, अम्मािं जी दो-

जायेगीिं, कोई धचिंता न ीिं। अगर माता-वपता के

युवती

की प्राण-रक्षा

ो जाए तो क्या छोटी बात

िीरे से उठा और आकर वपता के सामने खडा

ै?

ो गया।

रात के दस बज गये थे। बाबू दरबारीलाल चारपाई पर लेटे ु ए ु क्का पी र े थे।
आज
बयाना

उन् े सारा हदन दौडते गुजरा था। शाममयाना तय ककया; बाजे वालों को
हदया; आनतशबाजी, फुलवारी आहद का प्रबन्ि ककया। घिंटो ब्रा मणों के

साथ मसर मारते र े , इस

वक्त

जरा

कमर सीिी कर र ें थे कक स सा

जारीलाल को सामने दे खकर चौंक पडें। उसका उतरा ु आ चे रा सजल
और किंु हठत मुख दे खा तो कुछ धचिंनतत
ै

न? कुछ

उदास मालम
ू

ोते

ो।

आिंखे

ोकर बोले--क्यों लालू, तबीयत तो अच्छी

जारीलाल--मै आपसे कुछ क ना चा ता ूिं ; पर भय
अप्रसन्न न

ोता

ै कक क ीिं आप

ों।

दरबारीलाल--समझ गया, व ी पुरानी बात

ै न ? उसके मसवा कोई दस
ू री बात

ो

शौक से क ो।
जारीलाल--खेद

ै कक मैं उसी ववषय में कुछ क ना चा ता ूिं ।

दरबारीलाल--य ी क ना चा ता
अयोग्य ूिं , मै य

भार स

ो न मुझे इस बन्िन में न डामलए, मैं इसके

न ीिं सकता, बेडी मेरी गदग न को तोड दे गी, आहद या

और कोई नई बात ?
जारीलाल--जी न ीिं नई बात

ै । मैं आपकी आज्ञा पालन करने के मलए सब

प्रकार तैयार ूिं ; पर एक कसी बात
प्रकट कर दे ना चा ता ूिं । इसके

ै , ज्जसे मैने अब तक नछपाया था, उसे भी
बाद आप जो कुछ ननश्चय करें गे उसे मैं

मशरोिायग करुिं गा।
जारीलाल ने बडे ववनीत शब्दों में अपना आशय क ा, डाक्टरों की राय भी बयान
की

और अन्त में बोलें --कसी दशा में मुझे पूरी आशा

ै कक आप मुझे वववा

करने के मलए बाध्य न करें गें। दरबारीलाल ने पुत्र के मुख की और गौर से दे खा,
क े जदी का नाम न था, इस कथन पर
नछपाने और अपना

ववश्वास न आया; पर अपना अववश्वास

ाहदग क शोक प्रकट करने के मलए

व

कई

ममनट तक

ग री धचिंता में मग्न र े । इसके बाद पीडडत किंठ से बोले --बेटा, इस इशा में तो
वववा

करना और भी आवश्यक

के मलए जीते र े , पर वववा

ो

ै । ईश्वर न करें कक

म व

बुरा हदन दे खने

जाने से तुम् ारी कोई ननशानी तो र

ईश्वर ने कोई सिंतान दे दी तो व ी

मारे

बुढ़ापे

की लाठी

जाएगी।

ोगी, उसी का मुिं

दे खरे ख कर हदल को समझायेंगे, जीवन का कुछ आिार तो र े गा। कफर

आगे

क्या

ोगा, य

ईश्वर की

कौन क

सकता

लीला अपरम्पार

ोकर बैठों, म जो कुछ
ी

ै ? डाक्टर ककसी की कमग-रे खा तो न ीिं पढ़ते,

ै , डाक्टर उसे न ीिं समझ सकते । तम
ु ननज्श्चिंत

करते

ै , करने दो। भगवान चा ें गे तो सब कल्याण

ोगा।

जारीलाल ने इसका कोई उत्तर न ीिं हदया। आिंखे डबडबा आयीिं , किंठावरोि के
कारण मुिं

तक न खोल सका। चुपके से आकर अपने कमरे मे लेट र ा।

तीन हदन और गज
ु र गये, पर
तैयाररयों

जारीलाल कुछ ननश्चय न कर सका। वववा

में रखे जा चक
ु े थे। मिंत्रेयी की पज
ू ा

का शोर मचा ु आ था। मु ल्ले

की

ो चक
ू ी थी और द्वार पर बाजों

के लडके जमा

ोकर बाजा सुनते थे और

उल्लास से इिर-उिर दौडते थे।
सिंध्या
ने

ो गयी थी। बरात आज रात की गाडी से

जाने

वाली

थी।

बरानतयों

अपने वस्त्राभूष्ण प नने शुरु ककये। कोई नाई से बाल बनवाता था और

चा ता था कक खत कसा

साफ

ो जाय मानों व ािं बाल कभी थे

अपने पके बाल को उखडवा कर जवान
साबुन, उबटन की लूट मची ु ई थी और

बनने

की

ी न ीिं , बुढ़े

चेष्टा कर र े थे। तेल ,

जारीलाल बगीचे

मे

एक

वक्ष
ृ

के

नीचे उदास बैठा ु आ सोच र ा था, क्या करुिं ?
अज्न्तम ननश्चय की घडी मसर पर खडी थी। अब एक क्षण भी ववल्म्ब करने का
मौका न था। अपनी वेदना ककससे क ें , कोई सुनने वाला न था।

