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Charag (Hindi Edition)

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साल:
2018
प्रकाशन:
Manjul Publishing House
भाषा:
hindi
फ़ाइल:
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1

Children's Omnibus

سال:
2015
زبان:
english
فائل:
PDF, 2.03 MB
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2

Corporate Kabootar (Hindi Edition)

زبان:
hindi
فائل:
PDF, 1.06 MB
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चराग़

चराग़

वसीम बरेलवी
संकलन: स चन चौधरी

मंजुल प ल शग हाउस

मंजुल प ल शग हाउस
कॉरपोरेट एवं संपादक य कायालय
तीय तल, उषा ीत कॉ ले स, 42 मालवीय नगर, भोपाल-462003
व य एवं वपणन कायालय
7/32, अंसारी रोड, द रयागंज, नई द ली-110002
वेबसाइट: www.manjulindia.com
वतरण के
अहमदाबाद, बगलु , भोपाल, कोलकाता, चे ई,
हैदराबाद, मु बई, नई द ली, पुणे
चराग़
कॉपीराइट © 2018 वसीम बरेलवी
सवा धकार सुर त
यह सं करण 2018 म पहली बार का शत
ISBN 978-93-87383-24-1
संकलन: स चन चौधरी
यह पु तक इस शत पर व य क जा रही है क काशक क ल खत पूवानुम त के बना इसे या इसके कसी भी
ह से को न तो पुन: का शत कया जा सकता है और न ही कसी भी अ य तरीक़े से, कसी भी प म इसका
ावसा यक उपयोग कया जा सकता है । य द कोई
ऐसा करता है तो उसके व
कानूनी कारवाई क
जाएगी।

प रचय
ो. वसीम बरेलवी
वसीम बरेलवी का स ब ध मुरादाबाद के जागीरदार घराने से है। उनके परदादा 384 गाँव
के मा लक थे तथा मुरादाबाद से काशीपुर तक े न उ ह क ज़मीन पर चला करती थी।
इसी प रवार के कारण उनके मोह ले का नाम नवाबपुरा पड़ गया था। उस मोह ले म
वसीम बरेलवी का पैतृक घर आज भी बदली ई सूरत म मौजूद है।
वसीम बरेलवी के पता ी शा हद सैन “नसीम” अपनी कम आयु म ही एक
वक ल के चंगुल म फँस गये जसने उ ह कुछ का कुछ समझा कर सारी जायदाद अपने
नाम लखवा ली। जब उ ह होश आया और बात बड़ तक प ँची तो यह मुकदमा हाई
कोट तक लड़ा गया ले कन शा हद सैन साहब उसी वक ल का साथ दे ते रहे और अंततः
सारी जायदाद उसी वक ल को मल गई। प रवार के बड़ ने शा हद सैन का ववाह
बरेली के एक बड़े ज़म दार शेख़ इंतेज़ामउ लाह उफ़ मु ा मयाँ क पु ी से कर दया।
इंतेज़ामउ लाह साहब ब त प ँच और ापक स ब ध वाले धम नरपे
वृ के
थे। वे ऑनरेरी म ज े ट भी थे। शा हद सैन साहब घर जमाई के प म उ ह के
घर रहने लगे। बरेली शहर के मोह ला गढ़इया के इसी वशाल घर म 8 फ़रवरी 1940
को वसीम बरेलवी का ज म आ और मुरादाबाद के होते ए भी बरेलवी श द उनके नाम
का अटू ट अंग बन गया।
वसीम बरेलवी के पता ी शा हद सैन के धमगु
ी स यद ग़ा लब मयाँ ने
अपने श य के इस पु का नाम ज़ा हद हसन रखा था। घर के लोग ने यार से उ ह
परवेज़ का नाम दया और बड़े होकर जब उ ह ने शायरी शु क तो अपने लये “वसीम
बरेलवी” नाम पस द कया और अब यही नाम उनक पहचान है।
धन दौलत से अलग वसीम बरेलवी के ख़ानदान क सा ह यक प म भी एक
पहचान रही है। इस घराने म बड़े-बड़े महान व ावान और सा ह यका; र होते रहे ह।
हज़रत मख़ म समाउ न रहमतु लाह अलैह, वसीम बरेलवी के मूल पु ष थे। दे हली के
महरोली म नकलने वाला पंखे का जुलूस उ ह से स ब धत है। उनक एक
से ही
बड़े-बड़े पापी और राचारी सीधे रा ते पर आ जाते थे। दै व ान और चम कार से
सुस जत होने के कारण इस कुल के लोग शासन के उ च पद पर आसीन होते रहे ह।
मौलाना अबुल बरकात, मु ती मोह मद दौलत और मौलाना तुराब अली साहब जैसे े
जानकार इस कुल म पैदा ए ह जनके सा ह यक और धा मक कारनामे आज भी
इ तहास म सुर त ह। उ क मश र क़ताब “आबे हयात” म लखा है क वाजा मीर

दद (18व सद के
स शायर), “मसनवी मौलाना म” पढ़ने के लये मु ती
मोह मद दौलत साहब के पास आया करते थे। मौलाना तुराब अली साहब 53 पु तक के
रच यता थे। यह सल सला ो. मोह मद हसन (दे हली व व ालय) जैसे व ान और
व त समी क से लेकर वसीम बरेलवी तक फैला आ है। इस सारे ववरण से यह पता
चलता है क वसीम बरेलवी एक ऐसे कुल का ह सा ह जो अ य धक आदरणीय और
व ा का तीक रहा है।
वसीम बरेलवी ने सन् 1958 म आगरा व व ालय से उ म एम.ए. फ़ ट
डवीज़न फ़ ट पोज़ीशन म पास कया। एक माह बाद ही उनक नयु स भल के ह द
इ टर कॉलेज म हो गई। स भल म रहते ए ही उ ह ने मुशायर म जाना शु कर दया
था। अ टू बर 1959 म उनक नयु दे हली व व ालय के ह कॉलेज म हो गई।
इस नौकरी के बीच ही उ ह ने ल व टक कोस म वेश लेकर भाषा के बनने बगड़ने
इ या द का अ ययन कया। इसने उ ह यह नर अता कया क वह व भ भाषा क
उ प से लेकर आज तक के प पर घ ट बोल सकते ह।
द ली क नौकरी से उ ह एक साथ कई लाभ ए। एक ओर उ ह वाजा अहमद
फ़ा क़ , ज़हीर अहमद स क़ , जावेद व श और क़मर रईस जैसे व ान के साथ
उठने बैठने और काम करने का अवसर मला तो सरी ओर आन द मोहन जुतशी,
गुलज़ार दे हलवी और अ जुमन “तामीरे अदब” के ारा स रचनाकार म आन द
नारायण मु ला, ब मल सईद , अनवर साबरी, स यद हा मद, ल भूराम जोश मल यानी,
गोपाल म ल, शमीम करहानी, अश मल यानी, सा हर हो शयारपुरी को सुनने, ब क
ख़ुद उनके स मुख अपनी रचनाय सुनाने का सौभा य ा त आ। अतः स भल के साथसाथ दे हली क नौकरी और रहना सहना भी वसीम बरेलवी क जीवन कथा का एक
अटू ट अंश है।
16 जुलाई 1962 को वसीम बरेलवी उ व ा के प म बरेली कॉलेज म नयु
ए। 1979 म वह उ वभागा य बना दये गए। अब तक न केवल उनके नेतृ व म
ब त से छा -छा ा शोध थ तुत करके पीएच.डी. क ड ी ा त कर चुके ह ब क
वयं उनके जीवन और शायरी पर भी शोध काय हो चुका है। वसीम बरेलवी एम.जे.पी.
व व ालय के कला संकाय के डीन भी रहे और बेपनाह शोहरत और समाज म वशेष
थान रखने के नाते बरेली जैसे वशाल और ऐ तहा सक नगर के 1992 म चीफ़ वॉडन
स वल डफ़ै स के ओहदे से सरफ़राज़ कये गये। जून 2000 म डीन के पद से कायमु
होकर वह पूण प से शायरी को सम पत हो गए।
सन् 1966 म आपका पहला का संकलन “तब सुम-ए-ग़म” का शत आ और
ब त लोक य रहा। फर 1972 ई. म दे वनागरी ल प म “आँसू मेरे दामन तेरा” ल े री
सोसायट बरेली ारा इस शान से का शत आ क इस अवसर पर एक ब त बड़ा
अ खल भारतीय मुशायरा आयो जत कया गया जसम फ़राक गोरखपुरी, शमीम
करहानी, ख़ुमार बाराबंकवी, शाज़ तमकनत और डॉ. म लकज़ादा मंज़ूर अहमद इ या द
जैसे नामचीन शायर स म लत ए थे। साथ ही मश र फ़ मी गायक महे कपूर ने इस
काय म म शा मल होकर वसीम बरेलवी क दो ग़ज़ल तुत क थ । त कालीन के य
मं ी हेमवती न दन ब गुणा जी ने अ य ता क और मेजर जनरल कौल ने इस आयोजन

का उ ाटन कया। का सं ह के काशन का म अभी तक थमा नह है और ह द उ दोन ल पय म अब तक उनके तेरह सं ह का शत हो चुके ह।
दे श वदे श म उ ह असं य अवॉड और स मान मल चुके ह। फ़राक़ इ टरनेशनल
अवॉड और अली सरदार जाफ़री अवॉड यू.एस.ए. शु होने के बाद सबसे पहले उ ह ही
दान कये गए। एक ओर
टन सट क सल टै सास, अमे रका ारा उ ह नाग रक
स मान दे ते ए ऑनरेरी सट ज़न शप और गुड वल ए बेसेडर का स मान दया गया तो
सरी ओर भारत म क़ौमी कौ सल बराए फ़रोग़ उ ज़बान (एन.सी.पी.यू.एल.) का
वायस चैयरमेन नयु कया गया जो उ सा ह य जगत का सबसे त त एज़ाज़ है।
वसीम बरेलवी अब तक व के हर उस दे श म जा चुके ह जहाँ-जहाँ मुशायर का
आयोजन कया जाता है और अदबी सेमीनार आयो जत कये जाते ह। शायरी तुत
करने के लये अब तक वह न जाने कतनी बार अमे रका, कनाडा, बई, शारजाह, क़तर,
मसकत, सऊद अरब, बहरीन, पा क तान, क नया इ या द दे श का दौरा कर चुके ह।
इन दे श म बड़े-बड़े मुशायर के टकट उनके नाम से ही बक जाते ह और उनक
उप थ त मुशायरे क कामयाबी क ज़मानत समझी जाती है।
वसीम बरेलवी के कलाम को दे श क तीन गायक पी ढ़य ने गाया है। पहली पीढ़
के गायक म महे कपूर और लता मंगेशकर ने उनक ग़ज़ल गा । सरी पीढ़ के गायक
जगजीत सह, पंकज उधास, च दन दास ने उनक ग़ज़ल को अपनी आवाज़ द , तो
तीसरी पीढ़ के युवा ग़ायक अमरीश म ा ने उनक ग़ज़ल को गाने का गौरव ा त
कया। म क या बु स ा. ल. ारा अब तक उनक तीन सी.डी. जारी क जा चुक ह।
एक ओर गो व दा और शाइनी आ जा जैसे फ़ मी कलाकार ने अपनी फ़ म म
वसीम बरेलवी के शेर पढ़े तो सरी ओर ब त से राजनेता और उ च थ पद पर
आसीन अ धका रय , हाईकोट के जज और आम जनमानस ने अपनी बात को अ धक
भावी बनाने के लये अकसर अपने स बोधन म वसीम बरेलवी के शेर पढ़े ह।
जुलाई 2017 म जब पु लस क व र अ धकारी े ता ठाकुर का स ाधारी पाट
के कुछ लोग से ववाद हो जाने के फल व प तबादला कर दया गया और उनसे
मी डया ने पूछा क आपको तबादले पर कैसा अनुभव हो रहा है तो उ ह ने अनायास ही
वसीम बरेलवी का यह शेर पढ़ा:
जहाँ रहेगा वह रोशनी लुटाएगा
कसी चराग़ का अपना मकां नह होता
े ता ठाकुर का यह वी डयो वायरल हो गया और सोशल मी डया पर उसने धूम मचा
द।
वसीम बरेलवी के वे शेर जो ज़रबुलम ल बन चुके ह अथात ख़ास व आम क
ज़बान पर ह उन पर डॉ. जावेद नसीमी एक क़ताब तरतीब दे चुके ह जसका शीषक है
“वसीम बरेलवी के ज़रबुलम ल अशआर”। यह पु तक उ और दे वनागरी दोन ल प म
है और अब तक इसक हज़ार तयाँ बक चुक ह।

उनके का ,
व को सम पत “ल हे-ल हे” जैसी सा ह यक प का के तीन
वशेषांक का शत कये गये ह जसम फ़राक़ गोरखपुरी, डॉ. मोह मद हसन, शमीम
करहानी, नशूर वा हद , डॉ. क़मर रईस, डॉ. अ ल मुग़नी, महशर बदायुनी, डॉ. तनवीर
अलवी, रफ़त सरोश, इशरत ज़फर, डॉ. अली अहमद फ़ा मी और कुँवर बैचेन जैसे
ह दो-पाक के सु स क़लमकार ने वसीम बरेलवी क शायराना अज़मत को न केवल
माना है ब क उनक शायरी के नये आयाम और अ दाज़-ए- फ़ क तहदा रय को
सा ह यक ईमानदारी के साथ सराहा भी है।
हाल ही म जे.एन.यू. के ोफ़ेसर वाजा मोह मद इकराम और ‘ल हे-ल हे’ के
स पादक हसीब सोज़ ने वसीम बरेलवी के फन और
व पर “वसीम बरेलवी क
शायरी- फ़करी और फ़ ी जहात” के शीषक से एक क़ताब तरतीब दे कर का शत क
है। इसके अ त र क़मर गो डवी ने उनके का और
व पर एक क़ताब हाल ही
म लखकर का शत क है जसका वमोचन इसी महीने लखनऊ म एक सा ह यक
समारोह म आ है।
दे श और समाज को जब-जब वसीम बरेलवी क ज़ रत पड़ी है उ ह ने नः वाथ
भाव से अपनी सेवाएँ तुत क ह। कुछ वष पूव जब बरेली म दं गा आ और क यु लग
गया तो वह बरेली के बु जीवी समाज के साथ सड़क पर नकले और अमन व शा त
क़ायम करने के लये अपनी सामा जक भू मका इस तरह नभाई क आज तक उसे शहर
याद करता है। उन दन उ ह ने अपने सारे बाहर के दौरे रदद् करके ख़ुद को समाज सेवा
के लये सम पत कर दया था और आ ख़रकार वह बरेली म आपसी सौहाद और
भाईचारे को क़ायम रखने म सफल ए।
2016 म उनके नाम के साथ एक मसाली उपल ध यह भी जुड़ी क उनक
सा ह यक और सामा जक सेवा को मा यता दे ते ए अ खलेश यादव सरकार ने उ ह
छः वष के लये उ. . वधान प रषद का सद य मनोनीत कया। बताया जाता है क उ. .
वधान प रषद के इ तहास म कला और सा ह य के े से या तो ह द क महान
कव य ी महादे वी वमा को मनोनीत कया गया था या फर दे श सरकार ने अ ैल 2016
म वसीम बरेलवी को मनोनीत कया। उ क वे पहली ह ती ह जसे उ. . सरकार ने इस
एज़ाज़ से नवाज़ा है जो सा ह य जगत के साथ ही उ
नया के लये भी गव का वषय
है।
30 अ ैल 2016 को उ ह ने वधान प रषद क सद यता क शपथ ली और उसी
दन से समाज के कमज़ोर और लाचार वग क सेवा म लग गये। पछले वष उ ह ने
एम.एल.सी. को मलने वाले डेढ़ करोड़ पये म से 25-25 लाख पये चार ज़ल के
अ पताल को आईसीयू बनाने के लये दए और असा य रोग जैसे कसर इ या द के
मरीज़ के इलाज के लये बराबर आ थक सहायता दे रहे ह।
वसीम बरेलवी के
व और समाज सेवा से अलग य द उनक शायरी क बात
कर तो वे शु से ही मुशायर के कामयाब शायर थे।
रफ़त सरोश ने अलीगढ़ के एक मुशायरे का ज़ करते ए लखा है क अलीगढ़
युनीव सट का वह मुशायरा भी याद है जब हम दोन साथ अलीगढ़ गए थे। दौरे सानी

उनके कलाम से शु
आ था। उस व युनीव सट के सख़ुन फ़हम तलबा का मजमा
था और वसीम के सुरीले तर ुम और चुट ली ग़ज़ल ने सामेईन का दल जीत लया था।
ग़ा लबन यही मुशायरा वसीम बरेलवी के “मुशायराना क रयर” का रोशन न शे अ वल
है।
रफ़त सरोश ने जस मुशायरे का ज़ कया है वह वसीम बरेलवी के ब कुल
शु आती ज़माने का मुशायरा था। उसम वसीम बरेलवी को ऐसी सफलता मली थी क
युनीव सट के छा ने उनका ीफ़केस छपाकर ज़बरद ती उ ह कने पर मजबूर कर
दया और तीन दन तक युनीव सट के अलग-अलग हॉल म शेरी न श त का आयोजन
करके वसीम बरेलवी को सुना जाता रहा।
वसीम ने अपनी शायरी के लये आसान और आम फ़हम ज़बान का इ तेमाल कया
है। आसान ल ज़ म अ छा शेर कहना यादा मु कल समझा जाता है। रफ़त सरोश ने
वसीम के कुछ शेर को मीर, ग़ा लब और मो मन के शेर के साथ रखते ए यह बताया है
क उपरो उ ताद क खू बयाँ वसीम बरेलवी के कलाम म भी मौजूद ह। रफ़त सरोश
लखते ह क:
“वसीम तग़ जल क अलामत को हाथ से नह जाने दे ते और ज़बान के मज़ाजदाँ
होने क है सयत से ज़बान जैसी नाजक चीज़ से खलवाड़ नह करते। उनके बाज़
अशआर को इस अ क सनद के तौर पर पेश कया जा सकता है क सहल-ए-मुमतना
शेर वह है जसक न न हो सके।
“मीर” उन नीमबाज़ आँख म
दले नादाँ तुझे आ या है

