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Lokpriya Shayar Aur Unki Shayari: Firaq Gorakhpuri (Hindi)

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साल:
2014
प्रकाशन:
Rajpal & Sons
भाषा:
hindi
ISBN:
B01M8PCM1K
फ़ाइल:
PDF, 2.07 MB
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1 comment
 
Ashutosh63amt
Shukriya aap logo ka ❤️❤️
07 October 2021 (13:17) 

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MAHAN CHANAKYA KI JEEVAN GATHA (Hindi)

Year:
2013
Language:
hindi
File:
PDF, 742 KB
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MUJHE BANANAA HAI UPSC TOPPER (Hindi Edition)

Language:
hindi
File:
PDF, 4.14 MB
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फ़राक़ गोरखपुरी

लोक य शायर और उनक शायरी

फ़राक़
गोरखपुरी

संपादक: काश पं डत
सह-संपादक: सुरेश स लल

फ़राक़ गोरखपुरी क ज़ दगी और उनक बेहतरीन
ग़ज़ल, न म, शे’र और बाइयाँ

ISBN: 978-93-5064-197-2
सं करण: 2014 © राजपाल ए ड स ज़
FIRAQ GORAKHPURI (Life-Sketch and Poetry)
Editor: Prakash Pandit, Associate Editor: Suresh Salil

राजपाल ए ड स ज़

1590, मदरसा रोड, क मीरी गेट- द ली-110006
फोनः 011-23869812, 23865483, फै सः 011-23867791
website: www.rajpalpublishing.com
e-mail: sales@rajpalpublishing.com

म
प रचय
ग़ज़ल
न म
आधी रात को
परछाइयाँ
कुछ ग़मे जाना, कुछ ग़म दौरां
शामे-अयादत
जुदाई
हडोला
दा ताने-आदम
एक न म
बाइयाँ
शे’र और क़त्ए

यूं ही ‘ फ़राक़’ ने उ बसर क
कुछ ग़मे-जानां, कुछ ग़मे दौरां

प रचय
यह 1948 का ज़ है। उ के एक नौजवान शायर ने ‘ फ़राक़’ गोरखपुरी के बारे म मुझे
एक घटना सुनाते ए कहा, ‘म इलाहाबाद म ‘ फ़राक़’ साहब का मेहमान था। उन दन
जब क ह द के दो तनुमा मन उ को वदे शी भाषा कहकर इसे दे श- नकाला दे ने के
प म थे, वहाँ क एक थानीय सं था ने एक क व-स मेलन का आयोजन कया।
‘ फ़राक़’ साहब को उसका सभाप त बनना था और मेरी शाम ख़ाली थी। ‘ फ़राक़’
साहब मुझे भी अपने साथ वहाँ ले गए और मेरे इ कार के बावजूद उ ह ने ोता से मेरा
प रचय करा दया और मुझसे कोई न म सुनाने को कहा।
‘क व-स मेलन ह द का था और म उ का शायर—इस पर बन-बुलाया मेहमान!
ब धक को ‘ फ़राक़’ साहब क यह ‘हरकत’ पस द न आई और म ी महोदय तो
अपना मान सक स तुलन ही खो बैठे, जब उप थत स जन ने मुझसे ताबड़तोड़ कई
न म सुन और मेरे बाद के पढ़ने वाले क व को ‘ ट’ कर दया।
‘म ी महोदय अब तक जैस-े तैसे चुप बैठे थे। यह माजरा दे खते ही उनक आँख म
ख़ून उतर आया और उ ह ने लोग पर फटकार भेजनी शु कर द क कतने नल ज,
न दनीय और दे श ोही ह आप लोग, जो उ के एक शायर के कलाम पर तो वाह-वाह
करते ह और ह द के सेवक क क वता पर सी टयाँ बजाते ह— ह द , जो रा भाषा होने
जा रही है… ह द , जो…’
“ फर या आ?” मने अपने शायर दो त से पूछा, “लोग को अपनी नल जता
और दे श ोह का एहसास आ या नह ?”
“सो तो मालूम नह , हाँ ‘ फ़राक़’ साहब ने तुर त म ी महोदय के हाथ से
माइ ोफ़ोन झपट लया और यह कहकर टे ज से उतर गए क म इस क व-स मेलन के
सभाप त व को अपनी शान के ख़लाफ़ समझता ँ जसका एक ज़ मेदार सद य
फुसफुसी और बेतुक क वता को रा भाषा के नाम पर महान क वता मनवाना चाहता है।
आपने न केवल मेरा अपमान;  कया है, न केवल मेरे मेहमान का अपमान कया है, ब क
रा भाषा का भी अपमान कया है।”

यह घटना सुनकर ‘ फ़राक़’ साहब के
व के स ब ध म मेरी जानकारी म तो
वृ
ई, ले कन कोई वशेष आ य मुझे इस घटना से नह आ। ‘ फ़राक़’ साहब के
वभाव से म अ छ तरह प र चत ँ। उनक ायः सभी रचनाएँ मेरी नज़र से गुज़र चुक
ह। उन पर लगाए गए तरह-तरह के सा ह य-स ब धी आरोप और ‘ फ़राक़’ साहब क
ओर से दए गए उनके उ र का भी मने अ ययन कया है और उनसे वयं मलने का भी
मुझे कई बार सौभा य ा त हो चुका है। इन कारण से नम-ओ-नाजक शे’र कहने और
‘शायरे-जमाल’ (सौ दय का शायर) कहलाने वाले इस शायर के बारे म यह कहते ए
क चत् स ता ही होती है क ‘ फ़राक़’ साहब मुँहफट होने क हद तक प वाद और
‘क़लमफट’ होने क हद तक सा ह यक यो ा ह। अं ेज़ी, फ़ारसी, सं कृत, ह द , उ
आ द कई भाषा के गहरे अ ययन के आधार पर ‘ फ़राक़’ साहब को जब भी कसी
‘सा ह यक अनाजव’ का अनुभव होता है, तुर त उनक ज़बान या क़लाम ग तशील हो
उठती है। पा क तान म जब इ लामी और हानी (आ या मक) सा ह य का नारा बुल द
आ, तो मा सक प का ‘नुक़ूश’ (लाहौर) जसम इस कार के लेख का शत ए थे,
के स पादक को एक प म उ ह ने लखा—
“…रही बात भौ तकता या आ या मकता क । न यानवे तशत सा ह यक और
असा ह यक काम म यह झगड़ा उठता ही नह । जब जंगल म आग लगती है तो वे
सम त ज तु, जो एक- सरे को खा जाते ह, चुपचाप एक थान पर खड़े हो जाते ह।
आज इसक ब कुल आव यकता नह है क जो सा ह यकार भौ तकवाद के समथक ह
उनका एक धड़ा हो, जो अ या मवाद के प पाती ह उनका सरा। भूख, बेकारी,
बेरोज़गारी, चोरबाज़ारी, र त, जीवन के हर वभाग क अ व था, सा ाजी श य के
षड् य और वनाशा मक य न हज़ार म से नौ सौ न यानवे
य क द र ता
पा क तान, ह तान, ए शया, अ क़ा और यूरोप के भी कई दे श का जीवन नरक
बनाए ए ह। फर तीसरे महायु का ख़तरा मुसलमान के ही नह , संसार-भर के जीवन
और मृ यु का
बन गया है। इस समय नमकहलाल सा ह यकार के स मुख इ लामी
और ग़ैर-इ लामी, ‘आ तक’ और ‘ना तक’ सा ह य के
नह ह, ब क एक ही
कार क मुसीबत म गर तार मु लम और ग़ैर-मु लम नया को एक ही उ े य के
सा ह य क आव यकता है—अथात्, इन व
ापी सम या का ववेक पैदा करना,
सामू हक संघष और संग ठत आ दोलन के मह व का बोध पैदा करना और अपने दे श,
ए शया, अ क़ा और यूरोप के जन-आ दोलन का साथ दे ने क त परता पैदा करना
और इन या मक ताव को उ म सा ह यक रचना
ारा आगे बढ़ाना। वतमान
का बोध और वतमान म जस उ वल भ व य क स भावनाएँ संसार-भर के लए
न हत ह, उन स भावना का बोध। यही वह सा यवाद स यता (Socialist Realism)
है जसके सहारे सा ह य-रचना होगी। यह स यता न इ लामी है, न ईसाई है, न ह है,
ब क सा यवाद स यता है…”
(अनुवाद)
और जब ‘ फ़राक़’ साहब ने महसूस कया क सा यवाद म व ास रखने वाले
ग तशील सा ह यकार ( जनम से एक होने का वयं ‘ फ़राक़’ साहब को गौरव ा त है)

संक णता के शकार हो गए ह और ाचीन सा ह य क ओर वशेष यान नह दे त,े तो
उ ह ने इस वृ क बड़े कड़े श द म न दा क :
“याद रहे क सा ह य और सं कृ त ा तय के बावजूद अगर अपने सल सल और
ोत से वमुख हो गए, तो स त घाटे म रहगे। संसार क सबसे ाचीन पु तक ‘ऋ वेद’
से लेकर टै नीसन, वनबन, टा टाय, टै गोर, ग़ा लब और इक़बाल तक के सा ह य म
सर को भा वत करने के जो ढं ग और कला मक चम कार हम मलते ह, य द हमने
उ ह ा त नह कया तो केवल ग तशील उ े य हम से महान सा ह य क रचना नह
करवा सकते…हम ाचीन सा ह य क आ मा को अपने अ दर समोना है। यह ाचीन
सा ह य के अ ययन मा से स भव नह , ब क उसके ाण तक प ँचने क ज़ रत है।
य द हम ाचीन सा ह य के त व का भेद न पा सके तो हमारा सा ह य ग तशील होते
ए भी एक कट पतंग के समान होगा।”
सा ह य के स ब ध म ही नह , वे अपने
गत जीवन म भी काफ़ ‘दबंग’ ह।
सामा जक प से कोई कतना ही बड़ा
य न हो, वे उसक कसी मामूली-सी
अनु चत बात को भी सहन नह कर सकते। रा य के कसी वभाग क ओर से कसी
अद ब या शायर क नयु के सल सले म जब उ ह बतौर सलाहकार बुलाया जाता है
(उ ‘आजकल’ के भूतपूव स पादक ‘जोश’ मलीहाबाद और उपस पादक क नयु
के लए भी ‘ फ़राक़’ साहब को बुलाया गया था), तो केवल उसी शायर या अद ब क
नयु
हो पाती है ‘ फ़राक़’ जसके प म ह । नयु -म डल का कोई सद य भी
‘ फ़राक़’ साहब के फ़ैसले क अवहेलना नह कर सकता। य द भूले से कोई
आ ेप कर बैठे तो ‘ फ़राक़’ कदा प यह कहने से नह चूकगे क “म ासी या बंगाली या
गुजराती होते ए आपको कसी उ अद ब के बारे म कोई राय दे ने क कैसे जुरत ई?”
या “हद है साहब! अगर आपको ही यह फ़ैसला करना था तो मुझे आपने य तकलीफ़
द ?” इस स ब ध म उनम ब त ही कम सहनशीलता थी और वे अपने या पराए कसी
को नह ब शते थे।
एक बार ब बई क एक ‘मह फ़ल म, जसम सरदार जाफ़री, जाँ नसार ‘अ तर’,
‘सा हर’ लु धयानवी, ‘कैफ़ ’ आज़मी इ या द कई ग तशील शायर मौजूद थे, ‘ फ़राक़’
साहब ने बड़े गौरव से एक शे’र पढ़ा:
मौत इक गीत रात गाती थी
ज़ दगी झूम-झूम जाती थी
सरदार जाफ़री ने यह समझकर क ‘ फ़राक़’ साहब ने ज़ दगी पर मौत को धानता
द है, ऊँची ज़बान से ललकारा, “‘ फ़राक़’ साहब! गु ताख़ी मुआफ़ हो, हम आप शे’र
सुनाइए, बकवास मत क जए।”
‘ फ़राक़’ साहब भला इस गु ताख़ी को कैसे मुआफ़ कर सकते थे, तुर त भड़ककर
बोले, “म तो शे’र ही सुना रहा ँ, बकवास तो आप कर रहे ह।”
और इसके बाद उप थत स जन ने ‘ फ़राक़’ साहब क ज़बान से ज़ दगी और
मौत क फ़लासफ़ क ऐसी-ऐसी बात सुन क य द वयं ज़ दगी और मौत साकार
होत , तो इन बात से पनाह माँगने लगत ।

बात करने का भी ‘ फ़राक़’ साहब को उ माद क हद तक शौक़ है। जीवन-दशन से
लेकर वे मढक क व भ जा तय तक के बारे म बे-थकान बोल सकते ह ब क ढूँ ढढूँ ढकर बोलने के अवसर नकालते ह। हैदराबाद म एक मह वपूण उ -का स थी।
का स के चौथे दन क एक बैठक म ‘ फ़राक़’ साहब को अ भभाषण दे ना था।
का स के ब धक तो ख़ैर पहले से उ ह सूचना दे चुके थे क भाषण पहले से का शत
कया जाएगा, का स म भाग लेने वाले शायर -अद ब ने भी उनसे ब त आ ह कया
क वे शी ा तशी भाषण लख ल। इस उ े य के लए, यानी उनसे भाषण लखवाने के
लए, दो
मुक़रर कए गए जो जब मौक़ा मलता, काग़ज़-क़लम लेकर बैठ जाते
क लखवाइए। ‘ फ़राक़’ साहब एक-आध वा य लखवाने के बाद ही उ ह इस कार
बात म उलझा लेते क वे वयं भाषण क बात भूल जाते। चौथा दन आ प ँचा और
भाषण क केवल चार पं याँ पूण । लोग ने ‘ फ़राक़’ साहब को क़लम-काग़ज़ दे कर
ज़बद ती एक कमरे म ब द कर दया ता क दोपहर तक, जैसे भी हो, वे भाषण पूरा कर
ल। दोपहर के अ धवेशन के समय जब वालं टयर उ ह लवाने उनके नवास- थान पर
प ँचे तो ‘ फ़राक़’ साहब को मकान के कसी कमरे म भी न पाकर ब त चकराए।
नराश होकर लौट रहे थे क रसोईघर से बात करने क आवाज़ आई। झाँककर दे खा तो
‘ फ़राक़’ साहब बगन हाथ म लए बगन के भुरते के बारे म बावच से बात कर रहे थे।
यही नह , काग़ज़ का पुलंदा लेकर जब वे जलसे म अपना अ भभाषण पढ़ने लगे तो
केवल चार पं याँ पढ़कर ही उ ह ने पुलंदा एक तरफ़ रख दया और माइ ोफोन
थामकर बोले, “ लखे ए अ भभाषण क या ज़ रत है? बड़ी मु त के बाद हैदराबाद
आने का मौक़ा मला है। दो त से दो बात ही कर ल!”
और अ भभाषण के नाम पर वे नर तर दो घ ट तक बात करते रहे और मेज़ पर
पड़ा कोरे काग़ज़ का पुलंदा ब धक का मुँह चढ़ाता रहा।
बात के र सया रघुप तसहाय ‘ फ़राक़’ गोरखपुर के रहने वाले थे। वह 1896 ई. म
आपका ज म आ था और वह आपने ार भक श ा ा त क । पता मुंशी
गोरख साद ‘इबरत’ उस समय के स वक ल और शायर थे। इस कार शायरी
‘ फ़राक़’ गोरखपुरी को घु 1 म ही मली। ले कन का अ भ च उन दन नखरी, जब
उ च श ा के लए आप इलाहाबाद आए और यहाँ आपको ोफ़ेसर ‘नासरी’ जैसे
सा ह यक का स पक ा त आ। वैसे जब आप चौदह-प ह बरस के थे तो आपके
चाचा मुंशी ह रखलाल से आपको अपने पता क न म , ग़ज़ल क एक पांडु ल प मल
गई। यह पांडु ल प एक मु त तक मेरा ओढ़ना- बछौना रही। ग़ज़ क घर-भर म बजाय
शे’र-ओ-शायरी के चच और बचपन ही से बजाय शे’र-ओ-शायरी के चसके के मेरा ज़ौक़
तनहाई म पलता रहा और शे’र-ओ-न मे क कसक, जो मेरे दल म पैदा ई थी, उसम म
न कसी को अपना शरीक (भागीदार) बना सकता था और न ख़ुद शे’र कहकर इस
कसक को ह का कर सकता था।” ोफ़ेसर ‘नासरी’ ने न केवल आपक ग़ज़ल का
संशोधन कया, ब क उ शायरी के नयम पर नयमपूवक ले चर भी दए, और इस
कार आपके दल क दबी ई वाला को व लत कर दया।
शु ही से आपक बु ऐसी ती थी क आप येक क ा म उ म सफलता ा त
करते रहे। योर से ल कालेज, इलाहाबाद से इस शान से बी. ए. पास कया क सरकार

ने तुर त ड ट कल टरी के लए चुन लया। पर तु ड ट कल टर बनने के बजाए आप
कां ेस-आ दोलन म भाग लेने लगे और य सर को जेल भेजने के बजाय वयं जेल
चले गए। त प ात् कई वष तक जब प डत जवाहरलाल नेह कां ेस के जनरलसे े टरी रहे तो आप कां ेस के अ डर-से े टरी रहे।
जेल म गए तो वहाँ भी शे’र-ओ-शायरी का सल सला जारी रहा; ब क जेलख़ाना
एक कार से उनके लए शे’र-ओ-शायरी क पाठशाला बन गया। यहाँ न केवल
स ह त शायर से आपक भट ई, ब क बड़े-बड़े सा ह य- े मय से भी बराबर
मुलाक़ात होती रह । मौलाना मुह मद अली, मौलाना ‘हसरत’ मोहानी और मौलाना
अबुल कलाम ‘आज़ाद’ क त दन क संग त ने सोने पर सुहागे का काम कया, अतः
अपने एक शे’र म आप कहते ह:
अहले- ज़ दाँ 2 क ये मज लस है सबूत इसका ‘ फ़राक़’
क बखर कर भी ये शीराज़ा3 परेशां न आ4
1927 म जब आप जेल से छू टे , तो
यन कालेज, लखनऊ म नौकर हो गए और
फर सनातन धम कालेज, कानपुर म उ पढ़ाने के लए बुला लए गए। इस बीच आपने
एम.ए. पास कर लया और इलाहाबाद व व ालय म अं ेज़ी के ोफ़ेसर नयु हो
गए।
‘ फ़राक़’ साहब ने अन गनत क वताएँ, ग़ज़ल, बाइयाँ, क़त्ए इ या द लखे ह।
समालोचक भी वे उ च को ट के ह ले कन मरण वे सदा अपनी ग़ज़ल ब क ग़ज़ल के
उन शे’र के कारण कए जाएँगे जनक सं या सैकड़ तक प ँचती है और जो न स दे ह
ला सक का दजा रखते ह। और उ ह ‘शे’र के कारण, जनम उ क ाचीन इ क़या
शायरी के वपरीत इ क़ क उद्भावना एक जी वत और ग तशील श
के प म
मलती है, कुछ लोग उ ह ‘आधु नक उ -सा ह य का सबसे बड़ा ग़ज़ल-गो शायर’ मानते
ह और इसम कोई स दे ह भी नह है क आपके यहाँ श द क जो सु दर पैठ, ह द और
उ के श द और पक का सु दर सम वय ( जससे आपक भाषा सरस और सरल हो
गई है) और ेम और सौ दय क मनोवै ा नक सू मताएँ जस सजीलेपन से व मान ह,
वे अ य उ शायर के यहाँ कुछ कम ही नज़र आती ह। भावकुता म च तन का त व
स म लत कर आप न केवल भावशीलता म वृ कर दे ते ह, ब क साथकता म भी
नखार आ जाता है।
‘ फ़राक़’ साहब क अ धकतर शायरी इ क़या शायरी है। ले कन इनक इ क़या
शायरी उ क अ धकांश इ क़या शायरी-जैसी नह है। अपनी इ क़या शायरी ारा
‘ फ़राक़’ ने ाचीन इ क़या शायरी को ेयसी, बेवफ़ा तवायफ़ (वे या) के कोठे से नीचे
उतारा है और आ शक़ को आठ पहर के रोने-धोने से मु
दलाई है। आपके
कथनानुसार, “इ क़या शायर के लए सफ़ आ शक़ होना और शायर होना काफ़ नह ।
सफ़ नेक और रक़ क़ल-क़ ब (कोमल दय) होना काफ़ है। सफ ज बाती (भावुक)
और सफ़ माक़ूल आदमी होना भी काफ़ नह । दा ख़ली और ख़ा रजी (आंत रक और
बा ) मुशाहदा (अवलोकन) भी काफ़ नह । इन गुण के अलावा पुरअज़मत (महान)
इ क़या शायरी के लए ज़ री है क शायर क दक़ (बोध और ान स ब धी)