उसने सोचा
भी

मारे माता-वपता ककतने अदरू दशी

ै , अपनी उमिंग में

इन् े

इतना

न ी सझ
ू ता कक विु पर क्या गज
ु रे गी। विू के माता-वपता ककतने अदरू दशी

ै , अपनी

उमिंग

कर न ीिं जानते।

मे

भी

इतने अन्िे

ो र े

ै कक दे खकर भी न ीिं दे खते , जान

क्या य

वववा

झोंकना

ै ? कदावप न ीिं। य

ै , किंु द छुरे से रे तना

वैिव्य के

अज्ग्न-किंु ड

लडकी के शत्रु

में

ै , कसाई

तो लडकी का कुएिं में डालना

ै , भाड मे

ै । कोई यातना इतनी दस्
ु स , कर अपनी पत्र
ु ी का

डाल दे ते

ै , बधिक

ै। य

ैं,

माता-वपता

त्यारे

ै ? कदावप न ीिं। य

ै । क्या इनके मलए कोई दण्ड न ीिं

? जो जानबूझ कर अपनी वप्रय सिंतान के खून से अपने

ाथ रिं गते

ै , उसके

मलए कोई दिं ड न ीिं? समाज भी उन् े दिं ड न ीिं दे ता, कोई कुछ न ीिं क ता।
य

सोचकर

ाय !

जारीलाल उठा और एक ओर चुपचाप चल हदया। उसके मुख पर

तेज छाया ु आ था। उसने आत्म-बमलदान से इस कष्ट का ननवारण करने का
दृढ़ सिंकल्प

कर

मलया

था।

उसे

मत्ृ यु

का लेशमात्र भी भय न था। व

उस दशा का प ुिं च गया था जब सारी आशाएिं मत्ृ यु पर
जाती

में
कई

अवलज्म्बत

ो

ै।

उस हदन से कफर ककसी ने
खा

ी

गई

जारीलाल की सूरत न ीिं दे खी। मालूम न ीिं जमीन

या आसमान। नाहदयों मे जाल डाले गए, कुओिं में बािंस पड गए, पमु लस

ु मलया गया, समाचार-पत्रों

मे ववज्ञज्प्त ननकाली गई, पर क ीिं पता न चला ।

फ्तो के बाद, छावनी रे लवे से एक मील पज्श्चम की ओर सडक पर कुछ

ड्डडयााँ ममलीिं। लोगो को अनम
ु ान ु आ कक
जान दी, पर ननज्श्चत रूप से

कुछ

जारीलाल ने गाडी के नीचे दबकर

न मालुम ु आ।

भादों का म ीना था और तीज का हदन था। घरों में सफाई

ो

र ी

थी।

सौभाग्यवती रमखणयािं सोल ो श्रिंग
ृ ार ककए गिंगा-स्नान करने जा र ी थीिं। अम्बा
स्नान करके लौट आयी
कर र ी थी। पनतग ृ

थी

और तुलसी के कच्चे चबूतरे के सामने खडी विंदना

में उसे य

प ली

था। स सा उसके पनत ने अन्दर आ
बोला--मुिंशी दरबारी लाल तुम् ारे कौन
तीज

पठौनी

आयी

कर

ी

तीज

उसे

स ास

ोते ै , य

ै । अभी डाककया दे गया

थी, बडी उमिंगो से व्रत रखा
नेत्रों

से

दे खा

और

उनके य ािं से तुम् ारे मलए
ै।

य
ी

क कर उसने एक पासगल चारपाई पर रख हदया। दरबारीलाल का नाम सन
ु ते
अम्बा की आिंखे सजल

स्मनृ तयािं

जीववत

ो

गयीिं, ह्रदय

उद्गार-सा उठ पडा। आ ! य
ै कक मुझे य

ो गयीिं। व

लपकी ु यी आयी और पासगल

में

जारीलाल के प्रनत श्रद्धा का एक

उसी दे वात्मा के

आत्मबमलदान का पुनीत फल

हदन दे खना नसीब ु आ। ईश्वर उन् े

सद्गनत

दें ।

व

आदमी

न ीिं, दे वता थे, ज्जसने अपने कल्याण के ननममत्त अपने प्राण तक

समपगण

कर हदए।

पनत ने पूछा--दरबारी लाल तुम् ारी चचा

ैं।

अम्बा-- ााँ।
पनत--इस पत्र में
अम्बा--य

जारीलाल का नाम मलखा

मुिंशी दरबारी लाल के बेटे

ै, य

कौन

ै?