- सारी म ती शराब क सी है (मीर)
- आ ख़र इस दद क दवा या है
(ग़ा लब)
तुम मेरे पास होते हो गोया
- जब कोई सरा नह होता (मो मन)
इक ज़रा सी अना के लये उ
- तुम भी त हा रहे म भी त हा रहा
भर
(वसीम)
जहाँ रहेगा वह रोशनी लुटाएगा - कसी चराग़ का अपना मकाँ नह
होता (वसीम)
रात भर आँसु से जो लखी - सुबह को उस कहानी का सौदा आ
गयी
(वसीम)
रात भर झील क गोद म सोके भी- सुबह को चाँद य यासा- यासा लगे
(वसीम)
वसीम बरेलवी अब तक मुशायर के लये एक सौ से यादा वदे शी या ाएं कर चुके ह।
वदे श म बसे ए लोग उनसे मलकर ऐसे ख़ुश होते ह जैसे वे अपने घर के कसी सद य
से मल रहे ह । अपनी म के लये यह ेम, अपन से मलने के लये यह ाकुलता
और अपने घर से र परदे स म रहने का ख, वसीम बरेलवी ने उन लोग से मलकर
महसूस कया है और इसे अपनी शायरी का ह सा भी बनाया है। मसाल के तौर पर यह

शेर दे खये:
खु क म ही ने जब पाँव जमाने न दये
बहते दरया से फर उ मीद कोई या रखे
हमारे बारे म लखना तो बस यही लखना
कहाँ क शमाएं है कन मह फ़ल म जलती ह
हम तो बेनाम इराद के मुसा फर ह “वसीम”
कुछ पता हो तो बताएं क कधर जाते ह
वसीम बरेलवी पूरी तरह अपने युग, अपने माहौल और अपनी म से जुड़े ए शायर ह।
वह सफ़ का प नक नया क बात नह करते ब क अपने आस-पास से पूरी तरह
बाख़बर रहते ह और जद द मौज़ूआत, अथात समकालीन सम या और घटना पर
पूरी नज़र रखते ए इ ह अपनी शायरी का ह सा बनाते ह। व व यात ना क़द ो.
क़मर रईस ने लखा है:
“वह (वसीम बरेलवी) ग़ज़ल क रवायत से मुनह रफ़ ए बग़ैर अपने अहेद (युग)
क स चाइय क तजुमानी ( त न ध व) कर रहे ह। उनके रमूज़-ओ-अलाएम क
अपनी नया है। वह सरे जद द शोरा क पैरवी से गुरेज़ करते ह, मसलन परवाज़ और
सफ़र के तलाज़मात उनके कलाम म बड़ी अह मयत रखते ह और ये आज के नौजवान
क ज़ दगी, उनक कशमकश और मह मय को पेश करते ह।
मसलन:
मली हवा म उड़ने क वह सज़ा यार
क म ज़मीन के र त से कट गया यार
आज कल के रा त क बेयक नी दे खकर
कौन है जसम सफ़र का हौसला रह जायेगा
य मेरा साथ छोड़े जाते हो
रा ता रहनुमा नह होता
इस तरह मेरा ज़ौके सफ़र कोस रहा है
जैसे क न मलना मेरी मं ज़ल क ख़ता है
सफ़र पे आज वही क तयाँ नकलती ह
ज ह ख़बर है हवाय भी तेज़ चलती ह

कह भी जाए मेरी हमसफ़र सी लगती है
वह राह जसम कोई नक़श-ए-पा नह होता
वसीम बरेलवी क शोहरत और सव यता का ाफ़ लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उ ह
चाहने वाल म हर वग और हर धम के लोग मौजूद ह। उ ह चाहने और यार करने का
यह सल सला उनक शायराना ज़दगी क शु आत से ही चला आ रहा है। 1977 म वह
जौनपुर के एक मुशायरे म गये थे। पंजाब मेल से बनारस प ँच गये। वहाँ से बस के ारा
जौनपुर जाना था। जब वह टकट लेने के लये बढ़े तो एक बुजग उनके पास आकर बोले
क अगर आप बुरा न मान तो आपका टकट म ले लू।ँ वसीम के हाँ कहने पर उ ह ने
टकट ले लया और दोन एक साथ ही बस म बैठ गये ले कन वह महाशय ब कुल
खामोश ही बैठै रहे तो वसीम साहब ने पूछा आप मुझे कैसे जानते ह, तो उ ह ने उ र
दया क सन् 1969 म आपने आज़मगढ़ म पहला मुशायरा पढ़ा था वहाँ मने पहली बार
आपको सुना था। उसके बाद से म आपका हर मुशायरा सुनता ँ। आपको सुनने के लये
ही आया ँ, और यह कहकर उ ह ने अपने ीफ़ केस से एक पो टकाड नकाल कर
दखाया और कहा क जब मेरे साले ने मुझे ख़बर द क जौनपुर के मुशायरे के पो टर म
वसीम बरेलवी का नाम भी शा मल है तो मने उसे ख़त लखा क मुशायरे के कनवेनर से
मलकर पूछो क या वाक़ई वसीम बरेलवी आ रहे ह? तो यह पो टकाड मेरे साले ने
भेजा था। उ ह ने पो टकाड वसीम साहब के आगे बढ़ा दया उसम उन साहब के साले ने
लखा था “मने मालूम कर लया है। वसीम बरेलवी का क फ़मशन आ चुका है, वह
मुशायरे म आ रहे ह।” इस पो टकाड के मलने के बाद ही म मुशायरा सुनने आया ँ।
वसीम साहब ने उनसे पूछा क जब आप इतने दन से मेरी शायरी को पस द करते ह तो
आज तक मुलाक़ात य नह क ? उनका उ र था क “मने सोचा इतनी अ छ सूरत,
इतनी अ छ आवाज़, इतनी अ छ दल म उतर जाने वाली शायरी ले कन कह यह
आदमी अ छा नह नकला तो इसके बारे म जो ख़याल बना आ है वह ख़ म हो जायेगा
म इस वाब को तोड़ना नह चाहता था।” वसीम साहब ने पूछा तो फर अब आपने कैसे
समझ लया क म आदमी अ छा ँ। तो वह बोले म अलीगढ़ से लॉ ेजुएट ,ँ आज़मगढ़
म वकालत करता ँ और टे शन पर आपक गु तुगू के बाद अ छ तरह समझ लया था
क आप आदमी भी अ छे ह और दे खये अब आपके साथ सफ़र कर रहा ँ।
उपरो घटना तो वसीम साहब क नौजवानी और शायरी के शु आती दौर क है।
अब एक घटना सन् 2013 क भी सुन ली जये जब वसीम साहब 73 वष के थे और
अमेरीका के मुशायरे म ग़ज़ल पढ़ने के बाद मंच से नीचे आये तो ब त से लोग ने उ ह
घेर लया और ऑटो ाफ़ वग़ैरह लेने लगे। उसी भीड़ म से एक ब त ही सु दर सी म हला
हजाब पहने ए वसीम साहब के पास आय । उनके हाथ म वसीम साहब के तीन का
संकलन और दो सी.डी. मौजूद थ जो उ ह ने वह लगे ए टॉल से ख़रीद थ । उ ह ने
ऑटो ाफ़ के लये का संकलन को आगे बढ़ाते ए कहा “वसीम साहब! मुझे दस
साल लग गये आप तक प ँचते प ँचते।” वसीम साहब ने आटो ाफ़ के बाद क़ताब उ ह
वापस क तो उस भारी भीड़ के बीच ही उ ह ने अनायास ही वसीम साहब के दोन गाल ,
माथे और ठोड़ी पर चु बन कर लये और फ़ौरन ही पलटकर गेट क ओर चल द । न उस

म हला ने उस व त और कोई बात क और न ही उसके बाद आज तक उनसे कोई राबता
कया। इस आचरण से साफ़ है क उसने ख़ुद को नुमायां करने या वसीम साहब से
तअ लुक़ बढ़ाने के लये ऐसा नह कया था ब क दल के अ दर वसीम बरेलवी के लये
मुह बत और अक़ दत का ऐसा वा लहाना ज बा था जसे वह रोक न सक और उ ह
सामने पाकर चुंबन लेने पर मजबूर हो गयी। ऐसी पाक ज़ा अक़ दत क मसाल कम ही
दे खने म आती ह और लोग के दल म जगह बनाने का यह सौभा य सभी को ा त नह
होता।
वसीम बरेलवी ने अपनी शायरी पर मज़मून लखवाने के लये न कभी नाक़ेद न
(आलोचक ) के घर का तवाक़ कया और न प -प का के स पादक क खुशामद
क । स पादक के मांगने पर भी वह अपना कलाम कम ही भेजते ह। यही वजह है क
प -प का म उनका कलाम नज़र नह आता। प का वाले अकसर उनका कलाम
सर के नाम से छाप दे ते ह। कहने का मतलब यह है क उ ह ने छपने छपाने पर कोई
यान नह दया और सीधा-सीधा ोता से संवाद करना ही बेहतर जाना। जैसा क ो.
अली अहमद फ़ा मी ने लखा है क:
“ फ़रदौसी, कालीदास, कबीर, नज़ीर, मीर, ग़ा लब, जोश, फ़ैज़ बगैरह सबके सब
अवामी शायर ह और अवाम ने ही उ ह ज़ दा भी र खा है। इसी क़बील के शायर ह
वसीम बरेलवी, ज ह ने कभी ख़वास ( व श वग) क परवाह नह क । न क़ाद
(आलोचक ) को ख़ा तर म नह लाए क उ ह अपने अवामी मुशाहेदात, तख़लीक़
तजबात और मुख़ लसाना वाब तगी पर इस क़दर एतेमाद व यक़ न है।”
सु स आलोचक ोफ़ेसर मो. हसन ने वसीम बरेलवी क शायरी पर राय दे ते ए
लखा है क:
“वसीम क शायरी असर-ए-हा ज़र (वतमान काल) के ज़ म क गवाही है। ऐसी
आवाज़ जो दलदोज़ बाज़ग त छोड़ जाती ह उनके अ द न म वह ह को पघलाने
वाले हादसात और एहसासात ह जनम ख और ददम द के समु दर अंगड़ाइयाँ लेते
ह।”
वसीम बरेलवी जब पहली बार पा क तान गये तो वहाँ उनक मक़बू लयत का यह
हाल था क बड़े-बड़े अख़बार के पूर-े पूरे कॉलम उन पर लखे गये। वहाँ के ब त बड़े
अखबार दै नक जंग, कराची ए स ेस और जंग मड वीक इ या द ने उनसे इ टर ू
लेकर उ ह नुमायाँ करके का शत कया और अपने अख़बार के पूर-े पूरे पेज वसीम
बरेलवी के लय व फ़ कर दये।
रोज़नामा ए स ेस, कराची (पा क तान) क
त न ध मैरा अतहर ने अपने
अख़बार म लखा क वसीम बरेलवी ह तान ही नह पा क तान म भी ब त मक़बूल
है। उनक मौजूदगी मुशायरे क कामयाबी क ज़मानत समझी जाती है।
पा क तान म मैरा अतहर को दया गया वसीम बरेलवी का इ टर ू यादगार और
तारीख़ी इ टर ू है जसम उ ह ने कहा क आपके यहाँ क (पा क तान क ) क़ताब
ह तान म दे वनागरी म छपती ह, इ ह पढ़कर अहमद नद म क़ासमी, मुनीर नयाज़ी
और परवीन शा कर वग़ैरह ह द जानने वाल म भी मक़बूल ए इसके वपरीत यहाँ मुझे

एहसास होता है क ह तान के बड़े शायर “ नराला”, “जयशंकर साद” और
“नीरज” वगैरह के बारे म आम लोग को तो या ख़ास लोग को भी कोई मालूमात नह
है। यह चीज़ मुझे सोचने पर मजबूर करती है क वहाँ के अदब (सा ह य) और आम शेरी
हलक़ म सारी खड़ कयाँ और दरवाज़े खोल के र खे गये ह तो यहाँ ऐसा य नह है?
जब क बड़े अदब (उ च सा ह य) के फ़रोग़ के लये यहाँ भी इसका होना ज़ री है। हम
ट .एस. ईलीयट, शे सपीयर और बायरन वग़ैरह को पढ़ते ह तो कबीर, रहीम वग़ैरह को
य न पढ़ा जाये। म समझता ँ क पा क तान म भी उ के साथ दे वनागरी ल प सीख
ली जाए। ह द
ट जानने के बाद आप इसके हक़ क़ (वा त वक) सोस तक प ंच
सकते ह।” शायद वसीम बरेलवी के यास से ही पा क तान म ह द के क वय अशोक
च धर और डॉ. कुवँर बेचैन इ या द को बुलाया गया और वहाँ उनक शायरी को सराहना
मली। अभी ह द के कुछ और क वय को भी वहाँ जाना था ले कन हालात खराब होने
के कारण यह म क गया।
ह द क वता और ह द के शायर के
त वसीम बरेलवी क इस उदारता,
फराख़ दली और ह द का से ेम का ही नतीजा है क वे उ के साथ-साथ ह द
वाल म भी उतने ही लोक य ह। इस लोक यता का उदाहरण उस समय सामने आया
ज ब 27 नव बर 2016 को लखनऊ म वसीम बरेलवी का ज मनाया गया तो इस
अवसर पर उ ह आशीवाद दे ने के लये ी मुरारी बापू वशेष चाटड वमान से लखनऊ
पधारे और काय म म स म लत होकर इसे ऐ तहा सक बना दया।
वसीम बरेलवी क शायरी पर उ और ह द के बड़े-बड़े व ान और आलोचक
अपनी राय दे चुके ह जो प का ‘ल हे-ल हे’ के वशेष न बर म मौजूद है। उनम से कुछ
के अंश यहाँ तुत ह।
“वसीम के कलाम म आगही और शऊर क तह का जायज़ा है… वसीम क
शायरी एहसासे हयात क हयात अफ़ज़ा शायरी है।”
― फ़राक़ गोरखपुरी
“उ शायरी म ग़म के मज़ामीन ब त मलते ह मगर इस क़दर हसीन ग़म, शीर
ग़म जैसा क वसीम क ग़ज़ल म मलता है शायद ही कह और मल सके।
ग़ज़ल क ज़बान बड़ी सलीस, दलकश और शीर है।”
― नशूर वा हद
“शायरी म वसीम बरेलवी क आवाज़ एक नई आवाज़ है। अपने मआसरीन
(समकालीन) से अलग उनक शायरी नखरी ई और सुथरी शायरी है।”
― ो. जग ाथ आज़ाद
“वसीम बरेलवी ने इस दौर म ग़ज़ल क रवायत को पूरी ज़ मेदारी से नभाया है
और लु फ़ यह है क उनक ग़ज़ल कह भी रवायती नह होने पात ।”

― डॉ. सहर अंसारी (पा क तान)
“वसीम के लहजे म नफ़ासत और बला का तहज़ीबी रचाव है, यह सजावट से
पाक दो टू क अ दाज़ म बात करते ह। समाजीयात और समाजी क़दर और
तअ लुक़ के फैलाव को नहायत तवाजन और गहरी मानवीयत के साथ लाते ह।”
― ो. यूनुस शरर (अमरीका)
“वसीम बरेलवी का कमाल यह है क वह ग़ज़ल के लबो लहजे म ही तमाम
मौज़ूआत व मसाएल को बखूबी समेटते ह और कह बड़े लतीफ़ इशारे म बड़ी
बात कह जाते ह।” मसलन:
आसु पर इस तरह हंसते ह लोग
जैसे ग़म का कोई मु तक़ बल नह
― ो. वाजा मो. इकरामु न
वसीम बरेलवी के बुजग और नामचीन शायर तथा आलोचक और उनके
समकालीन शायर , क वय , आलोचक तथा बु जी वय क राय दे खने के बाद
इस वा त वकता को मानना पड़ेगा क वसीम बरेलवी एक अहेदसाज़ श सीयत
का नाम है जसका यह दावा ब कुल सही है क:
हमारे शेर म इक दौर सांस लेता है
वसीम कैसे ज़माना हम भुलाएगा
― डॉ. जावेद नसीमी
रामपुर

अवाड तथा स मान
• मीर तक़ मीर एकेडमी, लखनऊ का इ तयाज़े मीर अवॉड@@ मीर तक़ मीर
एकेडमी, लखनऊ का इ तयाज़े मीर अवॉडमीर तक़ मीर एकेडमी, लखनऊ का
इ तयाज़े मीर अवॉड
• ह द उ संगम, लखनऊ का ग़ज़ल अवॉड
• कला मृ त, लु धयाना का ग़ज़ल अवॉड
• कुल ह द ह द उ सा ह य अवॉड लखनऊ
• अ जुमन-ए-अमरोहा, कराची (पा क तान) का खुसूसी ग़ज़ल अवॉड
• इ लयत कॉलेज कराची (पा क तान) का ग़ज़ल अवॉड
• दा उ मा नय स, शकागो (अमरीका) का नसीम-ए-उ अदब अवॉड
• ह द सा ह य स मेलन, याग ारा सा ह य सार वत स मान
• काउ सलेट जनरल ऑफ़ इ डया, ज ा (स.अ.) ारा स मान 1997-2005
• गहवारा-ए-अदब, अमरीका ारा सा ह य स मान 2005
• टन सट काउ सल, टै सास (अमरीका) ारा नाग रक स मान ऑनरेरी
सट ज़न शप और गुड वल ए बैसेडर 2007
• गहवारा-ए-अदब, एटला टा अमरीका ारा अदबी स मान 2007
• ऐवान-ए-उ , ऑरलडा अमरीका ारा सा ह य स मान 2007
• मु हदा क़ौमी मूवमे ट, यूयाक अमरीका ारा अदबी एज़ाज़ 2007
• रदशन क 48व वषगांठ पर सा ह यक े म उ कृ योगदान के लए श त
प से स मा नत 2007
• फ़राक़ इ टरनैशनल अवॉड 2008
• “जंग” ुप ऑफ़ यूज़ पेपस, पा क तान ारा सपासनामा 2008
• अलीगढ़ अलुमनाए असो सएशन, टै सास (अमरीका) ारा अली सरदार जाफ़री
ल े री अवॉड 2009
• पा क तानी अमेरीकन असो सएशन, कने टकट (अमरीका) ारा अदबी एज़ाज़
2009
• सवभाषा सं कृ त सम वय स म त ारा डॉ. राम गोपाल चतुवद स मान 2009
• जनवाणी सा ह यक अवॉड 2011
• उ सोसायट , अमरीका ारा रहनुमाए उ अवॉड 2012
• ह का-ए-एहबाबे ज़ौक़, अमरीका ारा अदबी एज़ाज़ 2012