जमा लयाती या व दानी (अ तः ेरणा स ब धी) और इ लाक़ (सदाचार-स ब धी)
दलच पयाँ वसीअ ( व तृत) ह । उसक श सयत (
व) एक वसीअ ज़ दगी
और वसीअ क चर क हा मल (वाहक) हो। उसका दल भी बड़ा हो और दमाग़ भी
बड़ा हो—यानी ऐसे दल और दमाग़ ज ह क चर ने रचाया-सजाया हो।”
महान इ क़या शायरी का यह भेद दे व-वाणी क तरह ‘ फ़राक़’ पर नह उतरा,
ब क यह अ छ और बुरी, सफल और असफल शायरी और दे श क ाचीन और
वतमान स यता और सं कृ त के तुलना मक अ ययन क दे न है। अपने क वता-सं ह
‘मशाल’ क भू मका म लखते ह क ‘बीसव सद क तीसरी दहाई ख़ म हो रही थी।
उस व त तक मेरी शायरी क उ कम-ओ-बेश दस बरस थी। उ के यादातर शायर तो
दस बरस क म क़ (अ यास) म ब त-कुछ कर गुज़रते ह और कह गुज़रते ह, ले कन
मेरी शायरी क र तार जतनी सु त थी, उतनी शायद ही कसी और उ शायर क
शायरी क रही हो। बात यह थी क शायरी करने क ब न बत उ शायरी ने जो हम
सरमाया दया है, उसक जाँच-पड़ताल म मुझे गहरी दलच पी थी। उस शायरी पर नज़र
डाली तो उसम ब त-कुछ ख़ू बयाँ नज़र आ , ले कन क मयाँ और ख़रा बयाँ भी ब त
मल ।”
इ ह क मय और ख़रा बय को खंगालते ए, जैसा क म ऊपर नवेदन कर चुका ँ,
‘ फ़राक़’ साहब इस नतीजे पर आ प ँचे क उ के अ धकतर शायर ने न-ओ-इ क़
क जो नया बसाई है उससे बाहर नया क उद्भावना स भव है, और महान शायरी
केवल
गत भावना के सु दर वणन का नाम नह , ब क उन भावना के सु दर
वणन का नाम है जो
गत होने पर भी सामू हक है सयत रखती ह । इस कार के
नए योग और उ और ह द के पगल आ द को साथ-साथ चलाने क को शश म
उनक कुछ कृ तयाँ ‘असर’ लखनवी जैसे शायरी के ाचीन कूल से स ब ध रखने वाले
शायर को अप र चत और बेतुक भी नज़र आ और उ ह ने ‘ फ़राक़’ साहब के शे’र
को काने, लूले और लंगड़े शे’र स करने के य न कए। ले कन इसको या कया जाए
क येक काल के महान क वय क रचना म उनके समकालीन कई कार क
ु टयाँ नकालते रहे ह। ‘मीर’ क ग़ज़ल म से कुछ शे’र छाँटकर उ ह लोलुप आ द स
करने का य न कया गया। ‘ग़ा लब’ के शे’र को अथहीन कहा गया और उन पर
फ़ारसी शायर के शे’र चुराने का आरोप लगाया। ‘इक़बाल’ को तो लखनवी शायर ने
यह कहकर शायर मानने से ही इ कार कर दया क वे भाषा और मुहावरे के सही
इ तेमाल से अन भ ह और अं ेज़ी-सा ह य म तो इसका सबसे बड़ा उदाहरण
‘शे स पयर’ ह जनके स ब ध म अब भी समालोचक का मत है क वे ाकरण
ब कुल नह जानते थे और अशु भाषा लखते थे। अतएव ‘ फ़राक़’ साहब जब कसी
मुशायरे म झूम-झूमकर अपने शे’र सुनाते थे और हर शे’र के बाद कुछ इस कार
खचकर ‘जी’ कहते थे मानो कह रहे ह …है कोई माई का लाल, जो इससे बेहतर शे’र
कह सके?—तो चुपचाप मान लेने को जी चाहता था क वे ग़लत नह कह रहे।
माई के इस लाल को उसके एक क वता-सं ह ‘गुले न मा’ पर पहले सा ह य
अकादमी क ओर से पाँच हज़ार पए का पुर कार मला और 1970 म भारतीय
ानपीठ क ओर से इसी क वता-सं ह पर एक लाख पए का पुर कार दया गया।

‘ फ़राक़’ साहब का एक लंबी बीमारी के बाद 3 माच 1982 को इलाहाबाद म दे हांत
हो गया।
— काश पं डत
_________________

1. हालाँ क ‘ फ़राक़’ साहब का कहना है क घु म नह मली—‘उ ’ शायर के तज़ करे (चचाएँ) यादातर कुछ
इस क़ म के बयानात से शु होते ह क शायरी का च का बचपन ही से था और दन-रात शे’र-ओ-शायरी के
चच रहते थे। मेरे बचपन के बारे म ऐसे बयानात यूँ तो थोड़े-ब त सच होते ए भी गुमराहकुन ह गे…अपने
वा लद के मुतअ लक़ यह सुनता ज़ र था क उस ज़माने क शायरी म उनके कारनाम क ख़ास अह मयत
(मह व) थी और उनक तसनीफ़-क़दा (र चत) मसनवी ‘ ने- फ़तरत’ मुस स ‘न ोनुमा-ए- ह द’ और ब तसी सरी न म ‘हाली’, ‘आज़ाद’ वग़ैरा उस व त के अद ब को मुतव जह कर चुक थ …अलब ा मेरे
फूफ ज़ाद भाई बाबू राज कशोर लाल ‘सहर’ तमाम कु बे म त हा आदमी थे जो मुझसे तो अठारह-बीस बरस
बड़े थे, ले कन जब म बारह-तेरह बरस का आ, तबसे मुझे ‘गुलज़ारे-नसीम’ के ब त-से टु कड़े सुनाया करते थे
और बाद को मेरे वा लद क न म (सहे कायनात क भू मका) का भी ज़ कया करते थे। फर ‘दाग़’ और
‘मीर’ के सैकड़ अशआर और अपने अशआर और हज़रत ‘ रयाज़’ (एक स शायर) क ज़ दगी के
वाक़यात और अशआर सुनाया करते थे। मेरा यह हाल था क दस (पा ) कताब म जो न म थ उनम मुझे
कोई क शश (आकषण) नह मलती थी। ले कन अगर कसी शे’र या न म का कोई टु कड़ा ऐसा हाथ आ जाता
था जसम बचपन के शऊर (बोध) के मुता बक़ मुझे रस, तर ुम और रंगीनी मले, तो ये चीज़ मेरे दल म
ख़ामोशी से उतर जाती थ और शऊर पर बार-बार मंडराती थ । म खेलते-खेलते उन न म म खो जाता था और
अ सर अपने सा थय और हमजो लय म उन मौक़ पर अपने-आपको त हा महसूस करता था।”

2. जेल- नवासी 3. सलाई, जो पु तक के पु े म क जाती है 4. बखरी नह ।

ग़ज़ल

1
या कह आए थे कस उ मीद से कस दल से हम
इक जनाज़ा बन के उठते ह तरी मह फ़ल से हम
र ता र ता मौत को न द आ गई हंगामे- ज़ब्ह1
सो गए अफ़साना-ए-बेदद -ए-क़ा तल से2 हम
अब मुह बत भी तरी सई-ए-तशफ़ 3 बन गई
वना यूँ मायूस होते थे ज़रा मु कल से हम
अपना पैमान-ए-वफ़ा फर याद कर ले एक बार
आज होते ह जुदा, ऐ दो त, तेरे दल से हम
ठ कर तुझसे ब त बेदद हम भी हो गए
एक ख़ंजर हो गए जब से खचे क़ा तल से हम
जा रहे ह चोट-सी दल पर लए, ऐ दो तो,
प ँचे थे इस मह फ़ले-मय म बड़ी मु कल से हम
जानलेवा, ऐ जुनूँ, गो ह ये सरगदा नयाँ4
यूँ बहक जाते ह ले कन ख़ुद रहे-मं ज़ल से हम
कने वालो, स ती-ए-मं ज़ल इसी का नाम है
चल नह पड़ते याले-स ती-ए-मं ज़ल से हम
नभ नह सकता कभी ऐस का बाहम इतबात5
फ़तरतन रखते हो नफ़रत हक़6 से तुम, बा तल7 से हम
आज कूचे म तरे, तुझको ख़बर है या नह
हो गए रोकर जुदा, ऐ दो त, अपने दल से हम

कट गई ऐ बहरे-ग़म8 मौज से हँसते-खेलते
बहते-बहते दे ख आ ख़र आ लगे सा हल से हम
न का ज़ोर-ओ-तुग़ाफुल9 का भी कसको ऐतबार
दल शक ता10 वरना होते थे ज़रा मु कल से हम
यूँ झझक उठते ह अंजामे-मुह बत से ‘ फ़राक़’
बा-ख़बर ह इसके हर आसान, हर मु कल से हम
_________________

(1919)

1. क़ ल होते व त 2. क़ा तल क बेदद क कहानी 3. तस ली क को शश 4. मु कल, परेशा नयाँ 5. मेल-मुलाक़ात
6. स य 7. झूठ, म या 8. ख का रेला 9. अ याय और अपे ा 10. भ न दय, टू टे दल वाले

2
कारगारे इ क़ म अब तक ग़मे- प हाँ1 न आ
म अभी बेख़बर-ए-कुलफ़त-ए- ह ाँ2 न आ
माने-ए-वहशत नवद 3 मुझे ज़दाँ4 न आ
दर-ओ-द वार से कुछ होश का सामाँ न आ
बाग़ म बाद-ए-सबा5 भेजने वाले हर सुबह
हम असीराने-क़फ़स6 पर कभी अहसाँ न आ
हमने दे खा है वो अ दाज़-ए-जुनूँ भी जो कभी
चाक दल, चाक जगर, चाक गरेबाँ न आ
रंग को हसरते-परवाज़7 अभी बाक़ है
आलमे- नकहते-बबाद8 गु ल ताँ न आ
दार9 से उठता है इक नारा-ए-म ताना हनोज़10
हाय वो दद जो श मदा-ए-दरमाँ11 न आ
ख़ू बयाँ तुझम ह, ऐ इ क़, ज़माने-भर क
ये तो कुछ दावा-ए-हमताई-ए-ख़ूबाँ12 न आ
ने-गुलज़ार से दल चाक आ जाता है
जोशे-गुल चारागर-ए-तंगी-ए-दामाँ13 न आ
सरहद जलवागहे-नाज़ से जसक न मल
वो तो इक खेल आ, चाक गरेबाँ न आ
कहती है व ल क शब वो नगहे- वाब अलूर14

ख़ म अभी क़ सा-ए-बेताबी-ए- ह ाँ न आ
आज तक सु हे-अज़ल15 से वही स ाटा है
इ क़ का घर कभी श मदा-ए-महमाँ16 न आ
ज़ दगी या वो तरे ग़म से जो दल तंग नह
या वो शीराज़ा-ए-ह ती17 जो परीशाँ न आ
अहले- ज़दाँ18 का ये मजमा है सबूत इसका ‘ फ़राक़’
क बखर कर भी ये शीराज़ा परीशाँ न आ
(1921)
_________________

* इस ग़ज़ल का ऐ तहा सक मह व है। ह द के महान प कार और वाधीनता सेनानी अमर शहीद गणेशशंकर
व ाथ ने अपनी लखनऊ जेल डायरी (1921-22) म, उसी दौरान आगरा जेल म ए एक मुशायरे का उ लेख
कया है। यह ग़ज़ल फ़राक़ साहब ने उस मुशायरे म पढ़ थी—संपादक
1. छपा आ ख 2. बछोह के दद से उदासीन 3. एका त क भटकन से इंकार करने वाला 4. जेलख़ाना, 5. सुबह
क हवा 6. पजड़े के कैद 7. उड़ने क इ छा 8. बबाद क हवा का आलम 9. फांसी 10. अब तक 11. इलाज का
इ छु क 12. खूबसूरत सुंद रय क बराबरी का दावा 13. दामन क तंगी का इलाज 14. सपन म खोई नगाह 15.
सृ क सुबह 16. अ त थ का इ छु क 17. जीवन क व था 18. क़ै दय या बं दय का

3
दारो-रसन1 का घटने को है ऐतबार या
कहता चला उधर कोई म तानावार या
हो इ क़े-सर नगूँ2 से भी कोई दो-चार या
सच है नगाहे-शौक़ का भी ऐतबार या
ह ती के बंद-बंद जुदा होके रह गए
दल पर पड़ी तरी नगहे-बेक़रार या
बुझ-बुझ के दाग़े- दल उभर आते ह हमनवा
मुझ क़ैद -ए-क़फ़स क खज़ाँ या, बहार या
कुछ रंग सा फ़ज़ा से टपकता है ऐ जुनूँ
चटका आ है शीशा-ए-बादो-बहार3 या
बैठे- बठाए छे ड़ दया नाज़े-यार को
ये तूने कर दया दले-नाकदाकार4 या
ऐ दल, कसी क पहली नगाह को भूल जा
याद आ गया तुझे मरे ग़फ़लत शुआर5 या
सब छोड़ ही चुके थे, भरोसा मरा ‘ फ़राक़’
लो, वो भी कहते ह क तरा ऐतबार या
मुँह फेर कर ‘ फ़राक़’ वो कुछ मु कुरा गये
सुनते अब और हाले- दले-बेक़रार या
_________________

(1924)

1. सूली और फाँसी 2. श मदा ेम 3. बसंती हवा का याला या जाम 4. मन क न

यता 5. बेसुधी म डू बा

4
हम जाग रहे थे सीने म रह रह के खनक-सी होती थी
गहरा स ाटा चार तरफ़ छाया था, नया सोती थी
बात म कभी जो कट जाती थी अब आँख म कटती है
ये रात पहाड़ सी, इक दन था, जब कतनी छोट होती थी
बेबाक नज़र के ट क से आँख मलती-सी जाग उठ
और ग़ा फ़ल इस वीराने म इक दद क नया सोती थी
रहती

नया क आवाज़ आ-आके जहाँ सर पीट ग

वो गोर-ए-ग़रीबाँ1 क ब ती कन गहरी न द सोती थी
कट जाती है अब भी कटने को, ले कन वो एक ज़माना था
जब रात रात-सी होती थी, जब सुबह सुबह-सी होती थी
सोते से कसी का उठना भी इक आलम होता था हमदम
बखरे होते थे बाल, आँख भी न द क बाती होती थी
वो डू ब डू ब के उभर आना, वो दद क तरह चमक जाना
ऐ क़ा तल, कसी मासूम के खूँ म तेज़ छु री मुँह धोती थी
वो रात ‘ फ़राक़’ है याद मुझ,े अब तक वो सुबह नह भूली
जो कटते कटते कटती थी, जो होते होते होती थी
(1925)
_________________
1. मुसा फ़र का क़

तान

5
म होश-ए-अना दल1 ँ मु कल है सँभल जाना
“ऐ बादे -सबा मेरी करवट तो बदल जाना”
तक़द रे-मुह बत ँ मु कल है बदल जाना
सौ बार सँभल कर भी मालूम सँभल जाना
उस आँख क म ती ँ, ऐ बादाकशो, जसका
उठ कर सरे-मैख़ाना2 मुम कन है बदल जाना
ऐयामे-बहाराँ3 म द वान के तेवर भी
जस स त4 नज़र उ आलम का बदल जाना
घनघोर घटा
म मूर5 हवा

म सरशार फ़ज़ा म
म मु कल है सँभल जाना

इस गुलशने-ह ती म कम खलते ह गुल ऐसे
नया महक उ े गी तुम दल को मसल जाना
म साज़े-हक़ क़त म सोया आ न मा था
था राज़े- नहाँ6 कोई पद से नकल जाना
म ती म लगावट से उस आँख का ये कहना
मै वार7 क नीयत ँ मुम कन है बदल जाना
जो तज़-ग़ज़लगोई ‘मो मन’ ने तरह क थी
सद हैफ़8 ‘ फ़राक़’ उसका सद हैफ़ बदल जाना
_________________

(1925)

1. प रद का होश 2. शराबख़ाने म 3. बस त ऋतु म 4. तरफ़ 5. मदम त 6. भेद क बात 7. शराब पीने वाला, 8.
सौ-सौ अफ़सोस

6
रात आधी से यादा गई थी सारा आलम सोता था
नाम तरा ले-लेकर कोई दद का मारा रोता था
चारागरो1, ये त क 2 कैसी, म भी ँ इस नया म
उनके ऐसा दद उठा कब, जनको बचना होता था
कुछ का कुछ कह जाता था म फ़क़त3 क बेताबी म
सुनने वाले हँस पड़ते थे, होश मुझे तब होता था
तारे अ सर डू ब चले थे रात म रोने वाल को
आने लगी थी न द-सी कुछ नया म सवेरा होता था
तक-मुह बत4 करने वालो, कौन ऐसा जग जीत लया
इ क़ से पहले के दन सोचो, कौन बड़ा सुख होता था
नया- नया ग़फ़लत तारी, आलम-आलम बेख़बरी
न का जा कौन जगाए एक ज़माना सोता था
उसके आँसू कसने दे ख,े उसक आह कसने सुन
चमन-चमन था न भी, ले कन द रया-द रया रोता था
पछला पहर था ह क शब का, जागता रब सोता संसार
तार क छाँव म कोई ‘ फ़राक़’ सा जैसे मोती परोता था।
(1926)
_________________

1. इलाज करने वालो 2. सां वना 3. वयोग 4. ेम का प र याग

7
शामे-ग़म कुछ उस नगाहे-नाज़ क बात करो
बेख़ुद बढ़ती चली है, राज़ क बात करो
ये सुकूते-यास1, ये दल क रग का टू टना
ख़ामुशी म कुछ शक ते-साज़2 क बात करो
नकहते-ज फ़े परीशाँ3, दा ताने-शामे-ग़म
सुबह होने तक इसी अ दाज़ म बात करो
जो अदम4 क जान है, जो है पयामे- ज़ दगी5
उस सुकूते-राज़6, उस आवाज़ क बात करो
इ क़ वा हो चला, बे-क़ैफ़ सा, बेजार सा
आज उसक न गसे-ग़ माज़7 क बात करो
नाम भी लेना है जसका इक जहाने-रंगो-बू8
दो तो, उस नौबहारे-नाज़9 क बात करो
कुछ क़फ़स क ती लय से छन रहा है नूर सा
कुछ फ़ज़ा, कुछ हसरते-परवाज़10 क बात करो
इ क़े-बेपरवा भी अब कुछ ना शकेबा11 हो चला
शोख़ी-ए- न-ए-क र मासाज़12 क बात करो
जस क फ़क़त ने पलट द इ क़ क काया ‘ फ़राक़’
आज उस ईसा-नफ़स दमसाज़13 क बात करो
_________________