ैं।

पनत--तुम् ारे चचरे भाई?
अम्बा--न ीिं, मेरे परम दयालु उद्धारक, जीवनदाता, मझ
ु े अथा
बचाने

वाले, मझ
ु े सौभाग्य का वरदान दे ने वाले।

पनत ने इस भाव क ा मानो कोई भूली ु ई बात याद
समझ
***

जल में डुबने से

गया। वास्तव में व

मनष्ु य न ीिं दे वता थे।

आ

गई

ो--आ !

मैं

ननिागसन
परशुराम –व ीिं—व ीिं दालान में ठ रो!
मयागदा—क्यों, क्या मझ
ु में कुछ छूत लग गई!
परशुराम—प ले य
तर

र ीिं

और

बताओिं तुम इतने हदनों से क ािं र ीिं, ककसके साथ र ीिं, ककस

कफर य ािं ककसके साथ आयीिं? तब, तब ववचार...दे खी जाएगी।

मयागदा—क्या इन बातों को पूछने का य ी वक्त
परशुराम— ािं, य ी बात

ै ; कफर अवसर न ममलेगा?

ै । तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ

ी ननकली

थीिं। मेरे पीछे -पीछे कुछ दे र तक आयीिं भी; मै पीछे कफर-कफर कर तुम् ें दे खता
जाता

था,कफर

एकाएक

तुम

क ािं गायब

ो गयीिं?

मयागदा – तुमने दे खा न ीिं, नागा सािुओिं का एक दल सामने से आ गया।
आदमी

सब

इिर-उिर दौडने लगे। मै भी िक्के में पडकर जाने ककिर चली गई।

जरा भीड कम ु ई तो तुम् ें ढूिंढ़ने

लगी। बासू का नाम ले-ले कर पुकारने लगी,

पर तुम न हदखाई हदये।
परशुराम – अच्छा तब?
मयागदा—तब मै एक ककनारे बैठकर रोने लगी, कुछ सझ
ू

ी न पडता कक

क ािं

जाऊिं, ककससे क ूिं , आदममयों से डर लगता था। सिंध्या तक व ीिं बैठी रोती र ी।ैै
परशुराम—इतना तूल क्यों दे ती

ो? व ािं से कफर क ािं गयीिं?

मयागदा—सिंध्या को एक युवक ने आ कर मुझसे पूछा, तुम् ारे क घर के लोग क ीिं
खो

तो

न ीिं गए

ै ? मैने क ा— ािं। तब उसने तुम् ारा नाम, पता, हठकाना पूछा।

उसने सब एक ककताब पर

मलख मलया और मझ
ु से बोला—मेरे साथ आओ, मै

तम्
ु ें तम्
ु ारे घर भेज दिं ग
ू ा।
परशुराम—व

आदमी कौन था?

मयागदा—व ािं की सेवा-सममनत का स्वयिंसेवक था।
परशुराम –तो तम
ु उसके साथ
मयागदा—और क्या करती? व
शाममयाने में
उन सेवकों

ो लीिं?
मुझे सममनत के कायगलय में ले गया। व ािं एक

एक लम्बी दाढ़ीवाला मनष्ु य बैठा ु आ कुछ मलख र ा था। व ी
का

अध्यक्ष

था।

और

भी ककतने

ी सेवक व ािं खडे थे। उसने

मेरा पता-हठकाना रज्जस्टर में मलखकर मुझे एक अलग शाममयाने

में भेज

हदया, ज ािं और भी ककतनी खोयी ु ई ज्स्त्रयों बैठी ु ई थीिं।
परशुराम—तम
ु ने उसी वक्त अध्यक्ष से क्यों न क ा कक मझ
ु े प ुिं चा दीज्जए?
मयागदा—मैने एक बार न ीिं सैकडो बार क ा; लेककन व
मेला न

खत्म

का प्रबन्ि न ीिं

य

ो जाए और सब खोयी ु ई ज्स्त्रयािं एकत्र न
कर

सकता।

मेरे पास न इतने आदमी

क ते र े , जब तक
ो जाएिं, मैं भेजने
ैं , न इतना िन?

परशुराम—िन की तुम् े क्या कमी थी, कोई एक सोने की चीज बेच दे ती तो
काफी रूपए

ममल जाते।

मयागदा—आदमी तो न ीिं थे।
परशुराम—तुमने य

क ा था कक खचग की कुछ धचन्ता न कीज्जए, मैं अपने ग ने

बेचकर अदा कर दिं ग
ू ी?