• मौलाना मोह मद अली जौहर अदबी अवॉड, दे हली 2013
• उ. . सरकार ारा “यश भारती” स मान 2013
• कैफ़ आज़मी अदबी अवॉड 2013
• इ डया उ सोसायट , दोहा (क़तर) ारा लाइफ़ टाइम ए चवमट अवॉड फ़ार पोए
2013
• ह द उ सा ह य अवॉड 2014
• इ हाद-ए- म लत क वे शन “ नशाने मीर” अवॉड 2014
• उ. . उ अकादमी ारा कौमी एकता सुग़रा महद अवॉड
• अमर उजाला ुप ारा कानपुर म “अतुल महे री वाणी” स मान 2015
• कलाधम बाग बेगम अ तर एकेडमी ऑफ़ ग़ज़ल ारा “कलाधम बाग” अवॉड
2015
• स त का लदास सा ह य स म त, कु
े ारा वण पदक स मान 2015
सद य
• सद य, से ल एडवाइज़री बोड ऑफ़ एजूकेशन ऑफ़ इ डया
• आकाशवाणी और रदशन (भारत सरकार) क सलाहकार स म त के सद य रहे
• आकाशवाणी रामपुर क ो ाम सलाहकार स म त के सद य रहे
• उ अकादमी लखनऊ के सद य रहे
• स वल डफ़े स, बरेली के चीफ़ वॉडन रहे
अ य
जन सतकता स म त, बरेली
बरेली नाग रक समाज, बरेली
संर क
• मानव सेवा लब, बरेली
• बरेली अमन कमेट , बरेली
• पूव वाईस चेयरमैन, एन.सी.पी.यू.एल. संसाधन वकास मं ालय (भारत सरकार)
• सद य, उ. . वधान प रषद 2016

वषय-सूची
नई ग़ज़ल
चु नदा ग़ज़ल
चु नदा अशआर
चु नदा न म
गीत

नई ग़ज़ल

1
हज़ार काँटो से दामन छु ड़ा लया मने
अना को मार के सब कुछ बचा लया मने
कह भी जाऊँ नज़र म ँ इक ज़माने क
ये कैसा ख़ुद को तमाशा बना लया मने
अज़ीम थे ये आ को उठने वाले हाथ
न जाने कब इ ह कासा बना लया मने
अंधेरे बीच म आ जाते इससे पहले ही
दया तु हारे दये से जला लया मने
मुझे जुनून था हीरा तराशने का तो फर
कोई भी राह का प थर उठा लया मने
जले तो हाथ मगर हाँ हवा के हमल से
कसी चराग़ क लौ को बचा लया मने

2
इससे बढ़कर वाब जीने क सज़ा कुछ भी नह
ज़ दगी भर ठोकरे खा मला कुछ भी नह
तुम तो याद के हवाले करके मुझको चल दये
मेरी मजबूरी यह है म भूलता कुछ भी नह
यार क अपनी ज़बाँ अपना ही इक अ दाज़ है
मने सब कुछ सुन लया उसने कहा कुछ भी नह
तयशुदा इ ज़ाम क जससे कोई त द क़ हो
मेरे घर से आज तक ऐसा मला कुछ भी नह
खो दया क़तरे ने ख़ुद को इक तअ लुक के लए
और मज़ा यह है सम दर को पता कुछ भी नह
आ खरश आँधी ने जो चाहा वही होकर रहा
को शश तो क चराग से आ कुछ भी नह

3
हवा अंधेर के ऐसे दबाव म आई
फर इक ग़रीब से घर का दया उठा लाई
घर क बात घर से जहाँ नकल आई
तो फर कसी के न रोके केगी वाई
याल यह था क अब दन ज़ र नकलेगा
मगर यह रात तो फर रात ले के लौट आई
ये जायदाद क तक़सीम भाइय म ई
क जायदाद म तक़सीम हो गये भाई
नह तो ख़ुद कसी म ज़र का एक ह सा थी
तु हारी स त जब उठ तो आँख कहलाई
बुझा दये गये कैसे बना वज़ाहत के
दय क गम मज़ाजी हवा के काम आई
मेरी नगाह म मं ज़ल के वाब रहते ह
मुझे सताती नह रा त क त हाई
अजीब बात है हर र ता टू टने के बाद
मुझे तो अपनी ही कोई कमी नज़र आई
म कम नगाह था ऐसा क पढ़ नह पाया
कसी दरीचे से छनती रही शानासाई

4
नया क हर जंग वह लड़ जाता है
जसको अपने आप से लड़ना आता है
परदा जब गरने के क़रीब आ जाता है
तब जाकर कुछ खेल समझ म आता है
तू या समझा तुझसे बछु ड़ कर बख ँ गा
दे ख! ये म ँ मुझको स भलना आता है
यार तो इक ज बा है तलब से आगे का
यार म कोई कैसे धोखा खाता है
जस घर म बस एक कमाने वाला हो
मर जाए जो घर का घर मर जाता है
नया से लड़ने को नकले हो तो वसीम
दे खो शमन दे ख के उलझा जाता है

5
सभी को छोड़कर ख़ुद पर भरोसा कर लया मने
वो म जो मुझम मरने को था ज़ दा कर लया मने
मुझे उस पार उतर जाने क ज द ही कुछ ऐसी थी
क जो क ती मली उस पर भरोसा कर लया मने
मुझे ये खौफ़ दे मा लक मुझी पर है नज़र तेरी
बस इतना ही नह काफ़ क सजदा कर लय मने
भरोसा तूने तोड़ा था मगर ख़ुद को सज़ा यूँ द
क फर जो मल गया उस पर भरोसा कर लया मने
यही चाहा क जो मुझसे मले मेरी तरह सोचे
इसी इक सोच से ख़ुद को अकेला कर लया मने
सफ़र मेरा कसी तूफान के डर से नह कता
इरादा कर लया तो फर इरादा कर लया मने

6
द रया का सारा नशा उतरता चला गया
मुझको डु बोया और म उभरता चला गया
वो पैरवी तो झूठ क करता चला गया
ले कन बस उसका चेहरा उतरता चला गया
हर साँस उ भर कसी मरहम से कम न थी
म जैसे कोई ज़ म था भरता चला गया
हद से बढ़ उड़ान क वा हश तो यूँ लगा
जैसे कोई पर को कतरता चला गया
मं ज़ल समझ के बैठ गये जनको च द लोग
म ऐसे रा त से गुज़रता चला गया
नया समझ म आई मगर आई दे र से
क चा ब त था रंग उतरता चला गया

7
यही तै जानकर कूदो उसूल क लड़ाई म
क रात कुछ न बोलगी चराग़ क सफाई म
बुरी सोच के कारोबार म इतनी कमी तो है
कमाई होती है बरकत नह होती कमाई म
नभाना खून के र ते कोई आसां नह होता
गुज़र जाती है सारी ज़ दगी ख़ुद से लड़ाई म
तअ लुक के वह मौसम तो भुलाए ही नह जाते
वफ़ा के ख़ नकलते थे जब उसक बेवफाई म
कसी को भी कसी फ़न म मकान ऐसे नह मलता
क सांस फूल जाती ह पहाड़ क चढ़ाई म

8
बछड़ जाऊँ तो फर र ता तेरी याद से जोडँगा
मुझे ज़द है म जीने का कोई मौक़ा न छोडँगा
मोह बत म तलब कैसी वफ़ादारी म शत या
वो मेरा हो न हो म तो उसी का हो के छोडँगा
तअ लुक टू ट जाने पर जो मु कल म तुझे डाले
म अपनी आँख म ऐसा कोई आँसू न छोडँगा
तेरे र ते मेरी यह एह तयात याद रखगे
चलूँगा इस सलीके से क न श-ए-पा न छोडँगा
कह ज बात के पैर से तहज़ीब भी चलती है
कसी के यार क खा तर म अपना घर न छोडँगा

9
चला है सल सला कैसा ये रात को मनाने का
तु ह हक़ दे दया कसने दय के दल खाने का
इरादा छो ड़ए अपनी हद से र जाने का
ज़माना है ज़माने क नगाह म न आने का
कहाँ क दो ती कन दो त क बात करते हो
मयाँ मन नह मलता कोई अब तो ठकाने का
नगाह म कोई भी सरा चेहरा नह आया
भरोसा ही कुछ ऐसा था तु हारे लौट आने का
ये म ही था बचा के ख़ुद को ले आया कनारे तक
सम दर ने ब त मौक़ा दया था डू ब जाने का

10
ज़माना मु कल म आ रहा है
हम आसान समझा जा रहा है
जधर जाने से दल कतरा रहा है
उसी जा नब को र ता जा रहा है
कसी का साथ पाने क ललक म
कोई हाथ से नकला जा रहा है
मला द ख़ाक म जसन बहार
उसे फूल म तोला जा रहा है
जसे महसूस करना चा हए था
उसे आँख से दे खा जा रहा है
तुझे क़तरा भुनाने क पड़ी है
तेरे हाथ से द रया जा रहा है

11
जाने कैसी यास पैमाने म है
सारी-सारी रात मैखाने म है
इसक म भी उसके पैमाने म है
यह शकायत आम मैखाने म है
तू जो है बस मुझको ठु कराने म है
मेरा सब कुछ तेरा कहलाने म है
तेरी नयादा रय से इक सवाल
मेरा र ता कौन से खाने म है
सच तो बस इक बार जी कर मुतमईन
झूठ ज़ दा ख़ुद को दोहराने म है
यह न ताबीर के समझेगी अज़ाब
आँख तो बस वाब दखलाने म है
वो भला नया को पाने म कहाँ
जो मज़ा नया को ठु कराने म है

12
ये एह तयाज़-ए-मोह बत तो जी नह जाती
क तेरी बात मुझी से कही नह जाती
तेरी नगाह भी कैसी अजब कहानी है
मेरे अलावा कसी से पढ़ नह जाती
ये हौसला भी कोई इ तयार दे ता है
कसी को ऐसे तो आवाज़ द नह जाती
तुझे पता भी है सूरज तेरे इलाक़े म
कह -कह तो कभी रोशनी नह जाती
जसे भी मलना है ख़ुद आए ये न जाएंगे
फ़क़ रज़ाद क शाहंशही नह जाती
घर पे आके भी ज़ -ए-सफ़र तो रहता है
सफ़र क बात सफ़र म ही क नह जाती
अजब मज़ाज है इन खानदारी लोग का
तबाह हो के भी द रया दली नह जाती
भटकते फरते ह कब से इक ऐसे सहरा म
जहाँ पे चीख भी अपनी सुनी नह जाती
ज़बां बगड़ने का अंदेशा भी तो रहता है
सफ़र म सबसे मयां बात क नह जाती

13
हो गया जैसा यहाँ, ऐसा कहाँ हो जायेगा
क़तरे बोलगे, सम दर बेज़बां हो जायेगा
यार क यह फ़तरी कमज़ोरी छु पा के दे खे तो
ज म बोलेगा तेरा चेहरा ज़बां हो जायेगा
क़दशनासी का यहाँ जब कोई पैमाना नह
जो भी उठे गा वह मीर-ए-कारवाँ हो जायेगा
तेरी नज़र क हद तुझको बताने के लए
और कुछ दन म तेरा बेटा जवाँ हो जायेगा
यार जब तेरे लए कोई जुनूँ था ही नह
तू भला बदनाम नया म कहाँ हो जायेगा
म न कहता था क मुझम इतनी दलच पी न ले
वह जो अपना ही नह तेरा कहाँ हो जाएगा
उ हो दरकार जस चेहरे को पढ़ने के लए
च द ल ज़ म भला कैसे बयाँ हो जाएगा
खौफ़ के साये म ब चे को अगर जीना पड़ा
बेज़बां हो जायेगा या बदज़बां हो जाएगा
या अजब शत अमलदारी का मौसम है वसीम
जो भी लूटे बाग़ को वह बागबाँ हो जाएगा

14
दन क ज़ र होगी मगर रात क कहाँ
सूरज! चराग़ जैसी तेरी रोशनी कहाँ
ह ठ को रोज़ इक नये द रया क आरज़ू
ले जाएगी ये यास क आवारगी कहाँ
कतरे को दे ख खो दया ख़ुद को तेरे लए
द रया तुझे नसीब ये द रया दली कहाँ
जो आँ धय के ज़ोर से नज़र मला सके
इस दौर के दय म वह द वानगी कहाँ
ख़ुदग ज़य म बंट गई ज ब क वुसअत
ग़म को भी जो नभाए अब ऐसी खुशी कहाँ
नया से कुछ उ मीद जो रखते तो कस लए
नया से सारी उ हमारी नभी कहाँ
म दन क रोशनी म आ गुम तो ऐ वसीम
नया चराग़ ले के मुझे ढूं ढती कहाँ

15
ग़म को नयादार बनाना पड़ता है
आँसू को भी आँख तक आना पड़ता है
जाने कस र ते को सोच के नकले थे
जाने कस र ते पर जाना पड़ता है
नई ज़मीन र ता रोज़ नह दे त
कभी-कभी ख़ुद को दोहराना पड़ता है
तुमसे र मो राह बढ़ाने क खा तर
कस- कस क बात म आना पड़ता है
अखबार क सुख़ बनना खेल नह
चौराह पर शोर मचाना पड़ता है

चु नदा ग़ज़ल

1
आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उसके होठ पे कुछ कांपता रह गया
रात मुज रम1 थी, दामन बचा ले गयी
दन गवाह क सफ़2 म खड़ा रह गया
वह मेरे सामने ही गया और म
रा ते क तरह दे खता रह गया
झूठ वाले कह -से-कह बढ़ गये
और म था क सच बोलता रह गया
आँ धय के इरादे तो अ छे न थे
यह दया कैसे जलता आ रह गया
उसको कांध पे ले जा रहे ह ‘वसीम’
और वह जीने का हक़ मांगता रह गया

1. अपराधी
2. पं

2
र से ही बस द रया1 द रया लगता है
डू ब के दे खो कतना यासा लगता है
त हा2 हो तो घबराया सा लगता है
भीड़ म उसको दे ख के अ छा लगता है
आज ये है कल और यहाँ होगा कोई
सोचो तो सब खेल तमाशा लगता है
म ही न मानूँ, मेरे बखरने म वरना
नया भर को हाथ तु हारा लगता है
ज़ेहन से काग़ज़ पर त वीर उतरते ही
एक मुस वर3 कतना अकेला लगता है
यार के इस न शे को कोई या समझे
ठोकर म जब सारा ज़माना लगता है
भीड़ म रह कर अपना भी कब रह पाता
चाँद अकेला है तो सब का लगता है
शाख़4 पे बैठ भोली-भाली इक च ड़या
या जाने उस पर ही नशाना लगता है

1. नद

2. अकेला
3. च कार
4. डाल

3
म इस उ मीद पे डू बा क तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इ तहान1 या लेगा
ये एक मेला है, वादा कसी से या लेगा
ढलेगा दन, तो हर इक अपना रा ता लेगा
म बुझ गया, तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चराग़ नह ं क फर जला लेगा
कलेजा चा हए

मन से

मनी के लए

जो बेअमल2 है, वह बदला कसी से या लेगा
म उसका हो नह सकता, बता न दे ना उसे
लक र हाथ क अपनी वह सब जला लेगा
हज़ार तोड़ के आ जाऊं उससे र ता ‘वसीम’
म जानता ं वह जब चाहेगा, बुला लेगा

1. परी ा
2. नक मा

4
ये है तो सबके लए हो ये ज़द हमारी है
इस एक बात पे

नया से जंग1 जारी है

उड़ान वाल ! उड़ान पे व त भारी है
पर 2 क अब के नह हौसल क बारी है
म क़तरा हो के भी तूफ़ाँ से जंग लेता ँ
मुझे बचाना सम दर क ज़ मेदारी है
इसी से जलते ह सहरा-ए-आरज़ू3 म चराग़
ये त गी4 तो मुझे ज़ दगी से यारी है
कोई बताये ये उसके ग़ रे बेजा5 को
वो जंग मने लड़ी ही नह जो हारी है
हर एक साँस पे पहरा है बे-यक़ नी का
ये ज़ दगी तो नह मौत क सवारी है
आ करो क सलामत रहे मरी ह मत
ये इक चराग़ कई आँ धय पे भारी है

1. लड़ाई
2. पंख
3. इ छा के रे ग तान
4. यास

5. अनु चत गव

5
अजीब है क मुझे रा ता नह दे ता
म उस को राह से जब तक हटा नह दे ता
मुझे भी चा हए कुछ व त ख़ुद से मलने को
म हर कसी को तो अपना पता नह दे ता
ये अपनी मज़ से अपनी जगह बनाते ह
सम दर को कोई रा ता नह दे ता
ज़ र है कसी गदन पे रोशनी का ख़ून
कोई चराग़ तो ख़ुद को बुझा नह दे ता
मरी नगाह क गु ता ख़याँ1 समझता है
वह जाने य मुझे फर भी सज़ा नह दे ता
ये छोट-छोटे दये सा ज़श म रहते ह
कसी का घर कोई सूरज जला नह दे ता