1. नराशा-भरी चु पी 2. साज़ के टू टने क 3. उलझे बाल क ख़ुशबू 4. परलोक 5. जीवन-स दे श 6. भेद-भरी चु पी
7. चुग़लखोर आँख 8. रंग और सुग ध का संसार 9. अपने सौ दय पर इतराते नए बस त 10. उड़ने क कामना 11.
धैयहीन 12. चम कारी सौ दय क चंचलता 13. मुद म भी जान फूँक दे ने वाले म क

8
मौत इक गीत रात गाती थी
ज़ दगी झूम-झूम जाती थी
कभी द वाने रो भी पड़ते थे
कभी तेरी भी याद आती थी
कसके मातम म चाँद तार से
रात ब मे-अज़ा1 समाती थी
रोते जाते थे तेरे ह

नसीब2

रात फ़क़त3 क ढलती जाती थी
खोई-खोई-सी रहती थी वो आँख
दल का हर भेद पा भी जाती थी
ज़ था रंगो-बू का, और दल म
तरी त वीर उतरती जाती थी
न म थी इन आँसु क चमक
ज़ दगी जनम मु कुराती थी
दद-ह ती4 चमक उठा जसम
वो हम अहले-वफ़ा5 क छाती थी
था सुकूते-फ़ज़ा तर ुम-रेज़
बू - ए - गेसू - ए - यार आती थी6
ग़मे जानाँ हो या ग़मे दौराँ
लौ सी कुछ दल म झल मलाती थी

ज़ दगी को वफ़ा क राह म
मौत ख़ुद रोशनी दखाती थी
बात या थी, क दे खते ही तुझे
उ फ़ते-ज़ी त7 भूल जाती थी
थे न अफ़लाक गोश बर आवाज़8
बेखुद दा ताँ सुनाती थी
करवट ले उफ़क पे9 जैसे सुबह
कोई दोशीज़ा10 रसमसाती थी
ज़ दगी, ज़ दगी को व ते-सफ़र
कारवाँ कारवाँ छु पाती थी
ग़म क वो दा ताने-नीम-शबी11
आ मान को न द आती थी
मौत भी गोशबर सदा12 थी ‘ फ़राक़’
ज़ दगी कोई गीत गाती थी
_________________

1. शोकसभा 2. जनके भा य म वयोग लखा हो 3. वयोग क रात 4. ज़ दगी का दद 5. वफ़ादार क 6. माहौल
क चु पी गुनगुनाने लग गई जब या के बाल क ख़ुशबू ने गीत क तान छे ड़ी 7. ज़ दगी से लगाव 8. आसमान
आवाज़ पर कान नह लगाए थे 9.
तज पर 10. कुँआरी सु दरी 11. आधी रात म छे ड़ी गई ग़म क दा तान 12.
मौत क आवाज़ पर कान लगाए थी

9
कोई नई ज़म हो, नया आ माँ भी हो
ऐ दल, अब उसके पास चल वो जहाँ भी हो
अ सुदगी-ए-इ क़ म1 सोज़े- नहाँ2 भी हो
यानी बुझे दल से कुछ उठता धुआँ भी हो
इस दजा इ तलात3 और इतनी मुग़ायरत4
तू मेरे और अपने कभी द मयाँ भी हो
मट जाएगी ये का वशे- ह ो- वसाल भी
मेरा कह पता, कह तेरा नशाँ भी हो
हम अपने ग़मगुसारे-मोह बत5 न हो सके
तुम तो हमारे हाल पे कुछ मेहरबाँ भी हो
तुझको सुपुदगी क क़सम, ज बे-शौक़ पर
गर एतमाद है तो कभी बदगुमाँ भी हो
ब मे-तस वुरात म6 ऐ दो त! याद आ
इस मह फ़ले- नशात म7 ग़म का समाँ भी हो
च क ई है न क कुछ बेतव जुही
ऐसे म अहले-शौक़ के8 मुँह म ज़बाँ भी हो
दम या का क ग दशे-अफ़लाक9 क गई
वो अ क ही सही, शबे-फ़क़त रवाँ भी हो
महबूब वो क सर से क़दम तक ख़ुलूस हो
आ शक़ वही क न से कुछ बदगुमाँ भी हो

(1938)
_________________

1. ेम क उदासी म 2. गु त पीड़ा 3. अनुराग 4. परायापन 5. ेम क सहानुभू त-कता 6. क पना
7. आन द-भरी मह फ़ल म 8. े मय के 9. काल-च

क मह फ़ल म

10
सर म सौदा1 भी नह , दल म तम ा भी नह
ले कन इस तक-मोह बत का2 भरोसा भी नह
ये भी सच है क मोह बत म नह म मजबूर
ये भी सच है क तेरा न कुछ ऐसा भी नह
बदगुमाँ हो के मल ऐ दो त, जो मलना है तुझे
ये झझकते ए मलना कोई मलना भी नह
यूँ तो हंगामे उठाते नह द वाना-ए-इ क़3
मगर ऐ दो त, कुछ ऐस का ठकाना भी नह
शकवा-ए-जौर4 करे या कोई उस शोख़ से जो
साफ़ क़ायल भी नह , साफ़ मुकरता भी नह
मेहरबानी को मोह बत नह कहते, ऐ दो त
आह, मुझ से तो तेरी रं जशे-बेजा5 भी नह
मु त गुज़र , तेरी याद भी आई न हम
और हम भूल गए ह तुझ,े ऐसा भी नह
मुँह से हम अपने बुरा तो नह कहते क ‘ फ़राक़’
है तेरा दो त, मगर आदमी अ छा भी नह
_________________

(1935)

1. उ माद 2. ेम के याग का 3. इ क़ के द वाने 4. अ याचार क शकायत 5. अनु चत मनोमा ल य

11
मुझको मारा है हरइक दद -दवा से पहले
द सज़ा इ क़ ने हर जुम -ख़ता से पहले
आ तशे-इ क़1 भड़कती है हवा से पहले
ह ट जलते ह मोह बत म आ से पहले
अब कमी या है तेरे बे-सरो-सामान को
कुछ न था तेरी क़सम, तक -फ़ना से2 पहले
इ क़े-बेबाक को3 दावे थे ब त ख़लवत म4
खो दया सारा भरम शम -हया से पहले
ख़ुद-ब-ख़ुद चाक ए पैरहने-लाला-ओ-गुल5
चल गई कौन हवा बादे -सबा6 से पहले
मौत के नाम से डरते थे हम ऐ शौक़े- ात7
तूने तो मार ही डाला था क़ज़ा से8 पहले
ग़फ़लत9 ह ती-ए-फ़ानी क 10 बता दगी तुझे
जो मेरा हाल था एहसासे-फ़ना से11 पहले
हम उ ह पा के ‘ फ़राक़’ और भी कुछ खोये गए
ये तक लुफ़ तो न थे अहदे -वफ़ा से12 पहले
_________________

(1937)

1. ेम- वाला 2. प र याग और मटने से 3. धृ इ क़ को 4. एका त म 5. फूल के व फट गए 6. भात-समीर 7.
जीवन का शौक़ 8. मृ यु से 9. असावधा नयाँ 10. न र जीवन क 11. मृ यु क अनुभू त से 12. ेम नभाने के ण
से

12
कुछ इशारे थे ज ह नया समझ बैठे थे हम
उस नगाहे-आशना को1 या समझ बैठे थे हम
र ता-र ता2 ग़ैर अपनी ही नज़र म हो गए
वाह री ग़फ़लत3, तुझे अपना समझ बैठे थे हम
होश क तौफ़ क़4 भी कब अहले- दल को5 हो सक
इ क़ म अपने को द वाना समझ बैठे थे हम
या कह, उ फ़त म राज़े-बे हसी6 य कर खुला
हर नज़र को तेरी दद-अ ज़ा7 समझ बैठे थे हम
बे नयाज़ी को तेरी पाया सरासर सोज़ो-दद
तुझको इस नया से बेगाना समझ बैठे थे हम
इ क़लाबे-पै-ब-पै हर ग दशो, हर दौर म8
इस ज़मीनो-आ माँ को या समझ बैठे थे हम
भूल बैठ वो नगाहे-नाज़9 अहदे -दो ती10
उसको भी अपनी तबीयत का समझ बैठे थे हम
साफ़ अलग हमको जुनूने-आ शक़ 11 ने कर दया
ख़ुद को तेरे दद का पदा समझ बैठे थे हम
कान बजते ह मोह बत के, सुकूते-नाज़ को12
दा ताँ का ख़ म हो जाना समझ बैठे थे हम
एक

नया दद क त वीर नकली, इ क़ को

कोहकन और क़ैस13 का क़ सा समझ बैठे थे हम
र ता-र ता इ क़ मानूसे-जहाँ14 होता चला
ख़ुद को तेरे ह म15 तनहा समझ बैठे थे हम
न को इक न ही समझे नह और ऐ ‘ फ़राक़’
मेहरबाँ ना-मेहरबाँ या- या समझ बैठे थे हम
_________________

(1939)

1. प र चत नज़र को 2. शनैः-शनैः 3. असावधानी 4. साम य 5. दल वाल (आ शक ) को 6. जड़ता का भेद 7.
पीड़ावधक 8. हर काल और हर कालच म एक-के-बाद-एक ा त होती है 9. नाज़ -भरी नज़र ( ेयसी) 10. म ता
का ण 11. ेमो माद 12. ेयसी के मौन को 13. फ़रहाद और मजनूं 14. संसार से प र चत 15. जुदाई म

13
थरथरी-सी है आ मान म
ज़ोर कुछ तो है नातवान म1
इ ह तनक म दे ख ऐ बुलबुल!
बज लयाँ भी ह आ शयान म,
कतना ख़ामोश है जहाँ ले कन
इक सदा आ रही है कान म
हम उसी ज़ दगी के दर पे2 ह
मौत है जसके पासबान म3
क़ै दय को पयामे-क़ ल मला
ज़ दगी-सी है क़ैदख़ान म
मं ज़ल र से चमकती थ
खो ग आके कारवान म
कोई सोचे तो फ़क़ कतना है
न और इ क़ के फ़सान म
एक चका-सा व त का खा कर
बाँकपन आ गया जवान म
हमसे य तू है बदगुमाँ ऐ दो त
हम नह तेरे राज़दान म
मौत के भी उड़े ह अ सर होश
ज़ दगी के शराबख़ान म
जनक तामीर इ क़ करता है
कौन रहता है उन मकान म
_________________

1. नबल म 2. पीछे पड़े ए 3. र क म

(1939)

14
कसी का यूँ तो आ कौन उ -भर फर भी
ये नो-इ क़ तो धोखा है सब, मगर फर भी
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई-नई-सी है कुछ तेरी रहगुज़र फर भी
क ँ ये कैसे, इधर दे ख या न दे ख इधर
क दद दद है फर भी नज़र नज़र फर भी
झपक रही ह ज़मान -मकाँ क भी आँख
मगर है क़ा फ़ला आमादा-ए-सफ़र1 फर भी
शबे- फ़राक़2 से आगे है आज मेरी नज़र
क कट ही जाएगी ये शामे-बेसहर3 फर भी
लुटा आ चमने-इ क़4 है, नगाह को
दखा गया वही या- या गुलो-समर5 फर भी
ख़राब होके भी सोचा कए तेरे महजूर6
यही क तेरी नज़र है तेरी नज़र फर भी
तेरी नगाह से बचने म उ गुज़री है
उतर गया रगे-जाँ7 म ये न तर फर भी
फ़ना भी होके गराँबारी-ए- ात8 न पूछ
उठाए उठ नह सकता ये दद-सर फर भी
अगच बेख़ुद -ए-इ क़ को ज़माना आ
‘ फ़राक़’ करती रही काम वो नज़र फर भी
_________________

(1940)

1. सफ़र के लए त पर 2. वयोग क रात 3. ऐसी सं या या रात जसक सुबह न हो 4. इ क़ क वा टका 5. फल-

फूल 6. वयोग- त 7. ाण क नाड़ी 8. जीवन का बोझ

15
क - क -सी शबे-मग1 ख़ म पर आई
वो पौ फट , वो नई ज़ दगी नज़र आई
ये मोड़ वो ह क परछाइयाँ भी दगी न साथ
मुसा फ़र से कहो, उसक रहगुज़र आई
फ़ज़ा2 तब सुमे-सुबहे-बहार3 थी ले कन
प ँच के मं ज़ले-जानाँ4 पे आँख भर आई
कसी क ब मे-तरब म5 हयात6 बटती थी
उ मीदवार म कल मौत भी नज़र आई
कहाँ हरएक से इ सा नयत का बार7 उठा
क ये बला भी तेरे आ शक़ के सर आई
दल म आज तेरी याद मु त के बाद
ब-चेहरा-ए-तब सुम8 व च मे-तर9 आई
नया नह है मुझे मग-नागहाँ का10 पयाम11
हज़ार रंग से अपनी मुझे ख़बर आई
फ़ज़ा को जैसे कोई राग चीरता जाये
तेरी नगाह दल म युँही उतर आई
ज़रा वसाल12 के बाद आईना तो दे ख ऐ दो त!
तेरे जमाल क 13 दोशीज़गी14 नखर आई
अजब नह क चमन-दर-चमन बने हर फूल

कली-कली क सबा15 जा के गोद भर आई
शबे-‘ फ़राक़’16 उठे दल म और भी कुछ दद
क ँ म कैसे, तेरी याद रात भर आई
_________________

(1941)

1. मौत क रात 2. वातावरण 3. वस त ऋतु क सुबह क मु कराहट 4. ेयसी क मं ज़ल यानी नवास- थान 5.
ख़ुशी क मह फ़ल म 6. जीवन 7. बोझ 8. मु कराता आ चेहरा लए 9. सजल ने लए 10. आक मक मृ यु का
11. स दे श 12. मलन, सहवास 13. सौ दय क 14. कौमाय 15. भात समीर 16. वयोग क रात (उपनाम का
सु दर योग कया गया है)

16
छलक के कम न हो ऐसी कोई शराब नह
नगाहे-न गसे-रअना1 तेरा जवाब नह
ज़मीन जाग रही है क इ क़लाब है कल
वो रात है कोई ज़रा भी म े - वाब2 नह
ज़मीन उसक , फ़लक3 उसका, कायनात4 उसक
कुछ ऐसा इ क़ तेरा ख़ा माँख़राब5 नह
का है क़ा फ़ला-ए-ग़म कब एक मं ज़ल पर?
कब इ क़लाब ज़माने का हमरकाब6 नह ?
जो तेरे दद से मह म ह यहाँ, उनको
ग़मे-जहाँ भी सुना है क द तयाब7 नह
अभी कुछ और हो इ सान का ल पानी
अभी हयात के चेहरे पर आबो-ताब8 नह
दखा तो दे ती है बेहतर हयात के9 सपने
ख़राब हो के भी ये ज़ दगी ख़राब नह
_________________

(1943)

1. रमणीय न गस (एक पु प का नाम जसक ेयसी क आँख से उपमा द जाती है) क नज़र 2. न ाम न 3.
आकाश 4. सृ 5. उजड़े घर वाला 6. सवारी के साथ-साथ 7. उपल ध 8. चमक-चमक 9. जीवन के

17
न आना तेरा अब भी गरचे1 दल तड़पा ही जाता है
तेरे जाने पे भी ले कन सुकूँ-सा2 आ ही जाता है
न बुझने वाला शो’ला था क न ले-इ म का फल था3
अभी तक दल से इ साँ के धुआँ उठता ही जाता है
ये भोली-भाली नया भी सयानी है क़यामत क
कोई करता है चालाक , तो धोखा खा ही जाता है
न यूँ त वीरे-उजलत4 बन के बैठो मेरे पहलू म
मुझे महसूस होता है, कोई उठता ही जाता है
नखरता ही चला जाता है न आईना-आईना
अज़ल से5 दल के साँचे म कोई ढलता ही जाता है
मोह बत सीधी-साद चीज़ हो, पर इसको या क जै
क ये सुलझी ई गु थी कोई उलझा ही जाता है
मेरा ग़म पुर सश क 6 द तरस7 से र है हमदम
मगर ख़ुश ँ क जो आता है, कुछ समझा ही जाता है
दले-नादाँ, मोह बत म ख़ुशी का ये भरम, या ख़ूब
तेरी इस सादगी पर न को यार आ ही जाता है
उलट जाती ह तदबीर, पलट जाती ह तक़द र
अगर ढूँ ढे़ नई नया तो इ साँ पा ही जाता है
_________________

(1943)

1. य प 2. शा त-सी 3. बाग़े-अदन म सरल वभाव हज़रत आदम (आ दमानव) इ म ( ान) के वृ का फल
खाकर गुनहगार ए थे। यह ‘इंजील’ क एक कथा है 4. ज द का च अथात् अभी चले क अभी चले 5.
अना दकाल से 6. पूछताछ 7. प ँच

18
ग़ैर या जा नए, य मुझको बुरा कहते ह
आप कहते ह जो ऐसा तो बजा1 कहते ह
वाक़ई2 तेरे इस अ दाज़ को या कहते ह?
न वफ़ा कहते ह जसको न जफ़ा कहते ह
ज ह शक हो वो कर और ख़ुदा क तलाश
हम तो इ सान को नया का ख़ुदा कहते ह
तेरी सूरत नज़र आई तेरी सूरत से अलग
न को अहले-नज़र3

ननुमा4 कहते ह

शकवा-ए- ह 5 कर भी तो कर कस दल से
हम ख़ुद अपने को भी अपने से जुदा कहते ह
तेरी दादे - सतम6 का है बयाँ नामुम कन
फ़ायदा या है, मगर यूँ ही ज़रा कहते ह
लोग जो कुछ भी कह तेरी सतमकशी को7
हम तो इन बात को अ छा न बुरा कहते ह
मं ज़ल काटत ह र क तार -भरी रात
जाने य लोग इसे आबला-पा8 कहते ह
और का तजुबा जो कुछ हो मगर हम तो ‘ फ़राक़’
त ख़ी-ए-ज़ी त9 को जीने का मज़ा कहते ह
(1953)
_________________

1. ठ क 2. वा तव म 3. पारखी 4. सौ दय का संकेतक 5. वयोग क शकायत 6. अ याचार का वृ ा त 7. अ याचार
ढाने को 8. पैर का छाला 9. जीवन क कटु ता को

19
सोज़े- पनहाँ1 हो, च मे-पुरनम2 हो
दल म अ छा-बुरा कोई ग़म हो
फर से तरतीब द ज़माने को
ऐ ग़मे- ज़ दगी मुन ज़म3 हो
इ क़लाब आ ही जाएगा इक रोज़
और न मे-हयात4 बरहम5 हो
ताड़ लेते ह हम इशारा-ए-च म6
और मुबहम7 हो, और मुबहम हो
दद ही दद क दवा बन जाए
ज़ म ही ज़ मे- दल का मरहम हो
वो कहाँ जाके अपनी यास बुझाए।
जसको आबे-हयात8 भी सम9 हो॥
क जए जो जी म आए ‘ फ़राक़’
ले कन उसक ख़ुशी मुक़ म10 हो
_________________