मयागदा—सब ज्स्त्रयािं क ने लगीिं, घबरायी क्यों जाती
ै।

म सभी जल्द अपने घर प ुिं चना चा ती

ो? य ािं ककस बात का डर

ै ; मगर क्या करें ? तब मैं भी चप
ु

ो र ी।
परशुराम – और सब ज्स्त्रयािं कुएिं में धगर पडती तो तम
ु भी धगर पडती?
मयागदा—जानती तो थी कक य

लोग िमग के नाते मेरी रक्षा कर र े

नौकरी या मजूर न ीिं

ैं, कफर आग्र

ब ु त-सी

व ािं दे खकर मझ
ु े कुछ तसल्ली

ज्स्त्रयों

को

ककस मुिं

इससे बढ़कर तस्कीन की और क्या बात

से करती? य

ो सकती

तस्कीन का आनन्द उठाती र ी? मेला तो दस
ू रे

ैं , कुछ

बात भी

मेरे

ै कक

ो गईग ् परशुराम— ािं,

थी? अच्छा, व ािं के हदन

ी हदन उठ गया

ोगा?

मयागदा—रात- भर मैं ज्स्त्रयों के साथ उसी शाममयाने में र ी।
परशुराम—अच्छा, तुमने मुझे तार क्यों न हदलवा हदया?
मयागदा—मैंने समझा, जब य

लोग प ुिं चाने की क ते

ी

ैं तो तार क्यों दिं ?ू

परशुराम—खैर, रात को तम
ु व ीिं र ी। यव
ु क बार-बार भीतर आते र े

ोंगे?

मयागदा—केवल एक बार एक सेवक भोजन के मलए पूछने आयास था, जब
सबों

ने

खाने

से इन्कार कर हदया तो व

म

चला गया और कफर कोई न

आया। मैं रात-भर जगती र ी।
परशुराम—य
गया

मैं कभी न मानूिंगा कक इतने युवक व ािं थे और कोई अन्दर न

ोगा। सममनत के युवक आकाश के दे वता न ीिं

अध्यक्ष तो जरूर
मयागदा— ािं, व

ी

दे खभाल

करने

गया

ोत। खैर, व

दाढ़ी वाला

ोगा?

आते थे। पर द्वार पर से पूछ-पूछ कर लौट जाते थे।

एक मह ला के पेट में ददग

ािं, जब

ोने लगा था तो दो-तीन बार दवाएिं वपलाने आए थे।

परशुराम—ननकली न व ी बात! मै इन िूतों की
ववशेषकर

नस-नस

नतलक-मालािारी दहढ़यलों को मैं गुरू घिंटाल

म ाशय कई बार दवाई दे ने

प चानता

ूिं ।

ी समझता ूिं । तो वे

गये ? क्यों तुम् ारे पेट में तो ददग न ीिं

ोने लगा

था?
मयागदा—तुम एक सािु पुरूष पर आक्षेप कर र े

ो। व

बेचारे एक तो मेरे बाप

के बराबर थे, दस
ू रे आिंखे नीची ककए र ने के मसवाय कभी ककसी पर सीिी
ननगा

न ीिं करते थे।

परशुराम— ािं, व ािं सब दे वता
दस
ू रे

ी दे वता जमा थे। खैर, तुम रात-भर व ािं र ीिं।

हदन क्या ु आ?

मयागदा—दस
ू रे हदन भी व ीिं र ी।
लेकर

एक स्वयिंसेवक

म सब ज्स्त्रयों को साथ में

मुख्य-मुख्य पववत्र स्थानो का दशगन कराने गया। दो प र को लौट कर

सबों ने भोजन ककया।
परशुराम—तो व ािं तुमने सैर-सपाटा भी खूब ककया, कोई कष्ट न
भोजन के

बाद गाना-बजाना ु आ

ोने पाया।

ोगा?

मयागदा—गाना बजाना तो न ीिं, ािं, सब अपना-अपना दख
ु डा रोती र ीिं, शाम
मेला उठ गया तो दो सेवक

म

लोगों को ले कर स्टे शन पर आए।

परशुराम—मगर तम
ु तो आज सातवें हदन आ र ी
मयागदा—स्टे शन पर एक दघ
ग ना
ु ट
परशुराम— ािं, य

तो मैं समझ

ो और व

ो गयी।
ी र ा था। क्या दघ
ग ना ु ई?
ु ट

भी अकेली?