1. बदतमीज़ी

6
ज़रा-सा क़तरा कह आज अगर उभरता है
सम दर ही के लहज़े म बात करता है
खुली छत के दये कब के बुझ गये होते
कोई तो है, जो हवा के पर कतरता है
शराफ़त क यहां कोई अह मयत1 ही नह
कसी का कुछ न बगाड़ो, तो कौन डरता है
यह दे खना है क सहरा2 भी है, सम दर भी
वह मेरी त ालबी3 कसके नाम करता है
तुम आ गये हो, तो कुछ चांदनी-सी बात ह
ज़म पे चांद कहां रोज़-रोज़ उतरता है
ज़म क कैसी वक़ालत हो, फर नह चलती
जब आसमां से कोई फ़ैसला उतरता है

1. मह ा
2. म थल
3. यास

7
खुल के मलने का सलीक़ा आपको आता नह
और मेरे पास कोई चारे दरवाज़ा नह
वो समझता था, उसे पाकर ही म रह जाऊंगा
उसको मेरी यास क श त1 का अ दाज़ा नह
जा, दखा नया को, मुझको या दखाता है ग़ र
तू सम दर है, तो हो, म तो मगर यासा नह
कोई भी द तक करे, आहट हो या आवाज़ दे
मेरे हाथ म मेरा घर तो है, दरवाज़ा नह
अपन को अपना कहा, चाहे कसी दज के ह
और जब ऐसा कया मने, तो शरमाया नह
उसक मह फ़ल म उ ह क रोशनी, जनके चराग़
म भी कुछ होता, तो मेरा भी दया होता नह
तुझ से या बछड़ा, मेरी सारी हक़ क़त2 खुल गयी
अब कोई मौसम मले, तो मुझ से शरमाता नह

1. ती ता
2. वा त वकता

8
तु ह ग़म का समझना अगर न आयेगा
तो मेरी आँख म आँसू नज़र न आयेगा
ये ज़ दगी का मुसा फ़र, ये बेवफ़ा ल हा
चला गया, तो कभी लौटकर न आयेगा
बनेग ऊँचे मकान म बैठकर न शे
तो अपने ह से म म का घर न आयेगा
मना रहे ह ब त दन से ज -ए-त ालबी1
हम पता था, ये बादल इधर न आयेगा
लगेगी आग, तो स त-ए-सफ़र2 न दे खेगी
मकान शहर म कोई नज़र न आयेगा
‘वसीम’ अपने अंधेर का ख़ुद इलाज करो
कोई चराग़ जलाने इधर न आयेगा।

1. यास का समारोह
2. या ा क दशा

9
मुह बत नासमझ होती है, समझाना ज़ री है
जो दल म है, उसे आँख से कहलाना ज़ री है
उसूल पर जहां आंच आये, टकराना ज़ री है
जो ज़ दा हो, तो फर ज़ दा नज़र आना ज़ री है
नई उ क ख़ुदमु ता रय 1 को कौन समझाये
कहां से बच के चलना है, कहां जाना ज़ री है
थके-हारे प र दे जब बसेरे के लए लौट
सलीक़ाम द2 शाख़ का लचक जाना ज़ री है
ब त बेबाक आँख म तअ लुक़3 टक नह पाता
मुह बत म क शश4 रखने को शरमाना ज़ री है
सलीक़ा ही नह , शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है, तो नज़र आना ज़ री है
मेरे होठ पे अपनी यास रख दो और फर सोचो
क इसके बाद भी नया म कुछ पाना ज़ री है

1. वा धकार
2. वहारकुशल
3. स ब ध
4. आकषण

10
सभी का धूप से बचने को सर नह होता
हर आदमी के मुक़ र म घर नह होता
कभी ल से भी तारीख़ लखनी पड़ती है
हर एक मा रका1 बात से सर नह होता
म उसक आँख का आँसू न बन सका, वना
मुझे भी ख़ाक म मलने का डर नह होता
मुझे तलाश करोगे, तो फर न पाओगे
म इक सदा ं, सदा का घर नह होता
हमारी आँख के आँसू क अपनी नया है
कसी फ़क़ र को शाह का डर नह होता
क़लम उठाये मेरे हाथ थक गये, फर भी
तु हारे घर क तरह मेरा घर नह होता
म उस मकान म रहता ं और ज़ दा ं ‘वसीम’
जसम हवा का गुज़र नह होता

1. संघष

11
म आसमां पे ब त दे र रह नह सकता
मगर यह बात ज़म से तो कह नह सकता
कसी के चेहरे को कब तक नगाह म र खूं
सफ़र म एक ही मंज़र तो रह नह सकता
यह आज़माने क फ़सत तुझे कभी मल जाये
म आँख -आँख म या बात कह नह सकता
सहारा लेना ही पड़ता है मुझको द रया का
म एक क़तरा ं तनहा तो बह नह सकता
लगा के दे ख ले, जो भी हसाब आता हो
मुझे घटा के वह गनती म रह नह सकता
यह च द ल ह 1 क बेइ तया रयां2 ह ‘वसीम’
गुनह से र ता ब त दे र रह नह सकता

1. ण
2. काबू न होना

12
तु हारी राह म म के घर नह आते
इसी लये तो तु ह हम नज़र नह आते
मुह बत के दन क यही ख़राबी है
यह ठ जाय, तो फर लौटकर नह आते
ज ह सलीक़ा1 है तहज़ीब-ए-ग़म2 समझने का
उ ह के रोने म आँसू नज़र नह आते
ख़ुशी क आँख म आँसू क भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नह आते
बसाते-इ क़3 पे बढ़ना कसे नह आता
यह और बात क बचने के घर नह आते
‘वसीम’ ख़बर बनाते ह, तो वही अख़बार
जो ले के एक भी अ छ ख़बर नह आते

1. ढं ग
2. ःख क सं कृ त
3. ेम क बाज़ी

13
अपने साए को इतना समझाने दे
मुझ तक मेरे ह से क धूप आने दे
एक नज़र म कई ज़माने दे खे, तो
बूढ़ आँख क त वीर बनाने दे
बाबा, नया जीत के म दखला ं गा
अपनी नज़र से र तो मुझको जाने दे
म भी तो इस बाग़ का एक प र दा ं
मेरी ही आवाज़ म मुझको गाने दे
फर तो यह ऊंचा ही होता जायेगा
बचपन के हाथ म चांद आ जाने दे
फ़सल पक जाय, तो खेत से बछड़गी
रोती आँख को यार कहां, समझाने दे

14
जीते ह, करदार1 नह है
नाव तो है, पतवार नह है
मेरा ग़म मझधार नह है
ग़म है, कोई उस पार नह है
खोना-पाना म या जानूं
यार है, कारोबार नह है
सजदा2 वहां इक सर क व ज़श3
सर पे जहां तलवार नह है
म भी कुछ ऐसा र नह ं
तू भी सम दर-पार नह है
पहले तोलो, फर कुछ बोलो
ल ज़ कोई बेकार नह है
म सबसे झुककर मलता ं
मेरी कह भी हार नह है

1. पा ता
2. माथा टे कना
3. ायाम

15
या ख है, सम दर को बता भी नह सकता
आँसू क तरह आँख तक आ भी नह सकता
तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसम तेरी या
हर श स मेरा साथ नभा भी नह सकता
यासे रहे जाते ह ज़माने के सवालात
कसके लए ज़ दा ं, बता भी नह सकता
घर ढूं ढ़ रहे ह मेरा रात के पुजारी
म ं क चराग़ को बुझा भी नह सकता
वैसे तो इक आँसू ही बहाकर मुझे ले जाये
ऐसे कोई तूफ़ान हला भी नह सकता

16
रात के हाथ से दन नकलने लगे
जायदाद 1 के मा लक बदलने लगे
एक अफ़वाह सब रौनक ले गयी
दे खते-दे खते शहर जलने लगे
म तो खोया र ंगा तेरे यार म
तू ही कह दे ना, जब तू बदलने लगे
सोचने से कोई राह मलती नह
चल दये ह, तो र ते नकलने लगे
छ न ली शोहरत 2 ने सब आज़ा दयां
राह चलत से र ते नकलने लगे

1. स प
2. स

17
क़तरा1 ं, अपनी हद से गुज़रता नह
म सम दर को बदनाम करता नह
तू अगर एक हद से गुज़रता नह
म भी अपनी हद पार करता नह
अपनी कम- ह मती को आ द जये
पर कसी के कोई यूं कतरता नह
जाने या हो गयी इसक मासू मयत2
अब ये ब चा धमाक से डरता नह
बस, जम से जुड़ी ह सभी रौनक
आसमां से कोई घर उतरता नह

1. बूंद
2. भोलापन

18
शाम तक सु ह क नज़र से उतर जाते ह
इतने समझौत पे जीते ह क मर जाते ह
फर वही त ख़-ए-हालात1 मुक़ र ठहरी
न शे कैसे भी ह , कुछ दन म उतर जाते ह
इक जुदाई का वह ल हा क जो मरता ही नह
लोग कहते थे क सब व त गुज़र जाते ह
घर क गरती ई द वार ही मुझसे अ छ
रा ता चलते ए लोग ठहर जाते ह
हम तो बेनाम इराद के मुसा फ़र ह ‘वसीम’
कुछ पता हो, तो बताय क कधर जाते ह

1. प र थ तय क कड़वाहट

19
म अपने वाब से बछड़ा नज़र नह आता
तो इस सद 1 म अकेला नज़र नह आता
अजब दबाव है इन बाहरी हवा का
घर का बोझ भी उठता नज़र नह आता
म तेरी राह से हटने को हट गया, ले कन
मुझे तो कोई भी रा ता नज़र नह आता
म इक सदा पे हमेशा को घर तो छोड़ आया
मगर पुकारने वाला नज़र नह आता
धुआं भरा है यहां तो सभी क आँख म
कसी को घर मेरा जलता नज़र नह आता
ग़ज़लसराई2 का दावा तो सब करे ह ‘वसीम’
मगर वह ‘मीर’-सा लहज़ा3 नज़र नह आता

1. शता द
2. ग़ज़ल सुनाना
3. शैली

20
जब अपनी सांस ही दरपरदा1 हम पे वार करे
तो फर जहां म कोई कस पे एतबार2 करे
वफ़ा क राह म कतने ही मोड़ आयगे
बता! ये उ कहां तेरा इ तज़ार करे
हर एक अपने लए मेरे ज़ म गनता है
मेरे लए भी कोई हो, जो मुझसे यार करे
ब त दन म ज़माने क ठोकर म रहा
कहो ज़माने से, अब मेरा इ तज़ार करे
सब अपनी यास म गुम ह, यहां तो ऐ साक़ 3
कोई नह , जो तेरे मैकदे 4 से यार करे

1. परदे क ओट से छपकर
2. व ास
3. शराब बांटने वाला
4. म दरालय

21
सांस का मतलब जान नह है
जीना कोई आसान नह है
यार क बाज़ी हार गये, तो
हार के भी नुक़सान नह है
ज़हन म वह जंग है जारी
जसका कोई ऐलान नह है
गांव के मेल-े पनघट दे खो
शहर म ह तान नह है
आज क नया उसको जाने
जसक कोई पहचान नह है

22
आँख आँख रहे और कोई घर न हो
वाब जैसा कसी का मुक़ र न हो
या तम ा है रोशन तो सब ह मगर
कोई मेरे चराग़ से बढ़ कर न हो
रोशनी है तो कस काम क रोशनी
आँख के पास जब कोई मंज़र न हो
या अजब आरज़ू घर के बूढ़ क है
शाम हो तो कोई घर से बाहर न हो
जसको कमतर समझते रहे हो वसीम
मल के दे खो कह तुमसे बेहतर न हो

23
उसक आँख से या न द चुराना है
ख़ुद को भी तो सारी उ जगाना है
तुझ तक जस र ते से हो कर जाना है
उस पर तो पहले से एक ज़माना है
कससे बचना कससे हाथ मलाना है
सबके पास अपना-अपना पैमाना1 है
आग हवा पानी से जो भी र ता हो
म के ह म म मल जाना है
कोई न समझे काश मरी मजबूरी को
घर का ग़म ले कर मह फ़ल2 म जाना है
फल तो ख़ैर कहाँ उसके खा पाऊँगा
फर भी पूरे शौक़ से पेड़ लगाना है
अ दर से जब सारे र ते बखरे ह
घर आँगन क बात तो बाहर जाना है
पाने को मरने वाल क नया म
खोने वाल का भी एक घराना है
ओस का न हा सा क़तरा1 समझायेगा
सूरज क नज़र म कैसे आना है

1. मापद ड
2. सभा, गो ी
1. बूंद

24
हम ये तो नह कहते क हम तुझसे बड़े ह
ले कन ये ब त है क तरे साथ खड़े ह
वो आज को सर करके1 दखाने पर अड़े ह
हम ह क अभी कल ही के पैर पे खड़े ह
ये बात तो उस बाग़ के हक़2 म नह जाती
कुछ फूल भी काँट क हमायत3 म खड़े ह
सवाई4 के इक डर को भी वह जीत न पाया
हम जसके लए सारे ज़माने से लड़े ह
दे ते ह वही फ़ैसले तूफ़ान के ख़ पर
जो एक ज़माने से कनार पे खड़े ह
ँ ख़ाक5 मगर मेरी मुह बत क बदौलत6
ये चाँद सतारे तरे क़दम म पड़े ह
ये गूँग क मह फ़ल है नकलना ही पड़ेगा
या इतनी ख़ता7 कम है क हम बोल पड़े ह
नया से वसीम आयी नभाने क जहाँ बात
हम ख़ुद से अकेले म ब त दे र लड़े ह

1. जीत कर
2. हत, प
3. समथन
4. बदनामी
5. म
6. कारण
7. अपराध

25
मले कुछ तो ख़ुशी होगी न कुछ जाये तो ग़म होगा
तअ लुक़1 जतना इस

नया के हंगाम से कम होगा

कहाँ तक आंख रोयेगी कहाँ तक कसका ग़म होगा
मरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा
तुझे पाने क को शश2 म कुछ इतना खो चुका ँ म
क तू मल भी अगर जाये तो अब मलने का ग़म होगा
सम दर क ग़लतफ़हमी3 से कोई पूछ तो लेता
ज़म का हौसला4 या ऐसे तूफ़ान से कम होगा
तरी चाहत मुझे आ ख़र समझने य नह दे ती
कसी क़तरे से मलने को सम दर कतना कम होगा
न हो इक यार का र ता जो पहचान बनाता है
तो पूछेगा कोई मुझ को न तू इतना अहम5 होगा
मुह बत नापने का कोई पैमाना नह होता
कह तू बढ़ भी सकता है कह तू मुझसे कम होगा

1. स ब ध
2. यास
3. समझ क भूल
4. उ साह

5. मह वपूण

26
या ठ क मुझे लगता है और या नह लगता
कह दे ता अगर जान का खतरा नह लगता
इस तरह तो मलना कोई मलना नह लगता
त हाई1 म भी म उसे त हा नह लगता
इक तेरे न होने से कुछ अ छा नह लगता
इस शहर म या है जो अधूरा नह लगता
इस दौर का ये सच है मगर कस को बताय
ग़ैर 2 क तरह भी कोई अपना नह लगता
सीने से लपटते ही पलट जाने क को शश
लहर को कनार पे भरोसा नह लगता
बस साथ नभाने का नर3 साथ है वरना
काँटे का कसी फूल से र ता नह लगता
छ ने लये जाता है उमीद 4 क चमक भी
ये तो मरे वाब का उजाला नह लगता
हर साल नये प े बदल दे ते ह तेवर
बूढ़ा है मगर पेड़ पुराना नह लगता
ख़ुदगज़ बना दे ती है श त क राह भी
यासे को कोई सरा यासा नह लगता

1. एका त
2. पराय
3. कला
4. आशा

27
कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा1 हो तो हर बात सुनी जाती है
जैसा चाहा था तुझे दे ख न पाये

नया

दल म बस एक ये हसरत2 ही रही जाती है
एक बगड़ी ई औलाद3 भला या जाने
कैसे माँ बाप के ह ठ से हँसी जाती है
क़ज़ का बोझ उठाये ए चलने का अज़ाब4
जैसे सर पर कोई द वार गरी जाती है
अपनी पहचान मटा दे ना हो जैसे सब कुछ
जो नद है वो सम दर से मली जाती है
आज के बखरे ए ब च क क़ मत5 म कहाँ
वो कहानी जो बुजग 6 से सुनी जाती है
पूछना है तो ग़ज़ल वाल से पूछो जा कर
कैसे हर बात सलीक़े से कही जाती है

1. ढं ग
2. लालसा
3. स तान
4. द ड

5. भा य
6. बड़े-बूढ़े लोग

28
कही-सुनी पे ब त एतबार1 करने लगे
मरे ही लोग मुझे संगसार2 करने लगे
पुराने लोग के दल भी ह ख़ुशबु क तरह
ज़रा कसी से मले एतबार करने लगे
नये ज़माने से आँख नह मला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से यार करने लगे
हमारी सादा मज़ाजी3 क दाद4 दे क तुझे
बग़ैर परखे तरा एतबार करने लगे
नज़र म चढ़ता नह फर नज़र से गरता है
जो हद से बढ़ के कोई इ कसार5 करने लगे
कोई इशारा दलासा न कोई वादा मगर
जब आयी शाम तरा इ तज़ार6 करने लगे
तुझे ही ढूँ ढने नकले थे तेरे द वाने
तो ये आ तरी नया से यार करने लगे

1. भरोसा, व ास
2. प थर से मार कर दया गया मृ यु-द ड
3. सरल दयता
4. शंसा

5. वन ता
6. ती ा

29
कुछ ऐसा मोजज़ा1 ल ज़ 2 के साथ हो जाये
जो म क ँ वो ज़माने क बात हो जाये
हमारे पास कहाँ व त जीतने का नर3
जो दन को ढूँ ढने नकल तो रात हो जाये
बुरी चली है हवा हमसफ़र4 बदलने क
न जाने कौन कहाँ कस के साथ हो जाये
बस एक यार ही ऐसा बुरा खलाड़ी है
जो चाल भी न चले और मात हो जाये
वो लाख जाने-सफ़र हो मगर उसे ये लगे
सफ़र म जैसे कोई यूँ ही साथ हो जाये
म तेरे काम का,