1. गु त पीड़ा 2. सजल आँख 3. संग ठत 4. जीवन- व था 5. अ त9. वष 10. सव प र

(1954)

त 6. आँख का इशारा 7. अ प 8. अमृत

20
न जाना आज तक या शै ख़ुशी है
हमारी ज़ दगी भी ज़ दगी है
तेरे ग़म से शकायत-सी रही है
मुझे सचमुच बड़ी श म दगी है
मोह बत म कभी सोचा है यूँ भी
क तुझसे दो ती या मनी है
कोई दम का ँ मेहमाँ मुँह न फेरो
अभी आँख म कुछ-कुछ रोशनी है
ज़माना ज म मुझ पर कर रहा है
तुम ऐसा कर सको तो बात भी है
झलक मासू मय म शो ख़य क
ब त रंगीन तेरी सादगी है
इसे सुन लो सबब1 इसका न पूछो
मुझे तुमसे मोह बत हो गई है
सुना है इक नगर है आँसु का
उसी का सरा नाम आँख भी है
वही तेरी मोह बत क कहानी
जो कुछ भूली ई कुछ याद भी है
तु हारा ज़ आया इ फ़ाक़न2
न बगड़ो, बात पर बात आ गई है
_________________
1. कारण 2. संयोग से

(1958)

21
ज़ दगी या है, ये मुझसे पूछते हो दो तो
एक पैमाँ1 है जो पूरा होके भी पूरा न हो
बेबसी ये है क सब कुछ कर गुज़रना इ क़ म
सोचना दल म ये, हमने या कया फर बाद को
र क2 है जस पर ज़माने भर को है वो भी तो इ क़
कोसते ह जसको वो भी इ क़ ही है, हो न हो
आदमीयत3 का तक़ाज़ा था मेरा इज़हारे-इ क़4
भूल भी होती है इक इ सान से, जाने भी दो
म तु ह म से था कर लेते ह यादे -र तगां5
यूँ कसी को भूलते ह दो तो, ऐ दो तो!
यूँ भी दे ते ह नशान इस मं ज़ले- ार का6
जब चला जाए न राहे-इ क़ म तो गर पड़ो
मैकश 7 ने आज तो सब रंगरे लयाँ दे ख ल
शैख़8 कुछ इन मुँहफट को दे - दलाकर चुप करो
आदमी का आदमी होना नह आसाँ ‘ फ़राक़’
इ मो-फ़न9, इ लाक़ो-मज़हब10 जससे चाहो पूछ लो
(1958)
_________________

1. त ा 2. ई या 3. मानवता 4. ेम का कट करण 5. पुरानी याद 6. क ठन मं ज़ल का 7. शरा बय ने 8.
धम पदे शक, वृ अ धप त 9. ान और कला 10. सदाचार और धम

22
हमको तुमको फेर समय का ले आई ये हयात कहाँ?
हम भी वही ह तुम भी वही हो ले कन अब वो बात कहाँ?
कतनी उठती ई जवा नयाँ खलने से पहले मुरझाएँ
मन उदास तन सूखे-सूखे इन ख म पात कहाँ?
ये संजोग- बयोग क नया कल हमको बछु ड़ा दे गी
दे ख लूँ तुमको आँख भर के आएगी अब ये रात कहाँ?
मोती के दो थाल सजाए आज हमारी आँख ने
तुम जाने कस दे स सधारे भेज ये सौग़ात कहाँ?
तेरा दे खना सोच रहा ँ दल पर खा के गहरे घाव
इतने दन छु पा रखी थी आँख ने ये घात कहाँ?
ऐ दल कैसी चोट लगी जो आँख से तारे टू टे
कहाँ टपाटप गरते आँसू और मद क ज़ात कहाँ?
यूँ तो वो बाज़ी जीत चुका था एक चाल थी चलने क
उफ़ वो अचानक राह पड़ जाना इ क़ ने खाई मात कहाँ?
झल मल- झल मल तार ने भी पायल क झंकार सुनी थी
चली गई कल छम-छम करती पया मलन क रात कहाँ?
(1959)

23
बड़ा करम1 है ये मुझ पर, अभी यहाँ से न जाओ
ब त उदास है ये घर, अभी यहाँ से न जाओ
तुम आ गए तो शबे-ग़म के पुछ गए आँसू
यहाँ न था कोई दन-भर, अभी यहाँ से न जाओ
अभी तो आए हो दे खा नह है जी-भर के
ये आरज़ू है क उठकर, अभी यहाँ से न जाओ
ए हो मुझसे जुदा जब ज़रा तव कुफ़2 से
सँभल गया ँ म अकसर, अभी यहाँ से न जाओ
हमारी आँख से चुन लो क फर कसी दाम
न मल सकगे ये गौहर3, अभी यहाँ से न जाओ
वो आरजएँ जो वाब ता4 तुमसे ह उनको
चले हो छोड़ के कस पर, अभी यहाँ से न जाओ
वफ़ूरे-ग़म5 से ज ह न द आ गई थी कभी
वो याद जाग उठ सोकर, अभी यहाँ से न जाओ
के रहो नगाहे-नीम-बा6 से कुछ म भी
बना लूँ अपना मुक़ र7, अभी यहाँ से न जाओ
तु हारे पास ये अ दाज़ा हो रहा है मुझे
क मेरा हाल है बेहतर, अभी यहाँ से न जाओ
अभी तो सोए चराग़ ने आँख खोली है
अभी तो जागते ह घर, अभी यहाँ से न जाओ

को- को क पड़ी है अभी तो रात तमाम
ब त उदास है म ज़र 8, अभी यहाँ से न जाओ
ये दल चराग़ जले से तु ह जहाँ भी रहो
पुकारता है बराबर, अभी यहाँ से न जाओ
हमारी रात चली जाएगी तु हारे साथ
हमारी रात को लेकर, अभी यहाँ से न जाओ
ब त के मेरी ख़ा तर ये सोचता ँ क अब
क ँ म तुमसे ये य कर, अभी यहाँ से न जाओ
(1962)
_________________

1. कृपा 2. दे र से 3. मोती 4. स ब धत 5. ग़म का आ ध य 6. अधखुली आँख 7. भा य 8.

य

24
सुकूते-शाम1 मटाओ, ब त अँधेरा है
सुख़न2 क शमअ जलाओ, ब त अँधेरा है
चमक उठगी सयाहब तयां3 ज़माने क
नवः-ए-दद4 सुनाओ, ब त अँधेरा है
हर चराग़ से हर तीरगी नह मटती
चराग़े-अ क जलाओ, ब त अँधेरा है
दयारे-ग़म5 म दले-बेक़रार छू ट गया
सँभल के ढूँ ढ़ने जाओ, ब त अँधेरा है
ये रात वो है क सूझे जहाँ न हाथ को हाथ
यालो र न जाओ, ब त अँधेरा है
वो ख़ुद नह तो सरे-ब मे-ग़म6 तो आज उसके
तब सुम 7 को बुलाओ, ब त अँधेरा है
ये तीरगी-ए-फ़ज़ाए-जहाँ8 मुह बत के
नसीबे-ख़ु ता9 जगाओ, ब त अँधेरा है
पसे-गुनाह जो ठहरे थे च मे-आदम म10
इन आँसु को बहाओ, ब त अँधेरा है
दल के सोज़े- नहाँ11 से नए उफ़क़ के क़र 12
इक आफ़ताब13 बनाओ, ब त अँधेरा है

बसाते-अज़ -समाँ14 के तो बुझ चुके ह कँवल
चराग़ दल के जलाओ, ब त अँधेरा है
ग़मे-‘ फ़राक़’ क तनहाइय क आहट पर
कशाँ-कशाँ15 चले आओ, ब त अँधेरा है
शबे- सयाह म गुम हो गई है राहे-हयात
क़दम सँभल के उठाओ, ब त अँधेरा है
बहस है ऐसे म बेदा रये-महो-अंजुम16
इन अँख ड़य को जगाओ, ब त अँधेरा है
ये ग़म क रात को कटती नज़र नह आती
इक और रात बनाओ, ब त अँधेरा है
गुज़ ता अहद क याद को फर करो ताज़ा
बुझे चराग़ जलाओ, ब त अँधेरा है
थी एक उलटती ई न द ज़ दगी उसक
‘ फ़राक़’ को न जगाओ, ब त अँधेरा है
_________________

(1963)

1. सं या क चु पी 2. वातालाप 3. भा य 4. दद का गीत 5. ख क नगरी 6. ग़म क मह फ़ल म 7. मु कुराहट को
8. नया का अँधेरा 9. सोती क़ मत 10. आ द मानव क आँख म गुनाह के बाद जो ठहरे थे 11. भीतरी गम 12.
नए तज के नकट 13. सूरज 14. धरती-आकाश के बछौने के 15. खचे- खचे 16. चांद- सतार का जागरण

25
जो दलो- जगर म उतर गई वो नगाहे-यार कहाँ है अब?
कोई हद है ज़ मे- नहाँ क भी क हयात वहमो-गुमाँ है अब
मली इ क़ को वो हयाते-नौ क आदम का जसम सुकून है
ये ह दद क नई मं ज़ल न ख़ लश न सोज़े- नहाँ है अब
कभी थ वो उठती जवा नयाँ क ग़बारे-राह नुजूम थे
न बुल दयाँ वो नज़र म ह न वो दल क बक़-तपाँ है अब
ज ह ज़ दगी का मज़ाक था, वही मौत को भी समझ सके
न उमीदो-बीम के मरहले म ख़याले-सूदो- ज़याँ है अब
न वो नो-इ क़ क सोहबत न वो माजरे न वो सा नहे
न वो बेकस का सुकूते-ग़म न कसी क तेग़-े ज़बाँ है अब
ये फ़राक़ है क वसाल है क ये मह वयत का कमाल है
वो याले यार कहाँ है अब वो जमाले यार कहाँ है अब
मुझे मट के भी तो सुकूँ नह क ये हालत भी बदल चल
जसे मौत समझे थे इ क़ म, वो मसाले-उ -े रवाँ है अब?
वो नगाह उठ के पलट गई, वो शरारे उड़ के नहाँ ए
जसे दल समझते थे आज तक ‘ फ़राक़’ उठता धुआँ है अब
(1965)

26
अरे वाबे-मुह बत क 1 भी या ता’बीर2 होती है
खुल आँख तो नया दद क त वीर होती है
उमीद टू ट जाएं और फर जीता रहे कोई
न पूछ ऐ दो त! या फूट ई तक़द र होती है
सरापा3 दद होकर जो रहा जीता ज़माने म
उसी क ख़ाक़ यारो ग़ैरते-अ सीर होती है
जला जस व परवाना, नगाह फेर ल मुझसे
भरी मह फ़ल म दर पदा मेरी ता’ज़ीर होती है
अज़ल आई, बदनामे-मुह बत हो के जाता ँ
वफ़ा से हाथ उठाता ँ, बड़ी तक़सीर होती है
कसी क ज़ दगी ऐ दो त जो धड़क म गुज़री थी
उसी क झल मलाती शम इक त वीर होती है
‘ फ़राक़’ इक शम सर धुनती है पछली शब जो बाल पर
मेरी जाती ई नया क इक त वीर होती है
(1965)
_________________

1. ेम के सपने क 2. व फल 3. सर से पाँव तक

27
जहाँ ज़मानो-मकाँ1 का नह गुज़ारा है
कहाँ से आज तेरी याद ने पुकारा है
रहे-हयात2 क
ा रयाँ न पूछ ऐ दो त
मुसा फर को तेरे दद का सहारा है
म आ माने-मुह बत से ख़सते-शब ँ
तरा ख़याल कोई डू बता सतारा है
कभी हयात कभी मौत के झरोखे से
कहाँ-कहाँ से तेरे इ क़ ने पुकारा है
नवाए-इ क़3 है इंसा नयत का न म-ए-दद
उसी ने गेसू-ए-तहज़ीब को सँवारा है4
हर इक वजूद क आँख म आँख डाल के दे ख
पलक क ओट कोई काँपता सतारा है
हर एक सीना-ए-इंसाँ है चोट खाया आ
हर एक श स कसी क नज़र का मारा है
कहाँ का साथ, ये त हा सफ़र है त हा तक
अज़ल से ता-ब-अबद5 इ क़ बे-सहारा है
अगर है ह द शनासी क 6 आरज़ू तुझको
मेरा कलाम उसी स त इक इशारा है
कस आँच क है ये लौहे-ज़ब पे7 नम दमक
कन आँसु ने ख़े- ह द को नखारा है

ये क़ौले- ह द सुनो, हम सदा सुहा गन ह
उसी का फूटती पौ जगमगाता तारा है
ग़ज़ल है या कोई दे वी खड़ी है लट छटकाये
ये कसने गेसू-ए-उ को यूँ सँवारा है
ये न मे अब
पे जनके है अज़ल का सुहाग8
हम ने साज़े-ग़ज़ल पर उ ह उतारा है
बयाने-कै फ़यत9 उस आँख का हो या, जसने
हज़ार बार जलाया है और मारा है
बग़ौर सुन ये ग़रीब का हर अमीर सै क़ौल10
ये माना, आज तु हारा है कल हमारा है
हरेक आँख के आँसू ह अपनी पलक म
हरेक सीने म जो दद है हमारा है
ज़मीने-शे’र का है मो जज़ा नुज़ूले-‘ फ़राक़’11
कस आ माँ का ये टू टा आ सतारा है?
_________________

1. दे श, काल 2. जीवन-पथ 3. म
े क पुकार 4. स यता क केश-स जा क है 5. आ दकाल से अंतकाल तक 6.
ह तान को जानने 7. माथे क त ती 8. हमेशा का सुहाग 9. प रचय 10. कथन 11. क वता क भू म पर फ़राक़
का अवतरण एक चम कार है

28
बस इक दामने- दल1 गु ल ताँ गु ल ताँ
गरीबाँ गरीबाँ2, बयाबाँ बयाबाँ
हजाब म3 भी तो नुमायाँ4 नुमायाँ
फ़रोज़ाँ, फ़रोज़ाँ
शाँ
शाँ5
तेरे ज फ़ो- ख़6 का बदल ढूँ ढ़ता ँ
श ब ताँ7, श ब ताँ चराग़ाँ8 चराग़ाँ
ख़तो-ख़ाल क 9 तेरे परछाइयाँ ह
ख़याबाँ10 ख़याबाँ, गु ल ताँ गु ल ताँ
वो था राज़े- प हाँ11 जसे सबने समझा
वैदा वैदा12, नुमायाँ नुमायाँ
जुनून-े मुह बत13, उन आँख क वहशत14
बयाबाँ बयाबाँ, ग़ज़ालाँ15 ग़ज़ालाँ
वही वहशत ह, वही हैरत ह
गु ल ताँ गु ल ताँ, बयाबाँ बयाबाँ
हो क़ौसे- जूह शबनम आलूद जैसे
वो रंगीन पैकर पशेमाँ पशेमाँ16
ये क़ामत17, क ख़ुश द अँगड़ाइयाँ ले18
उमड़ती जवानी, ख़ु म ताँ19 ख़ु म ताँ

है सीना, क संगीत पछले पहर का
वो चेहरा क ऊषा पशेमाँ पशेमाँ20
ये ख़ु बू-ए-गेसू, क बेख़ुद ह आ 21
ये आँख का जा प र ताँ प र ताँ
वही इक तब सुम22 चमन दर चमन है
वही पंखुड़ी है गु ल ताँ गु ल ताँ
ये साज़े-ख़मोश23 आज लौ दे रहा है
सुकूते-नज़र भी ग़जल वाँ ग़ज़ल वाँ24
चले आ रहे ह, चले जा रहे ह
कहाँ से, कधर को ख़रामाँ ख़रामाँ25
कहाँ उठ रही है, कहाँ पड़ रही है
नगाहे-मुह बत परीशाँ परीशाँ
ज़म ता फ़लक शामे-ग़म का धुँधलका
मुह बत क नया हरासाँ हरासाँ26
ये ग़म के शरारे मुह बत मुह बत
ये जगमग सतारे हसीना हसीना
वो सु हे अज़ल हो, क रोज़े-क़यामत27
धुँधलका धुँधलका, श ब ताँ श ब ताँ
यही ज बे- प हाँ क है दाद काफ़ 28
चले आओ मुझ तक गुरेज़ाँ गुरेज़ाँ29
कह यूँ भी बदली ह ग़म क फ़ज़ाएँ30
वही बादो-बाराँ बहाराँ बहाराँ31
फ़राके-हज़ 32 से तो वा क़फ़ थे तुम भी
वो कुछ खोया खोया परीशाँ परीशाँ
[मूल ग़ज़ल अ वाभा वक प से और बड़े आकार क है। का -गुण को सुर त
रखते ए, बीच-बीच से कई शे’र छोड़ दए गए ह।—संपादक],

_________________

1. दय पी शरीर 2. परदे स 3. पद म 4. कट 5. दोन का ही अथ ‘ काशमान’ या ‘रोशन’ 6. केश और चेहरा 7.
शयनागार म 8. द पमाला म 9. क़द और नैन-न श 10. या रयाँ 11. गु त रह य 12. खुलासा-खुलासा 13.
ेमो माद 14. उ माद और भय 15. हरन क आँख म 16. वह सु दर शरीर इस तरह शरमाया-शरमाया-सा, जैसे
ओस म लपटा इ धनुष 17. कद 18. मानो सूरज अँगड़ाइयाँ ले रहा हो 19. मधुशालाएँ 20. उषाकाल (भोर) का
ल जत चेहरा 21. हरन 22. मु कान 23. ख़ामोश साज़ 24. ख़ामोश नज़र भी ग़ज़ल गाती ई जैसी 25. धीरे-धीरे
26. ज़मीन से आसमान तक वयोग क शाम का धुँधलका और मुह बत क नया डरी-डरी ई सी है 27. आ दकाल
क सुबह से क़यामत के दन तक 28. गु त ेम-भावना क इतनी ही शंसा पया त है 29. झझकते 30. ग़म का
माहौल 31. वही आँधी और बा रश, वही वस त ऋतुएँ 32. शोक म डू बे शायर फ़राक़ से

29
ये तो नह क ग़म नह
हाँ, मेरी आँख नम नह
तुम भी तो तुम नह हो आज
हम भी तो आज हम नह
न शा सँभाले है मुझे
बहके ए क़दम नह
क़ा दरे-दोजहाँ1 है, गो
इ क़ के दम म दम नह
मौत अगरचे मौत है
मौत से ज़ी त2 कम नह
कस ने कहा ये तुमसे, ख़
आबे-हयात सम नह 4
कहते हो दहर5 को भरम
मुझको तो ये भरम नह
अब न ख़ुशी क है ख़ुशी
ग़म भी अब तो ग़म नह
मेरी नश त है ज़म
ख़ु द नह , इरम नह 6
और ही है मुक़ामे- दल
दै र नह हरम नह

3

,

क़ मते- न दो जहाँ
कोई बड़ी रक़म नह
अहदे -वफ़ा है ने-यार7
क़ौल नह , क़सम नह
लेते ह मोल दो जहाँ
दाम नह , दरम नह 8
सोमो-सलात9 से ‘ फ़राक़’
मेरे गुनाह कम नह
_________________

1. दो लोक का अ धकारी 2. जीवन 3. एक पैग़ बर का नाम 4. अमृत वष नह 5. संसार, नया 6. मेरी बैठक यानी
मह फ़ल ज़मीन पर है, ज त या वग म नह 7. ेमी क स चाई ेम के त उसका अ डग रहना है 8. पया, पैसा
नह 9. रोज़ा-नमाज़

30
राज़ को राज़ ही र खा होता
या कहना गर ऐसा होता
न से कब तक पदा करते
इ क़ से कब तक पदा होता
कम कम उठत तेरी नगाह
अ सर ख़ून-े तम ा होता
कटते कटते कटत रात
होते होते सवेरा होता
रात क रात कभी मेरा घर
तेरा रैनबसेरा होता
इ क़ ने मुझसे कमी क , वना
मुझ पर तेरा धोखा होता
नया- नया, आलम-आलम
होता इ क़ और त हा होता
द रया-द रया, सहरा-सहरा
रोता, ख़ाक उड़ाता होता
आज तो दद- ह भी कम है
आज तो कोई आया होता
आज तो साज़े-ख़मोश है आलम
आज तो उसको पुकारा होता
ये नरजन बन, ये स ाटा

कोई प ा खड़का होता
म ँ, शाम है, त हाई है
तुम भी जो होते, अ छा होता
मेरी रगे-जाँ ख जाती जो
बाल भी तेरा बाँका होता
तू गर अपने हाथ से दे ता
पैमाना, पैमाना होता
आँख उठा कर, जान गँवा के
न का आलम दे खा होता
पदादारी-ए-ग़म भी है साक़
तूने हाल तो पूछा होता
हम जो तुझे कुछ भूल भी जाते
दद-मुह बत ना होता
कुछ तो मुह बत करके दखाती
कुछ तो ज़माना बदला होता
इससे तो, ऐ जागने वालो,
सोया होता, खोया होता
इ क़ तो चुप है, साज़े-मोह बत
तेरी नज़र ने छे ड़ा होता
कोई कभी कुछ दल ही दल म
शरमाया, पछताया होता
मं ज़ल मं ज़ल दल भटकेगा
आज तु ह ने रोका होता
हम भी ‘ फ़राक़’ इ सान थे आ ख़र
तक-मुह बत से या होता!