तक

मयागदा—जब सेवक हटकट लेने जा र ा था, तो एक आदमी ने आ कर उससे
क ा—य ािं गोपीनाथ के िमगशाला में एक आदमी ठ रे
गयी

ै , उनका भला-सास नाम

मकान

ुए

ैं , उनकी स्त्री खो

ै , गोरे -गोरे लम्बे-से खूबसूरत आदमी

ै , झवाई टोले में । तुम् ारा ु मलया

उसने

कसा

ैं, लखनऊ

ठीकबयान ककया कक

मुझे उसस पर ववश्वास आ गया। मैं सामने आकर बोली, तुम बाबूजी को
ो? व
तम्
ु ारा

िं सकर बोला, जानता न ीिं ूिं तो तुम् ें तलाश क्यो करता कफरता ूिं ।
बच्चा

जाओिं, तम्
ु ारे

रो-रो कर
स्वामीजी

लकान
घबरा

ो र ा

र े

ै । सब औरतें क ने लगीिं , चली

ोंगे। स्वयिंसेवक ने उससे दो-चार बातें

पूछ कर मुझे उसके साथ कर हदया। मुझे क्या मालूम था कक
वपशाच के
दशगन

जानते

मैं

ककसी नर-

ाथों पडी जाती ूिं । हदल मैं खुशी थी ककअब बासू को दे खूिंगी तुम् ारे

करूिंगी। शायद इसी उत्सुकता ने मुझे असाविान कर हदया।

परशुराम—तो तुम उस आदमी के साथ चल दी? व

कौन था?

मयागदा—क्या बतलाऊिं कौन था? मैं तो समझती ूिं , कोई दलाल था?
परशुराम—तुम् े य
मयागदा—अहदन आते

न सूझी कक उससे क तीिं, जा कर बाबू जी को भेज दो?
ैं तो बुवद्ध भ्रष्ट

परशुराम—कोई आ र ा

ो जाती

ै।

ै।

मयागदा—मैं गुसलखाने में नछपी जाती ूिं ।
परशुराम –आओ भाभी, क्या अभी सोयी न ीिं, दस तो बज गए

ोंगे।

भाभी—वासद
ु े व को दे खने को जी चा ता था भैया, क्या सो गया?
परशुराम— ािं, व

तो अभी रोते-रोते सो गया।

भाभी—कुछ मयागदा का पता ममला? अब पता ममले तो भी तम्
ु ारे ककस काम
की।

घर

से ननकली ज्स्त्रयािं थान से छूटी ु ई घोडी

ैं। ज्जसका कुछ भरोसा

न ीिं।
परशुराम—क ािं से क ािं लेकर मैं उसे न ाने लगा।
भाभी— ोन ार

ैं, भैया

मयागदा—(बा र आकर)

ोन ार। अच्छा, तो मै जाती ूिं ।
ोन ार न ीिं ूिं , तुम् ारी चाल

के ब ाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चा ती
परशुराम –बको मत! व
मयागदा—स्वामी, य

ै । वासद
ु े व को प्यार करने
ो।

दलाल तम्
ु ें क ािं ले गया।

न पूनछए, मुझे क ते लजज आती

ै।

परशुराम—य ािं आते तो और भी लजज आनी चाह ए थी।
मयागदा—मै परमात्मा को साक्षी दे ती ूिं , कक मैंने उसे अपना
न ीिं

अिंग

भी

स्पशग

करने हदया।

पराशुराम—उसका ु मलया बयान कर सकती

ो।

मयागदा—सािंवला सा छोटे डील डौल काआदमी था।नीचा कुरता प ने ु ए था।
परशुराम—गले में ताबीज भी थी?
मयागदा— ािं,थी तो।
परशुराम—व
थी।

व

िमगशाले का मे तर था।मैने उसे तुम् ारे गुम

उस दष्ु ट ने उसका व

स्वािंग रचा।

ो जाने की चचाग की

मयागदा—मझ
ु े तो व

कोई ब्रह्मण मालम
ू

परशुराम—न ीिं मे तर था। व

ोता था।

तुम् ें अपने घर ले गया?

मयागदा— ािं, उसने मुझे तािंगे पर बैठाया और एक तिंग गली में , एक छोटे - से
मकान के
अब मुझे

अन्दर ले जाकर बोला, तुम य ीिं बैठो, मुम् ारें बाबूजी य ीिं आयेंगे।
ववहदत

ुआ

कक

मुझे िोखा हदया गया। रोने लगी। व

थोडी दे र बाद चला गया और एक बुहढया

आ

कर

आदमी

मुझे भािंनत-भािंनत के

प्रलोभन दे ने लगी। सारी रात रो-रोकर काटी दस
ू रे हदन दोनों कफर मझ
ु े समझाने
लगे

कक रो-रो कर जान दे दोगी, मगर य ािं कोई तम्
ु ारी मदद को न आयेगा।

तुम् ाराएक घर

डूट

गया।

म तुम् े उससे क ीिं अच्छा घर दें गें ज ािं तुम सोने

के कौर खाओगी और सोने से लद
ककसी तर

जाओगी।

लब

मैने दे खा ककक य ािं से

न ीिं ननकल सकती तो मैने कौशल करने का ननश्चय ककया।

परशुराम—खैर, सुन चुका। मैं तुम् ारा

ी क ना मान लेता ूिं कक तुमने अपने

सतीत्व की रक्षा की, पर मेरा हृदय तुमसे घण
ृ ा करता
न ीिं ननकल सकती जो प ले थीिं।
मयागदा—स्वामी जी, य
प ले

अन्याय न

थी। सोधचए मेरी दशा क्या

परशुराम—मै य

ै , तुम मेरे मलए कफर व

इस घर में तुम् ारे मलए स्थान न ीिं
कीज्जए, मैं आपकी व ी

स्त्री

ूिं

ै।
जो

ोगी?