नया! कभी न हो पाऊँ

तो मुझ को लगता है मेरी नजात5 हो जाये
क़सूरवार न ठहराना कल मरे बादल
जो मेरी यास हवा के साथ हो जाये

1. चम कार
2. श द
3. इ म, कला
4. सहया ी
5. छु टकारा, मु

30
तहरीर1 से वरना मरी या हो नह सकता
इक तू है जो ल ज़ म अदा2 हो नह सकता
आँख म ख़याल म जो साँस म बसा है
चाहे भी तो मुझसे वह जुदा हो नह सकता
जीना है तो ये ज

3

भी सहना ही पड़ेगा

क़तरा ँ सम दर से ख़फ़ा4 हो नह सकता
गुमराह5 कये ह गे कई फूल से ज बे6
ऐसे तो कोई राहनुमा7 हो नह सकता
क़द8 मेरा बढ़ाने का उसे काम मला है
जो अपने ही पैर पे खड़ा हो नह सकता
ऐ यार तरे ह से म आया तरी क़ मत
वह दद जो चेहर से अदा हो नह सकता

1. रचना
2. वणन
3. अ याचार
4. नाराज़
5. पथ
6. भावनाएँ
7. मागदशक
8.
व

31
मरी नज़र के सलीक़े म या नह आता
बस इक तरी ही तरफ़ दे खना नह आता
अकेले चलना तो मेरा नसीब था क मुझे
कसी के साथ सफ़र बाँटना नह आता
उधर तो जाते ह र ते तमाम1 होने को
इधर से हो के कोई रा ता नह आता
जगाना आता है उसको कई तरीक़ से
घर पे द तक दे ने ख़ुदा नह आता
यहाँ पे तुम ही नह आस पास और भी ह
पर उस तरह से तु ह सोचना नह आता
पड़े रहो यूँ ही सहमे ए दय क तरह
अगर हवा के पर बाँधना नह आता

1. पूरा होना, समा त होना

32
अँधेरा ज़ेहन का स ते-सफ़र1 जब खोने लगता है
कसी का यान आता है उजाला होने लगता है
वह जतनी र हो उतना ही मेरा होने लगता है
मगर जब पास आता है तो मुझसे खोने लगता है
कसी ने रख दये ममता भरे दो हाथ या सर पर
मरे अ दर कोई ब चा बलख कर2 रोने लगता है
मुह बत चार दन क और उदासी ज़ दगी भर क
यही सब दे खता है और कबीरा रोने लगता है
समझते ही नह नादान कै3 दन क है मलक यत4
पराये खेत पे अपन म झगड़ा होने लगता है
ये दल बच कर ज़माने भर से चलना चाहे है ले कन
जब अपनी राह चलता है अकेला होने लगता है

1. या ा क दशा
2. फूट-फूट कर
3. कतने
4. वा म व

33
रात के टु कड़ पे पलना छोड़ दे
‘श म’1 से कहना क जलना छोड़ दे
मु कल2 तो हर सफ़र का न ह
कैसे कोई राह चलना छोड़ दे
म तो ये ह मत दखा पाया नह
तू ही मेरे साथ चलना छोड़ दे
लोग इस मंज़र के आद हो चुके
या करे सूरज नकलना छोड़ दे
तुझसे उ मीदे -वफ़ा3 बेकार है
कैसे इक मौसम बदलना छोड़ दे
कुछ तो कर आदाबे-मह फ़ल4 का लहाज़
यार ये पहलू बदलना छोड़ दे

1. द पक
2. क ठनाइयाँ
3. वफ़ा क उ मीद
4. मह फ़ल के नयम

34
वो भी या दन थे क जब यार म डर लगता था
पास से उसके गुज़रना भी नर लगता था
आने वाले कसी ल हे पे भरोसा न आ
जाने कस बात का ऐसा मुझे डर लगता था
अब तो जीने क भी आदत सी ई जाती है
इक ज़माना था क जीना भी नर1 लगता था
ज़ दगी ख़ौफ़2 कसी ने भी न खाया तुझ से
जस को भी दे खा उसे मौत से डर लगता था
अब तो हम ह, दरो-द वार3 से बात ह वसीम
साथ ब चे रहा करते थे तो घर लगता था

1. कला
2. डर
3. ार और द वार

35
उसने मेरी राह न दे खी और वह र ता तोड़ लया
जस र ते क ख़ा तर मुझसे नया ने मुँह मोड़ लया
बड़ी बड़ी ख़ु शय के हाँ1 नज़द क से जा कर दे खा तो
मने राह के चलते फरते ख से नाता जोड़ लया
म कतने रंग म ढलता कब तक ख़ुद से लड़ पाता
जीवन एक सफ़र था जसने रोज़ नया इक मोड़ लया
ऐसे श स को मीर2 बनाया जो बस वाब दखाता था
ब ती के लोग ने अपना आप मुक़ र फोड़ लया
म तो भोला भाला ‘वसीम’ और वो फ़नकार3 सयासत का
उसके जब घटने क बारी आयी मुझको जोड़ लया

1. यहाँ
2. अगुवा, नायक
3. कलाकार

36
वो मुझको या बताना चाहता है
जो नया से छु पाना चाहता है
मुझे दे खो क म उसको ही चा ँ
जसे सारा ज़माना चाहता है
क़लम करना1 कहाँ है उसका मंशा2
वो मेरा सर झुकाना चाहता है
शकायत का धुआँ आँख से दल तक
तअ लुक़3 टू ट जाना चाहता है
तक़ाज़ा4 व त का कुछ भी हो ये दल
वही क़ सा पुराना चाहता है

1. काटना
2. म त
3. स ब ध
4. माँग, अपे ा

37
उसे तलाश हो अब या कसी बहाने क
हम को पड़ गयी आदत फ़रेब1 खाने क
फर आये लोग ई को शश मनाने क
मगर वो म क न समझा हवा ज़माने क
तु हारी ज़द है अगर फ़ासला बढ़ाने क
तो हम भी आ ख़री को शश म ह नभाने क
तरी नज़र को चुरा कर कोई कहाँ ले जाये
तरी नज़र तो नज़र म है इक ज़माने क
तु हारे हाथ म हम कैसे ब तयाँ स प
तु हारे हाथ को आदत है घर जलाने क

1. धोखा

38
जहाँ द रया कह अपने कनारे छोड़ दे ता है
कोई उठता है और तूफ़ान का ख़ मोड़ दे ता है
मुझे बे-द तो-पा1 करके भी ख़ौफ़ उसका नह जाता
कह भी हा दसा गुज़रे वह मुझसे जोड़ दे ता है
बछड़ के तुझसे कुछ जाना अगर तो इस क़दर जाना
वो म
ँ जसे द रया कनारे छोड़ दे ता है
मुह बत म ज़रा सी बेवफ़ाई तो ज़ री है
वही अ छा भी लगता है जो वादे तोड़ दे ता है

1. हाथ-पाँव के बग़ैर

39
ज 1 का ज़हर कुछ भी हो पीता नह
म ज़माने क शत पे जीता नह
दे खे जाते नह मुझसे हारे ए
इस लए म कोई जंग जीता नह
अपनी सुबह के सूरज उगाता ँ ख़ुद
म चराग़ क साँस से जीता नह
उ भर ज़ा त 2 क हद म रहा
इस लए म कसी का चहीता नह

1. ज़ोर-ज़बरद ती
2. नयम

40
आँख म आँसू है रोने क तम ा दल म है
एक क़दम मं ज़ल से बाहर एक क़दम मं ज़ल म है
ज़ त-ए-ग़म1 से मट गई आ खर जवानी क उमंग
पहले दल मु कल म था अब ज़ दगी मु कल म है
आलम-ए-इ क़-ओ-वफ़ा2 से आ रही है यह ख़बर
राह म तारी कयाँ3 है रोशनी मं ज़ल म है
शम-ए-मह फ़ल जल उठ और जल गया परवाना भी
दे खना यह है उजाला कसके मु तक़ बल4 म है

1. ख या शोक का नयं ण
2. ेम- नबाह का संसार
3. अ धकार
4. भ व य

41
शब-ए-मैख़ाना भी जब तुझ पे गराँ1 गुज़रेगी
ज़ दगी! तू ही बता दे क कहाँ गुज़रेगी
तूने एक व म को रोशन तो कया है ले कन
उ ऐ शमअ तेरी बनके धुआँ गुज़रेगी
ज़ दगी तेरे लए मने ब त कुछ खोया
यह न समझा था क वे नाम-ओ- नशां गुज़रेगी
आज पी लेने दे साक़ मुझे जी लेने दे
कल मेरी रात ख़ुदा जाने कहाँ गुज़रेगी
उनसे कह दो मुझे ख़ामोश ही रहने द ‘वसीम’
लब पे आएगी तो हर बात गराँ गुज़रेगी

1. भारी

42
हयात उ ह मली जनको ग़म-ए-हयात नह
वहाँ चराग़ जले ह जहाँ पे रात नह
अंधेरे जसका मुक र न ह वह रात नह
उदास म न र ं मेरे बस क बात नह
तु हारी ब म म उनके भी जाम ख़ाली ह
ज ह यक़ है क मह म-ए-इ तफ़ात1 नह
तेरी नगाह मुझे ग़ैर य नह लगती
जब इसके ज़हन2 म माज़ी3 क कोई बात नह
‘वसीम’ यूँ मेरे हालात पूछते ह लोग
मेरे मटाने म जैसे कसी का हाथ नह

1. कृपा से वं चत
2. म त क
3. अतीत

43
लब पे दल क बात भी आई नह
या यह तेरे ग़म क

सवाई1 नह

घेर लेते ह ज़माने के ख़याल
मेरी तनहाई भी तनहाई नह
आँख से आँसू बहाकर या क ँ
म तेरे ग़म का तमाशाई नह
मु कुराना छोड़ दे ऐ ज़ दगी
यह अदा क लय को रास आई नह
रा त म हो गया हर तजरबा
अब म म ज़ल का तम ाई2 नह
इन दन म तो ब त मजबूर था
या तु ह भी मेरी याद आई नह
मेरी ख़ामोशी को समझो तो ‘वसीम’
इतनी शेर म भी गहराई नह
ऐ ‘वसीम’ आँख तु हारी सुख़ ह
रात भी लगता है न द आई नह

1. बदनामी

2. इ छु क

44
हाल1 ख दे गा तो माज़ी2 पे नज़र जायेगी
ज़ दगी हा दसा बन बन के गुज़र जायेगी
तुम कसी राह से आवाज़ न दे ना मुझको
ज़ दगी इतने सहारे पे ठहर जायेगी
तेरे चेहरे क उदासी पे है नया क नज़र
मेरे हालात पे अब कसक नज़र जायेगी
तुम जो ये-मशवरह-ए-तक-ए-वफ़ा दे ते हो
उ इक रात नह है जो गुज़र जायेगी
उनक याद का तसलसुल3 जो कह टू ट गया
ज़ दगी तू मेरी नज़र से उतर जायेगी
इसी उ मीद पे कब से चला जाता ँ ‘वसीम’
‘उस’ क जा नब4 भी कोई राह गुज़र जायेगी

1. वतमान
2. अतीत
3. सल सला
4. ओर

45
तु हारी राह म हम ज़ दगी गुज़ार चले
क़रार ढूँ ढने आये थे बेक़रार चले
वहारखेज़1 तब सुम था जनक फ़तरत म
तेरे चमन से वह गु चे भी अ कवार2 चले
तेरे ख़याल म यूँ ज़ दगी गुज़रती है
क जैसे गोद म लेकर कोई बहार चले
‘वसीम’ ऐसे ज़माने म इस मज़ाज के साथ
यह कम नह है क हम ज़ दगी गुज़ार चले

1. ऐसी मु कान जसम बस त आ जाये
2. रोते ए

चु नदा अशआर

सलीक़ा ही नह , शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है, तो नज़र आना ज़ री है

उसूल पर जहाँ आँच आये, टकराना ज़ री है
जो ज़ दा हो, तो फर ज़ दा नज़र आना ज़ री है

अजीब है क मुझे रा ता नह दे ता
म उस को राह से जब तक हटा नह दे ता

ये अपनी मज़ से अपनी जगह बनाते ह
सम दर को कोई रा ता नह दे ता

म इस उ मीद पे डू बा क तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इ तहान या लेगा

म बुझ गया, तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चराग़ नह ं क फर जला लेगा

बनगे ऊंचे मकान म बैठकर न शे
तो अपने ह से म म का घर न आयेगा

‘वसीम’ अपने अंधेर का ख़ुद इलाज करो
कोई चराग़ जलाने इधर न आयेगा

खुली छत के दये कब के बुझ गये होते
कोई तो है, जो हवा के पर कतरता है

ज़म क कैसी वक़ालत हो, फर नह चलती
जब आसमां से कोई फ़ैसला उतरता है

सभी का धूप से बचने को सर नह होता
हर आदमी के मुक़ र म घर नह होता

क़लम उठाये मेरे हाथ थक गये, फर भी
तु हारे घर क तरह मेरा घर नह होता

सहारा लेना ही पड़ता है मुझको द रया का
म एक क़तरा ं तनहा तो बह नह सकता

लगा के दे ख ले, जो भी हसाब आता हो
मुझे घटा के वह गनती म रह नह सकता

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसम तेरी या
हर श स मेरा साथ नभा भी नह सकता

वैसे तो इक आँसू ही बहाकर मुझे ले जाये
ऐसे कोई तूफ़ान हला भी नह सकता

क़तरा ,ं अपनी हद से गुज़रता नह
म सम दर को बदनाम करता नह

जाने या हो गयी इसक मासू मयत
अब ये ब चा धमाक से डरता नह

झूठ वाले कह -से-कह बढ़ गये
और म था क सच बोलता रह गया

उसको कांध पे ले जा रहे ह ‘वसीम’
और वह जीने का हक़ मांगता रह गया

जब अपनी सांस ही दरपरदा हम पे वार करे
तो फर जहां म कोई कस पे एतबार करे

ब त दन म ज़माने क ठोकर म रहा
कहो ज़माने से अब मेरा इ तज़ार करे

आज पी लेने दे साक़ मुझे जी लेने दे
कल मेरी रात ख़ुदा जाने कहाँ गुज़रेगी

उनसे कह दो मुझे ख़ामोश ही रहने द ‘वसीम’
लब पे आएगी तो हर बात गराँ गुज़रेगी
आँख आँख रहे और कोई घर न हो
वाब जैसा कसी का मुक़ र न हो

रोशनी है तो कस काम क रोशनी
आँख के पास जब कोई मंज़र न हो

र से ही बस द रया, द रया लगता है
डू ब के दे खो कतना यासा लगता है

आज ये है कल और यहाँ होगा कोई
सोचो तो सब खेल तमाशा लगता है

आग हवा पानी से जो भी र ता हो
म के ह म म मल जाना है

फल तो ख़ैर कहाँ उसके खा पाऊँगा
फर भी पूरे शौक़ से पेड़ लगाना है

हम ये तो नह कहते क हम तुझसे बड़े ह
ले कन ये ब त है क तरे साथ खड़े ह

ये गूँग क मह फ़ल है नकलना ही पड़ेगा
या इतनी ख़ता कम है क हम बोल पड़े ह

म क़तरा हो के भी तूफ़ाँ से जंग लेता ँ
मुझे बचाना सम दर क ज़ मेदारी है

आ करो क सलामत रहे मरी ह मत
ये इक चराग़ कई आँ धय पे भारी है

कुछ ऐसा मोजज़ा ल ज़ के साथ हो जाये
जो म क ँ वो ज़माने क बात हो जाये

बुरी चली है हवा हमसफ़र बदलने क
न जाने कौन कहाँ कस के साथ हो जाये

जगाना आता है उसको कई तरीक़ से
घर पे द तक दे ने ख़ुदा नह आता

पड़े रहो यूँ ही सहमे ए दय क तरह
अगर हवा के पर बाँधना नह आता

तुम कसी राह से आवाज़ न दे ना मुझको
ज़ दगी इतने सहारे पे ठहर जायेगी

इसी उ मीद पे कब से चला जाता ँ ‘वसीम’
‘उस’ क जा नब भी कोई राह गुज़र जायेगी

तुझे पाने क को शश म कुछ इतना खो चुका ँ म
क तू मल भी अगर जाये तो अब मलने का ग़म होगा

मुह बत नापने का कोई पैमाना नह होता
कह तू बढ़ भी सकता है कह तू मुझसे कम होगा

कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा हो तो हर बात सुनी जाती है

आज के बखरे ए ब च क क़ मत म कहाँ
वो कहानी जो बुजग से सुनी जाती है

पुराने लोग के दल भी ह ख़ुशबु क तरह
ज़रा कसी से मले एतबार करने लगे

नये ज़माने से आँख नह मला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से यार करने लगे

जीना है तो ये ज भी सहना ही पड़ेगा
क़तरा ँ सम दर से ख़फा हो नह सकता

क़द मेरा बढ़ाने का उसे काम मला है
जो अपने ही पैर पे खड़ा हो नह सकता

कसी ने रख दये ममता भरे दो हाथ या सर पर
मरे अ दर कोई ब चा बलख कर रोने लगता है

मुह बत चार दन क और उदासी ज़ दगी भर क
यही सब दे खता है और कबीरा रोने लगता है

मु कल तो हर सफ़र का न ह
कैसे कोई राह चलना छोड़ दे

म तो ये ह मत दखा पाया नह
तू ही मेरे साथ चलना छोड़ दे

वो भी या दन थे क जब यार म डर लगता था
पास से उसके गुज़रना भी नर लगता था

अब तो जीने क भी आदत सी ई जाती है
इक ज़माना था क जीना भी नर लगता था

मुझे दे खो क म उसको ही चा ँ
जसे सारा ज़माना चाहता है

क़लम करना कहाँ है उसका मंशा
वो मेरा सर झुकाना चाहता है

फर आये लोग ई को शश मनाने क
मगर वो म क न समझा हवा ज़माने क

तु हारे हाथ म हम कैसे ब तयाँ स प
तु हारे हाथ को आदत है घर जलाने क

जहाँ द रया कह अपने कनारे छोड़ दे ता है
कोई उठता है और तूफ़ान का ख़ मोड़ दे ता है

मुह बत म ज़रा सी बेवफ़ाई तो ज़ री है
वही अ छा भी लगता है जो वादे तोड़ दे ता है

दे खे जाते नह मुझसे हारे ए
इस लए म कोई जंग जीता नह

अपनी सुबह के सूरज उगाता ँ ख़ुद
म चराग़ क साँस से जीता नह

वो समझता था, उसे पाकर ही म रह जाऊंगा
उसको मेरी यास क श त का अ दाज़ा नह

कोई भी द तक करे, आहट हो या आवाज़ दे
मेरे हाथ म मेरा घर तो है, दरवाज़ा नह

तु हारी राह म म के घर नह आते
इसी लये तो तु ह हम नज़र नह आते

ख़ुशी क आँख म आँसू क भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नह आते