31
रात भी, न द भी, कहानी भी
हाय, या चीज़ है जवानी भी
एक पैग़ामे- ज़ दगानी भी
आ शक़ मग-नागहानी भी1
इस अदा का तरी जवाब नह
मह्रबानी भी, सरगरानी2 भी
दल को अपने भी ग़म थे नया म
कुछ बलाएं थ आ मानी भी
मनसबे- दल3 ख़ुशी लुटाता है
ग़मे- प हाँ क पासबानी भी4
दल को शोल से करती है सैराब5
ज़दगी आग भी है, पानी भी
इ क़े-नाकाम क है परछा
शादमानी भी, कामरानी6 भी
दे ख दल के नगारख़ाने7 म
ज़ मे- प हाँ क है नशानी भी
ख़ क़8 या या मुझे नह कहती
कुछ सुनूँ म तरी ज़बानी भी
आए तारीख़े-इ क़ म9 सौ बार

मौत के दौर-द मयानी भी
दले-बदनाम, तेरे बारे म
लोग कहते ह इक कहानी भी
न म करते10 कोई नई नया
क ये नया ई पुरानी भी
दल को आदाबे-बंदगी11 भी न आए
कर गये लोग मरानी12 भी
ज़ौरे- कम कम का शु या बस है
आपक इतनी मेहरबानी भी
दल म इक क भी उठे , ऐ दो त,
याद आई तरी जवानी भी
सर से पा तक सुपुदगी13 को अदा
एक अंदाज़े-तुकमानी14 भी
पास रहना कसी का रात क रात
मेहमानी भी, मेज़बानी भी
ज़दगी ऐन द दे -यार15 ‘ फ़राक़’
ज़दगी ह 16 क कहानी भी
_________________

1. अकाल मृ यु 2. नाराज़गी 3. दल का तबा 4. भीतर के
मन क रखवाली भी करता है 5. सचाई 6.
असफलता भी, सफलता भी 7. रंगशाला 8. नया 9. ेम के इ तहास म 10. तत ब दे ते 11. श ाचार 12. म भी
सुना गए 13. समपण 14. व ोही तेवर 15. दो त का दशन 16. वयोग

32
‘मीर’ क तज़ म कही गई ग़ज़ल
अब अ सर चुप-चुप से रहे ह, यूँ ही कभू लब खोले ह
पहले ‘ फ़राक़’ को दे खा होता, अब तो ब त कम बोले ह
दन म हमको दे खने वालो, अपने अपने ह औक़ात1
जाओ न तुम इन ख़ु क आँख पे, हम रात को रो ले ह
फ़तरत2 मेरी इ क़ो-मुह बत, क़ मत मेरी त हाई
कहने क नौबत ही न आई, हम भी कसू के हो ले ह
बाग़ म वो वाबआवर आलम, मौजे-सबा के इशार पर3
डाली डाली नौरस प े, सहज सहज जब डोले ह
उफ़ वो लब पे मौजे-तब सुम4, जैसे करवट ल क ध
हाय वो आलम जुं बशे- म गाँ5, जब फ़ ने6 पर तोले ह
न शो- नगारे-ग़ज़ल म7 जो तुम ये शादाबी8 पाओ हो
हम अ क म कायनात के9, नोके-क़लम को डु बो ले ह
इन रात को हरीमे-नाज़ का10, इक आलम होये है नद म11
ख़ वत म12 वो नम उँग लयाँ बंदे-क़बा13 जब खोले ह
ग़म का फ़साना सुनने वालो, आ ख़रे-शब14 आराम करो
कल ये कहानी फर छे ड़गे, हम भी ज़रा अब सो ले ह
हम लोग अब तो पराये-से ह, कुछ तो बताओ हाले-‘ फ़राक़’
अब तो तु ह को यार करे ह, अब तो तु ह से बोले ह

_________________

1. व का ब वचन 2. वभाव, नय त 3. बाग़ म वो न द लाने वाले माहौल म सुबह क हवा के झ क के इशार पर
4. मु कान क तरंग 5. बल खाती भ ह 6. शरारत 7. ग़ज़ल का प नखारने म 8. ताज़गी 9. सृ के आँसु म 10.
े मका के हरम या नजी क का 11. सुलभ 12. एकांत म 13. चोली क गाँठ 14. रात के अ त म

33
बे- ठकाने है दले-ग़मग , ठकाने क कहो
शामे- ह ाँ, दो तो, कुछ उसके आने क कहो
हाँ, न पूछो इक गर तारे-क़फ़स1 क ज़दगी
हमसफ़ राने-चमन2, कुछ आ शयाने क कहो
उड़ गया है मं ज़ले-

ार म ग़म का सम द

गेसू-ए-पुरपेचो-ख़म के ताज़याने क कहो3
बात बनती और बात से नज़र आती नह
उस नगाहे नाज़ के बात बनाने क कहो
दा ताँ वो थी जसे दल बुझते-बुझते कह गया
शम्-ए-ब मे- ज़दगी के झल मलाने क कहो
कुछ दले-मर म4 क बात करो, ऐ अहले-ग़म,
जससे वीराने थे आबाद, उस दवाने क कहो
दा ताने- ज़दगी भी कस क़दर दलच प है
जो अज़ल से5 छड़ गया है, उस फ़साने क कहो
ये फ़सूने-नीमशब, ये वाब सामाँ ख़ामुशी
सामरी फ़न आँख के जा जगाने क कहो6
कोई या खायेगा यूँ स ची कसम, झूठ क़सम
उस नगाहे-नाज़ के सौग ध खाने क कहो
शाम से ही गोश-बर आवाज़7 है ब मे-सुख़न
कुछ ‘ फ़राक’ अपनी सुनाओ, कुछ ज़माने क कहो

_________________

1. पजड़े का पंछ , कैद 2. चमन के साथी 3. गम का घोड़ा मु कल मं ज़ल क तरफ उड़ गया है। उलझे-घुँघराले
केश के घोड़े क बात बताओ 4. बेजान या हारा आ दल 5. आ दकाल से 6. यह आधी रात का जा और यह
व ल चु पी, इन मायावी और म कार आँख क जा गरी क बात करो 7. आवाज़ पर कान लगाए है

34
वो चुपचाप आँसू बहाने क रात
वो इक श स के याद आने क रात
शबे-मह1 क वो ठं डी आँच, वो शबनम
तरे न के रसमसाने क रात
जवानी क दोशीज़गी का तब सुम2
गुले-राज़ के वो खलाने क रात
फुवार-सी न म क पड़ती ह जैसे
कुछ उस लब से सुनने-सुनाने क रात
मुझे याद है तेरी हर सुबहे- सत3
मुझे याद ह तेरे आने क रात
पुरअसरार-सी मेरी अज़-तम ा
वो कुछ ज़ेर-े लब मु कुराने क रात4
सरे-शाम से रतजगा के वो सामाँ
वो पछले पहर न द आने क रात
सरे-शाम से ता सहर क़ब-जानाँ5
न जाने थ वो कस ज़माने क रात
सरे-मैकदा त गी क वो क़सम6
वो साक़ से बात बनाने क रात
हमआग़ो शयाँ शा हदे - मेहरबाँ क 7
ज़माने के ग़म भूल जाने क रात

‘ फ़राक’ अपनी क़ मत म शायद नह थे
ठकाने के दन या ठकाने क रात
_________________

1. चाँदनी रात 2. जवानी के कुआँरेपन क मु कान 3. जाने क सुबह या सुबह के व जाना 4. कामनापू त क मेरी
आतुर याचना और वो ह ठ ही ह ठ म मु कुराने क रात 5. यतमा क नकटता 6. मधुशाला म होकर भी यासे होने
क क़सम 7. कृपालु यतमा के आ लगन

35
ज़ीरो-बम से साज़े- ख़लक़त के1 जहाँ बनता गया
ये ज़म बनती गई, ये आ माँ बनता गया
दा ताने-जौरे-बेहद2 ख़ूँ से लखता ही रहा
क़तरा-क़तरा अ के-ग़म का बेकराँ3 बनता गया
इ क़े-त हा से
आबाद कतनी मं ज़ल
इक मुसा फ़र कारवाँ-दर-कारवाँ बनता गया
म तेरे जस ग़म को अपना जानता था वो भी तो
ज़ेबे - उ वाने - हद से - द गराँ4 बनता गया
बात नकले बात से जैस,े वो था तेरा बयाँ
नाम तेरा दा ताँ-दर-दा ताँ बनता गया
हम को है मालूम सब दादे -इ मो-फ़ सफ़ा5
हाँ, हर ईमानो-यक बहमो-गुमाँ बनता गया6
म कताबे- दल म अपना हाले-ग़म लखता रहा
हर वरक़ इक बाबे-तारीख़े-जहाँ7 बनता गया
बस उसी क तजुमानी है मरे अशआर म
जो सुकूते-राज़8 रंग दा ताँ बनता गया
मने स पा था तुझे इक काम सारी उ म
वो बगड़ता ही गया, ऐ दल, कहाँ बनता गया
वा रदाते- दल को9 दल ही म जगह दे ते रहे

हर हसाबे-ग़म, हसाबे-दो ताँ10 बनता गया
मेरी घु म पड़ी है हो के हल11 उ ज़बाँ
जो भी म कहता गया ने-बयाँ12 बनता गया
व त के हाथ यहाँ या- या ख़ज़ाने लुट गए
एक तेरा ग़म क गंजे-शायगाँ13 बनता गया
सरज़मीने- हद पर अक़वामे-आलम14 के ‘ फ़राक़’
क़ा फ़ले बसते गए, ह दो ताँ बनता गया
_________________

1. सृ
पी साज़ के आरोह-अवरोह से 2. अ याचार क कहानी 3. असीम 4. सर क नयी सोच के शीषक क
शोभा 5. ान और दशनशा का वृ ांत 6. व ास अ ध व ास बनता गया 7. नया के इ तहास का अ याय 8.
मौन रह य 9. दल क वारदात (भावना मक संग ) 10. दो त का, कभी न चुकने वाला हसाब 11. घुल मल कर
12. बयान याने क य का स दय 13. ब मू य खज़ाना 14. नया भर क जा तयाँ और क़बीले

न म

आधी रात को
1
सयाह पेड़ ह अब आप अपनी परछा
ज़म से ता1 महो-अंजुम2 सुकूत3 के मीनार
जधर नगाह कर इक अथाह गुमशुदगी4
एक-एक करके अफ़सुदा5 चराग़ क पलक
झपक ग —जो खुली ह झपकने वाली ह
झपक रहा है ‘पुरा’ चाँदनी के दपन म
रसीले कैफ़6 भरे मंज़र का जागता वाब
फ़लक पे तार को पहली जमा हयाँ आ
2
तमो लय क कान कह -कह ह खुली
कुछ ऊँघती ई बढ़ती ह शाहराह पर
सवा रय के बड़े घुँघ
क झंकार
खड़ा है ओस म चुपचाप हर सगार का पेड़
हन हो जैसे हया क सुग ध से बोझल
ये मौजे-नूर7, ये भरपूर ये खली ई रात
क जैसे खलता चला जाए इक सफ़ेद कँवल
सपाहे- स ह अब कतनी र ब लन से?
—जगा रहा है कोई आधी रात का जा —
छलक रही है खुमे-ग़ैब से8 शराबे-वुजूद9
फ़ज़ा - ए - नीमशबी10 न गसे - ख़ुमार - आलूद11

कँवल क चुट कय म बँद है नद का सुहाग
3
ये रस क सेज, ये सुकुमार, ये सुकोमल गात
नैन कमल क झपक, काम प का जा
ये रसमसाई पलक क घनी-घनी परछा
फ़लक पे12 बखरे ए चाँद और सतार क
चमकती उँग लय से छड़के राज़ फ़तरत के13
तराने जागने वाले ह, तुम भी जाग उ ो
4
शुआए-मेहर14 ने यूँ उनको चूम-चूम लया
नद के बीच कुमु दनी के फूल खल उ े
न मुफ़ लसी हो, तो कतनी हसीन है नया
ये झायँ-झायँ-सी रह-रह के एक झ गुर क
हना क ट य म नम सरसराहट-सी
फ़ज़ा के सीने म ख़ामोश सनसनाहट-सी
लट म रात क दे वी क थरथराहट-सी
ये कायनात अब इक न द ले चुक होगी
5
ये म े - वाब15 ह रंगीन मछ लयाँ तहे-आब16
क हौज़े-सहन म17 अब इनक च मक18 भी नह
ये सर नगूँ ह19 सरे-शाख़20 फूल ‘गुड़हल’ के
क जैसे बेबुझे अंगारे ठं डे पड़ जाएँ
ये चाँदनी है क उमड़ा आ है रस-सागर
इक आदमी है क इतना खी है नया म
6
क़रीब चाँद के मँडला रही है इक च ड़या
भँवर म नूर के21 करवट से जैसे नाव चले
क जैसे सीना-ए-शायर म22 कोई वाब पले
वो वाब साँचे म जसके नई हयात ढले
वो वाब जससे पुराना नज़ामे-ग़म बदले

कहाँ से आती है मदमालती लता क लपट
क जैसे सैकड़ प रयाँ गुला बयाँ छड़काएँ
क जैसे सैकड़ बन-दे वय ने झूले पर
अदा-ए-ख़ास से एकसाथ बाल खोल दए
लगे ह कान सतार के जसक आहट पर
उस इ क़लाब क कोई ख़बर नह आती
दले-नुजूम23 धड़कते ह, कान बजते ह
7
ये साँस लेती ई कायनात, ये शबे-माह
ये पुरसुकून24, ये पुर-असरार25, ये उदास समाँ
ये नम-नम हवा के नीलगू26
ँ झ के
फ़ज़ा क ओट म मुद क गुनगुनाहट है
ये रात मौत क बेरंग मु कराहट है
धुआँ-धुआँ-से मना ज़र27 तमाम नमद दा28
ख़ुनुक29 धुँदलके क आँख भी नीम- वाबीदा30
सतारे ह क जहाँ पर है आँसु का कफ़न
हयात31 पदा-ए-शब म32 बदलती है पहलू
कुछ और जाग उठा आधी रात का जा
ज़माना कतना लड़ाई को रह गया होगा?
मेरे ख़याल से अब एक बज रहा होगा!
8
गुल ने चादरे शबनम म मुँह लपेट लया
लब पे सो गई क लय क मु कराहट भी
ज़रा भी सुंबले-तर क लट नह हलत
सुकूते-नीमशबी क हद नह मलत
अब इ क़लाब म शायद ज़यादा दे र नह
गुज़र रहे ह कई कारवाँ धुँदलके म
सुकूते-नीमशबी है उ ह के पाँव क चाप
कुछ और जाग उठा आधी रात का जा
9
नई ज़मीन, नया आ माँ, नई नया
नये सतारे, नई ग दश, नये दन-रात

ज़म से ता-ब-फ़लक इ तज़ार का आलम
फ़ज़ा-ए-ज़द म, धुँदले ग़बार का आलम
हयाते-मौतनुमा33, इ तशार34 का आलम
है मौजे- द35 क धुँदली फ़ज़ा क न ज़ ह
तमाम ख़ तगी-ओ-माँदगी36, ये दौरे-हयात37
थके-थके-से ये तारे थक -थक -सी ये रात
ये सद-सद ये बेजान फ क -फ क चमक
नज़ामे-सा नया38 क मौत का पसीना है
ख़ुद अपने-आप म ये कायनात डू ब गई
ख़ुद अपनी कोख से फर जगमगा के उभरेगी
बदल के कचुली जस तरह नाग लहराए
10
ख़ुनक फ़ज़ा म र साँ ह चाँद क करन
क आबगीन पे पड़ती है नम-नम फुआर—
ये मौजे-ग़फ़लते-मासूम, ये ख़ुमारे-बदन
ये साँस न द म डू बी, ये आँख मदमाती
अब आओ, मेरे कलेजे से लग के सो जाओ
ये पलक ब द करो और मुझ म खो जाओ
_________________

(जून 1944)

1. तक 2. चाँद- सतार (तक) 3. न त धता 4. खोया आ 5. म लन 6. आन द 7. काश क लहर 8. अ यलोक
क सुराही से 9. अ त व क म दरा 10. आधी रात का वातावरण 11. मदो म न गस (फूल) 12. आकाश पर 13.
कृ त के 14. सूरज क करन 15. व -म न 16. पानी क तह म 17. आँगन के तालाब म 18. चुहलबा ज़याँ 19.
सर झुकाए ए 20. टह नय पर 21. काश के 22. क व के दय म 23. सतार के दय 24. शा त 25. रह यमय
26. नी लमामय 27. य 28. सजल ने 29. शीतल 30. अध- न त 31. जीवन 32. रात के पद म 33. मृ यु- पी
जीवन 34. अ त- तता 35. धुएँ क लहर 36. जजरता और थकान 37. जीवन का युग 38. सरी जीवन- व था
(सा यवाद)

परछाइयाँ
शाम
ये शाम इक आईना-ए-नीलगू1ँ , ये नम2, ये महक
ये मंज़र क झलक, खेत, बाग़, द रया, गाँव
वो कुछ सुलगते ए, कुछ सुलगने वाले अलाव
सया हय का दबे पाँव आ माँ से नज़ूल3
लट को खोल दे जस तरह शाम क दे वी
पुराने व त के बरगद क ये उदास लटाय
क़रीब-ओ- र ये गोधू ल क उभरती घटाय
ये कायनात4 का ठहराव, ये अथाह सुकूत5
ये नीम-तीरा फ़ज़ा6 रोज़े-गम का ताबूत7
धुआँ-धुआँ-सी ज़म है घुला-घुला-सा फ़लक