सब सोच चक
ु ा और ननश्चय कर चक
ु ा। आज छ: हदन से य

सोच र ा

ूिं ।

तुम जानती

मैंने प ले

ी

नतलािंजली

ो कक मुझे समाज का भय न ीिं। छूत-ववचार को
दे

दी, दे वी-दे वताओिं को प ले

ज्जस स्त्री पर दस
ू री ननगा ें पड चुकी, जो

एक

सप्ता

तक न-जाने क ािं और

ककस दशा में र ी, उसे अिंगीकार करना मेरे मलए असम्भव
ै तो ईश्वर की ओर से

ी ववदा कर चुका:पर

ै , मेरा दोष न ीिं।

मयागदा—मेरी वववशमा पर आपको जरा भी दया न ीिं आती?

ै।

अगर

अन्याय

परशुराम—ज ािं घण
ृ ा
को

ै , व ािं दया क ािं? मै अब भी तुम् ारा भरण-पोषण

तैयार ूिं ।जब तक जीऊगािं, तुम् ें अन्न-वस्त्र का कष्ट न

स्त्री न ीिं

करने

ोगा पर तुम मेरी

ो सकतीिं।

मयागदा—मैं अपने पुत्र का मु

न दे खूिं अगर ककसी ने स्पशग भी ककया

ो।

परशुराम—तम्
ु ारा ककसी अन्य परू
ु ष के साथ क्षण-भर भी एकान्त में र ना
तुम् ारे पनतव्रत को नष्ट करने के मलए ब ु त

ै। य

ववधचत्र बिंिन

ै , र े तो

जन्म-जन्मान्तर तक र े : टूटे तो क्षण-भर में टूट जाए। तुम् ीिं बताओिं, ककसी
मुसलमान ने जबरदस्ती मुझे अपना उज्च्छट भोलन खखला हदया

ोता तो मुझे

स्वीकार करतीिं?
मयागदा—व .... व .. तो दस
ू री बात
परशुराम—न ीिं, एक
से

ी बात

ै।

ै । ज ािं भावों का सिंबिंि

काम न ीिं चलता। य ािं तक अगर कोई क

ने छू ननया

ै

तब

भी

ै , व ािं तकग और

दे कक तुम् ारें पानी को मे तर

उसे ग्र ण करने से तुम् ें घण
ृ ा आयेगी। अपने

हदन से सोचो कक तुम् ारें साथ

न्याय

कर

र ा

ूिं

ननकाल सकती थी। मुझे इसमलए न दत्ु कार र े

ो और कक मैं इसका
परशुराम—य

बात न ीिं

पालन करता ूिं ।
ै । मै इतना नीच न ीिं ूिं ।

मयागदा—तो तम्
ु ारा य ीिं अनतमिं ननश्चय
परशुराम— ािं, अिंनतम।

ै?

ी

या अन्याय।

मयागदा—मै तुम् ारी छुई चीजें न खाती, तुमसे पथ
ृ क र ती पर तुम् ें घर
न

न्याय

से

तो

ो कक तुम घर के स्वामी

मयागदा-- जानते

ो इसका पररणाम क्या

ोगा?

परशुराम—जानता भी ूिं और न ीिं भी जानता।
मयागदा—मुझे वासुदेव ले जाने दोगे?
परशुराम—वासद
ु े व मेरा पत्र
ु

ै।

मयागदा—उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे?
परशुराम—अपनी इच्छा से न ीिं, तुम् ारी इच्छा

ो तो दरू से दे ख सकती

ो।

मयागदा—तो जाने दो, न दे खिंग
ू ी। समझ लिंग
ू ी कक वविवा ूिं और बािंझ भी। चलो
मन, अब
***

इस घर में तम्
ु ारा ननबा

न ीिं

ै । चलो ज ािं भाग्य ले जाय।

नैराश्य लीला
पिंडडत हृदयनाथ अयोध्या के एक सम्माननत पुरूष थे। िनवान तो न ीिं लेककन
खाने वपने से खुश
इिर ककराये