अपने साए को इतना समझाने दे
मुझ तक मेरे ह से क धूप आने दे

बाबा नया जीत के म दखला ं गा
अपनी नज़र से र तो मुझको जाने दे

पहले तोलो, फर कुछ बोलो
ल ज़ कोई बेकार नह है

म सबसे झुककर मलता ं
मेरी कह भी हार नह है

म तो खोया र ंगा तेरे यार म
तू ही कह दे ना, जब तू बदलने लगे

सोचने से कोई राह मलती नह
चल दये ह, तो र ते नकलने लगे

इक जुदाई का वह ल हा क जो मरता ही नह
लोग कहते थे क सब व त गुज़र जाते ह

हम तो बेनाम इराद के मुसा फ़र ह ‘वसीम’
कुछ पता हो, तो बताय क कधर जाते ह

अजब दबाव है इन बाहरी हवा का
घर का बोझ भी उठता नज़र नह आता

म इक सदा पे हमेशा को घर तो छोड़ आया
मगर पुकारने वाला नज़र नह आता

जाने कब शहर के र त का बदल जाये मज़ाज
इतना आसाँ तो नह लौट के घर आना भी

ऐसे र ते का भरम रखना कोई खेल नह
तरा होना भी नह और तरा कहलाना भी

नया मरे ख़लाफ़ खड़ी कैसे हो गयी
मेरी तो मनी भी नह थी कसी के साथ

कस काम क रही ये दखावे क ज़ दगी
वादे कये कसी से गुज़ारी कसी के साथ

तुम तो अपने आप म ही गुम रहते हो
तुम से कसी का यार न समझा जायेगा

धुआँ भरा हो जन आँख म नफ़रत का
उनसे कोई वाब न दे खा जायेगा

मने तो उसम इक जहाँ दे खा
मुझम या बात उसे नज़र आयी

जायदाद कहाँ बट इनम
जायदाद म बँट गये भाई

अपनी दरयाई पे इतरा न ब त ऐ द रया
एक क़तरा ही ब त है तरी सवाई को

चाहे जतना भी बगड़ जाये ज़माने का चलन
झूठ से हारते दे खा नह स चाई को

हमारा ये है हर क ती पे चढ़ कर बैठ जाते ह
डु बो दे गी कहाँ जा कर ये अ दाज़ा नह होता

मरे ब च ! तु ह कतनी ही म आसा नयाँ दे ँ
बना ठोकर लगे कोई सफ़र पूरा नह होता

हर श स दौड़ता है यहाँ भीड़ क तरफ़
फर यह भी चाहता है, उसे रा ता मले

इस दौर-ए-मुं सफ़ म ज़ री नह ‘वसीम’
जस श स क ख़ता हो, उसी को सज़ा मले

सब से जीती भी रहे, सब क चहीती भी रहे
ज़ दगी, ऐसे तुझे कौन गुज़रने दे गा

दल को समझाओ क बेकार परेशाँ है ‘वसीम’
अपनी मनमानी उसे कोई न करने दे गा

ख़ुद चलो, तो चलो, आसरा कौन दे
भीड़ के दौर म रा ता कौन दे
यह ज़माना अकेले मुसा फ़र का है
इस ज़माने को फर रहनुमा कौन दे

बछड़ते व त दलासे, न खोखले वादे
वह पहली बार मुझे आज बेवफ़ा न लगा

‘वसीम’ अपने गरेबाँ म झांककर दे खा
तो अपने चार तरफ़ कोई भी बुरा न लगा

मेरा कहलाने का मतलब ये तो नह , तू मेरा हो
तेरा-मेरा र ता, जैसे फूल का र ता ख़ु बू से

शाह ने भी शाही छोड़ के यार कया, तो यार मला
दल क ज़बान जीत न पाया कोई भी ज़ोर-ए-बाज़ू से

अजीब लोग थे, क़ पे जान दे ते थे
सड़क क लाश का कोई भी दावेदार न था

‘वसीम’ धूप से बचने भी हम कहाँ आये
इक ऐसे पेड़ के नीचे, जो सायादार न था

चु नदा न म

म तु ह ख न ँ तो कसको ँ
म तु ह ख न ँ तो कसको ँ
कौन इतना क़रीब है मेरे
इतना अपना तो मेरा कोई नह
जो मुझे मुझसे र ले जाये
जो मरे ऐसे व त काम आये
जब उमीद का हर दया बुझ जाये
जो मरी ख़लवत को पहचाने
सो अँधेर म राह दखलाये
और म पूरे एतमाद1 के साथ
हाथ उसका कुछ ऐसे हाथ म लूँ
जैसे वो बे लखा मुक़ र हो
जैसा बाहर हो वैसा अ दर हो
उसके ह ट पे ह ट यूँ र खूँ
जैसे उन फूल-प य का नशा
मेरे बैराग क अमानत हो
ज म का एक-एक हफ़2 खुले
और ग़जल क इशा रयत1 का सफ़र
ख़ म हो कर सुहाग न म बने
म जो ऐसे म बोलना चा ँ
सी दे ह टो को अपने ह टो से
और उस कै फ़यत म ले आये
जो असीरे-ज़बाँ नह होती

बस तस वुर2 म रंग भरती है
जुगनु क तरह चमकती है
और अँधेरे म र स3 करती है
म तु ह ख न ँ तो कसको ँ
तुम मरी चाह क सदाक़त हो
तुम मरा वाब हो हक़ क़त हो
सब तो व ती4 सुख के साथी ह
चाहत इनक बेग़रज़ कब ह
ये मदारी ह जनका सारा काम
बस मरे नाचने से चलता है
उनक छोड़ो यह माँगने वाले
तुमसे हर बाज़ी हार जायगे
इनसे कोई उमीद या र खूँ
और तु ह ख न ँ तो कसको ँ
तुम मरा एतबार ही तो हो
तुम मरा इ तयार ही तो हो
तुमसे बढ़ कर भला कहाँ कोई
जो ये बारे- गराँ1 उठा पाये
कोई बे स ती-ए-सफ़र2 को यूँ
जागी आँख सजाने वाला है
कौन इक जागते मुसा फ़र को
अपनी न दे सुलाने वाला है
फ़ोन जन उँग लय से होता है
उनक मह मयाँ समझता ँ
लाओ उन उँग लय को चूमता ँ
जो मुझे ढूँ ढने नकलती ह
और मायूस भी नह होती
उनक मस फ़यत समझता ँ

कभी बाल से खेलती ह तो ये
कभी आँख पे र खी जाती ह
कभी दल क तरफ़ सरकती ह
धड़कन के शुमार करने को
रगती ह तमाम ज म पे यूँ
जैसे म चोर ँ ये पहरेदार
थक गयी ह ये उँग लयाँ तो लाओ
म उ ह फर से ताज़ा दम कर ँ
तुम लखो और लखती ही जाओ
चूम कर म उ ह क़लम कर ँ
मुझको एहसास है म जानता ँ
कतना ईसार कर रही हो तुम
अ मत तुम पे नाज़ करती ह
और मेरी सला हयत क हद
तुमसे नज़र मलाते डरती ह

1. व ास
2. अ र
1. संकेता मक, ला णकता
2. क पना
3. नृ य
4. णक
1. भारी बोझ
2. या ा क दशाहीनता

मेरा साथ न दो
अपने ही बारे म सोचो
सोच को इ कानात1 न दो
मेरी राह ब त अलग ह
जाओ मेरा साथ न दो
तुम फूल के पीछे पागल
म ख़ुशबू का द वाना
मुझको ख़ाली जाम ब त ह
तुमको चा हए मैख़ाना
जो मेरे हाथ म आ कर
काँपे ऐसा हाथ न दो
मेरी राह ब त अलग ह
जाओ मेरा साथ न दो
तुमको शौक़, ज़माना जाने
मेरी नया तुम ही तुम
तुमको रग़बत2 नया भर से
मेरा हवाला तुम ही तुम
जो मेरे एहसास से खेल
मुझको वो दन-रात न दो
मेरी राह ब त अलग ह
जाओ मेरा साथ न दो

तुम चढ़ते सूरज के पुजारी
म रात का हमराही
तुम प क बाल से झूलो
म पगडंडी धूल भरी
मुझको ही मुझसे जो छु ड़ा द
ऐसे एहसासात न दो
मेरी राह ब त अलग ह
जाओ मेरा साथ न दो
तुम सोन-चाँद क छन-छन
म म का स धापन
तुम इक शहर का टे ढ़ा र ता
म गाँव का फैलापन
तुम आवाज़ क इक नया
स ाटे का साथ न दो
मेरी राह ब त अलग ह
जाओ मेरा साथ न दो

1. संभावनाएँ
2. दलच पी

खलौना
दे र से एक नासमझ ब चा
इक खलौने के टू ट जाने पर
इस तरह से उदास बैठा है
जैसे मैयत1 क़रीब र खी हो
और मरने के बाद हर-हर बात
मरने वाले क याद आती हो
जाने या- या ज़रा तव कुफ़2 से
सोच लेता है और रोता है
ले कन इतनी ख़बर कहाँ उसको
ज़ दगी के अजीब हाथ म
ये भी म का इक खलौना है

1. शव
2. दे र

मेरी ज़म
मेरी ज़म 1 यारी ज़म
तू आ माँ से है बड़ी
जस क बल द क क शश2
अ छ तो है स ची नह
ले कन ये तेरा वहम3 है
म तुझ से कट कर भी कभी
स ते-सफ़र4 छू पाऊँगा
तू जब भी चाहे थाम ले
ये पाँव जन से ह सफ़र
के फ़ासल म जुअत5
सब कुछ तो तेरे दम से है
मेरी ज़म यारी ज़म
तू तो मरी र तार6 है
क़दम क पहरेदार है
तू ही मरा इज़हार7 है
तू ही मरा ग़म वार8 है
मेरी ज़म यारी ज़म

1. ज़मीन, धरती
2. आकषण
3. म
4. या ा
5. साहस
6. ग त
7. कट, प, अ भ

8. हमदद, सहानुभू त करने वाला

शहीद का पैग़ाम
मुह बत के चराग़ को धुआँ होने नह दे ना
ज़मी के कंकर को आसमाँ होने नह दे ना
गुलाब क महक को बेजबाँ1 होने नह दे ना
महाज़े-जंग2 से रह-रह के ये आवाज़ आती है
शहीद के ल को रायगाँ3 होने नह दे ना
जो रात से मली हो उस सहर4 से फ़ासला रखना
खुले दल क मुलाक़ात 5 से शर6 का फ़ासला रखना
जो आँख को लड़ा दे उस नज़र से फ़ासला रखना
महाज़े-जंग से रह-रह के ये आवाज़ आती है
शहीद के ल को रायगाँ होने नह दे ना
बस इक इ साफ़ क शमएँ जल घर-घर उजाला हो
हमारी नेकनामी का जहाँ7 म बोलबाला हो
ख़रीदे वो न हमको जसने ख़ुद को बेच डाला हो
महाज़े-जंग से रह-रह के ये आवाज़ आती है
शहीद के ल को रायगाँ होने नह दे ना
सम दर क हद तय ह कोई यासा न रह जाये
अँधेर के इशार पर दया जलता न रह जाये
हमारे जान दे ने का बस इक क़ सा न रह जाये

महाज़े-जंग से रह-रह के ये आवाज़ आती है
शहीद के ल को रायगाँ होने नह दे ना

1. मूक, चुप
2. यु
े , लड़ाई का मैदान
3. थ
4. भोर
5. भट
6. बुराई
7. नया

अदना1 सा बासी
कल भी मेरी यास पे द रया हँसते थे
आज भी मेरे दद का दमा2 कोई नह
म इस धरती का अदना सा बासी ँ
सच पूछो तो मुझ सा परेशाँ कोई नह
कैसे-कैसे वाब बुने थे आँख ने
आज भी उन वाब सा अज़ा3 कोई नह
कल भी मेरे ज म भुनाये जाते थे
आज भी मेरे हाथ मे दामाँ4 कोई नह
कल मेरा नीलाम कया था ग़ैर ने
आज तो मेरे अपने बेचे दे ते ह
सच पूछो तो मेरी ख़ता5 बस इतनी है
म इस धरती का अदना सा बासी ँ

1. तु छ
2. इलाज
3. स ता
4. आँचल, दामन
5. गुनाह, दोष

सयासत1 के नाम
हमने ल ज को एतबार2 दया
तूमने जीते जी उनको मार दया
हमने दल जोड़ने का काम कया
तुमने ज़ेहन 3 को इ तशार4 दया
हमने बस यार बाँटना चाहा
तुमने नफ़रत का कारोबार कया
काश, तुमको कोई बता दे ता
तुमने ज़ेहन को जो ग़बार5 दया
एक कुस ज़ र जीत गये
तुमने ह दो तान हार दया

1. राजनी त
2. व ास
3. मन
4. बेचैनी
5. धूल

31 अ टू बर 1984 का ग़मगीन शाम के नाम
वो एक फूल क प ी गुलाब क ख़ुशबू
हज़ार काँट म रह कर, जो मु कुराती थी
जो आँ धय के मुक़ा बल1 दये जलाती थी
ज़म को फूल बनाने का एहतमाम2 रहा
तमाम उमर जसे ज़ दगी से काम रहा
वो एक फूल क प ी गुलाब क ख़ुशबू
बखर के रह गयी इस एतबार के हाथ
जसे बनाने म स दय का हौसला दरकार
जसे गँवाने म ल ह क गुमरही3 काफ़
वो एक फूल क प ी गुलाब क ख़ुशबू
कुछ ऐसी बखरी क आँसू पे इ तयार नह
कुछ ऐसी बखरी क आँख पे एतबार नही
कुछ ऐसी बखरी क माहौल4 सोगवार लगे
ये सारा बाग़ ही जैसे गुनाहगार5 लगे

1. मुक़ाबले म सामना
2. इ तज़ाम, ब ध
3. पथ ता
4. वातावरण
5. दोषी

शहर मेरा
शहर मेरा उदास गंगा सा
कोई भी आये और अपने पाप
खो के जाता है धो के जाता है
आग का खेल खेलने वाले
ये नह जानते क पानी का
आग से बैर है हमेशा का
आग कतनी ही ख़ौफ़नाक सही
उसक लपट क उ थोड़ी है
और गंगा के साफ़ पानी को
आज बहना है कल भी बहना है
जाने कस- कस का दद सहना है
शहर मेरा उदास गंगा सा

वाब नह दे खा है
मने मु त से कोई वाब नह दे खा है
रात खलने का गुलाब से महक आने का
ओस क बूँद म सूरज के समा जाने का
चाँद सी म के ज़रा1 से सदा2 आने का
शहर से र कसी गाँव म रह जाने का
खेत ख लहान म बाग म कह गाने का
सुबह घर छोड़ने का, दे र से घर आने का
बहते झरन क खनकती ई आवाज़ का
चहचहाती ई च ड़य से लद शाख़ 3 का
नर गसी4 आँख म हँसती ई नादानी का
मु कुराते ए चेहरे क ग़ज़ल वानी5 का
तेरा हो जाने तरे यार म खो जाने का
तेरा कहलाने का तेरा ही नज़र आने का
मने मु त से कोई वाब नह दे खा है
हाथ रख दे मरी आँख पे न द आ जाये

1. कण
2. आवाज़
3. डा लय
4. नर गस क तरह
5. ग़ज़ल पढ़ना

एक न म
द वाली क रात आयी है तुम द प जलाये बैठ हो
मासूम उमंग को अपने सीने से लगाये बैठ हो
त वीर को मेरी फूल क ख़ुशबू म बसाये बैठ हो
आँख के नशीले डोर पर काजल को बठाये बैठ हो
म र कह तुमसे बैठा इक द प क जा नब1 तकता ँ
इक ब म2 सजाये र खी है इक दद जगाये रखता ँ
ख़ामोशी मेरी साथी है और दे खने वाला कोई नह
ऐ काश! कह से आ जाते जीने का बहाना कोई नह

1. ओर, तरफ़
2. सभा, गो ी

ख़ुदकुशी1
ख़ामोशी और शब का स ाटा
एक म एक तेज़रौ2 द रया
घ सल म छु पे ए पंछ
दल लरज़ता आ प र द का
र साधू क एक कु टया म
जल रहा है दया मगर चुप है
कस क़दर बे हसी3 का जीना है
नौहा4 जारी है नौहागर5 चुप है
कौन सा दद है जसे दल म
ले के त हाइय म आता ँ
ये मक़ामात सोचते ह गे
रोज़ आता ँ लौट जाता ँ
आज इक साल हो गया ख़ा लद
जब इसी गोमती के पानी को
तुमने फूल क सेज समझा था
और ठु करा दया जवानी को
फ़ े -रोज़ी6 मआले-ख़ु ारी7
एक कुनबे क ज़ दगी का सवाल
छोटे भाई क छू टती तालीम8
छोट बहन क शा दय का ख़याल
यार करती रही मगर शमसा
तुमसे अहदे -वफ़ा1 नभा न सक
मुफ़ लसी ऐसा एक शोला थी
जसको कोई हवा बुझा न सक