रात का पहला पहर
ये चाँदनी, ये हवाएँ, ये शाख़े-गुल क लचक
ये दौरे-बादा, ये साज़े-ख़मोश फ़तरत के
सुनाई दे ने लगी जगमगाते सीन म
दल के नाजक-ओ-श फ़ाफ़ आबगीन म
तेरे ख़याल क पड़ती ई करन क खनक

रात गए
ये रात! छनती हवा क स धी-स धी महक
ये खेल करती ई चाँदनी क नम दमक

सुग ध ‘रात क रानी’ क जब मचलती है
फ़ज़ा म हे-तरब8 करवट बदलती है
ये प सर से क़दम तक हसीन जैसे गुनाह
ये आ रज़ क 9 दमक, ये फ़सूने-च मे- सयाह10
ये धज न दे जो अज ता क सन त को11 पनाह
ये सीना, पड़ ही गई दे वलोक क भी नगाह
ये सरज़मीन12 है आकाश क पर तश-गाह
उतारते ह तेरी आरती सतारा-ओ-माह13
सजल बदन क बयाँ कस तरह हो कैफ़ यत
सर वती के बजाये ए सतार क गत
जमाले-यार14 तेरे गु ल ताँ क रह-रह के
जबीने-नाज़15 तेरी कहकशाँ क 16 रह-रह के
दल म आईना-दर-आईना सुहानी झलक

आधी रात से कुछ पहले
ये छब, ये प, ये जीवन, ये सज, ये धज, ये लहक
चमकते तार क करन क नम-नम फुआर
ये रसमसाते बदन का उठान और ये उभार
फ़ज़ा के आईने म जैसे लहलहाए बहार
ये बेक़रार, ये बेइ तयार जोशे-नमूद17
क जैसे नूर का18 फ़ वारा हो शफ़क़-आलूद19
ये ज वे पैकरे-शब ताब के20 ये ब मे-श द21
ये म तयाँ क मए-साफ़-ओ- द22 सब बेबूद23
ख़जल हो24 ला’ले-यमन25 उ व-उ व क 26 वो डलक

आधी रात को
बस इस सतारा-ए- शगरफ़ क 27 जब पे28 झमक
वो चाल जससे लबालब गुला बयाँ छलक
सुकूँ-नुमाँ29 ख़मे-अब 30 ये अधखुली पलक
हर एक नगाह से ऐमान क 31 बज लयाँ लपक

ये आँख जसम कई आ माँ दखाई पड़
उड़ा द होश वो कान क सादा-सादा लव
घटाएँ व द म आए32, ये गेसु क लटक

ढलती ई आधी रात
ये क़ैफ़ो-रंग-े नज़ारा33, ये बज लय क लपक
क जैसे कृ ण से राधा क आँख इशारे करे
वो शोख़ इशारे क र बा नयत34 भी जाए झपक
जमाल35 सर से क़दम तक तमाम शोला है
सुकूनो-जुँ बशो-रम36 तक तमाम शोला है
मगर वो शो’ला क आँख म डाल दे ठं डक

तीन पहर रात भीग चली
ये रात! न द म डू बे ए से ह द पक
फ़ज़ा म बुझ गये उड़-उड़ के जुगनु

के शरार

कुछ और तार क आँख का बढ़ चला है ख़ुमार
फ़सुदा छटक ई चाँदनी का धुँदला ग़बार
ये भीगी-भीगी उदाहट, ये भीगा-भीगा नूर
क जैसे च मा-ए-ज मात म37 जले काफ़ूर
ये ढलती रात! सतार के क़ ब का38 ये गुदाज़39
ख़ुनक फ़ज़ा म तेरा शबनमी तब सुम-े नाज़40
झलक जमाल क ताबीरे- वाबे-आईनासाज़41
जहाँ से ज म को दे ख तमाम नाज़ो- नयाज़
जहाँ नगाह ठहर जाए राज़ अ दर राज़
सुकूते-नीमशबी42, लहलहे बदन का नखार
क जैसे न द क वाद म जागता संसार
है ब मे-माह43 क परछाइय क ब ती है
फ़ज़ा क ओट से वो ख़ामशी बरसती है

क बूँद-बूँद से पैदा हो गोशो- दल म44 खनक

पछला पहर
कसी याल म है ग़क़45 चाँदनी क चमक
हवाएँ न द के खेत से जैसे आती ह
हयातो-मौत म सरगो शयाँ-सी होती ह
करोड़ साल के जागे सतारे नम-द दा46
सयाह गेसु के साँप नीम- वाबीदा47
ये पछली रात, ये रग-रग म नम-नम कसक
_________________

(जुलाई 1944)

1. नी लमामय दपण 2. नमी 3. अवतरण 4.
ा ड 5. त धता 6. धुँधला वातावरण 7. गम दन के शव का स क़
(मृत शरीर रखने का स क़) 8. आ ाद क आ मा 9. कपोल क 10. काली आँख का जा 11. कला को 12.
धरती 13. चाँद- सतारे 14. ेयसी क सु दरता 15. ेयसी का माथा 16. आकाशगंगा क 17. अपने-आपको दखाने
का जोश 18. काश का 19. ला लमापूण 20. रात के शरीर के काश के 21. सा ीजन क मह फ़ल 22. साफ और
मैली शराब (तलछट) 23. जसक परवाह न हो 24. ल जत हो 25. यमन का लाल 26. अंग-अंग 27. लाल सतारे
क 28. माथे पर 29. शा तपूण 30. भृकु ट का बंक 31. सौग ध क श य क 32. झूम उठ 33. य क
मादकता और रंग 34. परमा मा 35. सौ दय 36. न लता, ग त और भाग-दौड़ 37. अँधेरे के च मे म 38. दल का
39. मृ लता 40. सु दर मु कान 41. दपण बनाने वाले के व का फल 42. आधी रात क न त धता 43. चाँद क
मह फ़ल 44. दल और कान म 45. डू बी ई 46. सजल ने 47. ह क न द म

कुछ ग़मे-जानां, कुछ ग़मे-दौरां
तेरे आने क मह फ़ल ने जो कुछ आहट-सी पाई है,
हर इक ने साफ़ दे खा, शम क लौ लड़खड़ाई है
तपाक और मु कराहट म भी आँसू थरथराते ह,
नशाते-द द1 भी चमका आ दद-जुदाई है
ब त चंचल ह अरबाबे-हवस क 2 उँग लयाँ ले कन,
उ से- ज़ दगी3 क भी नक़ाबे- ख़4 उठाई है
ये मौज के थपेड़े, ये उभरना बहरे-ह ती म5,
बाबे- ज़ दगी6 ये या हवा सर म समाई है?
सुकूते-बहरो-बर क 7 ख़ वत म8 खो गया ँ जब,
उ ह मौक़ पे कान म तेरी आवाज़ आई है
ब त-कुछ यूँ तो था दल म, मगर लब सी लए मने
अगर सुन लो तो आज इक बात मेरे दल म आई है
मोह बत मनी म कारगर है र क का9 ज बा,
अजब सवाइयाँ ह ये अजब ये जग-हँसाई है
मुझे बीमो-रज़ा क 10 बहसे-लाहा सल म11 उलझाकर,
हयाते-बेकराँ12 दर-पदा या- या मु कराई है
हम ने मौत को आँख म आँख डालकर दे खा,

ये बेबाक नज़र क ये मोह बत क ढटाई है
मेरे अश र के13 मफ़ म14 भी ह पूछते मुझसे
बताता ँ तो कह दे ते ह ये तो ख़ुद-सताई15 है
हमारा झूट इक चुमकार है बेदद नया को,
हमारे झूट से बदतर ज़माने क सचाई है

(1934)

_________________

* कुछ मुह बत के ग़म ( य या ेयसी से स ब धत)
** कुछ

नया के ग़म (सांसा रक)

1. दशन का आन द 2. लोलुप क 3. जीवन- पी हन क 4. चेहरे का घूँघट 5. जीवन-सागर म 6. जीवन- पी
पानी का बुलबुला 7. म -पानी (धरती) के मौन क 8. एका त म 9. ई या का 10. भय और ई रे छा 11. थ क
बहस 12. अथाह जीवन 13. शे’र के 14. अथ 15. आ म शंसा

शामे अयादत

( स वल अ पताल, इलाहाबाद म रोग-श या से)

आमदे -महबूब
ये कौन मु कराहट का आगमन लए ए
शबाबो-शेरो-रंगो-नूर का धुआँ लए ए
धुआँ क बक़- न का1 महकता शो’ला कोई,
चुट ली ज़ दगी क शादमा नयाँ लए ए
लब से2 पंखड़ी गुलाब क हयात3 माँगे है
कँवल-सी आँख सौ नगाह-मेहरबाँ लए ए
क़दम-क़दम पे दे उठ है ली ज़मीने-रहगुज़र,4
अदा-अदा म बेशुमार बज लयाँ लए ए
नकलते बैठते दल क आह नगाह म
रसीले ह ट फ़ ले-गुल क 5 दा ताँ लए ए
वो मु कराती आँख जनम र स6 करती है हयात7
शफ़क़ क 8, गुल क , बज लय क शो ख़याँ लए ए
जगाने वाले न मा-ए-सहर9 लब पे मौजज़न10,
नगाह न द लाने वाली लो रयाँ लए ए
वो न गसे- सयाह11, नीमबाज़12, मैकदा-बदोश13,

अँधेरी म त रात क जवा नयाँ लए ए
तगाफ़लो-ख़ुमार14 और बेख़ुद क 15 ओट म,
नगाह इक जहाँ क हो शया रयाँ लए ए
हरी-भरी रग म वो चहकता बोलता ल ,
वो सोचता आ बदन ख़ुद इक जहाँ लए ए
जबीने-नूर16 जस पे पड़ रही है नम छू ट-सी,
ख़ुद अपनी जगमगाहट क कहकशाँ लए ए
ये कौन नौबहारे-नाज़ आया, उ व-उ व म17
जवा नयाँ, जवा नय क आँ धयाँ लए ए
ये कौन आँख पड़ रही है मुझ पे इतने यार से,
वो भूली-सी, वो याद-सी कहा नयाँ लए ए
ये कसक महक -महक साँस ताज़ा कर ग दमाग़
शब के राज़ शबनम क न मयाँ लए ए
ये कन नगाह ने मेरे गले म बाँह डाल द ,
जहान-भर के ख से दद से अमां18 लए ए
नगाहे-यार दे गई मुझे सुकूने-बेकरां19
वो बे-कही वफ़ा क गवा हयाँ लए ए
मुझे जगा रहा है मौत क ग़नूदगी से20 कौन
नगाह म सुहागरात का समाँ लए ए
मेरी अफ़सुदा21 और बुझी ई जब को22 छू लया
ये कस नगाह क करन ने साज़े-जाँ लए ए
सुते-से चेहरे पर हयात रसमसाई, मु कराई
न जाने कब के आँसु क दा तां लए ए
तब सुमे-सहर23 ये ह पताल क उदास शाम,
ये कौन आ गया नशाते-बेकरां24 लए ए।

तेरे न आने तक अगच मेहरबाँ था इक जहाँ,
म रो के रह गया ँ सौ ग़मे- नहाँ25 लए ए।
‘ फ़राक़’ आज पछली रात य न मर र ँ क अब
हयात ऐसी शाम ह गी फर कहाँ लए ए
(1943)
_________________

* जस शाम को कोई रोगी क दशा पूछने आए ** ेयसी का आगमन
1. सु दरता क बजली का 2. ह ठ से 3. जीवन 4. माग क ज़मीन 5. वस त ऋतु क 6. नृ य 7. जीवन 8. उषा क
9. भात-गान 10. लहराते ए 11. काली न गस (आँख) 12. अधखुली 13. कंधे पर मधुशाला लए ए 14. बे खी
और उ माद 15. आ म- व मृ त क 16. यो त का माथा 17. अंग-अंग म 18. पनाह 19. अथाह शा त 20. त ा
21. मलीन 22. माथे को 23. भात क मु कान 24. असीम आन द 25. गु त ःख

जुदाई
शजर-हजर पे ह ग़म क घटाएँ छाई ई
सुबुक ख़राम हवा को न द आई ई
रग ज़म के मना ज़र क पड़ चल ढ ली
लव फ़लक के चराग़ क झल मलाई ई
ये ख़ ताहाली, ये दरमाँदगी, ये स ाटा
फ़ज़ा-ए-नीमशबी भी है सनसनाई ई
धुआँ धुआँ से मना ज़र ह शबन म ताँ के
सयाह रात क ज फ़ ह रसमसाई ई
ये रंग तार भरी रात के तन फ़स का
क बू-ए-दद म हर साँस है बसाई ई
ख़ुनुक़ उदास फ़ज़ा क आँख म आँसू
तरे फ़राक़ क ये ट स है उठाई ई
सुकूते नीमशबी गहरा होता जाता है
रग ह सीन-ए-ह ती क तल मलाई ई
है आज साज़े-नबाहा-ए-ख़ूचकाँ, ऐ दो त,
हयात तेरी जुदाई क चोट खाई ई
मरी इन आँख से अब न द पदा करती है
जो तरे पंज-ए-रंग क थ जगाई ई
स र क पाले ए तेरे नम दामन के
नशात तेरे तब सुम से जगमगाई ई
लटक वो गेसु क जैसे पेचो-ताबे-कमंद
लचक वो भव क जैसे कमाँ झुकाई ई
सहर का जैसे तब सुम दमक वो माथे क

करन सुहाग क बद क लहलहाई ई
वो अँख ड़य का फ़सू,ँ प क वो दे वी यत
वो सीना हे-नुमूँ जसम कुनमुनाई ई
वो सेज साँस क ख़ु बू को जस पे न द आए
वो क़द गुलाब क इक शाख़ लहलहायी ई
वो झल मलाते सतारे तरे पसीने के
जबीने-शामे-जवानी थी जगमगाई ई
हो जैसे बुतकदा आज़र का बोल उठने को
वो कोई बात-सी गोया लब तक आई ई
वो धज, वो दलबरी, वो काम प आँख का
सजल अदा म वो रागनी रचाई ई
वो वाबगाह म शोल क करवट दमे-सुबह
वो भैरवी तेरी बेदा रय क गाई ई
वो मु कुराती ई लु फ द द क सुबह
तरी नज़र क शुआ क गुदगुदाई ई
लगी जो तेरे तस वुर के नम शोल से
हयाते-इ क़ है उस आँच क तपाई ई
हनोज़ व के कान म छमछमाहट है
वो चाप तेरे क़दम क सुनी-सुनाई ई
हनोज़ सीना-ए-माज़ी म जगमगाहट है
दमकते प क द पावली जलाई ई
ल म डू बी उमंग क मौत रोक ज़रा
हरीमे- दल म चली आती है ढठाई ई
रहेगी याद जवाँ बेबगी मुह बत क
सुहाग राग क वो चू ड़याँ बढ़ाई ई
ये मेरी पहली मुह बत न थी, मगर ऐ दो त
उभर गई ह वो चोट दबी-दबाई ई
सुपुदगी-ओ-खुलूसे- नहाँ के पद म
तो तरी नम नगाही क थ बठाई ई
उठा चुका ँ म पहले भी ह के सदमे
वो साँस खती ई आँख डबडबाई ई
ये हादसा है अजब तुझको पा के खो दे ना

ये सा नहा है ग़ज़ब तेरी याद आई ई
अजीब दद से कोई पुकारता है तुझे
गला ँ धा आ, आवाज़ थरथराई ई
कहाँ है आज तू ऐ रंगो-नूर क दे वी
अँधेरी है मरी नया लुट लुटाई ई
प ँच सकेगी भी तुझ तक मेरी नवा-ए-‘ फ़राक़’
जो कायनात के अ क म है नहायी ई?

हडोला
(ब च के, और बचपन के बारे म एक ल बी न म के स पा दत अंश)
दयारे- ह द1 था गहवारा2, याद है हमदम?
ब त ज़माना आ कसके कसके बचपन का
इसी ज़मीन पे खेला है राम का बचपन
इसी ज़मीन पे उन न ह-न ह हाथ ने
कसी समय म धनुषबाण को सँभाला था
इसी दयार ने दे खी है कृ ण क लीला
यह घर द म सीता, सुलोचना, राधा
कसी ज़माने म गु ड़य से खेलती ह गी
यह ज़म , यही द रया, पहाड़, जंगल, बाग़
यही हवाएँ, यही सु हो-शाम, सूरज-चाँद
यही घटाएँ, यही बक़ -रादो, क़ौसे-क़ज़ह3
यह के गीत, रवायात, मौसम के जुलूस
आ ज़माना क स ाथ के थे गहवारे
इ ह म आँख खुली थी अशोके-आज़म क
इ ह नज़ार म बचपन कटा था व म का
सुना है भथहरी भी इ ह से खेला था
भरत, अग त, क पल, ास, पा णनी, कौ ट य,
जनक, व श , मनू, वा मी क, व ा म ,
कणाद, गौतमी, रामानुज, कुमा रल भ ,
मोहनजोदाड़ो-हड़ पा के और अजंता के
बनाने वाले यह ब लम से खेले थे
इसी हडोले म भवभू त, का लदास कभी
मक मक के जो तुतलाए गुनगुनाये थे
सर वती ने ज़बान को उनक चूमा था
यह के चाँद व सूरज खलौने थे उनके

इ ह फ़ज़ा म बचपन पला था ख़ुसरो का
इसी ज़म से उठे तानसेन और अकबर
रहीमो-नानको-चैत य और च ती ने
इ ह फ़ज़ा म बचपन के दन गुज़ारे थे
इसी ज़म पे कभी शाहज़ादा-ए-ख़ुरम
ज़रा-सी दल शकनी पे जो रो दया होगा
भर आया था दले नाजक तो या अजब उसने
उन आँसु म झलक ताज क भी दे खी हो,
अह याबाई, दमन, प नी, औ-र ज़या ने
यह के पेड़ क शाख़ म डाले थे झूले
इसी फ़ज़ा म बढ़ाई थी पग बचपन क
इ ह नज़ार म सावन के गीत गाये थे
इसी ज़मीन पे घुटन के बल चले ह गे
म लक मुह मदो-रसखान और तुलसीदास,
इ ह फ़ज़ा म गूँजी थी तोतली बोली
कबीरदास, तुकाराम, सूरो-मीरा क ,
इसी हडोले म व ापती का कंठ खुला
इसी ज़मीन के थे लाल मीरो-ग़ा लब भी
ठु मक ठु मक के चले थे घर के आँगन म,
अनीसो-हाली-ओ-इक़बाल और वा रसशाह
यह क ख़ाक से उभरे थे ेमचंदो-टै गोर
यह से उ े थे तहज़ीबे- हद के मेयार4
इसी ज़मीन ने दे खा था बालपन उनका,
यह दखा थ इन सबने बाल लीलाएँ
यह हर एक के बचपन ने तर बयत5 पाई
यह हर एक के जीवन का बालकांड खुला,
यह से उठते बगूल के साथ दौड़े ह
यह क म त घटा के साथ झूमे ह
यह क मद-भरी बरसात म नहाए ह
लपट के क चड़ो-पानी से बचपने उनके,
इसी ज़मीन से उ े वो दे श के सावंत
उड़ा दया था ज ह क पनी ने तोप से
इसी ज़मीन से उ ह अन गनत न ल
पले ह हद- हडोले म अन गनत ब चे,
मुझ ऐसे कतने ही गुमनाम ब चे खेले ह
मुझ ऐसे कतने ही गुमनाम मद -ज़न उ े
इस ज़म से, इसी म सुपुद-ख़ाक ए
ज़मीने- हद अब आरामगाह है उनक …