थे।

कई मकान थे, उन् ी के ककराये पर गुजर

बढ गये थे, उन् ोंने

अपनी

ोता था।

सवारी भी रख ली थी। ब ु त ववचार

शील आदमी थे, अच्छी मशक्षा पायी थी। सिंसार का

काफी तरजरु बा था, पर

कक्रयात्मक शककत ् से व्रधचत थे, सब कुछ न जानते थे। समाज उनकी आिंखों में
एक

भयिंकर

भूत था ज्जससे सदै व डरना चाह ए। उसे जरा भी रूष्ट ककया तो

कफर

जाने की खैर न ीिं। उनकी

स्त्री जागेश्वरी उनका प्रनतबबम्ब, पनत के

ववचार उसके ववचार और पनत की इच्छा
कभी मतभेद न

उसकी

इच्छा

ोता था। जागेश्चरी खखव की उपासक थी। हृदयनाथ

थे, दोनो िमगननष्ट थे। उससे क ीिं अधिक , ज्जतने
ुआ

करते

ै।

थी, दोनों प्राखणयों में

इसका कदाधचत ् य

और कोई सनतान न थी। उनका

समान्यत:

मशक्षक्षत

वववा

तेर वें वषग में

के नाम अपना सब-कुछ मलख मलखाकर ननज्श्चत

ु आ था, व
कक

उसका

अभी तक य
सो ाग

लोग

कारण था कक एक कन्या के मसवा उनके
ो गया था और माता-

वपता की अब य ी लालसा थी कक भगवान इसे पुत्रवती करें तो

ककन्तु वविाता को कुछ और

वैष्णव

म लोग नवासे

ो जायें।

ी मन्जूर था। कैलाश कुमारी का अभी गौना भी न

भी न जानने पायी थी कक वववा

का आश्य क्या

ै

उठ गया। वैिव्य ने उसके जीवन की अमभलाषाओिं का

दीपक बुझा हदया।
माता और वपता ववलाप कर र े थे, घर में कु राम मचा ु आ था, पर
कैलाशकुमारी भौंचक्की
में य