जानलेवा थे सारे ग़म ख़ा लद
मने माना क तुम परेशां थे
ले कन ऐ दो त! कैसे भूल गये
तुम बहरहाल एक इ साँ थे
तुमने अ छा नह कया साथी
ख़ुदकुशी को इलाजे-ग़म समझा
मौत क बरतरी2 को मान लया
और इक ज़ दगी को कम समझा
शमआ जलती है आँ धय म भी
दद बन जाते तुम दल के लए
इस मुसलसल जहाद3 म ख़ा लद
तुमको जीना था सर के लए
ज़ दगी क उदा सय म भी
सोचने के लए ब त कुछ था
सोचने के लए ब त कुछ था
ले कन अब हो तो कुछ नह सकता

1. आ मह या
2. ती गामी
3. नल जता
4. दन
5. दन करने वाला
6. आजी वका क च ता
7. वा भमान का प रणाम
8. श ा, पढाई
1. वचन, त ा
2. े ता
3. संघष

मेरी त वीर
वो दन क तुमने मुझे पहली बार दे खा था
मुझे कहाँ मरी त वीर को जो कॉ नस पर
मरी ख़मोश क़ताब के साथ र खी थी
यह कौन ह मरी बहन से तुमने पूछा था
उ ह तो लगता है जैसे कह पे दे खा था
जवाब उनसे तु ह या मला ये तुम जानो
मगर ये कहती थ तुम भी क उनक जुअत पर
हया के बोझ से नज़र न उठ सक फर भी
ज़बाँ से कुछ न कहा तुमने इस शरारत पर
अदा से रख के झुक आँख पर हथेली को
शु हे म डाल दया था हर इक सहेली को
वो दन क सारे ज़माने क आँख से बच कर
मरे ख़याल म रहने क आरज़ू क थी
नज़र के सामने त वीर रख के रात के
मरी ख़मोश नगाह से गुतगू क थी
हर एक शेर को ख़लवत म गुनगुनाया था
ख़मो शय म तर ुम मरा चुराया था
कसी बहाने से आय तुम और आती रह
वफा़ के साज़ ह का ऱ स होता रहा
तक लुफ़ात उठे और तुम अजनबी न रह

हसीन ज फ़ के साये म यार सोता रहा
क़रीब रह के मुह बत क मं ज़ल समझ
ब त सी रात बड़ी एह तयात से गुज़र
मरा ख़याल क़ताब से र रहने लगा
तु हारी याद मरा काफ़ व त लेने लग
सहे लयाँ तु ह मग़ र कह के छोड़ गय
तुम अपना व त मरी शायरी को दे ने लग
तु हारी आँख म छु प कर सु र रहने लगा
मुझे वफ़ा पे अपनी ग़ र रहने लगा
लब का पाक तब सुम लब क हद म रहा
दल क बात नगाह तक आ के लौट गय
तुम एक रोज़ अनोखी सी एह तयात के साथ
मरी खुली ई बाँह तक आ के लौट गय
ये एक ऐसी अदा थी ज़बाँ से कुछ न कहा
बस एह तराम से बाँह को अपनी चूम लया
मगर चराग़ हमेशा कह नह जलते
ये ज़ दगी है ज़माने के साथ चलती है
ख़ुशी क उ का, ल हे हसाब करते ह
हसीन हो ते मुह बत नज़र बदलती है
ये हा दसात कहाँ तक ख़ला म पलते
कहाँ तक अपनी मुह बत के मशग़ले चलते
तु हारी पाक मुह बत पे बदगुमाँ नज़र
उठ ई थ मगर फर भी आ रही थ तुम
तु हारे आने म वो बेतक लु़फ़ न रही
अब एक र म थी जसको नभा रही थ तुम

बनी ई थ मुह बत का इ तहाँ नज़र
कस एह तयात से उठती थी बेज़बाँ नज़र
तुम इ तहान के हर दौर से गुज़रती रह
अदा से शमए - मुह बत मगर जलाये ए
कुछ आरज़ूएँ मुह बत क मौत मरती रह
मरे ख़याल को हर साँस म छु पाये ए
ख़मो शय म सदा का रंग भरती रह
तग़ युरात क फ़तरत से जंग करती रह
तु हारे दल म ख़मोशी क आग जाग उठ
मरे ख़याल म उभरे नये नये ख़ाके
हमारे माथे क शकन उभर के डू ब गय
हम ने मल के बग़ावत के वाब भी दे ख़े
मगर ज़माने के आगे हमारी इक न चली
जो उठ चुक थी वो आँधी दय से क न सक
तु हारे पास शराफ़त क पासदारी थी
जसे ज़माना कोई अह मयत नह दे ता
तु हारे पास हया का हसीन ज़ेवर था
जसे यहाँ पे कोई मु त भी नह लेता
मरे ख़ुदा ने दया आदमी ने छ न लया
तु ह रवाज़ क शोख़ी ने मुझसे छ न लया
तु हारे घर म अमारत का एह तमाम न था
क जससे ज म क बोली लगायी जाती है
फर इन ज़मीरफ़रोश का तज रबा भी न था
जो सूद लेते ह औलाद क जवानी से
ख़ज़ाँ से दे ते ह ज े बहार का बदला

वसूल करते ह मासूम यार से क़ज़ा
ज़माना अपने तरीक़ पे नाज़ करता है
म र रहने पे मजबूर हो गया तुमसे
रवाजो-र मो-मुक़ र क पासबानी म
क़रीब आ के ब त र हो गया तुमसे
रवायत का गराया आ सँभल न सका
क़दम उठाये मगर अपनी राह चल न सका
ये मु तसर सी कहानी चलो तमाम ई
नये सफ़र को नया दल बना लया तुमने
इन एतबारफ़रोश क ब तय से र
चराग़े-शामे-ग़रीबाँ जला लया तुमने
सहर क नूर मज़ाजी सुपुद-शाम ई
ये मु तसर सी कहानी चलो तमाम ई
मगर ये प बदलना तु ह न रास आया
तु हारे दल को नये मशग़ले न जीत सके
चराग़ तेल क क़ लत से टम टमा उ ा
तबीब5 आये इलाज के बाद लौट गये
रग म फैल गयी पदादारे-ग़म न ई
कुछ ऐसी आग थी दल क दवा से कम न ई
मरज तु हारा दवा से मात खा न सका
अजीब ज़ म थे दल के क मु द मल न ए
अजल क़रीब थी फर भी नफ़स क ब दश म
वो दद थे क हवा म मु त क़ल न ए
तु हारे पास से गुज़रा क़रीब जा न सका
ये इ फ़ाक़ तु ह दे खने भी आ न सका

ज़माना अपने कये पर ब त पशेमाँ था
मगर उदास बग़ावत के आगे इक न चली
अब एह तमामे-चराग़ाँ से ब म या सजती
चता म आग लगाते रहे चता न जली
हर एह तमाम के बाव फ़ ज़ म भर न सका
मरी उदास नगाही को ख़ म कर न सका
इधर शबाब मरा शायरी म ढलने लगा
उधर तबीब के हाथ से न ज़ छू ट गयी
इधर म शेर म दल का ल उगलने लगा
उधर तु हारी जवानी क शाम आ प ँची
जमी ई थ नगाह फ़राज़े-सा हल पर
अब अपने पाँव सफ़र म थे आँख मं ज़ल पर
ग़म क आँख मरी बेकसी पे भर आयी
मरे लब का तब सुम ने साथ छोड़ दया
तु हारे बाद मरी ज़ी त म ख़मोशी थी
क जस को मेरे ही शेर ने मल के तोड़ दया
न जाने कैसे ये साँस म डू ब कर आयी
तु हारी याद हर इक शेर म उतर आयी
तुम आज मेरी इयादत को य चली आय
तु ह तो ख़ुद भी अब आराम क ज़ रत ह
ये उतरा-उतरा सा चेहरा ये मु म हल से नुकुश
तग़ युरात से मुझको बड़ी शकायत है
अजब तरह से सुमे-हयात अपनायी
ये तुम हो या है तु हारी वफ़ा क परछाई
तुम आ गयी हो तो कुछ याद आ रहा है मुझे

मरी नगाह के आगे क़ताब माज़ी है
मगर ये सोच के पाये ख़याल क से गये
क मेरा हाल ही मेरा जवाबे-माज़ी है
म मुतमइन ँ क इक ग़म उठा रहा है मुझे
बड़ी अदा से ज़माना मटा रहा है मुझे
ये दे ख लो वही कमरा है जसम पहली बार
मरे शबाब क त वीर तुमने दे खी थी
तु हारे सामने कॉ नस है और वही त वीर
वह पे र खी है उस दन जहाँ पे र खी थी
मगर े म के शीशे पे जम गया है ग़बार
बता रही ह फ़ज़ाएँ ब त उड़ा है ग़बार
ग़बार जसने तु ह र कर दया मुझसे
नगाह भर के तु ह दे ख भी नह सकता
तु ह भी मेरे ख़दो-खाल या नज़र आय
न जाने कब तक उठे गा ये ख़ाक का पदा
वो ख़ाक जसने तु ह र कर दया मुझसे
ग़बार जसने मरा वाब ले लया मुझसे

जवाँ नज़र
वो एक रेलवे वाटर क एक खड़क से
लगी ई कोई नादान नौजवाँ लड़क
खड़ी है और मुझे इस तरह दे खे जाती है
क जैसे मेरी नगाह म अपनी नौउ ी
डु बो चुके तो कसी से नज़र मलायेगी
कस एतमाद1 से अपनी नज़र क क ती2 को
मरी नगाहो के तूफ़ाँ म डाल र खा है
क मेरे दल क तह को उतर के छू आये
ये कम सनी के गु ल ताँ3 के गुलबदन4 शोला
ब त हस तो नह है मगर जवानी ने
गुदाज़5 ज म को चनगा रय म गूँधा है
नज़र को गम -ए-ज बात ने तपाया है
म एक रेल के ड बे म जसका वाटर से
बरायेनाम सा कुछ फ़ासला रहा होगा
ये बैठा सोच रहा ँ क रा ता चलता
म अजनबी ँ जसे कोई हमसफ़र भी मरा
न जानता है न अपनाइयत क नज़र से
ग़रीब दल म उतरने का क़ द6 रखता है
मगर ये फ़ासला इस इक जवाँ नज़र म नह
जो बारे-शम उठाते ए झझकती है
जो सफ़ मेरे लए बार-बार उठती है
ये ल हा भर के लए हो क मु त के लए
जवान नज़र का आपस म इक तअ लुक़ है
जसे भुला के ये फ़तरत से लड़ नह सकत
कह मल ये मगर अजनबी नह होत

1. व ास
2. नाव
3. फुलवारी
4. फूल जैसे कोमल और मृ ल अंग वाली
5. मांसल
6. इ छा, कामना

द वाने दो
सफ़ एहसासे-जुदाई से बहलते रहना
लड़खड़ाते ए क़दम से सँभलते रहना
बेकसी और ये उतरा आ चेहरा शब का
म अकेला ँ मरे साथ ही चलते रहना
और कुछ दे र चराग़ , अभी जलते रहना
अभी उ मीद क नज़र म चमक बाक़ है
अभी इन बेले क क लय म महक बाक़ है
उनके आने क तव क़ो1 तो नह है फर भी
सोचने के लए गु जाइश-ए-शक बाक़ है
सीख लूँ तुमसे ही मुम कन है सँभलते रहना
और कुछ दे र चराग़ , अभी जलते रहना
सोचता ँ कई उ मीदे -सहर म ह गे
कतने ही मेरी तरह और सफ़र म ह गे
अपनी मं ज़ल क तम ाएँ लये हसरत से
कतने अफ़साने अभी राहगुज़र म ह गे
तुम हवा के इराद को बदलते रहना
और कुछ दे र चराग़ , अभी जलते रहना
ढल चुक रात आ ब द लबे-ज़ म- जगर
रह गयी दल म अँधेर के, तम ा-ए-सहर
कोई आया न इधर रात के स ाट म

मु त ज़र ही रही मासूम

क नज़र

अब कस उ मीद पे कह ँ क बहलते रहना
और कुछ दे र चराग़ो, अभी जलते रहना
थक गया दद ठहरने लगे साँस के क़दम
ग़म के एहसास से घुटने लगा उ मीद का दम
नाउमीद ने उमीद को कहाँ छोड़ दया
खुल न जाये मरी ख़ामोश मुह बत का भरम
उ भर मेरी तरह आग म जलते रहना
रास आया न तु ह भी ये पघलते रहना
तुम भी बुझ जाओ मरे दल को भी बुझ जाने दो
आ ख़री बार मरी आँख को भर आने दो
आज क रात मुह बत पे गराँ गुज़रेगी
ख़ म हो जायगे इक साथ ही द वाने दो

1. अपे ा

आँसूफ़रोश1
म दल के ज़ म का एक ता जर2 म एक आँसूफ़रोश शायर
म ज़ दगी के उदास चेहरे क झु रयाँ बेचने चला ँ
नज़र क त ालबी3 क मने मज़ाजे-फ़न4 म समो दया है
सयाह5 रात से जो मली ह वो त ख़याँ बेचने चला ँ
गुनाहगार आँख के इशारे पलक से ढलके ए सतारे
थमी ई तीरगी6 के साये मटे - मटे रोशनी के ख़ाके
लुटे ए कारवाँ का माज़ी शक त खाये ए इरादे
म मुदा इ सा नयत के दामन क ध जयाँ बेचने चला ँ
ख़ुलूस क ज़ दगी के लाले वफ़ा का ख़ूँ जान क तबाही
झुक नगाह क कजअदाई7 जवान ह टो क बेवफ़ाई
नये ज़माने क तंज़ख़ूई8 हसीन माज़ी क बेसबाती
हज़ार ह टो क बात करती ख़मो शयाँ बेचने चला ँ
कोई ख़रीदो क बात करती ख़मो शयाँ बेचने चला ँ
कोई ख़रीदो क आज ख़ु ा रय 9 का माथा झुका आ है
कोई ख़रीदो क आज फ़नकार ज़ दा रहना भी चाहता है
ख़फ़ फ़10 नज़र से अपने फ़न को हर एक चेहरे को दे खता है
ये ल हा तारीख़ ही का दे दो क उसका माज़ी से सल सला है
हर ऐसे ल हे को इक अमानत बना के तारीख़11 ने र खा है

मगर अमानत बना के रखने का सल सला कब तलक रहेगा
रग से फ़नकार क कहाँ तक ये क़तरा-क़तरा ल

1. आँसू बेचनेवाला
2. ापारी
3. यास
4. कला
5. काली
6. अंधेरे
7. खापन
8. ं य करने क आदत
9. आ मा भमान
10. हलक नगाह, वहंगम
11. इ तहास
12. र

12

बहेगा

ऐ वाबे-सफ़र
ऐ वाबे-सफ़र1 ताबीरे-सफ़र2
ऐ स ते-सफ़र तक़द रे-सफ़र3
ले सारे गले बेजान ए
तू अपनी शकायत पर ना दम4
म अपने लखे पर श म दा
अब आ क बुन एक वाब नया
जो आँख -आँख सफ़र करे
जो ज ब को बे जगर करे
जो यार क ख़ुशबू से जागे
जो क़ब5 के ज़ानू पर सोये
म तुझसे मुह बत क नया
माँगूँ तो मुझे मल ही जाये
तू चाँद को छू ना चाहे तो
म चाँद ज़म पर ले आऊँ
म यासे ह ट दखाऊँ तो
सात सम दर ज करे
तू मुझम समाना चाहे तो
शक़6 हो जाऊँ धरती क तरह
म क़लम उठाऊँ लखने को
तू ल ज़ बने शहकार1 बने
तू यार के नग़मे गाये तो
म गीत बनूँ म हार बनूँ
तू जुगनू का अरमान करे
म मु खोल के दन दे ँ
म एक करन क बात क ँ ,

तू सूरज डाल दे क़दम म
तू या है कैसे बतलाऊँ
म ल ज़ कहाँ से लाऊँगा
तू कौन है कसको समझाऊँ
म ख़ुद से बछड़ना चा ँगा
ऐ हे-सफ़र ऐ जाने-सफ़र
ऐ ने-सफ़र इ काने-सफ़र
तू ऐसे सम दर र ते को
य लहर सा कोई नाम ही दे
इस झूठनुमा स चाई को
या तय है कोई इ ज़ाम ही दे

1. या ा का व
2. या ा का फल
3. या ा का भा य
4. श म दा
5. नज़द क
6. दो फाड़
1. अ यु म कृ त

क़लम बरदा ता1
तू क पद म भी, नुमायाँ भी
तू क मु कल भी, और आसाँ भी
तू क ख़ामो शय क नया भी
तू क इज़हार का सलीक़ा भी
तेरी आँख क रोशनी का सफ़र
मेरी परछाइय के सीने पर
एक वादे पे एतबार क बात
दे र तक अपने इ तज़ार क बात
तुझको ऐ काश यह पता होता
तेरा उस रोज़ लापता होना
कैसे-कैसे सवाल करता था
जतना जीता था उतना मरता था
फर कई दन अजीब हाल रहा
सामने इक बड़ा सवाल रहा
लखना चाहा तो लख नह पाया
शकवा करना मुझे नह आया
आज तेरी तवील न म2 के साथ
ज़ेहन म आ रही है ऐसी बात
जसको ल ज़ से छू ते डरता ँ
डू बता ँ न पार उतरता ँ
म तो बस झूठ ँ बनावट ँ
अपनी ही बदगुमान आहट ँ
म दखाव क राह का राही
मेरी आदत सभी क दलदारी
मेरे ज बे सदाकत 1 से परे

मेरे र ते महज़2 दखावे के
म आ आसमान का तारा
और तू एक म का ज़रा
इ त मेरी बरतरी मेरी
और सारी अज़ीयत3 तेरी
सबको बहलाना मेरी फ़तरत4 है
यानी ये यार मेरी आदत है
अपने झूठे चलन से ज़ दा ँ
और तरे स चेपन से डरता ँ
ल ज़ सब झूठे और बेमानी
यानी मेरा वुजूद सैलानी
मुझको इस तरह सोचने वाले
तू तअ लुक़ का दद या जाने
झूठ उस पर कहाँ करेगा यक़
सच बताने का जस पे व त नह
वो दखावे का दद या सहता
अपने हाथ म जो नह रहता
फर भला मुझसे बदगुमानी य
इतनी बेर त-सी कहानी य
मेरी स चाइय पे शक करना
है गुनाह से जोड़ना र ता
मेरे बारे म ऐसा य सोचा
क म अपनी नज़र से गरने लगा
मेरे बारे म अपनी सोच बदल
एक ल बे सफ़र पे साथ नकल
धूप को चाँदनी बनाने तक
ज सहना है मु कराने तक
ज़ दगी पहले ही उदास-सी है
इक करन वो भी बदहवास सी है
रोशनी को असीर1 करने तक
साथ दे आफ़ताब2 उभरने तक