ज़मीने- हद है गहवारा आज भी हमदम
अगर हसाब कर दस करोड़ ब च का
ये ब चे हद क सबसे बड़ी अमानत ह
हरेक ब चे म है सद जहाने-इ कानात;6
मगर वतन का हलो-अ द जनके हाथ म है
नज़ामे- ज़दगी-ए- हद जनके बस म है
रवैया दे ख के उनका ये कहना पड़ता है
कसे पड़ी है क समझे वो इस अमानत को
कसे पड़ी है क ब च क ज़दगी को बचाये
ख़राब होने से, मटने से, सूख जाने से,
बचाये कौन इन आजदा7 होनहार को
वो ज़दगी जसे ये दे रहे ह भारत को
करोड़ ब च के मटने का एक अल मया8 है…
वो ब चे, छन गए ह जनसे बचपने उनके
हम ने घ ट दया जनके बचपने का गला,
जो खाते-पीते घर के ह ब चे उनको भी या
समाज फूलने-फलने के दे सका साधन?
वो साँस लेते ह तहज़ीबकुश फ़ज़ा म9
हम उनको दे ते ह बेजान और ग़लत तालीम,
मलेगा इ मे-जहालतनुमा से या उनको?
नकल के मदरस और यू नव स टय से
ये बदनसीब न घर के न घाट के ह गे—
म पूछता ँ ये तालीम है क म कारी?…
ये उ टा दस-अदब10, ये सड़ी ई तालीम
दमाग़ क हो ग़ज़ा या ग़ज़ा-ए- ज मानी
हरेक तरह क ग़ज़ा म यहाँ मलावट है,
वो जसको ब च क तालीम कह के दे ते ह
वो दस11 उलट छु री है गले पे बचपन के,
ज़मीने- हद हडोला नह है ब च का
करोड़ ब च का ये दे श अब जनाज़ा है,
हम इं कलाब के ख़तर से ख़ूब वा क़फ ह
कुछ और रोज़ यही रह गए जो लैलो- नहार
तो मोल लेना पड़ेगा हम ये ख़तरा भी
क ब चे कौम क सबसे बड़ी अमानत ह
_________________

1. हद दे श 2. हडोला, 3. बजली क कड़क और इं धनुष 4. भारत क स यता के

य 5. लालन-पालन, तालीम

6. नया-भर क सैकड़ संभावनाएँ 7. सताए ए और खी 8. खद घटना या संग 9. स यता का गला घोटने
वाला वातावरण 10. सा ह य- श ा 11. श ा-प त

दा ताने आदम

(ल बी न म के संपा दत अंश)
क़रन 1 के मटाने से मटे ह न मटगे
आफ़ाते-ज़माना2 से झुके ह न झुकगे
उभरे तो दबाने से दबे ह न दबगे
हम मौत के मारे भी मरे ह न मरगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
गो बहरो-बरो-चख़3 मटाने पे तुले ह
उभरे ए कोहसार के तेवर भी कड़े ह
बेदद अना सर4 भी ब त बफ़रे ए ह
बन-बन के मट जाएँग,े मट- मट के बनगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
इंसान ह और चार तरफ़ वाद -ए-पुरख़ार5
पुरहौल मना ज़र का वो माहौल शररबार6
वो बोलते स ाटे वो ज़दाँने-शबे-तार7
कमज़ोर ह पर ज े-मशी यत8 से लड़गे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
कुछ पूछो न फ़तरत का जो बताव था हमसे
हर ल हा फटे पड़ते थे सौ कोहे-अलम से
दल क न बुझी शमा कभी दामने-ग़म से
ह ती के नशात अपनी मुराद से पलगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
ऐ हे-ज़म 9, हे-ज़याँ, हे-मकाँ ख़ेज़10

ऐ जाने-जहाँ, जाने-जहाँ, जाने-जहाँ ख़ेज़
अज़ ख़ाबेगराँ, ख़ाबेगराँ, ख़ाबेगराँ ख़ेज़11
हम शा हदे -तारीख़ को बेदार12 करगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
जब द ते-नवद के मना ज़ल से13 बढ़ आए
गुर खानाबदोशी को ज़राअत के14 सखाये
पुरअ न सुकूनत15 के लए गाँव बसाये—
कल अपने ही क़दम के तले शहर बसगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
खेत को सँवारा तो सँवरते गये ख़ुद भी
फ़सल को उभारा तो उभरते गए ख़ुद भी
फ़तरत को नखारा तो नखरते गए ख़ुद भी
नत अपने बनाये ए साँच म ढलगे,
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
बे-फ़ैज़ीए- फ़तरत का न रोना है न धोना
म क ज़म भी तो उगलने लगी सोना
सोई ई धरती को है कुछ और ही होना
मं ज़ल को जगा दगे जहाँ पाँव धरगे,
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
उन वा दय को जनम नह बा रशे-रहमत16
उन घा टय को जनम उड़े गद-कु रत17
उन खा ड़य को जनम नह बू-ए-लताफ़त18
हम अहले-ज़म कशे- फद स करगे19
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
अब व त के सीने म चटकने लग क लयाँ
अब रंग पर आये ह फ़ज़ा के गु ल ताँ
शबनम क खनक, गुल क दमक सौते-हज़ाराँ20
हम ख़ुद ही गुलो-बुलबुलो-स याद बनगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
अल क़ सा ज़माने को पड़ी इसक ज़ रत
बट जाए कई त क़ म इंसान क म लत

तहज़ीब बढ़े , इस लए वो जनक है कसरत
गदन पे जुवा बारे-ग़लामी का धरगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
तहज़ीब को परवान चढ़ाया है हम ने
तारीख़ को हर दस21 पढ़ाया है हम ने
स यार क ग दश को22 बढ़ाया है हम ने
अब श सो-क़मर23 अपने इशार पे चलगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
वीरान को ज़ीशान24 बनाया है हम ने
धरती को प र तान बनाया है हम ने
इंसान को इंसान बनाया है हम ने
या- या न कया इ क़ म, या- या न करगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
सौ रंग से नया को हम आबाद करगे
हर गाम पे नया नयी ईजाद करगे
हम इसको सुहागन क तरह शाद करगे
धरती क हम उजड़ी ई माँग भरगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
सावंती ज़माने से है बढ़ कर ये ज़माना
खुलता है नहारख़ान-ए- फ़तरत का ख़ज़ाना25
अब गेसू-ए-दौराँ नह म तकशे-शाना26
माज़ी क नगाह को ये दन ख़ीरा करगे27
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
साइ स के ये मो जज़े28 ईजाद के ये दौर
नया के सब आईन29 तमद न के सभी तौर30
बदलगे अभी और, अभी और, अभी और
तारीख़ क र तार31 ब त तेज़ करगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
कल-पुज़ क र तार म है बक़ क सुरअत32
अब दे खते ही दे खते आयेगी ये नौबत
सामान क इफ़रात ख़रीदार क क़ लत

बाज़ार नये ढूँ ढ़ने से भी न मलगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
बाज़ार क ख़ा तर वो बड़ी जंग छड़ेगी
नया के कई ह स म इक आग लगेगी
इस जंग म मज़ र क तक़द र खुलेगी
सरमायापर त33 इक नयी आफ़त म पड़गे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
अब ज म के ऐवान34 क बु नयाद हलेगी
इस ज़लज़ले म ट से यूँ ट बजेगी
कान पड़ी आवाज़ सुनाई नह दे गी
घराते ए कँगूरे इस घर के गरगे
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
वो हद क तहज़ीबो-तमद् न35 के ज़माने
अफ़साना-दर-अफ़साना ह यार के फ़साने
सु तानी-ए-जम र36 के गा-गा के तराने
फर हद के क़ा बल म नई ह भरगे37
हम ज़दा थे, हम ज़दा ह, हम ज़दा रहगे…
_________________

1. स ग या वषाण के 2. युग क वप य 3. समु , आसमान आ द 4. पंचत व 5. काँट से भरी घाट 6. ख़ौफ़नाक
ह य का वह अंगारे बरसाता वातावरण 7. क़ैदख़ाने जैसी बेहद अँधेरी रात 8. कृ त क याद तय व अ याचार से
9. धरती क आ मा 10. ‘वाले’ यय, जैस—
े ‘धरती क आ मावाले’ 11. सुनहरे सपन वाले 12. इ तहास के सा ी
को जगाएँगे 13. बनैले या जंगली जीवन क मं ज़ल से 14. खानाबदोश या बनजार को खेती करने के तरीके 15.
शा तपूण जीवन- नवाह 16. रे ग तानी घा टयाँ, जहाँ बरसात नह होती 17. धूल-ध कड़ और गंदगी है 18. शु हवा
19. सारी धरती को हम वग-जैसा बनाएँगे 20. प रद क चहचह, 21. पाठ या श ा 22. तार क ग त को 23.
सूरज और चाँद 24. हरा-भरा, सरस ज़ 25. भा य का गु त खज़ाना 26. नया दौर कसी क दया का मुहताज नह
होगा 27. पुराने नज़ रये को नया दौर अथहीन कर दे गा 28. व ान के कारनामे 29. क़ायदा-कानून 30. नाग रक
जीवन के सभी तौर-तरीक़े 31. इ तहास क ग त 32. बजली क सी फ़त 33. पूँजीप त 34. अ याय और अ याचार
वाली कूमत क 35. स यता और नाग रकता 36. गणता क शासन-प त 37. ह तान क यो यता और
द ता म फर से नयी आ मा पैदा करगे

एक न म
न पूछ या काम कर गई है दल-ो-नज़र म उतर गई है
तेरी नज़र सब को आज़माए तेरी नज़र कौन आज़माए
शगु ता1 दल को न कर सकेगा का- का ज़ेरे-लब तब सुम2
म उन लब पर कभी तो दे खूँ वो मु कराहट जो मु कराए
हयाते-फ़ानी3 से बढ़ के फ़ानी नगाहे-बक़ -शरर4 से कमतर
ये इ क़ है तो सलाम अपना यही वफ़ा है तो बाज़ आए
तू इस तरह याद आ रहा है क शामे-ग़म म म डर रहा ँ
कह न आ जाए मेरे दल म वो याद जो तुझको भूल जाए
हज़ारहा दल तड़प-तड़प कर ब-यक अदा मट के रह गए ह
न पूछ या उन दल पे गुज़री जो रह गए थे बचे-बचाए
फ़ र त और दे वता का भी जहाँ से ार था गुज़रना
हयात कोस नकल गई है तेरी नगाह के साए-साए
हज़ार हो इ म-ो-फ़न म यकता5 अगर न हो इ क़ आदमी म
न एक ज. र का राज़ समझे न एक क़तरे क थाह पाए
ख़ताब6 बेल ज़ कर गए ह पयामे-ख़ामोश दे गए ह
वो गुज़रे ह इस तरफ़ से, जस दम बदन चुराए नज़र बचाए
मेरे लए व त वो है जस दम ‘ फ़राक़’ दो व त मल रहे ह
वो शाम जब ज फ लहलहाए वो सुबह चेहरा रस मसाए
(1955)

_________________

1. फु टत 2. ह ठ -ही-ह ठ म मु कराना 3. न र 4. बजली और चगारी क आँख 5. अ तीय 6. स बोधन

बाइयाँ

बाइयाँ
इ सान के पैकर म1 उतर आया है माह2
क़द या चढ़ती नद है अमृत क अथाह
लहराते ए बदन पे पड़ती है जब आँख
रस के सागर म डू ब जाती है नगाह
वो पग है प म क बजली लहराए
वो रस आवाज़ म क अमृत ललचाए
र तार म3 वो लचक पवन-रस बल खाए
गेसु

म4 वो लटक क बादल मँडलाए

है प म वो खटक, वो रस, वो झंकार,
क लय के चटकते व त जैसे गुलज़ार5
या नूर क 6 उँग लय से दे वी कोई
जैसे शबे-माह7 म बजाती हो सतार
क़तरे अरक़े- ज म के8 मोती क लड़ी
है पैकरे-नाज़न 9 क फूल क छड़ी
ग दश म नगाह है क बटती है हयात10
ज त भी है आज उ मीदवार म खड़ी
सहरा म ज़मा11, मकाँ12 के खो जाती ह

स दय बेदार13 रह के सो जाती ह
अ सर सोचा कया ँ ख़ वत म14 ‘ फ़राक़’
तहज़ीब य ग़ ब15 हो जाती ह
नया म अब इस मज़ के बीमार नह
इस दौर म16 सतजुग के पर तार17 नह
इस र माल क नकासी है मुहाल18
बाज़ार म माज़ी के19 ख़रीदार नह
प डत जी, शैख़ जी, महाजन, क़ाज़ी
अब लड़- भड़कर ए ह इस पर राज़ी
जनता को लगी रट नई नया क
मलकर नारा लगाओ माज़ी, माज़ी
संयोग- वयोग क कहानी न उठा
पानी म भीगते कँवल को दे खा
बीती ह गी सुहाग रात कतनी
ले कन है आज तक कँवारा नाता
दन डू ब गया रात क अँ धयारी है
आलम पे सुकूते-तीरगी तारी है20
तारे नकल आए दाग़े-सीना21 चमके
वो आँख क , ये क़ ब क 22 बेदारी23 है
नया जो सँवर जाए सँवर जाने दे
नया जो नखर जाए नखर जाने दे
ये फ़सते-न ज़ारा ग़नीमत है ‘ फ़राक़’
दल पे जो गुज़र जाए गुज़र जाने दे
बेहाल ‘ फ़राक़’ इतना न हो दल तो टटोल
कस सोच म है सर तो उठा आँख तो खोल
ये सोज़े-हयात24 साज़े-ग़म क ये लौ

दहक

ई आग है क हीरा अनमोल

दोशीज़ा25 पंखड़ी को शबनम26 धो जाए
जैसे शो’ल क जगमगाहट खो जाए
पछले पहर को ख़ुमारे- ज मे-नाजक27 जैसे
क लय के लब पे मु कुराहट सो जाए
आ जाता है न म सलोनापन और
चंचलपन, बालपन, अनेलापन और
कटते ही सुहाग रात दे ख जो उसे
बढ़ जाता है ह का कँवारापन और
सोने वाल को या जगाती

नया

थे कौन फ़साने28 जो सुनाती नया
नया का भरम खुला न पूछो कस व त
जब आँख खुली तो दे खी जाती नया
जो रंग उड़ा वो रंग आ ख़र लाया
दद -ग़मो-सोज़ो-साज़ या- या पाया
सब जीने का मज़ा मला मोह बत करके
सद29 शु

‘ फ़राक़’ दल को खना आया

या कहते थे इसका तो कसे होश रहा
हाँ ब म म30 तक़रीर का इक जोश रहा
दे खा जो ये रंग होश वाल का ‘ फ़राक़’
द वाना भी कुछ सोच के ख़ामोश रहा
उट् ठे गी उ ह क आँख तेरे आगे
कब माक से31 वफ़ा के पुतले भागे
आई थी ज ह न द सरे-दारो-रसन32
ले अब वो तेरे दे खने वाले जागे

करते नह कुछ तो काम करना या आये
जीते जी जाँ से गुज़रना या आये
रो-रो के मौत माँगने वाल को,
जीना नह आ सका तो मरना या आये
घर छोड़े
क कोई मं ज़ल न सही
होती नह सहल कोई मु कल न सही
ह ती क ये रात काट दे ने के लए
वीराना सही, कसी क मह फ़ल न सही
खोते ह अगर जान तो खो लेने दे
जो ऐसे म हो जाए वो हो लेने दे
इक उ पड़ी है स भी कर लगे
इस व त तो जी भर के रो लेने दे
हर ज वे से इक दस-नुम33
ू लेता ँ
छलके ए सद34 जामो-सुबू लेता ँ
ऐ जाने-बहार तुझ पे पड़ती है जब आँख
संगीत क सरहद को छू लेता ँ
नया को कसी नौ 35 से ये राज़ मले
नया के कसी साज़ से ये साज़ मले
नया को तो हम दे ते सुकूने-जावेद
कुछ दल के धड़कने का भी अ दाज़ मले
ऐ ज़ दगी - ए - ग़म तेरी वहशत दे खी
तेरी नैरंगी - ए - तबीयत दे खी
खुलते नह तेरे भेद, मने तुझ म
हँस दे ने क रोते-रोते आदत दे खी
रंगत है क घुँघ
क म म झंकार
जोबन है क पछली रात बजता है सतार
सरशार फ़ज़ा

क 36 रग टू टती ह

चटकाता है उँग लयाँ जवानी का ख़ुमार
_________________

1. शरीर म 2. चाँद 3. चाल म 4. केश म 5. वा टका 6. यो त क 7. चाँदनी रात म 8. शरीर के पसीने के 9. सु दरी
का शरीर 10. जीवन 11.-12. समय और वशालता (Time and Space) 13. जा त 14. एका त म 15. अ त 16.
काल म 17. शंसक 18. क ठन 19. अतीत के 20. संसार पर अंधेरे क शा त का रा य है 21. छाती अथवा दल के
दाग़ 22. दल क 23. जागरण 24. जीवन क तपन 25. सुकुमार, नई खली 26. ओस 27. रात के पछले पहर म
नाजक बदन क म दरालस म ती, हष, गव 28. कहा नयाँ 29. सौ 30. मह फ़ल म 31. यु से 32. सूली पर 33.
वकास का पाठ 34. सैकड़ 35. तरह 36. उ म वातावरण क

शे’र और क़त्ए

शे’र और क़त्ए
मासूम है मोह बत ले कन इसी के हाथ
ऐ जाने-इ क़ मने तेरा बुरा भी चाहा
इक तेरे छू टने का ग़म, एक ग़म उनसे मलने का
जनक इनायत से जी और उदास हो गया
तू याद आए तेरे जौरो-जफ़ा1 ले कन न याद आए
तस वुर म2 ये मासूमी बड़ी मु कल से आती है
रहा है तू मेरे पहलू म इक ज़माने तक
मेरे लए तो वही ऐन ह

के3 दन थे

फ़रेबे-अहदे -मोह बत क 4 सादगी क क़सम
वो झूट बोल क सच को भी यार आ जाए
दये जाता ँ तेरी याद को राह
तुझे सौ-सौ तरह भुलाता ँ
दोन आलम कह न टकरा जाएँ
मौत ने साज़े- ज़ दगी छे ड़ा
तुझको तो ग़रज़ या मेरे इस हाल से ऐ दो त
शायद क मेरा दद ज़माने के लए है
रयाज़े-द म5 झूट हँसी भी हमने दे खी है
दबाने के लए हर दद, ओ नादाँ, नह होता!