ो- ो कर सबके मुिं

न आता था कक ये

मािं-बाप के अनतररक्त व

लोग

की ओर ताकती थी। उसकी समझ

रोते क्यों

ककसी तीसरे व्यज्क्त

ैं। मािं बाप की इकलौती बेटी थी।
को

उपने मलए आवश्यक न

समझती थी। उसकी सख
ु कल्पनाओिं में अभी तक पनत का प्रवेश न ु आ था।
व

समझती थी, स्त्रीयािं पनत के मरने पर इसमलए राती

ै कक व

उनका और

बच्चों का पालन करता
क्या धचन्ता

ै।

मेरे घर में ककस बात

ै कक खायेंगे क्या, प नेगें क्या? मढ
ु रे

की कमी

ज्जस चीज की जरूरत

बाबूजी तुरन्त ला दें गे, अम्मा से जो चीज मागूिंगी व
क्यों?व
प्रेम

।

कभी सोचती, शायद य

कसी चीज न मािंग बैठूिं ज्जसे व

लोग इसमलए रोते

दे न

एक चीज ननत्य लाते र ते
ाल

आप

ैं ? क्या मैं अब कुछ और

था कक बेटी की सूरत दे खते

बाप की दशा और भी
पर

दें गी।

करूणाजनक

कफर

न ीिं, मािं

ोगी

रोऊिं
के

ैं कक क ीिं मैं कोई

सकें। तो मै कसी चीज मािंगूगी

क्यो? मै अब भी तो उन से कुछ न ीिं मािंगती, व
य ा

दे

अपनी मािं को रोते दे खती तो रोती, पती के शोक से

से

ै ? मझ
ु े इसकी

ी

मेरे

ी

मलए एक न

ो जाऊगीिं? इिर माता का

ी आिंखों से आिंसू की झडी लग जाती।

थी। घर में आना-जाना छोड हदया। मसर

ाथ िरे कमरे में अकेले उदास बैठे र ते। उसे ववशे ष द:ु ख

इस बात का था

कक स े मलयािं भी अब उसके साथ खेलने न आती। उसने उनके घर लाने की
माता

से

आज्ञा मािंगी तो फूट-फूट कर रोने लगीिं माता-वपता की य

तो उसने उनके

सामने

जाना

छोड हदया, बैठी ककस्से क ाननयािं पढा करती।

उसकी एकािंतवप्रयता का मािं-बाप ने कुछ
के मारे घुली जाती

और

ी

ै।

ै घर छोड कर क ीिं भाग

इसका कष्ट अब न ीिं दे खा जाता।

जागेश्वरी—मेरी तो भगवान से य ी प्राथनाग
तक

अथग समझा। लडकी शोक

ै, इस वज्राघात ने उसके हृदय को टुकडे-टुकडे कर डाला

एक हदन हृदयनाथ ने जागेश्वरी से क ा—जी चा ता
जाऊिं।

दशा दे खी

ै कक मझ
ु े सिंसार से उठा लें। क ािं

छाती पर पत्थर कीस मसल रखूिं।

हृदयनाथ—ककसी भानतिं इसका मन ब लाना चाह ए, ज्जसमें शोकमय ववचार आने
ी

न

दारूण

पायें।
ो जाता

म लोंगों को द:ु खी और रोते दे ख कर उसका द:ु ख और भी
ै।

जागेश्वरी—मेरी तो बुवद्ध कुछ काम न ीिं करती।

हृदयनाथ— म लोग यों

ी मातम करते र े तो लडिंकी की जान पर बन जायेगी।

अब कभी कभी धथएटर हदखा हदया, कभी घर में गाना-बजाना करा हदया। इन
बातों

से

उसका

हदल

ब लता र े गा।

जागेशवरी—मै तो उसे दे खते
ववचार

ब ु त अच्छा

ी रो पडती ूिं । लेककन अब जब्त करूिंगी

ै । ववना हदल ब लाव के उसका शोक न दरू

तम्
ु ारा

ोगा।

हृदयनाथ—मैं भी अब उससे हदल ब लाने वाली बातें ककया करूगािं। कल एक
सैरबीिं लाऊगा, अच्छे -अच्छे दृश्य जमा करूगािं। ग्रामोफोन तो अज
दे ता ूिं । बस उसे

र वक्त

ककसी

न

ी मगवाये

ककसी कात में लगाये र ना चाह ए।

एकातिंवास शोक-जवाला के मलए समीर के समान

ै।

उस हदन से जागेश्वरी ने कैलाश कुमारी के मलए ववनोद और प्रमोद के
लमा

समान

करने शरू ककये। कैलासी मािं के पास आती तो उसकी आिंखों में आसू की

बूिंदे न दे खती, ोठों पर

िं सी

की

आभा हदखाई दे ती। व

–बेटी, आज धथएटर में ब ु त अच्छा तमाशा

ोने वाला

मुस्करा कर क ती

ै , चलो दे ख आयें। कभी

गिंगा-स्नान की ठ रती, व ािं मािं-बेटी ककश्ती पर बैठकर नदी में जल वव ार
करतीिं, कभी दोनों सिंध्या-समय पाकै की ओर चली जातीिं। िीरे -िीरे स े मलयािं भी
आने लगीिं।

कभी

पज्ण्डत हृदय नाथ
ी मग्न

सब

की सब बैठकर ताश खेलतीिं। कभी गाती-बजातीिं।

ने

भी

ववनोद

की

सामधग्रयािं जुटायीिं। कैलासी को दे खते

ोकर बोलते—बेटी आओ, तुम् ें आज काश्मीर के दृश्य हदखाऊिं:

कभी

ग्रामोफोन बजाकर उसे सुनाते। कैलासी इन सैर-सपाटों का खूब आन्नद उठाती।
अतने

सुख

से

उसके हदन कभी न गुजरे थे।

2
इस भािंनत दो वषग बीत गये। कैलासी सैर-तमाशे की इतनी आहद
हदन भी धथएटर
दास

न जाती तो बेकल-ससी

ै और समानता का

शत्रु।

ो गयी कक एक

ोने लगती। मनोरिं जन नवीननता का

धथएटरों के बाद मसनेमा की सनक सवार ु ई।

मसनेमा के बाद ममस्मेररजम और

ह पनोहटजम

के

तमाशों

की सनक सवार

ु ई। मसनेमा के बाद ममस्मेररजम और ह प्नोहटजम के तमाशों
के

मािं-बेटी

तो कुछ गुनगुनती

अवश्स्य जातीिं। कैलासी ननत्य इसी नशे में डूबी र ती, चलती
ु ई, ककसी

से

बाते करती तो व ी धथएटर की और मसनेमा

की। भौनतक सिंसार से अब कोई वास्ता न था, अब
सिंसार में था। दस
ू रे लोक की ननवामसन

उसका ननवास कल्पना

ोकर उसे प्राखणयों से

कोई

के लोग मूखग ै , य

पर

मसनेमा

गवग करने लगी। स े मलयों से

की

के लोग करते ै । व ािं मनोरिं जन
ज्जतनी
हदया

कद्र
की

क्या

डीिंगे मारती, य ािं

करे गें। इसकी कद्र तो पज्श्चम

सामाधग्रयािं

उतनी

ी

आवश्यक

ै

वा। जभी तो वे उतने प्रसनन-धचत्त र ते ै , मानो ककसी बात की धचिंता

ी न ीिं।
ै व

य ााँ ककसी को इसका रस
भी सरिं शाम से मु

ी न ीिं। ज्जन् ें भगवान

ढािंक कर पडे र मे

गवग-पूणग बातें सुनतीिं और उसकी और भी

अपमान करने के आवेश में आप

ने सामर्थयग भी

ैं। स े मलयािं कैलासी की

प्रशिंसा

करतीिं। व

ी

ास्यास्पद बन जाती थी।

पडोमसयों में इन सैर-सपाटों की चचाग

ोने लगी। लोक-सम्मनत

ररआयत
पूजा-