1. आशुलेख
2. क वता
1. स चाइय
2. मा
3. यातनाएँ
4. आदत
1. क़ैद
2. सूरज

गीत

छोट -छोट ख़ु शयाँ अपनी
छोट -छोट ख़ु शयाँ अपनी छोटे -छोटे ग़म
हम या जान स ाधम तेरे द न-धरम
पेट क आग बुझाने भर को फरते मारे-मारे
घर का सपना दे ख-दे ख के नैन ए बंजारे
खेत के सीने से उपजे अपना हर मौसम
हम या जान स ाधम तेरे द न-धरम
खेत पड़ा है गरवी जैसे ग़ैर के घर, घरवाली
अपने बाग़ क सेवा से वं चत है बाग़ का माली
क़ज़ा कैसे उतरे बाँटे कौन कसी का ग़म
हम या जान स ाधम तेरे द न-धरम
छोरी भई सयानी लागी च ता बड़ी महान
बयाही जाने से गोहने तक पल-पल सद समान
शहनाई बजते ही जैसे फूट पड़े सरगम
हम या जान स ाधम तेरे द न-धरम
ग़मी कसी के घर हो सगरे गाँव जले न चू हा
बन आशीवचन बूढ़ के, बने न कोई हा
क या इक घर से ही जाये घर-घर आँख नम
हम या जान स ाधम तेरे द न-धरम

जवान का अ भन दन
धरती के अनमोल सतार ! तुम एक दौर का दपण हो,
धरती के अनमोल सतार ख़ून बहाकर धरती माँ क लाज बचाने वाल !
कल क र ा करने वाल ! आज बचाने वाल ।
ऐ इ तहास के राज लार ! तुम एक दौर का दपण हो,
हन के स र, तु हारे माथे तलक लगाय
बहन र ाब धन वाला वादा, याद दलाय!
माँ ख़ुद बढ़कर कहे सघारो! तुम एक दौर का दपण हो,
धरती के अनमोल सतार न द क ब ल दे कर तुमने कतने वाब बचाये,
खेत का जा फ़ ल क ख़ुशबू कोई लूट न पाये।
सीमा के पहरेदार ! तुम एक दौर का दपण हो,
धरती के अनमोल सतार घोर अँधेर म इक अनबूझ द प जलाने वाल !
एक मज़लूम क डू बती क ती पार लगाने वाल !
ऐ मयादा के पतवार ! तुम एक दौर का दपण हो,
धरती के अनमोल सतार -

सजन, म भूल गयी ये बात
तू अ बर क आँख का तारा मेरे छोटे हाथ
सजन, म भूल गयी ये बात
तुझको सारे मन से चाहा, चाहा सारे तन से
अपने पूर पन से चाहा और अधूरेपन से
पानी क इक बूँद कहाँ और कहाँ भरी बरसात
सजन, म भूल गयी ये बात
जनम-जनम माँगूँगी तुझको तू मुझको ठु कराना
म माट म मल जाऊँगी तू माट हो जाना
लहर के आगे या इक छोटे तनके क औक़ात
सजन, म भूल गयी ये बात
तेरी ओर ही दे खा मने अपनी ओर न दे खा
जब-जब बढ़ना चाहा पाँव से लपट ल मण रेखा
म अपने भी साथ नह थी तेरे नया साथ
सजन, म भूल गयी ये बात

डू बी जाऊँ
तेरी एक नज़र ही मुझको धूप से कर गयी छाँव
सजन, ये बात कसे बतलाऊँ
तन क तपती रेत पे जैसे फुहार गरे शबनम क
कैसी ल जाहीन छु अन पापी तेरे मौसम क
बदरा-बदरा सेज सजाऊँ धूप-धूप शमाऊँ
सजन, ये बात कसे बतलाऊँ
कल तक जस दरपन म म थी और मरे वीराने
आज उसी दरपन म तू ही तू है तू या जाने
मेरे अ दर चोर छु पा है जाने कब चुर जाऊँ
सजन, ये बात कसे बतलाऊँ
रोज़ के दे खे भाले मंज़र आज कुछ और कहे ह
नया भर क न दयाँ जैसे मेरे साथ बहे ह
कैसा कनारा हाथ म आया है क डू बी जाऊँ
सजन, ये बात कसे बतलाऊँ

ब द आ हर ार
जीवन के इस मोड़ पे जैसे छू ट गया संसार
क जैसे

ठ गया संसार

क वता बाज़ार म लायी याद का योहार
त हाई से र ता माँगा स ाट से यार
सुर सागर म छोड़ के मुझको टू ट गया हर तार
क जैसे

ठ गया संसार

सपन के नीलाम पे रोयी आँख क ख़ु ारी
सागर-सागर डू ब के उभरी यास क इक चगारी
साये को मुहताज ई है ज म क ये द वार
क जैसे

ठ गया संसार

चेहरे क वहा रकता से दरपन टू टा जाये
कल से आज का आज से कल का दामन छू टा जाये
गली-गली स ाटा जागे ब द आ हर ार
क जैसे

ठ गया संसार

अभी अ यास नह
र भी रहना आ जायेगा मन को अभी अ यास नह
जीवन भर यासा रहना है पल दो पल क यास नह
र भी रहना आ जायेगा मन को अभी अ यास नह
शाम ढले याद क खड़क का हर पट खुल जाये
पायल गूँजे चूड़ी बाजे कंगन कान म गाये
साथ मरा ठु करानेवाले कब तू मेरे पास नह
र भी रहना आ जायेगा मन को अभी अ यास नह
न द के अधर पर अब भी तेरी ही बात ह
आहट-आहट च क पड़े ह या मन रात ह
तू मेरे व ास को लूटे मुझको अभी व ास नह
र भी रहना आ जायेगा मन को अभी अ यास नह
दल का या था इक दरपन जो ठे स लगी और टू टा
दे ह के मेले म या आये ज म का नाता टू टा

टू ट- बखर जाने के आगे दरपन का इ तहास नह
र भी रहना आ जायेगा मन को अभी अ यास नह
दरपन-दरपन
अपना चेहरा खो कर पगला दरपन-दरपन ढूँ ढ रहा है
ज म क द वार म रह कर मन का आँगन ढूँ ढ रहा है
खँडहर म रात को इक आवाज़ अकेली जागे
गूँगे प थर बात न पूछ हीर पुकार राँझे
सारे ब धन तोड़ने वाला यार का ब धन ढूँ ढ रहा है
मन का आँगन ढूँ ढ रहा है
फूल क ख़ुशबू को छू ने क फ़ म उ गुज़ारी
जीते प े हाथ म ले कर जीवन बाज़ी हारी
हार को जीत बना ले अपनी ऐसा साधन ढूँ ढ रहा है
मन का आँगन ढूँ ढ रहा है
र त के ापार म पड़ कर जीवन दाँव लगाये
प थर खाये प थर पूजे प थर ही अपनाये
काँट के अ धकार म रह कर फूल का दामन ढूँ ढ रहा है
मन का आँगन ढूँ ढ रहा है

आशा

क होली

बरहा क अ न म जल गयी आशा क होली
आज मरा स ाटा मुझसे खेले आँख- मचोली
याद क क तूरी लये म शहर -शहर जाऊँ
वाब क जंज़ीर ग़म क हरनी को पहनाऊँ
तपती धूप म कब तक मन क क ची आग बुझाऊँ
बाज़ार म कौन लगाये अनजाने क बोली
आज मरा स ाटा मुझसे खेले आँख- मचोली
नील गगन पर तारे जैसे ज म क बारात
चाँद अकेला जैसे त हा त हाई क बात
रात उजाली हो कर भी है अँ धयार के साथ
आस का या है जसने पुकारा साथ उसी के हो ली
आज मरा स ाटा मुझसे खेले आँख- मचोली
गहरे द रया म खो कर भी मोती हाथ न आये
द रया क लहर ने दे खो या- या रंग दखाये
तूफ़ाँ-तूफ़ाँ ज़ म उठाये मौज-मौज टकराये
और आ यह सा हल-सा हल अपनी नाव डु बो ली
आज मरा स ाटा मुझसे खेले आँख- मचोली
इ क़ है आग लगाने वाला है जीवन एक अलाव
कब तक घुलने ँ साँस म त हाई के घाव
कब से नैना खोज रहे ह कह नज़र तो आओ

ऐसे दे श बसा ँ जसम कोई न समझे बोली
आज मरा स ाटा मुझसे खेले आँख- मचोली

ख़ुशबू आँगन-आँगन जाये
बाँसु रया वो गीत क जससे ब ती का सूनापन जाये
नग़म का वो फूल क जस क ख़ुशबू आँगन-आँगन जाये
बाँसु रया वो गीत क जससे ब ती का सूनापन जाये
चेहर के इस शहर म जैसे सब जाने-अनजाने
नफ़रत क वो धूल अट है कौन कसे पहचाने
धम के नाम पे बहने वाले ख़ून का यह स तापन जाये
बाँसु रया वो गीत क जससे ब ती का सूनापन जाये
महल -महल दन नकले ह कु टय -कु टय रात
अ दे श के शहर खड़ी है सपन क बारात
बूढ़े उपदे श क ग लय अब या बाग़ी यौवन जाये
बाँसु रया वो गीत क जससे ब ती का सूनापन जाये
पूजा के फूल पर भी लालच क ओस पड़ी है
ल जत-ल जत ेम क दे वी आस के ार खड़ी है
इ सानी उपहार के सर से वाथ का यह पागलपन जाये
बाँसु रया वो गीत क जससे ब ती का सूनापन जाये

तोड़ गया सावन
धरती को अ बर से जोड़ गया सावन
जोड़ा कुछ ऐसे क तोड़ गया सावन
बूँदो म उतर सम दर सी बात
बाहर के होट पे अ दर क बात
भीगे
को नचोड़ गया सावन
जोड़ा कुछ ऐसा क तोड़ गया सावन
मन म छड़ ऐसी बेनाम जंग
अँगड़ाई भी ले न पाय उमंग
ह ट को यास से जोड़ गया सावन
जोड़ा कुछ ऐसा क तोड़ गया सावन
धरती को बाँह म भरने क वा हश
पगो से आकाश छू ने क को शश
झूल को हलता ही छोड़ गया सावन
जोड़ा कुछ ऐसे क तोड़ गया सावन
गूँगे पहाड़ से बचता-बचाता
बेजान खँडहर पे आँसू बहाता
नाजक क लयाँ मरोड़ गया सावन
जोड़ा कुछ ऐसे क तोड़ गया सावन

पकड़े न मन का चोर
अमुवा क डाली पे कोय लया कूके मोर मचाये शोर
सजन कोई पकड़े न मन का चोर
साँस क गम से काया पघले कोई न जाने भेद
मेरी इक अँगड़ाई से बच कर गुज़र चार वेद
म इक आग क चढ़ती न दया तू ही मेरा ज़ोर
सजन कोई पकड़े न मन का चोर
जल क मछरी जल जग जाने, जल बाहर अ ान
अ दर-बाहर शोर न हो तो जंगल भी सुनसान
तू जो थामे हाथ तो बैरी घटे हवा का ज़ोर
सजन कोई पकड़े न मन का चोर

भला म मानूँ कसक बात
आँख कहे क दन नकला है दल ये कहे है रात
भला म मानूँ कसक बात
चौराह क भीड़ म खोयी चेहर क पहचान
शौक़ से अब इ सान के प म आ जाये भगवान
कुछ होता है कुछ दखता है कुछ लगता है हाथ
भला म मानूँ कसक बात
म दर चुप है म जद चुप है नफ़रत बोल रही है
और सयासत ज़हर कहाँ तक प ँचा तोल रही है
कुछ के लए ये आग का मौसम कुछ के लए बरसात
भला म मानूँ कसक बात
ज म को आग लगाने पर मजबूर है पेट क आग
फूल ने अंगारे पहने घर-घर प ँची आग
कोई उसे कहता प रवतन कोई सयासी1 घात
भला म मानूँ कसक बात
औरत के स मान से बढ़ कर औरत क मजबूरी
मद को पूरा करने ही म औरत ई अधूरी
जनम-जनम उसक हो जाये जसको थमा दो हाथ

भला म मानूँ कसक बात

1. राजनी तक

मेरा यार न हो तो
धरती कैसे अनाज उगाये, अ बर या पानी बरसाये
मेरा यार न हो तो साजन र तलक सूखा पड़ जाये
हरा भरा सब मेरे दम से बाक़ सब कुछ धूल
मेरे कारण फूल म ख़ुशबू वना फूल भी शूल
मेरे यार को छू जाये तो म भी सोना हो जाये
मेरा यार न हो तो साजन र तलक सूखा पड़ जाये
हँसते-गाते मेले-ठे ले रंग भरे योहार
पया मलन क आस न हो तो सब के सब बेकार
यार जगे तो घूँघट का अ भमान धरा र खा रह जाये
मेरा यार न हो तो साजन र तलक सूखा पड़ जाये
यार नगर तक आने वाले सारे र ते चोर
फर भी उन र त पर आने वाल का इक शोर
मयादाएँ आस बँधाएँ हर ब धन र ता दखलाये
मेरा यार न हो तो साजन र तलक सूखा पड़ जाये
धुआँ-धुआँ शहर म टू टे वन का पागल शोर
आँख क सीमा से आगे बढ़े न मन का चोर
मेरे यार क उँगली थामे कलयुग भी सतयुग हो जाये
मेरा यार न हो तो साजन र तलक सूखा पड़ जाये

पछतावे
सपने जैसा यौवन उड़ती ततली जैसा यार
कह मल जाये फर इक बार
फूल म बस कर रह जाऊँ ख़ुशबू के पर कत ँ
पायल क आवाज़ को अपने पाँव से बाँध के र खूँ
पतझर पर अब कभी न खुलने ँ गी अपने ार
कह मल जाये फर इक बार
सावन को चुनरी कर लूँ साँस म रख लूँ बूँद
बाँह के घेरे म ले लूँ चाँद क यासी करन
उ से अब के छ न ही लूँगी ढलने का अ धकार
कह मल जाये फर इक बार
कैसे-कैसे भावुक पल अ भमान क भट चढ़ाये
साजन म ख़ुद सोयी और तुझे तारे गनवाये
अब न कभी जीतूँगी मने मानी ऐसी हार
कह मल जाये फर इक बार

लहर जैसा यार
झील जैसा मनवा मेरा लहर जैसा यार
क मेरा लहर जैसा यार
स ाटे क चादर ओढ़े सोये सगरा गाँव
पाँव क पायल खोल के अपने पया से मलने जाऊँ
सीना मेरा घायल कर दे साँस क तलवार
क मेरा लहर जैसा यार
कौन सा भेद बताऊँ स खय कौन सा भेद छु पाऊँ
गाँव क चौपाल से गुज़ ँ साँस रोकती जाऊँ
मोरी जीत भी ऐसी लागे जैसे मोरी हार
क मेरा लहर जैसा यार
दरपन क चौखट पर पहर खड़ी-खड़ी शरमाऊँ
पछली साँझ का वादा तोड़ के मन ही मन पछताऊँ
इस संसार म मेरे अपने व का इक संसार
क मेरा लहर जैसा यार
प क बाली क तरह मेरा ज म झकोले खाये
अनजानी बाँसु रयाँ क लय पर मनवा लहराये
यौवन के मँझधार से काँपे मयादा पतवार
क मेरा लहर जैसा यार

स खय से ही मलना चा ँ उनसे ही कतराऊँ
अपने मन क गहराई म ख़ुद ही डू बती जाऊँ
इक जे को घूर रहे ह नैया और पतवार
सजनवा लहर जैसा यार

न आये शहर म ऐसी रात
फूल जैसे र ते छू टे ख़ुशबू जैसे हाथ
न आये शहर म ऐसी रात
माँ क आँख का तारा खोया बाप का एक सहारा
घर से नकला ही यूँ था जो घर को लौट न पाया
जीवन ठहरा हाँफता पंछ , मौत के ल बे हाथ
न आये शहर म ऐसी रात
स ाटे का सीना चीर गयी इक अ धी गोली
बहरे ए बरस के र ते गूँगी यार क बोली
कस क जीत का ज मनाये आँसू क बरसात
न आये शहर म ऐसी रात
ख़ूब ई ब ती म वीरान म आँख मचोली
ख़ूब खली और ख़ूब ही खेली सबने ख़ून क होली
कोई तो हो जो इतना कहे या आया कसके हाथ
न आये शहर म ऐसी रात

मेरे गाँव क म
मेरे गाँव क म तेरी महक बड़ी अलबेली
तेरा भोलापान नया क सबसे बड़ी पहेली
तेरे आँगन म उतरे ह स चे-स चे मौसम
तू अपने सीधे-सीधे रंग से भारी-भरकम
तेरे सामने या लगते ह बेला जूही चमेली
तेरी महक बड़ी अलबेली
भोर भये, फसल अँगड़ाई ल जाग ख लहान
खेत म सूरज उतरे तो करन लग कसान
तू स दय से एक ही जैसी फर भी नयी नवेली
तेरी महक बड़ी अलबेली
सावन के झूल म झूल ज म के अंगारे
पगे भरती उ चढ़ती न दयाँ बहते धारे
कोई है उन म लाज लारी कोई बड़ी खुल खेली
तेरी महक बड़ी अलबेली
ह रयाली को दे ख-दे ख के अपना आपा आँके
घूँघट म रह कर भी गोरी सात सम दर झाँके
आँख उठा कर दे ख ले जस को उसका अ ला बेली
तेरी महक बड़ी अलबेली