मुझे ख़बर नह ऐ हमदमो6, सुना ये है
क दे र-दे र तक अब म उदास रहता ँ
फर ये कैसी कसक-सी है दल म
तुझको मु त ई क भूल चुका
बनाकर हमको मट जाते ह ग़म भी शादमानी7 भी
हयाते-च द-रोज़ा8 है हक़ क़त9 भी कहानी भी
हयात हो क अज़ल10 सबसे काम ले ग़ा फ़ल11
क मु तसर12 भी है कारे-जहाँ13 दराज़14 भी है
आज आँख म काट ले शबे- ह
ज़ दगानी पड़ी है सो लेना
हम से या हो सका मोह बत म
ख़ैर तुमने तो बेवफ़ाई क
आज तो दद- ह भी कम है
आज तो कोई आ गया होता
ख़राब होके उठा ँ तेरी नगाह से
म सोचता ँ क नया सँवर गई होगी
इ क़ नया से बेख़बर है मगर
पेट क बात जान लेता है
वफ़ा-जफ़ा म तेरी इ तयाज़15 सहल न था
समझ-समझ के मोह बत भी आज रोई है
कौन ये ले रहा है अँगड़ाई
आ मान को न द आती है
चुप हो गए तेरे रोने वाले
नया का ख़याल आ गया है
शबे- वसाल के16 बाद आईना तो दे ख ज़रा
तेरे जमाल क 17 दोशीज़गी18 नखर आई

मं ज़ल गद क मा न द19 उड़ी जाती ह
वही अ दाज़े - जहाने - गुज़राँ20 है क जो था
ह म पहली नगाह का ज़
कब याद आई कब क बात
अभी फ़तरत से21 होना है नुमायाँ22 शाने-इ सानी23
अभी हर चीज़ म महसूस होती है कमी अपनी
ये ज़ दगी के कड़े कोस, याद आता है
तेरी नगाहे - करम का24 घना-घना साया
ब त दन म मोह बत को हो सका मालूम
यही क तुझको ज़ रत नह मोह बत क
अपने घर का हर इक राजा
इ क़ का घर परदे स है ले कन
शऊरे-इ क़25 क तकमील26 हो चुक शायद
न भूलता है कोई अब न याद आता है
कहाँ वो ख़लवत27 दन-रात क और अब ये आलम28 है
क जब मलते ह दल कहता है कोई तीसरा होगा
अजब या कुछ दन के बाद अब नया भी नया हो
ये या कम है मोह बत को मोह बत कर दया मने
हस भी हो तुम अ छे आदमी भी हो, गला29 ये है
मोह बत वाल से तुमको मोह बत है मगर कम-कम
म दे र तक तुझे ख़ुद ही न रोकता ले कन
तू जस अदा से उठा है, उसी का रोना है
कया है सैर गहे- ज़ दगी म30 ख़31 जस स त32
तेरे याल से टकरा के रह गया ँ म
ख़फ़ा हो जा, जो म फ़क़त म33 ग़मग ँ, ख़फ़ा हो जा
क तेरी नाख़ुशी से बढ़के तेरी क़ है मुझको

हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई-नई-सी है कुछ तेरी रहगुज़र34 फर भी
ग़रज़ क काट दए ज़ दगी के दन ऐ दो त
वो तेरी याद म ह या तुझे भुलाने म
मुनासबत भी है कुछ ग़म से मुझको ऐ दो त
ब त दन से तुझे मेहरबाँ नह पाया
कुछ आदमी को ह मजबू रयाँ भी नया म
अरे वो दद-मोह बत सही, तो या मर जाय?
कूचे जानां के35 भी इक मु त से ह आहट पे कान
अहले-ग़म36 के कारवाँ, कन वा दय म खो गए?
थी यूँ तो शामे- ह 37 मगर पछली रात को
वो दद उठा ‘ फ़राक़’ क म मु करा दया
हम भी दे ख जो इस दद से कुछ होश म आए
अरे द वाना हो जाना मोह बत म तो आसाँ38 है
ज़ दगी को भी मुँह दखाना है
रो चुके तेरे बेक़रार ब त
मोह बत म मेरी त हाइय के ह कई उनवाँ39
तेरा आना, तेरा मलना, तेरा उठना, तेरा जाना
अगर मुम कन हो तो सौ-सौ जतन से
ज़ीज़ो! काट लो ये ज़ दगी है
इ क़ क दाद मल रहेगी मुझे
काश तुम अपनी क़ जान सको
कई बज लयाँ बे- गरे गर पड़ी ह
इन आँख को अब याद आ गया मु कराना
कहाँ हर एक से बारे- नशात40 उठता है
बलाएँ ये भी मोह बत के सर गई ह गी

कुछ नह कहत वो नगाह मगर
बात प ँचती है कहाँ-से-कहाँ
तेरे ख़याल म तेरी जफ़ा शरीक41 नह
ब त भुला के तुझे कर सका ँ याद तुझे
उ ह सुनते ही जन अश र म42 त वीर थी तेरी
नुमायाँ43 था तेरे चेहरे पर इक ज बा रक़ाबत का44
वो लम45 और ही है जसम मीठ न द आ जाए
ग़मो-शाद 46 म सोने के लए रात नह होत
आज रग-रग म जान दौड़ गई
मौत ने ज़ दगी को छे ड़ दया
जसे अपने-आप से कहते भी मुझे आज लाख हजाब47 है
वो ज़माना इ क़ को याद है मेरा अज़-ग़म48 तेरे

ब

49

तुझे पा के ख़ुद को म पाऊँगा क तुझी म खोया आ ँ म
ये तेरी तलाश है इस लए क मुझे है अपनी ही जु तजू
ऐ ‘ फ़राक़’ उ ह पा कर हम ये दल म कहते ह
सो चए तो मु कल है दे खए तो आसाँ है
क ती-ए- दल50 बचाइए इतना मगर रहे याल
डू बे अगर तो पार हो, पार लगे तो डू ब जाये
म आज सफ़ मोह बत के ग़म क ँ गा याद
यह और बात क तेरी भी याद आ जाए
मौत का भी इलाज हो शायद
ज़ दगी का कोई इलाज नह
ख़ता51 के बाद नदामत भी इ क़ को न मली
नगाहे-नाज़52 ये कहती है कोई बात नह
कोई समझे तो एक बात क ँ
इ क़ तौफ़ क53 है गुनाह नह

ग़म म तेरे जीने वाल को
दे ती है ख़ुद मौत दलासा
ह म आठ पहर का रोना
बात ज़रा-सी ग़म इतना-सा
कुछ ऐसा रंज-े जुदाई भी था न आज, मगर
सुकूने-नीमशबी म54 ब त तू याद आया
न से कब तक पदा करते
इ क़ से कब तक पदा होता
जीने वाले जी लगे
अब न मलोगे अ छ बात
लम- लम55 इ क़ भी तनहा
त हा न भी लम- लम
सोती क़ मत च क उठ
तू बोला या जा बोला
म आ माने-मोह बत से सते-शब56 ँ
तेरा ख़याल कोई डू बता सतारा है
शाम भी थी धुआँ-धुआँ न भी था उदास-उदास
दल को कई कहा नयाँ याद-सी आ के रह ग
उमीदो-यास57, वफ़ा-ओ-जफ़ा, फ़राक़-ओ- वसाल58
मसाइल59 इ क़ के इनके सवा कुछ और भी ह
ग़रज़ क होश म आना पड़ा मोह बत को
हम को दे ख ल द वाने तेरे र न जाएँ
ज़ दगी या मौत या दो करवट ह इ क़ क
सोने वाले च क उट् ठगे क़यामत भी तो हो
न समझने क ये बात ह न समझाने क
ज़ दगी उचट ई न द है द वाने क

यही कहती ई साग़र से उठ मौजे-शराब60
है तहे-जाम61 भी इक चीज़ अगर होश रहे
मोह बत नाम था नया म इक पैहम कशाकश का62
क अपनी ज़ दगी भी थी कभी तेरी कभी अपनी
क़ैद या, रहाई या, है हम म हर लम63
चल पड़े तो सहरा64 है, क गए तो ज़दाँ है
तू न चाहे तो तुझे पा के भी नाकाम रह
तू जो चाहे तो ग़मे- ह भी आसाँ हो जाए
फ़रेब-े स 65 खाकर मौत को ह ती समझ बैठे
न आया बेक़रारी को हयाते-जा वदाँ66 होना
मज़हब कोई लौटा ले और उसक जगह दे -दे
तहज़ीब सलीक़े क , इ सान करीने के
जो ज़हरे-हलाहल है अमृत भी वही नादाँ
मालूम नह तुझको अ दाज़ ही पीने के
ऐ भूल न सकने वाले तुझको
भूले न रह तो या कर
तू एक था मेरे अश र म67 हज़ार आ
इस इक चराग़ से कतने चराग़ जल उट् ठे
जससे कुछ च क पड़ सोई ई तक़द र
आज होता है उन आँख का इशारा भी कहाँ!
म ये कहता ँ क अफ़लाक से68 आगे ँ ब त
इ क़ कहता है अभी दद- दल उट् ठा भी कहाँ
राज़दाँ हाले-मोह बत का नह म, ले कन
तुमने पूछा भी कहाँ, मने बताया भी कहाँ
त करा69 उस नगहे-नाज़ का दल वाल म
दो तो, छे ड़ दया तुमने ये क़ सा भी कहाँ

तेरा अ दाज़े-तग़ाफ़ल70 है खुला राज़, मगर
इ क़ क आँख से उठता है ये पदा भी कहाँ
ज़ त क ताब न थी फरते ही वो आँख ‘ फ़राक़’
आज पैमाना-ए- दल हाथ से छू टा भी कहाँ

(1938)

इ क़-बेबाक को71 रोके ए है और ही कुछ
वाब-आलूदा72 नगाह तेरी बेदार73 सही
तेरी आ ह ता- ख़रामी74 भी सुकूने- दल75 है
इस र वश म76 भी तेरी शोख़ी - ए - र तार77 सही
कारवान को वो गुमराह न होने दे गा
इ क़ क आख़री मं ज़ल रसनो-दार78 सही॥
नगाहे-शौक़ म79 फर भी ह तेरे ही ज वे
न सही द द80, तेरी हसरते-द दार81 सही
मेरे इसरारे-मोह बत82 को अगर आँख नह
तेरे इ कार से पैदा तेरा इक़रार सही
जो सरे-ब म83 छलक जाए वो पैमाना है
यूँ तो ग दश म हरइक साग़रे-सरशार84 सही
आलमे-कुद्स85 क पड़ती ह इ ह पर छ ट
न बदम त सही, इ क़ सयाहकार86 सही
बेख़बर! इ क़ म जीने के लए ज द कर
जान दे ने के लए फ़सते- ब यार87 सही
फर भी है क़ा बले-ताज़ीर88 क मुज रम है ‘ फ़राक़’
हमने माना क मोह बत का गुनहगार सही
(1939)
कर गई काम वो नज़र, गो उसे आज दे खकर
दद भी उठ सका नह , रंग भी उड़ सका नह
तेरी कशीदगी म89 आज शाने-सुपुदगी90 भी है
न के बस म या है और, इ क़ के बस म या नह
इससे तो कु 91 ही भला, जो है इसी जहान का
ऐसे ख़ुदा से या, जसे फ़सते-मा सवा92 नह

वो कोई वारदात93 है, जसको कह क हो गई
दद उसी का नाम है जो शबे-ग़म94 उठा नह
याद तो आए जा क फर, होश उड़ाए जा क फर
छाने क ये घटा नह , चलने क ये हवा नह
दे ख लया वहाँ तुझे, द दा-ए-एतबार ने95
हाथ को हाथ भी जहाँ, सुनते ह सूझता नह
क़ौलो-क़रार96 भी तेरे वाबो-ख़याल हो गए
वो न कहा था न ने इ क़ को भूलता नह

(1940)

आह वो मं ज़ले-मुराद, र भी है क़रीब भी
दे र ई क क़ा फ़ले उसक तरफ़ रवाँ नह
दै रो-हरम97 है गद-राह, न शे-क़दम98 ह मेहरो-माह99
इनम कोई भी इ क़ क मं ज़ले-कारवाँ100 नह
कसने सदा-ए-दद101 द , कसक नगाह उठ गई
अब वो अदम102 अदम नह , अब ये जहाँ जहाँ103 नह
आज कुछ इस तरह खुला, राज़े-सुकूने-दाइमी104
इ क़ को भी ख़ुशी नह , न भी शादमाँ105 नह
अगर बदल न दया आदमी ने नया को
तो जान लो क यहाँ आदमी क ख़ैर नह
हर इ क़लाब के बाद आदमी समझता है
क इसके बाद न फर लेगी करवट ये ज़म
ब त न बेकसी-ए-इ क़ पर कोई रोये
क न का भी ज़माने म कोई दो त नह
अगर तलाश कर, या नह है नया म
जुज़ एक ज़ दगी क तरह ज़ दगी क नह
जो भूलत भी नह , याद भी नह आत

(1940)

(1941)

तेरी नगाह ने य वो कहा नयाँ न कह
तू शाद106 खो के उसे और उसको पा के ग़म 107
‘ फ़राक़’ तेरी मोह बत का कोई ठ क नह
ह्यात मौत बने, मौत फर ह्यात बने
तेरी नगाह से ये मोजज़ा108 भी र नह
हज़ार शु क मायूस कर दया तूने
ये और बात क तुझसे भी कुछ उमीद थ
ख़ुदा के सामने मेरे क़सूरवार ह जो
उ ह से आँख बराबर मेरी नह होत
मुझे ये फ़ क जो बात हो, मुद लल109 हो
वहाँ ये हाल क बस हाँ तो हाँ नह तो नह
युँ ही सा था कोई जसने मुझे मटा डाला
न कोई नूर का पुतला, न कोई ज़ोहरा-जब 110
(1941)
आ ही जाती है मगर फर भी मेरे दद क याद
गरचे है तक-मोह बत म111 भी आराम ब त
और भी काम ह नया म ग़मे-उ फ़त को112
उसक याद अ छ नह ऐ दले-नाकाम ब त
ये भी साक़ बस इक अ दाज़े- सयहम ती थी
कर चुके तौबा ब त, तोड़ चुके जाम ब त

(1937)

न का जा जगाए इक ज़माना हो गया
ऐ सुकूते-शामे-ग़म113 फर छे ड़ उन आँख क बात
ज़ दगी को ज़ दगी करना कोई आसाँ न था
ह म करके ज़हर को करना पड़ा आबे-हयात114
जा मली है मौत से आज आदमी क बे हसी115
जाग ऐ सुबहे-क़यामत116, उठ अब ऐ दद-हयात117
कुछ आ, कुछ भी नह और यूँ तो सब कुछ हो गया
मानी-ए-बेल ज़118 है ऐ दो त दल क वारदात119
तेरी बात ह क न मे तेरे न मे ह सहर120

ज़ेब121 दे ते ह ‘ फ़राक़’ और को कब ये कु

यात122
(1943)

कभी पाबं दय से छु ट के भी दम घुटने लगता है
दरो-द वार123 ह जसम, वह ज़ दाँ124 नह होता
हमारा ये तजुबा है क ख़ुश होना मोह बत म
कभी मु कल नह होता, कभी आसाँ नह होता
बजा है ज़ त भी, ले कन मोह बत म कभी रो ले
दबाने के लए हर दद ओ नादाँ नह होता
यक़ लाय तो या लाय, जो शक लाय तो या लाय
क बात म तेरी सच-झूट का इ काँ125 नह होता

(1941)

खो के इक श स को हम पूछते फरते ह यही
जसक तक़द र बगड़ जाए वो या करता है
नगहे-शौक़126 म और दल म ठनी है कब से
आज तक हम न समझ पाए क झगड़ा या है
इ क़ से तौबा है तो न का शकवा कैसा
क हये तो हज़रते- दल आपका मतलब या है
दल तेरा, जान तेरी, दद तेरा, ग़म तेरा
जो है ऐ दो त वो तेरा है, हमारा या है
हम जुदाई से भी कुछ काम तो ले ही लगे
छोड़कर मुझे चले जाओगे तुम, अ छा है
इनसे बढ़-चढ़ के तो ऐ दो त ह याद इनक
नाज़-ो-अ दाज़-ो-अदा म तेरी या रखा है
ऐसी बात से बदलती है कह फ़तरते- न127
जान भी दे दे अगर कोई तो या होता है
यह आँख म जो रह जाए तो है चगारी
क़तरा-ए-अ क128 जो बह जाए तो इक द रया है
तुझको शैतान के हो जाएंगे दशन वाइज़129

डालकर मुँह को गरेबाँ म कभी दे खा है
न हो आँसू कोई हम दोन तो बेहोश-से थे
च मे-पुरनम130 अभी तारा-सा कोई टू टा है
_________________

(1959)

1. अ याचार 2. क पना म 3. जुदाई के 4. ेम-काल के धोखे क 5. रयाज़—संयम, जप-तप, इं य- न ह, इबादत,
अ यास द —काल, समय, व त, अनी रवाद 6. सा थयो 7. हष 8. चार दन का जीवन 9. वा त वकता 10. मृ यु
11. ऐ बेख़बर ाणी 12. सं त 13. सांसा रक काय 14. द घ 15. भेद 16. मलन क रात के 17. सौ दय क 18.
कौमाय 19. तरह 20. अतीत का ढं ग 21. कृ त से 22. कट, य 23. मनु यता क शान 24. कृपा
का 25.
ेम-स ब धी चेतना 26. पूणता 27. एका त 28. थ त 29. शकायत 30. जीवन- पी सैरगाह म 31. मुँह 32. ओर
33. जुदाई म 34. गुज़रने का माग 35. ेयसी क गली के 36. शोक त ( ेमी) 37. जुदाई का सं याकाल (जुदा ए
एक ज़माना आ) 38. आसान 39. शीषक 40. स ता का बोझ 41. शा मल 42. शे’र म 43. सु प 44.
त
ता का 45. हालत 46. ग़मी और ख़ुशी 47. ल जा 48. ख वृ ा त 49. स मुख 50. दल- पी नाव 51.
ग़लती 52. ेयसी क नज़र 53. साम य 54. आधी रात क शा त म 55.
ा ड 56. रात से वदा 57. आशानराशा 58. जुदाई और मलाप 59. सम याएँ 60. शराब क लहर 61. याले क तह म 62. नर तर
का 63.
थ त 64. म थल 65. धैय करने का धोखा 66. अमर जीवन 67. शे’र म 68. आसमान से 69. चचा 70. बे ख़ी
का ढं ग 71. धृ इ क़ को 72. व मयी 73. जा त 74. धीमी चाल 75. मन क शा त 76. ढं ग म 77. चाल क
चंचलता 78. फाँसी 79. इ क़ क नज़र म 80. दशन 81. दशन क अ भलाषा 82. ेमा ह 83. भरी मह फ़ल म 84.
मदो म याला 85. दे व-लोक 86. काली करतूत करने वाला 87. काफ़ फ़सत 88. द ड-यो य 89. खचाव म 90.
समपण क शान 91. ना तकता 92. सरे के लए फ़सत 93. घटना 94. ग़म क रात को 95. व ास क आँख ने
96. वायदे 97. म दर-म जद 98. पद च 99. सूरज और चाँद 100. कारवाँ या क़ा फ़ले क मं ज़ल 101. दद-भरी
आवाज़ 102. अन त व 103. संसार 104. थायी शा त का भेद 105. ख़ुश 106. ख़ुश 107. खत 108.
चम कार 109. यु यु 110. अ त सु दर 111. ेम-प र याग म 112. ेम-स ब धी ग़म को 113. ग़म क शाम क
चु पी 114. अमृत 115. जड़ता 116. लय क सुबह ( लय) 117. जीवन-स ब धी पीड़ा 118. श द के बना अथ
119. घटना 120. जा 121. शोभा 122. अधम 123. दरवाज़े और द वार 124. कैदखाना 125. स भावना 126.
ेम127. सौ दय क कृ त 128. आँसू क बूँद 129. धम पदे शक 130. सजल ने